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Dasbodh dashak - 20 by स्वामी रामदास समर्थ

[Oct 31, 2007]

.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक २० .. दशक विसावा. . : . .
पूर्णनामदशक समास पहिला. . : . . पूर्णापूर्णनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
 प्राणीव्यापक मन व्यापक| पृथ्वी व्यापक तेज व्यापक | वायो आकाश त्रिगुण व्यापक| अंतरात्मा मूळमाया || १||
निर्गुण ब्रह्म तें व्यापक| ऐसें अवघेंच व्यापक | तरी हें सगट किं काये येक| भेद आहे || २||
आत्मा आणि निरंजन| येणेंहि वाटतो अनुमान | आत्मा सगुण किं निर्गुण| आणि निरंजन || ३||
श्रोता संदेहीं पदिला| तेणें संदेह वाढला | अनुमान धरून बैसला| कोण तो कैसा || ४||
ऐका पहिली आशंका| अवघा गल्बला करूं नका | प्रगट करून विवेका| प्रत्यये पाहावा || ५||
शरीपाडें सामर्थ्यपाडें| प्राणी व्याप करी निवाडें | परी पाहतां मनायेवढें| चपळ नाहीं || ६||
चपळपण येकदेसी| पूर्ण व्यापकता नव्हे त्यासी | पाहातां पृथ्वीच्या व्यापासी| सीमा आहे || ७||
 तैसेंचि आप आणि तेज| अपूर्ण दिसती सहज | वायो चपळ समज| येकदेसी || ८||
गगन आणि निरंजन| तें पूर्ण व्यापक सघन | कोणीयेक अनुमान| तेथें असेचिना || ९||
त्रिगुण गुणक्षोभिणी माया| माईक जाईल विलया | अपूर्ण येकदेसी तया| पूर्ण व्यापकता न घडे || १०||
आत्मा आणि निरंजन| हें दोहिकडे नामाभिधान | अर्थान्वये समजोन| बोलणें करावें || ११||
आत्मा मन अत्यंत चपळ| तरी हें व्यापक नव्हेचि केवळ | सुचित अंतःकर्ण निवळ| करून पाहावें || १२||
 अंतराळीं पाहातां पाताळी नाहीं| पाताळीं पाहातां अंतराळीं नाहीं | पूर्णपणें वसत नाहीं| चहुंकडे || १३||
पुढें पाहातां मागें नाहीं| मागें पाहातां पुढें नाहीं | वाम सव्य व्याप नाहीं| दशदिशा || १४||
चहुंकडे निशाणें मांडावीं| येकसरीं कैसीं सिवावीं | याकारणें समजोन उगवी| प्रत्ययें आपणासी || १५||
 सूर्य आला प्रतिबिंबला| हाहि दृष्टांत न घडे वस्तुला | वस्तुरूप निर्गुणाला| म्हणिजेत आहे || १६||
घटाकाश मठकाश| हाहि दृष्टांत विशेष | तुळूं जातां निर्गुणास| साम्यता येते || १७||
ब्रह्मींचा अंश आकाश| आणी आत्म्याचा अंश मानस | दोहींचा अनुभव प्रत्ययास| येथें घ्यावा || १८||
गगन आणि हें मन| कैसे होती समान | मननसीळ महाजन| सकळहि जाणती || १९||
मन हें पुढें वावडे| मागें आवघेंचि रितें पडे | पूर्ण गगनास साम्यता घडे| कोण्या प्रकारें || २०||
 परब्रह्मचि अचळ| आणि पर्वतासहि म्हणती अचळ | दिनीही येक केवळ| हें कैसें म्हणावें || २१||
ज्ञान विज्ञान विपरितज्ञान| तिनी कैसीं होती समान | याचा प्रत्ययो मनन| करून पाहावा || २२||
 ज्ञान म्हणिजे जाणणें| अज्ञान म्हणिजे नेणणें | विपरितज्ञान म्हणिजे देखणें| येकाचें येक || २३||
 जाणणें नेणणें वेगळें केलें| ढोबळें पंचभूतिक उरलें | विपरीतज्ञान समजलें| पाहिजे जीवीं || २४||
