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Dasbodh dashak - 19 by स्वामी रामदास समर्थ

[Oct 31, 2007]

.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक १९ ..
दशक एकोणविसावा. . : . .
शिकवण समास पहिला. . : . . लेखनक्रियानिरूपण
|| श्रीरामसमर्थ ||
ब्राह्मणें बाळबोध अक्षर| घडसुनी करावें सुंदर | जें देखतांचि चतुर| समाधान पावती || १||
 वाटोळें सरळें मोकळें| वोतलें मसीचें काळें | कुळकुळीत वळी चालिल्या ढाळें| मुक्तमाळा जैशा || २||
 अक्षरमात्र तितुकें नीट| नेमस्त पैस काने नीट | आडव्या मात्रा त्या हि नीट| आर्कुलीं वेलांड्या || ३||
 पहिलें अक्षर जें काढिलें| ग्रंथ संपेतों पाहात गेलें | येका टांकेंचि लिहिलें| ऐसें वाटे || ४||
 अक्षराचें काळेपण| टांकाचें ठोसरपण | तैसेंचि वळण वांकाण| सारिखेंचि || ५||
वोळीस वोळी लागेना| आर्कुली मात्रा भेदीना | खालिले वोळीस स्पर्शेना| अथवा लंबाकार || ६||
 पान शिषानें रेखाटावें| त्यावरी नेमकचि ल्याहावें | दुरी जवळी न व्हावें| अंतर वोळींचे || ७||
 कोठें शोधासी आडेना| चुकी पाहातां सांपडेना | गरज केली हें घडेना| लेखकापसुनी || ८||
ज्याचें वय आहे नूतन| त्यानें ल्याहावें जपोन | जनासी पडे मोहन| ऐसें करावें || ९||
बहु बारिक तरुणपणीं| कामा नये म्हातारपणीं | मध्यस्त लिहिण्याची करणी| केली पाहिजे || १०||
भोंवतें स्थळ सोडून द्यावें| मधेंचि चमचमित ल्याहावें | कागद झडतांहि झडावें| नलगेचि अक्षर || ११||
ऐसा ग्रंथ जपोनी ल्याहावा| प्राणी मात्रास उपजे हेवा | ऐसा पुरुष तो पाहावा| म्हणती लोक || १२||
 काया बहुत कष्टवावी| उत्कट कीर्ति उरवावी | चटक लाउनी सोडावी| कांहीं येक || १३||
घट्य कागद आणावे| जपोन नेमस्त खळावे | लिहिण्याचे सामे असावे| नानापरी || १४||
 सुऱ्या कातऱ्या जागाईत| खळी घोंटाळें तागाईत | नाना सुरंग मिश्रित| जाणोनि घ्यावें || १५||
 नाना देसीचे बरु आणावे| घटी बारिक सरळे घ्यावे | नाना रंगाचे आणावे| नाना जिनसी || १६||
 नाना जिनसी टांकतोडणी| नाना प्रकारें रेखाटणी | चित्रविचित्र करणी| सिसेंलोळ्या || १७||
हिंगुळ संग्रहीं असावे| वळले आळिते पाहोन घ्यावे | सोपें भिजउनी वाळवावे| संग्रह मसीचे || १८||
 तगटी इतिश्रया कराव्या| बंदरी फळ्या घोटाव्या | नाना चित्रीं चिताराव्या| उंच चित्रें || १९||
नाना गोप नाना बासनें| मेणकापडें सिंदुरवणें | पेट्या कुलुपें जपणें| पुस्तकाकारणें || २०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे लेखनक्रियानिरूपणनाम समास पहिला ||

समास दुसरा. . : . . विवरणनिरूपण
|| श्रीरामसमर्थ ||
 मागां बोलिले लेखनभेद| आतां ऐका अर्थभेद | नाना प्रकारीचे संवाद| समजोन घ्यावे || १||
 शब्दभेद अर्थभेद| मुद्राभेद प्रबंधभेद | नाना शब्दाचे शब्दभेद| जाणोनी पाहावे || २||
नाना आशंका प्रत्योत्तरें| नाना प्रचित साक्षात्कारें | जेणें करितां जगदांतरें| चमत्कारती || ३||
नाना पूर्वपक्ष सिद्धांत| प्रत्ययो पाहावा नेमस्त | अनुमानाचे स्वस्तवेस्त| बोलोंचि नये || ४||
