Dasbodh dashak - 16
by स्वामी रामदास समर्थ
[Oct 31, 2007]
.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक १६ ..
दशक सोळावा. . : . .
सप्ततिन्वय समास पहिला. . : . .
वाल्मीकि स्तवननिरूपण
|| श्रीरामसमर्थ ||
धन्य धन्य तो वाल्मीक| ऋषीमाजी पुण्यश्लोक | जयाचेन हा त्रिलोक्य| पावनजाला || १||
भविष्य आणी शतकोटी| हें तों नाहीं देखिलें दृष्टीं | धांडोळितां सकळ सृष्टि| श्रुत नव्हे || २||
भविष्याचें येक वचन| कदाचित जालें प्रमाण | तरी आश्चिर्य मानिती जन. भूमंडळीचे || ३||
नसतां रघुनाथअवतार| नाहीं पाहिला शास्त्राधार | रामकथेचा विस्तार| विस्तारिला जेणें || ४||
ऐसा जयाचा वाग्विळास| ऐकोनी संतोषला महेश | मग विभागिलें त्रयलोक्यास| शतकोटी रामायेण || ५||
ज्याचें कवित्व शंकरें पाहिलें| इतरां न वचे अनुमानलें | रामउपासकांसी जालें| परम समाधान || ६||
ऋषी होते थोर थोर| बहुतीं केला कवित्वविचार | परी वाल्मीकासारिखा कवेश्वर| न भूतो न भविष्यति || ७||
पूर्वीं केली दृष्ट कर्में| परी पावन जाला रामनामें | नाम जपतां दृढ नेमें| पुण्यें सीमा सांडिली || ८||
उफराटे नाम म्हणतां वाचें| पर्वत फुटले पापाचे | ध्वज उभारले पुण्याचे| ब्रह्मांडावरुते || ९||
वाल्मीकें जेथें तप केलें| तें वन पुण्यपावन जालें | शुष्क काष्ठीं अंकुर फुटले| तपोबळें जयाच्या || १०||
पूर्वी होता वाल्हाकोळी| जीवघातकी भूमंडळीं | तोचि वंदिजे सकळीं| विबुधीं आणि ऋषेश्वरीं || ११||
उपरती आणि अनुताप| तेथें कैंचें उरेल पाप | देह्यांततपें पुण्यरूप| दुसरा जन्म जाला || १२||
अनुतापें आसन घातलें| देह्यांचें वारुळ जालें | तेंचि नाम पुढें पडिलें| वाल्मीक ऐसें || १३||
वारुळास वाल्मीक बोलिजे| म्हणोनि वाल्मीक नाम साजे | जयाच्या तीव्र तपें झिजे| हृदय तापसाचें || १४||
जो तापसांमाजीं श्रेष्ठ| जो कवेश्वरांमधें वरिष्ठ | जयाचें बोलणें पष्ट| निश्चयाचें || १५||
जो निष्ठावंतांचें मंडण| रघुनाथभक्तांचें भूषण | ज्याची धारणा असाधारण| साधकां सदृढ करी || १६||
धन्य वाल्मीक ऋषेश्वर| समर्थाचा कवेश्वर | तयासी माझा नमस्कार| साष्टांगभावें || १७||
वाल्मीक ऋषी बोलिला नसता| तरी आम्हांसी कैंची रामकथा | म्हणोनियां समर्था| काय म्हणोनी वर्णावें || १८||
रघुनथकीर्ति प्रगट केली| तेणें तयची महिमा वाढली | भक्त मंडळी सुखी जाली| श्रवणमात्रें || १९||
आपुला काळ सार्थक केला| रघुनाथकीर्तिमधें बुडाला | भूमंडळीं उधरिला| बहुत लोक || २०||
रघुनाथ भक्त थोर थोर| महिमा जयांचा अपार | त्या समस्तांचा किंकर| रामदास म्हणे || २१||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे वाल्मीकस्तवननिरूपणनाम समास पहिला ||
समास दुसरा. . : . . सूर्यस्तवननिरूपण
|| श्रीरामसमर्थ ||
धन्य धन्य हा सूर्यवौंश| सकळ वौंशामधें विशेष | मार्तंडमंडळाचा प्रकाश| फांकला भूमंडळीं || १||
