Dasbodh dashak - 17
by स्वामी रामदास समर्थ
[Oct 31, 2007]
.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक १७ ..
दशक सतरावा. . : . .
प्रकृति पुरुष समास पहिला. . : . . प्रकृतिपुरुषनाम
|| श्रीरामसमर्थ ||
निश्चळ ब्रह्मी चंचळ आत्मा| सकळां पर जो परमात्मा | चैतन्य साक्षी ज्ञानात्मा| शड्गुणैश्वरु || १||
सकळ जगाचा ईश्वरु| म्हणौन नामें जगदेश्वरु | तयापासून विस्तारु| विस्तारला || २||
शिवशक्ती जगदेश्वरी| प्रकृतिपुरुष परमेश्वरी | मूळमाया गुणेश्वरी| गुणक्षोभिणी || ३||
क्षेत्रज्ञ द्रष्टा कूटस्त साक्षी| अंतरात्मा सर्वसाक्षी | सुद्धसत्व महत्तत्त्व परीक्षी| जाणता साधु || ४||
ब्रह्मा विष्णु महेश्वरु| नाना पिंडी जीवेश्वरु | त्यास भासती प्राणीमात्रु| लहानथोर || ५||
देहदेउळामधें बैसला| न भजतां मारितो देहाला | म्हणौनि त्याच्या भेणें तयाला| भजती लोक || ६||
जे वेळेसी भजन चुकले| तें तें तेव्हां पछ्याडिलें | आवडीनें भजों लागले| सकळ लोक || ७||
जें जें जेव्हां आक्षेपिले| तें तें तत्काळचि दिधलें | त्रैलोक्य भजों लागलें| येणें प्रकरें || ८||
पांचा विषयांचा नैव्यद्य| जेव्हां पाहिजे तेव्हां सिद्ध | ऐसें न करितां सद्य| रोग होती || ९||
जेणें काळें नैव्यद्य पावेना| तेणें काळें देव राहेना | भाग्य वैभव पदार्थ नाना| सांडून जातो || १०||
जातो तों कळो देईना| कोणास ठाउकें होयेना | देवेंविण अनुमानेना| कोणास देव || ११||
देव पाहावयकारणें| देउळें लागती पाहाणें | कोठेंतरी देउळाच्या गुणें| देव प्रगटे || १२||
देउळें म्हणिजे नाना शरीरें| तेथें राहिजें जीवेश्वेरे | नान शरीरें नाना प्रकारें| अनंत भेदें || १३||
चालतीं बोलतीं देउळें| त्यामधें राहिजें राउळें | जितुकीं देउळें तितुकीं सकळें| कळली पाहिजे || १४||
मछ कूर्म वाराह देउळें| भूगोळ धरिला सर्वकाळें | कराळें विक्राळें निर्मळें| कितियेक || १५||
कित्येक देऊळीं सौख्य पाहे| भरतां आवघें सिंध आहे | परी तें सर्वकाळ न राहे| अशाश्वत || १६||
अशाश्वताचा मस्तकमणीं| जयाची येवढी करणी | दिसेना तरी काय जालें धनी| तयासीच म्हणावें || १७||
उद्भवोन्मुख होतां अभेद| विमुख होतां उदंड खेद | ऐसा अधोर्ध संवाद| होत जातो || १८||
सकळांचे मूळ दिसेना| भव्य भारी आणी भासेना | निमिष्य येक वसेना| येके ठाइं || १९||
ऐसा अगाध परमात्मा| कोण जाणे त्याचा महिमा | तुझी लीळा सर्वोत्तमा| तूंच जाणसी || २०||
संसारा आलियाचें सार्थक| जेथें नित्यानित्यविवेक | येहलोक आणी परलोक| दोनीं साधिले || २१||
मननसीळ लोकांपासीं| अखंड देव आहिर्निशीं | पाहातां त्यांच्या पूर्वसंचितासी| जोडा नाहीं || २२||