 प्रवृत्ति अथवा निवृत्ती| प्रचितीविण अवघी भ्रांती | गलंग्यांमधील जगज्जोति| चेतेल कोठें || ५||
 हेत समजोन उत्तर देणें| दुसऱ्याचे जीवीचें समजणें | मुख्य चातुर्याचीं लक्षणें| तें हें ऐसीं || ६||
चातुर्येंविण खटपट| ते विद्यादि फलकट | सभेमधें आटघाट| समाधान कैचें || ७||
बहुत बोलणें ऐकावें| तेथें मोन्यचि धरावें | अल्पचिन्हें समजावें| जगदांतर || ८||
 बाष्कळामधें बैसो नये| उद्धटासिं तंडों नये | आपणाकरितां खंडों नये| समाधान जनाचें || ९||
 नेणतपण सोडूं नये| जाणपणें फुगो नये | नाना जनाचें हृदये| मृद शब्दें उकलावें || १०||
 प्रसंग जाणावा नेटका| बहुतांसी जाझु नका | खरें असतांचि नासका| फड होतो || ११||
शोध घेतां आळसों नये| भ्रष्ट लोकीं बैसों नये | बैसलें तरी टाकूं नये| मिथ्या दोष || १२||
अंतर आर्ताचें शोधावें| प्रसंगीं थोडें चि वाचावें | चटक लाउनी सोडावें| भल्या मनुष्यासी || १३||
मज्यालसींत बैसों नये| समाराधनेसी जाऊं नये | जातां येळीलवाणें होये| जिणें आपुलें || १४||
उत्तम गुण प्रगटवावे| मग भलत्यासी बोलतां फावे | भले पाहोन करावे| शोधून मित्र || १५||
उपासनेसारिखें बोलावें| सर्व जनासि तोषवावें | सगट बरेंपण राखावें| कोण्हीयेकासी || १६||
ठाईं ठाईं शोध घ्यावा| मग ग्रामीं प्रवेश करावा | प्राणीमात्र बोलवावा| आप्तपणें || १७||
उंच नीच म्हणों नये| सकळांचें निववावें हृदये | अस्तमानीं जाऊं नये| कोठें तऱ्ही || १८||
जगामधें जगमित्र| जिव्हेपासीं आहे सूत्र | कोठें तऱ्ही सत्पात्र| शोधून काढावें || १९||
कथा होती तेथें जावें| दुरी दीनासारिखें बैसावें | तेथील सकळ हरद्र घ्यावें| अंतर्यामीं || २०||
तेथें भले आडळती| व्यापा ते हि कळों येती | हळुहळु मंदगती| रीग करावा || २१||
सकळामधें विशेष श्रवण| श्रवणाहुनी थोर मनन | मननें होये समाधान| बहुत जनाचें || २२||
धूर्तपणें सकळ जाणावें अंतरीं अंतर बाणावें | समजल्याविण सिणावें| कासयासी || २३||
 इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे विवरणनिरूपणनाम समास दुसरा ||

समास तिसरा. . : . . करंटलक्षणनिरूपण
|| श्रीरामसमर्थ ||
सुचित करूनी अंतःकर्ण| ऐका करंटलक्षण | हें त्यागितां सदेवलक्षण| आंगीं बाणें || १||
पापाकरितां दरिद्र प्राप्त| दरिद्रें होये पापसंचित | ऐसेंचि होत जात| क्षणक्षणा || २||
याकारणें करंटलक्षणें| ऐकोनी त्यागचि करणें | म्हणिजे कांहीं येक बाणें| सदेवलक्षण || ३||
करंट्यास आळस आवडे| यत्न कदापि नावडे | त्याची वासना वावडे| अधर्मीं सदा || ४||
सदा भ्रमिष्ट निदसुरा| उगेंचि बोले सैरावैरा | कोणीयेकाच्या अंतरा| मानेचिना || ५||
लेहों नेणे वाचूं नेणे| सवदासुत घेऊं नेणे | हिशेब कितेब राखों नेणे| धारणा नाहीं || ६||
हारवी सांडी पाडी फोडी| विसरे चुके नाना खोडी | भल्याचे संगतीची आवडी| कदापी नाहीं || ७||
चाट गडी मेळविले| कुकर्मी मित्र केले | खट नट येकवटिले| चोरटे पापी || ८||
ज्यासीं त्यासीं कळकटा| स्वयें सदाचा चोरटा | परघातकी धाटामोटा| वाटा पाडी || ९||
