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सोनमछली by डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल(Contd. from page 6...)अब यही बात लें कि यहां की कार्य-संस्कृति भारत की कार्य-संस्कृति से भिन्न है| वैसे, क्या भारत में कोई कार्य संस्कृति है भी? यहां तो जब आपको काम करना है तो सब कुछ को भूलकर काम ही करना है| अधिकतर कम्प्यूटर प्रोफेशनल सुबह आठ बजे दफ्तर जाते हैं और रात नौ बजे भी लौट आएं तो गनीमत है| फिर, घर आकर भी दफ्तर का काम, जो कई बार सुबह के दो-तीन बजे तक भी चलता रहता है| यह अपवाद नहीं, आम है| छुट्टियां बहुत ही कम| बावज़ूद इस बात के कि यहां सप्ताह में पांच दिन ही काम होता है, काम का यह आधिक्य और दबाव मारक नहीं लगता? पति-पत्नी दोनों ही काम करते हों तो और भी अधिक| अपना जीवन स्तर बनाये रखने के लिए दोनों का काम करना ज़रूरी भी है| वेतन डॉलर में मिलता है| एक अमरीकी डॉलर करीब पचास रुपये का होता है| अमरीकी वेतन को भारतीय मुद्रा में रूपांतरित करने पर सुखद आश्चर्य तथा गर्व होता है, लेकिन जब उस बहुत बड़ी राशि को यहां के खर्चों के सामने रख कर देखते हैं तो गुब्बारे की हवा निकलने लगती है| कामकाजी युवा दम्पती की यह विवशता होती है कि वे अपनी संतान को डे केयर सेंटर में छोड़ कर काम पर जाएं| डे केयर सेंटर यहां बहुत अच्छे हैं| एक डे केयर सेंटर हमने देखा| अच्छा था| लेकिन उसकी फीस? न ही पूछें तो बेहतर| मात्र 1800 डॉलर प्रति माह| यानि कोई एक लाख रुपये प्रति माह| भले ही पति पत्नी दोनों काम करते हों, और उनकी तनख्वाह भी लाखों में हो, इस तरह के खर्चे जो आपको अर्श से फर्श पर उतार लाएं, कम नहीं हैं| हर चीज़ महंगी है|
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