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सोनमछली by डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

(Contd. from page 8...)

यहां अमरीका में नौकरी का अर्थ भारत से बहुत अलग है| आप खुद नौकरी न कर रहे हों तब तो यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि लोग बहुत निष्ठा से काम करते हैं| लेकिन, कोल्हू में पिलने का दर्द तो बैल ही जानता है| काम आपसे ज़िन्दगी का सारा रस ही खींच ले, यह किसे पसन्द आएगा? पर, वरण की स्वतंत्रता तो आप पीछे ही छोड़ आते हैं| यह समाज तो Hire And Fire में विश्वास करता है| और, यहां Fire हो जाने का मतलब बहुत गहरा है| बहुतों के लिए काम न होने का एक अर्थ अमरीका में रहने के अधिकार का खत्म हो जाना भी होता है| कोई भी Fire नहीं होना चाहेगा| और इसलिए, प्रसन्न होने का अभिनय करते हुए काम में पिले रहना पड़ता है|

अमरीका में लम्बे समय तक गोरे और काले के बीच गहरा भेदभाव बरता जाता रहा है| अब स्थितियां बहुत बेहतर हैं| लेकिन मनुष्य स्वभाव का क्या करेंगे आप? इस अनुभूति का क्या करेंगे कि ये विदेशी (आप पढ़ें : हिन्दुस्तानी) यहां आकर हमारे रोज़गार के अवसर कम कर रहे हैं| यह कोई नहीं देखता, या जान बूझकर अनदेखा करता है कि अपने देश के संसाधनों का उपयोग कर वहां पढ़ लिख कर ये लोग इस देश (अमरीका) की समृद्धि में योगदान कर रहे हैं| नज़र आता है तो बस यह कि इनके कारण हमारे यहां बेरोज़गारी बढ़ रही है| बड़े स्थानों व पदों पर क्योंकि शालीन, अभिनय पटु लोग होते हैं, यह अनुभूति सतह के नीचे दबी रहती है, किंतु छोटे काम करने वालों के समक्ष प्रकट हो जाती है| प्रकट न भी हो, अनुभव तो होती ही है| देव आनन्द ने कभी 'देस परदेस' बनाई थी और महेंद्र भल्ला ने 'दूसरी तरफ' लिखा था|

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