दीर्घ सूचना सुचेचिना| न्याय नीति हे रुचेना | परअभिळासीं वासना| निरंतर || १०||
आळसें शरीर पाळिलें| परंतु पोटेंविण गेलें | सुडकें मिळेनासें जालें| पांघराया || ११||
आळसे शरीर पाळी| अखंड कुंसी कांडोळी | निद्रेचे पाडी सुकाळीं| आपणासी || १२||
जनासीं मीत्री करीना| कठिण शब्द बोले नाना | मूर्खपणें आवरेना| कोणीयेकासी || १३||
 पवित्र लोकांमधें भिडावे| वोंगळामधें निशंक धांवे | सदा मनापासून भावे| जननिंद्य क्रिया || १४||
तेथें कैचा परोपकार| केला बहुतांचा संव्हार | पापी अनर्थी अपस्मार| सर्वअबद्धी || १५||
शब्द सांभळून बोलेना| आवरितां आवरेना | कोणीयेकासी मानेना| बोलणें त्याचें || १६||
 कोणीयेकास विश्वास नाहीं| कोणीयेकासीं सख्य नाहीं | विद्या वैभव कांहींच नाहीं| उगाचि ताठा || १७||
राखावीं बहुतांची अंतरें| भाग्य येतें तदनंतरें | ऐसीं हें विवेकाचीं उत्तरें| ऐकणार नाहीं || १८||
 स्वयें आपणास कळेना| शिकविलें तें ऐकेना | तयासी उपाय नाना| काये करिती || १९||
कल्पना करी उदंड कांहीं| प्राप्तव्य तों कांहींच नहीं | अखंड पडिला संदेहीं| अनुमानाचे || २०||
पुण्य मार्ग संडिला मनें| पाप झडावें काशानें | निश्चय नाहीं अनुमानें| नास केला || २१||
कांहींयेक पुर्तें कळेना| सभेमधें बोलों राहेना | बाष्कळ लाबाड ऐसें जना| कळों आलें || २२||
 कांहीं नेमकपण आपुलें| बहुत जनासी कळों आलें | तेंचि मनुष्य मान्य जालें| भूमंडळीं || २३||
 झिजल्यावांचून कीर्ति कैंची| मान्यता नव्हे कीं फुकाची | जिकडे तिकडे होते ची ची| अवलक्षणें || २४||
 भल्याची संगती धरीना| आपणासी शाहाणे करीना | तो आपला आपण वैरी जाणा| स्वहित नेणे || २५||
लोकांसी बरें करवें| तें उसिणें सवेंचि घ्यावें | ऐसें जयाच्या जीवें| जाणिजेना || २६||
जेथें नाहीं उत्तम गुण| तें करंट्याचें लक्षण | बहुतांसीं न मने तें अवलक्षण| सहजचि जालें || २७||
 कार्याकारण सकळ कांहीं| कार्येंविण तो कांहींच नाहीं | निकामी तो दुःखप्रवाहीं| वाहातचि गेला || २८||
 बहुतांसीं मान्य थोडा| त्याच्या पापासी नाहीं जोडा | निराश्रई पडे उघडा| जेथें तेथें || २९||
याकारणें अवगुण त्यागावे| उत्तम गुण समजोन घ्यावें | तेणें मनासारिखें फावे| सकळ कांहीं || ३०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे करंटलक्षणनिरूपणनाम समास तिसरा ||

समास चौथा. . : . . सदेवलक्षणनिरूपण
|| श्रीरामसमर्थ ||
मागां बोलिले करंटलक्षण| तें विवेकें सांडावें संपूर्ण | आतां ऐका सदेवलक्षण| परम सौख्यदायेक || १||
उपजतगुण शरीरीं| परोपकारी नानापरी | आवडे सर्वांचे अंतरीं| सर्वकाळ || २||
सुंदर अक्षर लेहो जाणे| चपळ शुद्ध वाचूं जाणे | अर्थांतर सांगों जाणे| सकळ कांहीं || ३||
कोणाचें मनोगत तोडिना| भल्यांची संगती सोडिना | सदेवलक्षण अनुमाना| आणून ठेवी || ४||
तो सकळ जनासी व्हावा| जेथें तेथें नित्य नवा | मूर्खपणें अनुमानगोवा| कांहींच नाहीं || ५||
 नाना उत्तम गुण सत्पात्र| तेचि मनुष्य जगमित्र | प्रगट कीर्ती स्वतंत्र| पराधेन नाहीं || ६||
