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सोनमछली by डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल(Contd. from page 9...)
एक पराये देश में रहना क्या होता है, इसका अनुभव दस-पंद्रह दिन के विदेश भ्रमण से नहीं हो सकता| तब तो केवल चमक-दमक-खनक और सुख-सुविधाएं ही नज़र आती हैं| यही दिखता है कि यह देश कितना विकसित है| सब कुछ हरा ही हरा दिखता है| लेकिन जब आप तसल्ली से इन लोगों की ज़िन्दगी देखते हैं तब यह समझ में आता है कि बिना घरेलू नौकर के घर को साफ-सुथरा रखना कितना प्रयत्न-साध्य होता है, या पूरे पांच दिन दफ्तर में खटने के बाद जब छठे-सातवें दिन घर में खटना पड़ता है तो कैसा लगता है! सुबह जाकर देर रात लौटने पर खाना बनाने की बात तो छोड़िये, फ्रिज में जो बचा खुचा है उसे खाना भी दुश्वार लगता है| आप कभी-कभार रेस्तरां में जाएं यह आपका सुख है, पर जब मज़बूरी में जाएं तो खाना स्वादिष्ट होते हुए भी स्वादिष्ट नहीं लगता| अबोध शिशु को डे केयर सेंटर में या नैनी के भरोसे छोड़कर काम पर जाना कोई सुखद अनुभूति नहीं दे सकता| एक शिष्ट, शालीन, शानदार समाज में रहने का तमाम सुख इन अनुभवों के कारण एकदम शून्य हो जाता है| तब यह महसूस होता है कि यह समाज चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, आपका अपना नहीं है| कमलेश्वर और नई कहानी के शुरुआती दौर के उनके साथी अनेक कथाकारों ने अजनबीपन के जिस दंश का चित्रण अपनी अनेकानेक कहानियों में किया था, वह यहां कई गुना ज़्यादा महसूस होने लगता है| उन लोगों ने तो गांव से शहर आकर खो जाने की ही पीड़ा व्यक्त की थी , यहां तो पीड़ा अपने देश से बहुत दूर चले आने की तथा नानाविध होती है|
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