द्रष्टा साक्षी अंतरात्मा| जीवात्माची होये शिवात्मा | पुढें शिवात्मा तोचि जीवात्मा| जन्म घेतो || २५||
 आत्मत्वीं जन्ममरण लागे| आत्मत्वीं जन्ममरण न भंगे | संभवामि युगे युगे| ऐसे हें वचन || २६||
जीव येकदेसी नर| विचारें जाला विश्वंभर | विश्वंभरास संसार| चुकेना कीं || २७||
ज्ञान आणि अज्ञान| वृत्तिरूपें हें समान | निवृत्तिरूपें विज्ञान| जालें पाहिजे || २८||
ज्ञानें येवढें ब्रह्मांड केलें| ज्ञानें येवढें वाढविलें | नाना विकाराचें वळलें| तें हें ज्ञान || २९||
 आठवें देह ब्रह्मांडीचें| तें हें ज्ञान साचें | विज्ञानरूप विदेहाचें| पद पाविजे || ३०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे पूर्णापूर्णनिरूपणनाम समास पहिला ||

समास दुसरा. . : . . सृष्टीत्रिविधलक्षणनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
मूळमाया नस्तां चंचळ| निर्गुण ब्रह्म तें निश्चळ | जैसें गगन अंतराळ| चहुंकडे || १||
दृश्य आलें आणि गेलें| परी तें ब्रह्म संचलें | जैसें गगन कोंदाटलें| चहुंकडे || २||
जिकडे पाहावें तिकडे अपार| कोणेकडे नाहीं पार | येकजिनसी स्वतंत्र| दुसरें नाहीं || ३||
ब्रह्मांडावरतें बैसावें| अवकाश भकास अवलोकावें | तेथें चंचळ व्यापकाच्या नांवें| सुन्याकार || ४||
 दृश्य विवेकें काढिलें| मग परब्रह्म कोंदाटलें | कोणासीच अनुमानलें| नाहीं कदा || ५||
अधोर्ध पाहातां चहुंकडे| निर्गुण ब्रह्म जिकडे तिकडे | मन धांवेल कोणेकडे| अंत पाहावया || ६||
दृश्य चळे ब्रह्म चळेना| दृश्य कळे ब्रह्म कळेना | दृश्य आकळे ब्रह्म आकळेना| कल्पनेसी || ७||
कल्पना म्हणिजे कांहींच नाहीं| ब्रह्म दाटले ठाईंचा ठाईं | वाक्यार्थ विवरत जाई| म्हणिजे बरें || ८||
परब्रह्मायेवढें थोर नाहीं| श्रवणापरतें साधन नाहीं | कळल्याविण कांहींच नाहीं| समाधान || ९||
पिप्लीकामार्गें हळु हळु घडे| विहंगमें फळासी गांठी पडे | साधक मननीं पवाडे| म्हणिजे बरें || १०||
परब्रह्मासारिखें दुसरें| कांहींच नाहीं खरें | निंदा आणि स्तुतिउत्तरें| परब्रह्मीं नाहीं || ११||
ऐसे परब्रह्म येकजिनसी| कांहीं तुळेना तयासी | मानुभव पुण्यरासी| तेथें पवाडती || १२||
 चंचळें होते दुःखप्राप्ती| निश्चळायेवडी नाहीं विश्रांती | निश्चळ प्रत्ययें पाहाती| माहानुभाव || १३||
 मुळापासून शेवटवरी| विचारणा केलीच करी | प्रत्ययाचा निश्चयो अंतरीं| तयासीच फावे || १४||
कल्पनेचि सृष्टी जाली| त्रिविध प्रकारें भासली | तिक्षण बुद्धीनें आणिली| पाहिजे मना || १५||
 मूळमायेपासून त्रिगुण| अवघें येकदेसी लक्षण | पांचा भूतांचा ढोबळा गुण| दिसत आहे || १६||
पृथ्वीपासून च्यारी खाणी| चत्वार वेगळाली करणी | सकळ सृष्टीचि चाली येथुनी| पुढें नाहीं || १७||
 सृष्टीचें विविध लक्षण| विशद करूं निरूपण | श्रोतीं सुचित अंतःकर्ण| केलें पाहिजे || १८||
 मूळमाया जाणीवेची| मुळीं सूक्ष्म कल्पनेची | जैसी स्थिती परे वाचेची| तद्रूपचि ते || १९||