अखंड योग म्हणोनि योगी| योग नाहीं तो वियोगी | वियोगी तोहि योगी| योगबळें || २३||
भल्यांची महिमा ऐसी| जे सन्मार्ग लावी लोकांसी | पोहणार असतां बुडतयासी| बुडों नेदावें || २४||
स्थूळसूक्ष्मतत्वझाडा| पिंडब्रह्मांडाचा निवाडा | प्रचित पाहे ऐसा थोडा| भूमंडळीं || २५||
वेदांतीचें पंचिकर्ण| अखंड तयाचें विवर्ण | महांवाक्यें अंतःकरण| रहस्य पाहे || २६||
ये पृथ्वीमधें विवेकी असती| धन्य तयांची संगती | श्रवणमात्रें पावती गती| प्राणीमात्र || २७||
सत्संग आणी सत्शास्त्रश्रवण| अखंड होतसे विवर्ण | नाना सत्संग आणी उत्तम गुण| परोपकाराचे || २८||
जे सद्कीर्तीचे पुरुष| ते परमेश्वराचे अंश | धर्मस्थापनेचा हव्यास| तेथेंचि वसे || २९||
विशेष सारासार विचार| तेणें होय जग्गोद्धार | संगत्यागें निरंतर| होऊन गेले || ३०||
इति श्रीदासभोधे गुरुशिष्यसंवादे देवबळात्कारनाम समास पहिला ||
समास दुसरा. . : . . शिवशक्तिनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
ब्रह्म निर्मळ निश्चळ| जैसें गगन अंतराळ | निराकार केवळ| निर्विकारी || १||
अंतचि नाहीं तें अनंत| शाश्वत आणी सदोदित | असंत नव्हे तें संत| सर्वकाळ || २||
परब्रह्म तें अविनाश| जैसें आकाश अवकाश | न तुटे न फुटे सावकास| जैसें तैसें || ३||
तेथें ज्ञान ना अज्ञान| तेथें स्मरण ना विस्मरण | तेथें अखंड निर्गुण| निरावलंबी || ४||
तेथें चंद्र सूर्य ना पावक| नव्हे काळोखें ना प्रकाशक | उपाधीवेगळें येक| निरोपाधी ब्रह्म || ५||
निश्चळीं स्मरण चेतलें| त्यास चैतन्य ऐसें कल्पिलें | गुणासमत्वें जालें| गुणसाम्य ऐसें || ६||
गगनीं आली अभ्रछ्याया| तैसी जाणिजे मूळमाया | उद्भव आणी विलया| वेळ नाहीं || ७||
निर्गुणीं गुणविकारु| तोचि शड्गुणैश्वरु | अर्धनारीनटेश्वरु| तयास म्हणिजे || ८||
आदिशक्ति शिवशक्ति| मुळीं आहे सर्वशक्ति | तेथेऊन पुढें नाना वेक्ती| निर्माण जाल्या || ९||
तेथून पुढें शुद्धसत्व| रजतमाचें गूढत्व | तयासि म्हणिजे महत्तत्त्व| गुणक्षोभिणी || १०||
मुळीं असेचिना वेक्ती| तेथें कैंची शिवशक्ती | ऐसें म्हणाल तरी चित्तीं| सावधान असावें || ११||
ब्रह्मांडावरून पिंड| अथवा पिंडावरून ब्रह्मांड | अधोर्ध पाहातां निवाड| कळों येतो || १२||
बीज फोडून आणिलें मना| तेथें फळ तों दिसेना | वाढत वाढत पुढें नाना| फळें येती || १३||
फळ फोडितां बीज दिसे| बीज फोडितां फळ नसे | तैसा विचार असे| पिंडब्रह्मांडीं || १४||
नर नारी दोनी भेद| पिंडीं दिसती प्रसिद्ध | मुळी नस्तां विशद| होतील कैसीं || १५||
नाना बीजरूप कल्पना| तींत काये येक असेना | सूक्ष्म म्हणोनि भासेना| येकायेकीं || १६||
स्थूळाचें मूळ ते वासना| ते वासना आधीं दिसेना | स्थूळावेगळें अनुमानेना| सकळ कांहीं || १७||
