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सोनमछली by डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल(Contd. from page 7...)
किसी ठीक-ठाक रेस्तरां में एक वक़्त का खाना : 50 डॉलर| सिनेमा का एक टिकिट : 10 डॉलर| घण्टे दो घण्टे का कार पार्किंग शुल्क : 10 डॉलर| एक कप कॉफी : 5 डॉलर| हेयर कटिंग : 15 डॉलर| एक बार घर की सफाई : 80 डॉलर| क्या-क्या गिनाऊं? तो, यह सब खर्च करने के लिए काम तो करना ही है| दोनों को| लेकिन तब पारिवारिक जीवन? काम-काज, नौकरी की व्यस्तता और तनाव| इनके बीच रिश्तों की ऊष्मा को बनाये रखना भी खासा प्रयत्न साध्य हो जाता है| दरअसल यह पूंजीवाद का चरित्र ही है कि वह पहले आपको वैभव की चमक-दमक दिखाकर अपनी तरफ आकृष्ट करता है, आपकी जीवन शैली को अपने सांचे में ढालता है, आपको बहुत सारी सुख सुविधाओं का अभ्यस्त बनाता है; फिर तो आप खुद ही उसके व्यूह में ऐसे फंस जाते हैं कि उस 'स्तर' का निर्वाह करने के लिए निरंतर अधिक खपने-पचने को (अनचाहे भी) विवश होते हैं| यानि तब कम्बल ही बाबाजी को नहीं छोड़ता है| तो, भारत से लोग जिस वैभव की चमक-दमक से खिंच कर अमरीका आते हैं, धीरे-धीरे वह उनकी एक ऐसी ज़रूरत बन जाता है उसे चाह कर भी छोड़ पाना मुश्किल होता है| ‘चाह कर’ पर मैं जान-बूझ कर बल दे रहा हूं| आप क्यों कमाते हैं? इसलिए कि अपने कमाये का सुख ले सकें - या कि महज़ इसलिए कि और अधिक खर्च कर सकें? धीरे-धीरे खर्च करना ही आपकी ज़रूरत बनता जाता है| खर्च का सुख उठाने की तो फुर्सत ही कहां बचती है?
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