अष्टधा प्रकृतीचें मूळ| ते हे मूळमायाच केवळ | सूक्ष्मरूप बीज सकळ| मुळींच आहे || २०||
जड पदार्थ चेतवितें तें| म्हणौन चैतन्य बोलिजेतें | सूक्ष्म रूपें संकेतें| समजोन घ्यावीं || २१||
 प्रकृती पुरुषाचा विचार| अर्धनारीनटेश्वर | अष्टधा प्रकृतीचा विचार| सकळ कांहीं || २२||
गुप्त त्रिगुणाचें गूढत्व| म्हणौन संकेत महत्तत्त्व | गुप्तरूपें शुद्धसत्व| तेथेंचि वसे || २३||
जेथून गुण प्रगटती| तीस गुणक्षोभिणी म्हणती | त्रिगुणाचीं रूपें समजती| धन्य ते साधु || २४||
गुप्तरूपें गुणसौम्य| म्हणौनि बोलिजे गुणसाम्य | सूक्ष्म संकेत अगम्य| बहुतांस कैंचा || २५||
मूळमायेपासून त्रिगुण| चंचळ येकदेसी लक्षण | प्रत्ययें पाहातां खूण| अंतरीं येते || २६||
पुढें पंचभूतांचीं बंडें| वाढलीं विशाळें उदंडें | सप्तद्वीपें नवखंडें| वसुंधरा हे || २७||
त्रिगुणापासून पृथ्वीवरी| दुसऱ्या जिनसान्याची परी | दोनी जिनस याउपरी| तिसरा ऐका || २८||
 पृथ्वी नाना जिनसाचें बीज| अंडज जारज श्वेतज उद्भिज | च्यारी खाणी च्यारी वाणी सहज| निर्माण जाल्या || २९||
खाणी वाणी होती जाती| परंतु तैसीच आहे जगती | ऐसे होती आणी जाती| उदंड प्राणी || ३०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे सृष्टीत्रिविधलक्षणनिरूपणनाम समास दुसरा ||

समास तिसरा. . : . . सूक्ष्मनामाभिधाननिरूपण . . . .
 || श्रीराम ||
मुळींहून सेवटवरी| विस्तार बोलिला नानापरी | पुन्हा विवरत विरत माघारी| वृत्ति न्यावी || १||
च्यारी खाणी च्यारी वाणी| चौऱ्यासी लक्ष जीवयोनी | नाना प्रकारीचे प्राणी| जन्मास येती || २||
अवघे होती पृथ्वीपासूनी| पृथ्वीमधें जाती नासोनी | अनेक येती जाती परी अवनी| तैसीच आहे || ३||
ऐसें हें सेंड्याकडिल खांड| दुसरें भूतांचें बंड | तिसरें नामाभिधानें उदंड| सूक्ष्मरूपें || ४||
स्थूळ अवघें सांडून द्यावें| सूक्ष्मरूपें वोळखावें | गुणापासून पाहिलेच पाहावें| सूक्ष्मदृष्टीं || ५||
गुणाचीं रूपें जाणिव नेणीव| पाहिलाच पाहावा अभिप्राव | सूक्ष्मदृष्टीचें लाघव| येथून पुढें || ६||
शुद्ध नेणीव तमोगुण| शुद्ध जाणीव सत्वगुण | जाणीवनेणीव रजोगुण| मिश्रित चालिला || ७||
त्रिगुणाचीं रूपें ऐसीं| कळों लागलीं अपैसीं | गुणापुढील कर्दमासी| गुणक्षोभिणी बोलिजे || ८||
रज तम आणि सत्व| तिहींचें जेथें गूढत्व | तें जाणिजे महत्तत्त्व| कर्दमरूप || ९||
प्रकृती पुरुष शिवशक्ति| अर्धनारीनटेश्वर म्हणती | परी याची स्वरूपस्थिती| कर्दमरूप || १०||
सूक्ष्मरूपें गुणसौम्य| त्यास बोलिजे गुणसाम्य | तैसेंचि चैतन्य अगम्य| सूक्ष्मरूपी || ११||
बहुजिनसी मूळमाया| माहांकारण ब्रह्मांडीची काया | ऐसिया सूक्ष्म अन्वया| पाहिलेंचि पाहावें || १२||
च्यारी खाणी पांच भूतें| चौदा सूक्ष्म संकेतें | काये पाहणें तें येथें| शोधून पाहावें || १३||
आहाच पाहातां कळेना| गरज केल्यां समजेना | नाना प्रकारीं जनाच्या मना| संदेह पडती || १४||