सोमाआंगीं आहे लांछन| पक्षा येका होय क्षीण | रविकिर्ण फांकता आपण| कळाहीन होये || २||
याकारणें सूर्यापुढें| दुसरी साम्यता न घडे | जयाच्या प्रकाशें उजेडे| प्राणीमात्रासी || ३||
नाना धर्म नाना कर्में| उत्तमें मध्यमें अधमें | सुगमें दुर्गमें नित्य नेमें| सृष्टीमधें चालती || ४||
वेदशास्त्रें आणी पुराणें| मंत्र यंत्र नाना साधनें | संध्या स्नान पूजाविधानें| सूर्येंविण बापुडीं || ५||
नाना योग ना मतें| पाहों जातां असंख्यातें | जाती आपुलाल्या पंथें| सूर्यउदय जालियां || ६||
प्रपंचिक अथवा परमार्थिक| कार्य करणें कोणीयेक | दिवसेंविण निरार्थक| सार्थक नव्हे || ७||
सूर्याचें अधिष्ठान डोळे| डोळे नसतां सर्व आंधळे | याकारणें कांहींच न चले| सूर्येंविण || ८||
म्हणाल अंध कवित्वें करिती| तरी हेहि सुर्याचीच गती | थंड जालियां आपुली मती| मग मतिप्रकाश कैंचा || ९||
उष्ण प्रकाश तो सूर्याचा| शीत प्रकाश तो चंद्राचा | उष्णत्व नस्तां देह्याचा| घात होये || १०||
याकारणें सूर्येंविण| सहसा न चले कारण | श्रोते तुम्ही विचक्षण| शोधून पाहा || ११||
हरिहरांच्या अवतरमूर्ती| शिवशक्तीच्या अनंत वेक्ती | यापूर्वीं होता गभस्ती| आतां हि आहे || १२||
जितुके संसारासि आले| तितुके सूर्याखालें वर्तले | अंती देहे त्यागून गेले| प्रभाकरादेखतां || १३||
चंद्र ऐलीकडे जाला| क्षीरसागरीं मधून काढिला | चौदा रत्नांमधें आला| बंधु लक्षुमीचा || १४||
विश्वचक्षु हा भास्कर| ऐसें जाणती लाहानथोर | याकारणें दिवाकर| श्रेष्ठांहून श्रेष्ठ || १५||
अपार नभमार्ग क्रमणें| ऐसेंचि प्रत्यहीं येणें जाणें | या लोकोपकाराकारणें| आज्ञा समर्थाची || १६||
दिवस नस्तां अंधकार| सर्वांसी नकळे सारासार | दिवसेंविण तश्कर| कां दिवाभीत पक्षी || १७||
सूर्यापुढें आणिक दुसरें| कोण आणावें सामोरें | तेजोरासी निर्धारें| उपमेरहित || १८||
ऐसा हा सविता सकळांचा| पूर्वज होय रघुनाथाचा | अगाध महिमा मानवी वाचा| काये म्हणोनि वर्णावी || १९||
रघुनाथवौंश पूर्वापर| येकाहूनि येक थोर | मज मतिमंदास हा विचार| काये कळे || २०||
रघुनाथाचा समुदाव| तेथें गुंतला अंतर्भाव | म्हणोनी वर्णितां महत्व| वाग्दुर्बळ मी || २१||
सकळ दोषाचा परिहार| करितां सूर्यास नमस्कार | स्फूर्ति वाढे निरंतर| सूर्यदर्शन घेतां || २२||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे सूर्यस्तवननिरूपणनाम समास दुसरा ||
समास तिसरा. . : . . पृथ्वीस्तवननिरूपण
|| श्रीरामसमर्थ ||
धन्य धन्य हे वसुमती| इचा महिमा सांगों किती | प्राणीमात्र तितुके राहाती| तिच्या आधारें || १||
अंतरिक्ष राहाती जीव| तोहि पृथ्वीचा स्वभाव | देहे जड नस्तां जीव| कैसे तगती || २||
जाळिती पोळिती कुदळिती| नांगरिती उकरिती खाणती | मळ मूत्र तिजवरी करिती| आणी वमन || ३||
नासकें कुजकें जर्जर| पृथ्वीविण कैंची थार | देह्यांतकाळीं शरीर| तिजवरी पडे || ४||