कल्पनेची सृष्टी केली| ऐसीं वेदशास्त्रें बोलिलीं | दिसेना म्हणोन मिथ्या केली| न पाहिजेत कीं || १८||
पडदा येका येका जन्माचा| तेथें विचार कळे कैंचा | परंतु गूढत्व हा नेमाचा| ठाव आहे || १९||
नाना पुरुषांचे जीव| नाना स्त्रियांचे जीव | येकचि परी देहस्वभाव| वेगळाले || २०||
नवरीस नवरी नलगे| ऐसा भेद दिसों लागे | पिंडावरून उमगे| ब्रह्मांडबीज || २१||
नवरीचें मन नवऱ्यावरी| नवऱ्याचें मन नवरीवरी | ऐसी वासनेची परी| मुळींहून पाहावी || २२||
वासना मुळींची अभेद| देहसमंधें जाला भेद | तुटतां देहाच समंध| भेद जेला || २३||
नरनारीचें बीजकारण| शिवशक्तीमधें जाण | देह धरितां प्रमाण| कळों आलें || २४||
नाना प्रीतीच्या वासना| येकाचें येकास कळेना | तिक्षण दृष्टीनें अनुमाना| कांहींसें येतें || २५||
बाळकास वाढवी जननी| हें तों नव्हे पुरुषाचेनी | उपाधी वाढे जयेचेनी| ते हे वनिता || २६||
वीट नाहीं कंटाळानाहीं| आलस्य नाहीं त्रास नाहीं | इतुकी माया कोठेंचि ना हीं| मातेगेगळी || २७||
नाना उपाधी वाढऊं जाणे| नाना मायेनें गोऊं जाणे | नाना प्रीती लाऊं जाणे| नाना प्रपंचाची || २८||
पुरुषास स्त्रीचा विश्वास| स्त्रीस पुरुषाचा संतोष | परस्परें वासनेस| बांधोन टकिलें || २९||
ईश्वरें मोठें सूत्र केलें| मनुष्यमात्र गुंतोन राहिलें | लोभाचें गुंडाळें केलें| उगवेना ऐसें || ३०||
ऐसी परस्परें आवडी| स्त्रीपुरुषांची माहां गोडी | हे मुळींहून चालिली रोकडी| विवेकें पाहावी || ३१||
मुळीं सूक्ष्म निर्माण जालें| पुढें पष्ट दिसोन आलें | उत्पतीचें कार्य चाले| उभयतांकरितां || ३२||
मुळीं शिवशक्ती खरें| पुढें जालीं वधुवरें | चौऱ्यासि लक्ष विस्तारें| विस्तारली जे || ३३||
येथें शिवशक्तीचें रूप केलें| श्रोतीं मनास पाहिजे आणिलें | विवरलियांविण बोलिलें| तें वेर्थ जाणावें || ३४||
इति श्रीदासभोधे गुरुशिष्यसंवादे शिवशक्तिनिरूपणनाम समास दुसरा ||
समास तिसरा. . : . . श्रवणनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
थांबाथांबा ऐका ऐका| आधींच ग्रंथ सोडूं नका | सांगितलें तें ऐका| सावधपणें || १||
श्रव्णनामध्यें सार श्रवण| तें हें अध्यात्मनिरूपण | सुचित करून अंतःकर्ण| ग्रन्थामधें विवरावें || २||
श्रवणमननाचा विचार| निजध्यासें साक्षात्कार | रोकडा मोक्षाचा उधार| बोलोंचि नये || ३||
नाना रत्नें परीक्षितां| अथवा वजनें करितां | उत्तम सोनें पुटीं घालतां| सावधान असावें || ४||
नाना नाणीं मोजून घेणें| नाना परीक्षा करणें | विवेकी मनुष्यासी बोलणें| सावधपणें || ५||
जैसें लाखोलीचें धान्य| निवडून वेंचितां होते मान्य | सगट मानितां अमान्य| देव क्षोभे || ६||