राखे सकळांचें अंतर| उदंड करी पाठांतर | नेमस्तपणाचा विसर| पडणार नाहीं || ७||
नम्रपणें पुसों जाणे| नेमस्त अर्थ सांगों जाणे | बोलाऐसें वर्तों जाणे| उत्तम क्रिया || ८||
तो मानला बहुतांसी| कोणी बोलों न शके त्यासी | धगधगीत पुण्यरासी| माहांपुरुष || ९||
तो परोपकार करितांचि गेला| पाहिजे तो ज्याला त्याला | मग काय उणें तयाला| भूमंडळीं || १०||
 बहुत जन वास पाहे| वेळेसी तत्काळ उभा राहे | उणें कोणाचें न साहे| तया पुरुषासी || ११||
चौदा विद्या चौसष्टी कळा| जाणे संगीत गायेनकळा | आत्मविद्येचा जिव्हाळा| उदंड तेथें || १२||
 सकळांसी नम्र बोलणें| मनोगत राखोन चालणें | अखंड कोणीयेकाचे उणें| पडोंचि नेदी || १३||
 न्याय नीति भजन मर्याद| काळ सार्थक करी सदा | दरिद्रपणाची आपदा| तेथें कैची || १४||
उत्तम गुणें श्रृंघारला| तो बहुतांमधें शोभला | प्रगट प्रतापें उगवला| मार्तंड जैसा || १५||
जाणता पुरुष असेल जेथें| कळहो कैचा उठेल तेथें | उत्तम गुणाविषीं रितें| तें प्राणी करंटे || १६||
प्रपंची जाणे राजकारण| परमार्थीं साकल्य विवरण | सर्वांमधें उत्तम गुण| त्याचा भोक्ता || १७||
 मागें येक पुढें येक| ऐसा कदापी नाहीं दंडक | सर्वत्रांसीं अलोलिक| तया पुरुषाची || १८||
अंतरासी लागेल ढका| ऐसी वर्तणूक करूं नका | जेथें तेथें विवेका| प्रगट करी || १९||
कर्मविधी उपासनाविधी| ज्ञानविधी वैराग्यविधी | विशाळ ज्ञात्रुत्वाची बुद्धी| चळेल कैसी || २०||
पाहातां अवघे उत्तम गुण| तयास वाईट म्हणेल कोण | जैसा आत्मा संपूर्ण| सर्वां घटीं || २१||
आपल्या कार्यास तत्पर| लोक असती लाहानथोर | तैसाचि करी परोपकार| मनापासुनी || २२||
दुसऱ्याच्या दुःखें दुखवे| दुसऱ्याच्या सुखें सुखावे | आवघेचि सुखी असावे| ऐसी वासना || २३||
 उदंड मुलें नानापरी| वडिलांचें मन अवघ्यांवरी | तैसी अवघ्यांची चिंता करी| माहांपुरुष || २४||
जयास कोणाचें सोसेना| तयाची निःकांचन वासना | धीकारिल्या धीकारेना| तोचि महापुरुष || २५||
मिथ्या शरीर निंदलें| तरी याचें काये गेलें | ज्ञात्यासी आणि जिंतिलें| देहेबुद्धीनें || २६||
हें अवघें अवलक्षण| ज्ञाता देहीं विलक्षण | कांहीं तऱ्ही उत्तम गुण| जनीं दाखवावे || २७||
उत्तम गुणास मनुष्य वेधे| वाईट गुणासी प्राणी खेदे | तीक्षण बुद्धि लोक साधें| काये जाणती || २८||
 लोकीं अत्यंत क्षमा करिती| आलियां लोकांचे प्रचिती | मग ते लोक पाठी राखती| नाना प्रकारीं || २९||
 बहुतांसी वाटे मी थोर| सर्वमान्य पाहिजे विचार | धीर उदार गंभीर| माहांपुरुष || ३०||
 जितुके कांहीं उत्तम गुण| तें समर्थाचें लक्षण | अवगुण तें करंटलक्षण| सहजचि जालें || ३१||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे सदेवलक्षणनिरूपणनाम समास चौथा ||

समास पांचवा. . : . . देहमान्यणनिरूपण
 || श्रीरामसमर्थ ||
मातीचे देव धोंड्याचे देव| सोन्याचे देव रुप्याचे देव | काशाचे देव पितळेचे देव| तांब्याचे देव चित्रलेपे || १||