चौदा पांच येकोणीस| येकोणीस च्यारी तेविस | यांमधें मूळ चतुर्दश| पाहिलेंचि पाहावें || १५||
जो विवरोन समजला| तेथें संदेह नाहीं उरला | समजल्याविण जो गल्बला| तो निरर्थक || १६||
 सकळ सृष्टीचें बीज| मूळमायेंत असे सहज | अवघें समजतां सज्ज| परमार्थ होतो || १७||
समजलें माणूस चावळेना| निश्चइ अनुमान धरीना | सावळगोंदा करीना| परमार्थ कदा || १८||
शब्दातीत बोलतां आलें| त्यास वाच्यांश बोलिलें | शुद्ध लक्ष्यांश लक्षिलें| पाहिजे विवेकें || १९||
पूर्वपक्ष म्हणिजे माया| सिद्धांतें जाये विलया | माया नस्तां मग तया| काये म्हणावें || २०||
अन्वये आणी वीतरेक| हा पूर्वपक्षाचा विवेक | सिद्धांत म्हणिजे शुद्ध येक| दुसरें नाहीं || २१||
अधोमुखें भेद वाढतो| ऊर्धमुखें भेद तुटतो | निःसंगपणें निर्गुणी तो| माहांयोगी || २२||
माया मिथ्या ऐसी कळली| तरी मग भीड कां लागली | मायेचें भिडेनें घसरली| स्वरूपस्थिती || २३||
लटके मायेनें दपटावें| सत्य परब्रह्म सांडावें | मुख्य निश्चयें हिंडावें| कासयासी || २४||
पृथ्वीमधें बहुत जन| त्यामधें असती सज्जन | परी साधूस वोळखतो कोण| साधुवेगळा || २५||
म्हणौन संसार सांडावा| मग साधूचा शोध घ्यावा | फिरफिरों ठाइं पाडावा| साधुजन || २६||
उदंड हुडकावे संत| सांपडे प्रचितीचा महंत | प्रचितीविण स्वहित| होणार नाहीं || २७||
प्रपंच अथवा परमार्थ| प्रचितीविण अवघें वेर्थ | प्रत्ययेज्ञानी तो समर्थ| सकळांमध्यें || २८||
रात्रंदिवस पाहावा अर्थ| अर्थ पाहेल तो समर्थ | परलोकींच निजस्वार्थ| तेथेंचि घडे || २९||
म्हणौन पाहिलेंचि पाहावें| आणि शोधिलेंचि शोधावें | अवघें कळतां स्वभावें| संदेह तुटती || ३०||
 इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे सूक्ष्मनामाभिधाननिरूपणनाम समास तिसरा ||

समास चौथा. . : . . आत्मानिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
सकळ जनास प्रार्थना| उगेंच उदास करावेंना | निरूपण आणावें मना| प्रत्ययाचें || १||
 प्रत्यये राहिला येकेकडे| आपण धांवतो भलतेकडे | तरी सारासाराचे निवाडे| कैसे होती || २||
 उगिच पाहातां सृष्टी| गल्बला दिसतो दृष्टीं | परी ते राजसत्तेची गोष्टी| वेगळीच || ३||
पृथ्वीमधें जितुकीं शरीरें| तितुकीं भगवंताचीं घरें | नाना सुखें येणें द्वारें| प्राप्त होती || ४||
 त्याचा महिमा कळेल कोणाला| माता वांटून कृपाळु जाला | प्रत्यक्ष जगदीश जगाला| रक्षितसे || ५||
सत्त पृथ्वीमधें वांटली| जेथें तेथें विभागली | कळेनें सृष्टि चालिली| भगवंताचे || ६||
 मूळ जाणत्या पुरुषाची सत्ता| शरीरीं विभागली तत्वता | सकळ कळा चातुर्यता| तेथें वसे || ७||
सकळ पुराचा ईश| जगामध्यें तो जगदीश | नाना शरीरीं सावकास| करूं लागे || ८||
पाहातां सृष्टिची रचना| ते येकाचेन चालेना | येकचि चालवी नाना| देह धरुनी || ९||
नाहीं उंच नीच विचारिलें| नाहीं बरें वाईट पाहिलें | कार्ये चालों ऐसें जालें| भगवंतासी || १०||