येकांतीं नाजुक कारबार| तेथें असावें अति तत्पर | त्याच्या कोटिगुणें विचार| अध्यात्मग्रन्थीं || ७||
काहिण्या कथा गोष्टी पवाड| नाना अवतारचरित्रें वाड | त्या समस्तांमध्यें जाड| अध्यात्मविद्या || ८||
गत गोष्टीस ऐकिलें| तेणें काये हातास आलें | म्हणती पुण्य प्राप्त जालें| परी तें दिसेना कीं || ९||
तैसें नव्हे अध्यात्मसार| हा प्रचितीचा विचार | कळतां अनुमानाचा संव्हार| होत जातो || १०||
मोठे मोठे येऊन गेले| आत्म्याकरितांच वर्तले | त्या आत्म्याचा महिमा बोले| ऐसा कवणु || ११||
युगानयुगें येकटा येक| चालवितो तिनी लोक | त्या आत्म्याचा विवेक| पाहिलाच पाहावा || १२||
प्राणी आले येऊन गेले| ते जैसे जैसे वर्तले | ते वर्तणुकेचें कथन केलें| इछेसारिखें || १३||
जेथें आत्मा नाहीं दाट| तेथें अवघें सरसपाट | अत्म्याविण बापुडें काष्ठ| काये जाणे || १४||
ऐसें वरिष्ठ आत्मज्ञान| दुसरें नाहीं यासमान | सृष्टीमधें विवेकी सज्जन| तेचि हें जाणती || १५||
पृथ्वी आणी आप तेज| याचा पृथिवीमध्यें समज | अंतरात्मा तत्वबीज| तें वेगळेंचि राहिलें || १६||
वायोपासून पैलिकडे| जो कोणी विवेकें पवाडे | जवळीच आत्मा सांपडे| त्या पुरुषासी || १७||
वायो आकाश गुणमाया| प्रकृतिपुरुष मूळमाया | सूक्ष्मरूपें प्रचित येया| कठीण आहे || १८||
मायादेवीच्या धांदली| सूक्ष्मीं कोण मन घाली | समजला त्यची तुटली| संदेहवृत्ती || १९||
मूळमाया चौथा देह| जाला पाहिजे विदेह | देहातीत होऊन राहे| धन्य तो साधु || २०||
विचारें ऊर्ध चढती| तयासी च ऊर्धगती | येरां सकळां अधोगती| पदार्थज्ञानें || २१||
पदार्थ चांगले दिसती| परी ते सवेंचि नासती | अतो भ्रष्ट ततो भ्रष्ट होती| लोक तेणें || २२||
याकारळें पदार्थज्ञान| नाना जिनसीचा अनुमान | सर्व सांडून निरंजन| धुंडीत जावें| २३||
अष्टांग योग पिंडदज्ञान| त्याहून थोर तत्वज्ञान | त्याहून थोर आत्मज्ञान| तें पाहिलें पाहिजे || २४||
मूळमायेचे सेवटीं| हरिसंकल्प मुळीं उठी | उपासनायोगें इठी| तेथें घातली पाहिजे || २५||
मन त्यापलिकडे जाण| निखळ ब्रह्म निर्गुण | निर्मळ निश्चळ त्याची खूण| गगनासारिखी || २६||
येथून तेथवरी दाटलें| प्राणीमात्रास भेटलें | पदार्थमात्रीं लिगटलें| व्यापून आहे || २७||
त्याऐसें नाहीं थोर| सूक्ष्माहून सूक्ष्म विचार | पिंडब्रह्माचा संव्हार| होतां कळे || २८||
अथवा पिंड ब्रह्मांड असतां| विवेकप्रळये पाहों जातां | शाश्वत कोण हें तत्वता| उमजों लागे || २९||
करून अवघा तत्वझाडा| सारासाराचा निवाडा | सावधपणें ग्रन्थ सोडा| सुखिनावें || ३०||
इति श्रीदासभोधे गुरुशिष्यसंवादे श्रवणनिरूपणनाम समास तिसरा ||
समास चौथा. . : . . अनुमाननिरसन . . . .