रुविच्या लांकडाचे देव पोंवळ्य्यांचे देव| बाण तांदळे नर्मदे देव | शालिग्राम काश्मिरी देव| सूर्यकांत सोमकांत || २||
तांब्रनाणीं हेमनाणी| कोणी पूजिती देवार्चनीं | चक्रांगीत चक्रतीर्थाहुनी| घेऊन येती || ३||
उदंड उपासनेचे भेद| किती करावे विशद | आपलाले आवडीचा वेध| लागला जनीं || ४||
परी त्या सकळांचें हि कारण| मुळीं पाहावें स्मरण | तया स्मरणाचे अंश जाण| नाना देवतें || ५||
मुळीं द्रष्टा देव तो येक| त्याचे जाहाले अनेक | समजोन पाहातां विवेक| उमजों लागे || ६||
 देह्यावेगळी भक्ति फावेना| देह्यावेगळा देव पावेना | याकारणें मूळ भजना| देहेचि आहे || ७||
 देहे मुळींच केला वाव| तरी भजनासी कैंचा ठाव | म्हणोनी भजनाचा उपाव| देह्यात्मयोगें || ८||
 देहेंविण देव कैसा भजावा| देहेंविण देव कैसा पुजावा | देह्याविण मोहछाव कैसा करावा| कोण्या प्रकारें || ९||
 अत्र गंध पत्र पुष्प| फल तांबोल धूप दीप | नाना भजनाचा साक्षेप| कोठें करावा || १०||
 देवाचें तीर्थ कैसें घ्यावें| देवासी गंध कोठें लावावें | मंत्रपुष्प तरी वावें| कोणें ठाईं || ११||
 म्हणोनी देह्याविण आडतें| अवघें सांकडेंचि पडतें | देह्याकरितां घडतें| भजन कांहीं || १२||
 देव देवता भूतें देवतें| मुळींचे सामर्थ्ये आहे तेथें | अधिकारें नाना देवतें| भजत जावीं || १३||
 नाना देवीं भजन केलें| तें मूळ पुरुषासी पावलें | याकारणें सन्मानिलें| पाहिजे सकळ कांहीं || १४||
मायावल्ली फांपावली| नाना देहेफळीं लगडली | मुळींची जाणीव कळों आली| फळामधें || १५||
 म्हणोनी येळील न करावें| पाहाणें तें येथेंचि पाहावें | ताळा पडतां राहावें| समाधानें || १६||
प्राणी संसार टाकिती| देवास धुंडीत फिरती | नाना अनुमानीं पडती| जेथ तेथें || १७||
लोकांची पाहातां रिती| लोक देवार्चनें करिती | अथवा क्षत्रदेव पाहाती| ठाईं ठाईं || १८||
अथवा नाना अवतार| ऐकोनी धरिती निर्धार | परी तें अवघें सविस्तर| होऊन गेलें || १९||
येक ब्रह्माविष्णुमहेश| ऐकोन म्हणतीं हे विशेष | गुणातीत जो जगदीश| तो पाहिला पाहिजे || २०||
 देवासी नाहीं थानमान| कोठें करावें भजन | हा विचार पाहातां अनुमान| होत जातो || २१||
नसतां देवाचें दर्शन| कैसेन होईजे पावन | धन्य धन्य ते साधुजन| सकळ जाणती || २२||
 भूमंडळी देव नाना| त्यांची भीड उलंघेना | मुख्य देव तो कळेना| कांहीं केल्यां || २३||
कर्तुत्व वेगळें करावें| मग त्या देवासी पाहावें | तरीच कांहींयेक पडे ठावें| गौप्यगुह्य

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Heh Heh Heh...
My parents are both busy professional people and have trouble finding time for chores and home maintenance. On weekends they each make a list of things to be done. Father's list is never completely crossed off, but Mother's always is. Puzzled, I asked her how she managed that.
"Simple," she answered with a satisfied grin. "I do the chore first, and then I put it on the list and cross it off!"

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