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आज के झूलाघर, कल के वृद्धाश्रम by डॉ. महेश परिमल(Contd. from page 1...)
यह समाज की सच्चाई है कि झुर्रीदार चेहरा हमेशा हाशिए पर होता है। तट का पानी हमेशा बेकार होता है और जीवन की साँझ का मुसाफिर हमेशा भुला दिया जाता है। जिस तरह डूबते सूरज को कोई नमन नहीं करता, उसी तरह अनुभव की गठरी बने बुजुर्ग को भी कोई महत्व नहीं देता। वह केवल घर के एक कोने पर रखी हुई जर्जर मेज की तरह उपेक्षित ही रहता है, जिस पर कभी कबाड़ी की नजर भी जाती है, तो तिरस्कार के भाव से, इसके साथ ही उसे कम से कम पैसे में खरीद लेने की चाहत होती है। बुजुर्गों पर हमेशा यह आरोप लगाया जाता है कि वे समय के साथ नहीं चलते, सदैव अपने मन की करना और कराना चाहते हैं। उन्होंने जो कुछ भी सीखा, उसे अपने बच्चों पर लादना चाहते हैं। उनके मन का कुछ न होने पर वे बड़बड़ाते रहते हैं। उनका यह स्वभाव आज के युवाओं को बिलकुल नहीं भाता। कहते हैं कि बुढ़ापे के साथ बचपन भी आ जाता है। बच्चों को एक बार सँभाला भी जा सकता है, पर बुजुर्गों को सँभालना बहुत मुश्किल होता है। ये सारे आरोप अपनी जगह पर सही हो सकते हैं। पर इसे ही यदि स्वयं को उनके स्थान पर रखकर सोचा जाए, तो कई आरोप अपने आप ही धराशायी हो जाते हैं। रही बात नई पीढ़ी के साथ कदमताल करने की, तो कौन कहता है कि ये नई पीढ़ी के साथ कदमताल नहीं करना चाहते। क्या कभी किसी सास या बुजुर्ग महिला को अपनी बेटी या बहू के साथ स्कूटी पर पीछे बैठकर मंदिर जाते या शापिंग करने जाते नहीं देखा गया है? यही नजारा सुबह किसी पार्क में भी देखा जा सकता है, जहाँ बुजुर्ग दौड़ लगाते हुए देखे जा सकते हैं, या फिर किसी नवजवान को कसरत के सही तरीके बताते हुए देखे जा सकते हैं।
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