|| श्रीराम ||
बहुत जनासी उपाये| वक्तयास पुसतां त्रासों नये | बोलतां बोलतां अन्वयें| सांडूं नये || १||
श्रोत्यानें आशंका घेतली| तै तत्काळ पाहिजे फेडिली | स्वगोष्टीनें सगोष्टी पेंचली| ऐसें न व्हावें || २||
पुढें धरितां मागें पेंचला| मागें धरितां पुढें उडाला | ऐसा सांपडतचि गेला| ठाइं ठाइं || ३||
पोहणारचि गुचक्या खातो| जनास कैसा काढूं पाहातो | आशय लोकांच राहातो| ठाइं ठाइं || ३||
आपणचि बोलिला संव्हार| आपणचि बोलिजे सर्वसार | दुस्तर मायेचा पार| टाकिला पाहिजे || ५||
जें जें सूक्ष्म नाम घ्यावें| त्याचें रूप बिंबऊन द्यावें | तरीच वक्ता म्हणवावें| विचारवंत || ६||
ब्रह्म कैसें मूळमाया कैसी| अष्टधाप्रकृती शिवशक्ती कैसी | शड्गुणेश्वराची स्थिति कैसी| गुणसाम्याची || ७||
अर्धनारीनटेश्वर| प्रकृतिपुरुषाचा विचार | गुणक्षोभिणी तदनंतर| त्रिगुण कैसे || ८||
पूर्वकक्ष कोठून कोठवरी| वाच्यांशलक्ष्यांशाची परी | सूक्ष्म नाना विचार करी| धन्य तो साधु || ९||
नान पाल्हाळीं पडेना| बोलिलेंचि बोलावेना | मौन्यगर्भ अनुमाना| आणून सोडी || १०||
घडी येक विमळ ब्रह्म| घडी येक सर्व ब्रह्म | द्रष्टा साक्षी सत्ता ब्रह्म| क्षण येक || ११||
निश्चळ तेंचि जालें चंचळ| चंचळ तेंचि ब्रह्म केवळ | नाना प्रसंगीं खळखळ| निवाडा नाहीं || १२||
चळतें आणी निश्चळ| अवघें चैतन्यचि केवळ | रूपें वेगळालीं प्रांजळ| कदापी बोलवेना || १३||
उगीच करी गथागोवी| तो लोकांस कैसें उगवी | नाना निश्चयें नाना गोवी| पडत जाते || १४||
भ्रमास म्हणे परब्रह्म| परब्रह्मास ह्मणे भ्रम | ज्ञातेपणाचा संभ्रम| बोलोन दावी || १५||
घाली शास्त्रांची दडपण| प्रचितिविण निरूपण | पुसों जातां उगाच सीण| अत्यंत मानी || १६||
ज्ञात्यास आणि पदार्थभिडा| तो काय बोलेल बापुडा | सारासाराचा निवाडा| जाला पाहिजे || १७||
वैद्य मात्रेची स्तुती करी| मात्रा गुण कांहींच न करी | प्रचितिविण तैसी परी| ज्ञानाची जाली || १८||
तेथें नाहीं सारासार| तेथें अवघा अंधकार | नाना परीक्षेचा विचार| राहिला तेथें || १९||
पाप पुण्य स्वर्ग नर्क| विवेक आणि अविवेक | सर्वब्रह्मीं काये येक| सांपडलें नाहीं || २०||
पावन आणि तें पतन| दोनीं मानिलीं तत्समान | निश्चये आणि अनुमान| ब्रह्मरूप || २१||
ब्रह्मरूप जालें आघवें| तेथें काये निवडावें | आवघी साकरचि टाकावें| काये कोठें || २२||
तैसें सार आणि असार| अवघा जाला येकंकार | तेथें बळावळा अविचार| विचार कैंचा || २३||
वंद्य निंद्य येक जालें| तेथें काये हाता आलें | उन्मत्त द्रव्यें जें भुललें| तें भलतेंच बोले || २४||
तैसा अज्ञान भ्रमें भुलला| सर्व ब्रह्म म्हणोन बैसला | माहांपापी आणि भला| येकचि मानी || २५||
सर्वसंगपरित्याग| अव्हासवा विषयेभोग | दोघे येकचि मानितां मग| काये उरलें || २६||
भेद ईश्वर करून गेला| त्याच्या वाचेन न वचे मोडिला | मुखामधें घांस घातला| तो अपानीं घालावा || २७||
ज्या इंद्रियास जो भोग| तो तो करी येथासांग | ईश्वराचें केलें जग| मोडितां उरेना || २८||
अवघी भ्रांतीची भुटाटकी| प्रचितिविण गोष्टी लटकी | वेड लागलें जे बटकी| ते भलतेंचि बोले || २९||
प्रत्ययज्ञाता सावधान| त्याचें ऐकावें निरूपण | आत्मसाक्षात्काराची खूण| तत्काळ बाणें || ३०||
वेडें वांकडे जाणावें| आंधळें पाउलीं वोळखावें | बाश्कळ बोलणें सांडावें| वमक जैसें || ३१||
इति श्रीदासभोधे गुरुशिष्यसंवादे अनुमाननिर्शननाम समास चौथा ||
समास पांचवा. . : . . अजपानिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
येकवीस सहश्र सासें जपा| नेमून गेली ते अजपा | विचार पाहातां सोपा| सकळ कांहीं || १||
मुखीं नासिकीं अस