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सोनमछली by डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

(Contd. from page 2...)

एक भिन्न भाषा उसे कहना गलत न होगा| इन सबका आदी होने में वक़्त तो लगता ही है| प्रयत्नसाध्य भी कम नहीं है यह सब| कुछ चीज़ों को आप अपना लेते हैं, कुछ को स्वीकार करना मुश्किल लगता है| शायद कभी-कभी ‘न उगलते बने, न निगलते’ वाली स्थिति भी आ जाती हो| मैं सोचता हूं, भारत से, खासकर किसी छोटे कस्बे से आने वाली युवती जिसने अपने देश में सलवार सूट के सिवा शायद ही कुछ पहना हो, और जो अगर नव विवाहिता भी हो तो ढेरों चूड़ियों, बिन्दी, बिछुए, पायल, चमचमाते सिन्दूर के बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर पाती हो, जब जीन्स और टी शर्ट जैसी अपेक्षाकृत सम्मानजनक (अन्यथा आम तौर पर तो शॉर्ट और बनियान नुमा कुछ) वेशभूषा को अपनाने को तथा अपने बहुत सारे प्रसाधनों – सुहाग चिह्नों को छोड़ने को विवश होती होगी तो उसे कैसा लगता होगा? यह ठीक है कि अमरीका में कोई आपके कपड़ों की चिंता नही करता, कोई उस पर टिप्पणी भी नहीं करता, लेकिन आप अजूबा बन कर तो काम पर नहीं जा सकते| काम की छोड़ें, बाज़ार भी नहीं जा सकते| आप खुद ही अपने को असहज महसूस करने लगेंगे| ‘जैसा देश वैसा भेस’ यूं ही नहीं कह दिया गया था| इस कथन की ताकत यहीं आकर समझ में आती है| फिर, खानपान का मामला| जो लोग घोर शाकाहारी हैं, उनकी तो खैर मुसीबत है ही| बाहर, बाज़ार में ऐसा बहुत कम मिल पाता है जो हमारे मानदण्ड के अनुसार शाकाहारी हो| वस्तुत: शाकाहार की हमारी और इनकी अवधारणा में ज़मीन आसमान का फर्क़ है| यही कारण है कि इनका बहुत सारा शाकाहारी खाना भी भारतीय शाकाहारी के लिए अभक्ष्य होता है|

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