किंवा नेणणें आडवें केलें| किंवा अभ्यासीं घातलें | हें कैसें कैसें केलें| त्याचा तोचि जाणे || ११||
 जगदांतरीं अनुसंधान| बरें पाहाणें हेंचि ध्यान | ध्यान आणी तें ज्ञान| येकरूप || १२||
प्राणी संसारास आला| कांहीं येक शाहाणा जाला | मग तो विवरों लागला| भूमंडळीं || १३||
प्रगट रामाचें निशाण| आत्माराम ज्ञानघन | विश्वंभर विद्यमान| भाग्यें कळे || १४||
उपासना धुंडुन वासना धरिली| तरी ते लांबतचि गेली | महिमा न कळे बोलिली| येथार्थ आहे || १५||
द्रष्टा म्हणिजे पाहाता| साक्षी म्हणिजे जाणता | अनंतरूपी अनंता| वोळखावें || १६||
संगती असावी भल्यांची| धाटी कथा निरूपणाची | कांहीं येक मनाची| विश्रांती आहे || १७||
त्याहिमधें प्रत्ययेज्ञान| जाळून टाकिला अनुमान | प्रचितीविण समाधान| पाविजेल कैंचें || १८||
मूळसंकल्प तो हरिसंकल्प| मूळमायेमधील साक्षेप | जगदांतरीं तेंचि रूप| देखिजेतें || १९||
उपासना ज्ञानस्वरूप| ज्ञानीं चौथा देह आरोप | याकारणें सर्व संकल्प| सोडून द्यावा || २०||
पुढें परब्रह्म विशाळ| गगनासारिखें पोकळ | घन पातळ कोमळ| काये म्हणावें || २१||
उपासना म्हणिजे ज्ञान| ज्ञानें पाविजे निरंजन | योगियांचें समाधान| येणें रितीं || २२||
विचार नेहटूनसा पाहे| तरी उपासना आपणचि आहे | येक जाये एक आहे| देह धरुनी || २३||
अखंड ऐसी घालमेली| पूर्वापार होत गेली | आतां हि तैसीच चालिली| उत्पत्ति स्थिती || २४||
बनावरी बनचरांची सत्ता| जळावरी जळचरांची सत्ता | भूमंडळीं भूपाळां समस्तां| येणेंचि न्यायें || २५||
सामर्थ्य आहे चळवळेचें| जो जो करील तयाचें | परंतु येथें भगवंताचें| अधिष्ठान पाहिजे || २६||
 कर्ता जगदीश हें तों खरें| परी विभाग आला पृथकाकारें | तेथें अहंतेचें काविरें| बाधिजेना || २७||
हरिर्दाता हरिर्भोक्ता| ऐसें चालतें तत्वता | ये गोष्टीचा आतां| विचार पाहावा || २८||
सकळ कर्ता परमेश्वरु| आपला माइक विचारु | जैसें कळेल तैसें करूं| जगदांतरें || २९||
देवायेवढें चपळ नाहीं| ब्रह्मायेवढें निश्चळ नाहीं | पाइरी चढोन पाहीं| मूळपरियंत || ३०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे आत्मानिरूपणनाम समास चौथा ||

समास पांचवा. . : . . चत्वारजिन्नसनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
येथून पाहातां तेथवरी| चत्वार जीनस अवधारीं | येक चौदा पांच च्यारी| ऐसें आहे || १||
परब्रह्म सकळांहून वेगळें| परब्रह्म सकळांहून आगळें | नाना कल्पनेनिराळें| परब्रह्म तें || २||
परब्रह्माचा विचार| नाना कल्पनेहून पर | निर्मळ निश्चळ निर्विकार| अखंड आहे || ३||
 परब्रह्मास कांहींच तुळेना| हा येक मुख्य जिनसाना | दुसरा जिनस नाना कल्पना| मूळमाया || ४||
 नाना सूक्ष्मरूप| सूक्ष्म आणी कर्दमरूप | मुळींच्या संकल्पाचा आरोप| मूळमाया || ५||
हरिसंकल्प मुळींचा| आत्माराम सकळांचा | संकेत नामाभिधानाचा| येणें प्रकारें || ñ

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