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सोनमछली by डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

(Contd. from page 3...)

अगर बाहर खाना ही पड़ जाए (और नौकरी में तो ऐसे अवसर आते ही रहते हैं) तो आपके विकल्प अत्यधिक सीमित हो जाते हैं| अगर आप घोर शाकाहारी न भी हों, सर्वभक्षी भी हों, तो भी स्वाद और पाक विधी की भिन्नता को स्वीकार करना आसान नहीं होता| तन्दूरी या मुगलई सामिष भोजन के आदी को अमरीकी भोजन लगभग अग्राह्य ही लगता है| और जहां तक घर पर खाना पकाने की बात है, उन शहरों में जहां भारतीय बहुतायत में हैं, जैसे इस रेडमण्ड/सिएटल में, यहां तो सारी भारतीय खाद्य सामग्री मिल जाती है, लेकिन जिन स्थानों पर भारतीयों का ऐसा जमावड़ा नहीं है वहां तो आप दाल, घी, आटा तक के लिए तरस जाते हैं| यह ठीक है कि धीरे-धीरे आप ‘जो है जैसा है’ के आदी होते जाते हैं, पर कमी तो खटकती ही है|

अमरीका में वैसी आपसदारी, मुहल्लेदारी नहीं है जिसके कि हम भारतीय अभ्यस्त हैं| कुछ तो व्यस्तताएं और कुछ जीवन शैली तथा सोच| अमरीका में हर व्यक्ति अपनी निजता (Privacy)को इतना महत्वपूर्ण मानता है कि भारत जैसी आपसदारी कल्पनातीत हो जाती है| व्यस्तताएं तो हैं ही| काम के प्रति इनका दृष्टिकोण हमसे बहुत भिन्न है| हर आदमी वाकई अपनी पूरी क्षमता भर, बल्कि उससे भी कुछ अधिक ही, काम करता है| एक देश के रूप में अमरीका की सफलता का राज़ भी इसी में छिपा है| पर इस बात पर कम ही ध्यान जाता है कि काम के प्रति यह जुनून आदमी के साथ नाइंसाफी भी करता है|

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