बरें वाईट सकळ कांहीं| पृथ्वीविण थार नाहीं | नाना धातु द्रव्य तें हि| भूमीचे पोटीं || ५||
येकास येक संव्हारिती| प्राणी भूमीवरी असती | भूमी सांडून जाती| कोणीकडे || ६||
गड कोठ पुरें पट्टणें| नाना देश कळती अटणें | देव दानव मानव राहाणें| पृथ्वीवरी || ७||
नाना रत्नें हिरे परीस| नाना धातु द्रव्यांश | गुप्त प्रगट कराव्यास| पृथ्वीविण नाहीं || ८||
मेरुमांदार हिमाचळ| नाना अष्टकुळाचळ | नाना पक्षी मछ व्याळ| भूमंडळीं || ९||
नाना समुद्रापैलीकडे| भोंवतें आवर्णोदका कडें | असंभाव्य तुटले कडे| भूमंडळाचे || १०||
त्यामधें गुप्त विवरें| लाहानथोरें अपारें | तेथें निबिड अंधकारें| वस्ती कीजे || ११||
आवर्णोदक तें अपार| त्याचा कोण जाणे पार | उदंड दाटले जळचर| असंभाव्य मोठे || १२||
त्या जीवनास आधार पवन| निबिड दाट आणी घन | फुटों शकेना जीवन| कोणेकडे || १३||
त्या प्रभंजनासी आधार| कठिणपणें अहंकार | ऐसा त्या भूगोळाचा पार| कोण जाणे || १४||
नाना पदार्थांच्या खाणी| धातुरत्नांच्या दाटणी | कल्पतरु चिंतामणी| अमृतकुंडें || १५||
नाना दीपें नाना खंडें| वसती उद्वसें उदंडें | तेथें नाना जीवनाचीं बंडें| वेगळालीं || १६||
मेरुभोंवते कडे कापले| असंभाव्य कडोसें पडिलें | निबिड तरु लागले| नाना जिनसी || १७||
त्यासन्निध लोकालोक| जेथें सूर्याचें फिरे चाक | चंद्रादि द्रोणाद्रि मैनाक| माहां गिरी || १८||
नाना देशीं पाषाणभेद| नाना जिनसी मृत्तिकाभेद | नाना विभूति छंद बंद| नाना खाणी || १९||
बहुरत्न हे वसुंदरा| ऐसा पदार्थ कैचा दुसरा | अफट पडिलें सैरावैरा| जिकडे तिकडे || २०||
अवघी पृथ्वी फिरोन पाहे| ऐसा प्राणी कोण आहे | दुजी तुळणा न साहे| धरणीविषीं || २१||
नाना वल्ली नाना पिकें| देसोदेसी अनेकें | पाहों जातां सारिख्या सारिखें| येक हि नाहीं || २२||
स्वर्ग मृत्यु आणिपाताळें| अपूर्व रचिलीं तीन ताळें | पाताळलोकीं माहां व्याळें| वस्ती कीजे || २३||
नान वल्ली बीजांची खाणी| ते हे विशाळ धरणी | अभिनव कर्त्याची करणी| होऊन गेली || २४||
गड कोठ नाना नगरें| पुरें पट्टणें मनोहरें | सकळां ठाईं जगदेश्वरें| वस्ती कीजे || २५||
माहां बळी होऊन गेले| पृथ्वीवरी चौताळले | सामर्थ्यें निराळे राहिले| हें तों घडेना || २६||
असंभाव्य हे जगती| जीव कितीयेक जाती | नाना अवतारपंगती| भूमंडळावरी || २७||
सध्यां रोकडे प्रमाण| कांहीं करावा नलगे अनुमान | नाना प्रकारीचें जीवन| पृथ्वीचेनि आधारें || २८||
कित्तेक भूमी माझी म्हणती| सेवटीं आपणचि मरोन जाती | कित्तेक काळ होतां जगती| जैसी तैसी || २९||
ऐसा पृथ्वीचा महिमा| दुसरी काये द्यावी उपमा | ब्रह्मादिकापासुनी आम्हां| आश्रयोचि आहे || ३०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे पृथ्वीस्तवननिरूपणनाम समास तिसरा ||
समास चौथा. . : . . आपनिरूपण
|| श्रीरामसमर्थ ||
आतां सकळांचे ज्नमस्थान| सकळ जीवांचे जीवन | जयास आपोनारायेण| ऐसें बोलिजे || १||
