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सोनमछली by डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल(Contd. from page 4...)
हम लोग अपनी पिछली यात्रा में करीब डेढ़ महीना यहां रह कर गए| उस दौरान अपने एक पड़ोसी दम्पती की तो एक बार भी शक्ल नहीं देखी| बस, उनके घर की चिमनी से निकलते धुंए से यह एहसास होता कि इस घर में कोई रहता है| दूसरे पड़ोसी दम्पती को कभी-कभार आते-जाते देख लेते| एक दूसरे के घर आना-जाना दूर की बात है, दुआ सलाम तक नहीं| यह बाद में पता चला कि हमारे बेटी-दामाद और उनके बांये-दांये वाले पड़ोसी - तीनों एक ही दफ्तर, माइक्रोसॉफ्ट में काम करते हैं| निश्चय ही भारतीय परिवारों में खूब आना-जाना तथा सुख-दुख में भरपूर सहभागिता है, पर जिस आपसदारी के संस्कार हममें घुले मिले हैं उसका अभाव न खटके यह असम्भव है| सिएटल में हो सकता है यह अभाव न भी खटकता हो, क्योंकि सम्बंध रखने के लिये भारतीय खूब हैं, पर जिन शहरों में भारतीय नहीं या नहीं के बराबर हैं वहां क्या होता होगा? अमरीकी लोगों का भारतीयों के यहां आना-जाना नहीं जैसा ही है| इसे रंग भेद से जोड़ कर न देखें| यह उनकी जीवन शैली ही है| तीज-त्यौहार पर अपना देश याद न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता| क्रिसमस और नया साल यहां के सबसे बड़े पर्व-त्यौहार हैं| अन्य भी अनेक त्यौहार हैं| खूब धूम-धड़ाका, मौज-मस्ती रहती है| क्रिसमस का उल्लास लगभग नवम्बर से ही प्रारम्भ हो जाता है| इस सबसे आप अछूते क्यों रहें? खुशियां बांटने में हर्ज़ ही क्या है? हैलोवीन पर भारतीय भी अपने घरों के बाहर कद्दू रखते हैं, अमरीकी स्वाधीनता दिवस (4 जुलाई) पूरे उल्लास से मनाते हैं और क्रिसमस पर रोशनी की झालर सजाते हैं|
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