पृथ्वीस आधार आवर्णोदक| सप्तसिंधूचें सिंधोदक | नाना मेघीचें मेघोदक| भूमंडळीं चालिलें || २||
नाना नद्या नाना देसीं| वाहात मिळाल्या सागरासी | लाहानथोर पुण्यरासी| अगाध महिमे || ३||
नद्या पर्वतींहून कोंसळल्या| नाना सांकडीमधें रिचविल्या | धबाबां खळाळां चालिल्या| असंभाव्य || ४||
कूप बावी सरोवरें| उदंड तळीं थोरथोरें | निर्मळें उचंबळती नीरें| नाना देसीं || ५||
गायेमुखें पाट जाती| नाना कालवे वाहती | नाना झऱ्या झिरपती| झरती नीरें || ६||
डुरें विहीरें पाझर| पर्वत फुटोन वाहे नीर | ऐसे उदकाचे प्रकर| भूमंडळीं || ७||
जितुके गिरी तितुक्या धारा| कोंसळती भयंकरा | पाभळ वाहाळा अपारा| उकळ्या सांडिती || ८||
भूमंडळीचें जळ आघवें| किती म्हणोनी सांगावें | नाना कारंजीं आणावें| बांधोनी पाणी || ९||
डोहो डवंके खबाडीं टांकीं| नाना गिरिकंदरीं अनेकीं | नाना जळें नाना लोकीं| वेगळालीं || १०||
तीर्थें येकाहून येक| माहां पवित्र पुण्यदायक | अगाध महिमा शास्त्रकारक| बोलोनि गेले || ११||
नाना तीर्थांची पुण्योदकें| नाना स्थळोस्थळीं सीतळोदकें | तैसींच नाना उष्णोदकें| ठाईं ठाईं || १२||
नाना वल्लीमधें जीवन| नाना फळीं फुलीं जीवन | नाना कंदीं मुळीं जीवन| गुणकारकें || १३||
क्षीरोदकें सिंधोदकें| विषोदकें पीयूषोदकें | नाना स्थळांतरीं उदकें| नाना गुणाचीं || १४||
नाना युक्षदंडाचे रस| नाना फळांचे नाना रस | नाना प्रकारीचे गोरस| मद पारा गुळत्र || १५||
नाना मुक्तफळांचें पाणी| नाना रत्नी तळपें पाणी | नाना शस्त्रामधें पाणी| नाना गुणाचें || १६||
शुक्लीत श्रोणीत लाळ मूत्र स्वेद| नाना उदकाचे नाना भेद | विवरोन पाहातां विशद| होत जातें || १७||
उदकाचे देह केवळ| उदकाचेंचि भूमंडळ | चंद्रमंडळ सूर्यमंडळ| उदकाकरितां || १८||
क्षारसिंधु क्षीरसिंधु| सुरासिंधु आज्यसिंधु | दधिसिंधु युक्षरससिंधु| शुद्ध सिंधु उदकाचा || १९||
ऐसें उदक विस्तारलें| मुळापासून सेवटा आलें | मधेहि ठाईं ठाईं उमटलें| ठाईं ठाईं गुप्त || २०||
जे जे बीजीं मिश्रीत जालें| तो तो स्वाद घेऊन उठिलें | उसामधें गोडीस आलें| परम सुंदर || २१||
उदकाचें बांधा हें शरीर| उदक चि पाहिजे तदनंतर | उदकचि उत्पत्तिविस्तार| किती म्हणोनी सांगावा || २२||
उदक तारक उदक मारक| उदक नाना सौख्यदायेक | पाहातं उदकाचा विवेक| अलोलिक आहे || २३||
भूमंडळीं धांवे नीर| नाना ध्वनी त्या सुंदर | धबाबां धबाबां थोर| रिचवती धारा || २४||
ठाईं ठाईं डोहो तुंबती| विशाळ तळीं डबाबिती | चबाबिती थबाबिती. कालवे पाट || २५||
येकी पालथ्या गंगा वाहाती| उदकें सन्निधचि असती | खळाळां झरे वाहाती| भूमीचे पोटीं || २६||
भूगर्भीं डोहो भरलें| कोण्ही देखिले ना ऐकिले | ठाईं ठाईं झोवीरे जाले| विदुल्यतांचे || २७||
पृथ्वीतळीं पाणी भरलें| पृथ्वीमधें पाणी खेळे | पृथ्वी प्रग्टलें| उदंड पाणी || २८||
स्वर्गमृत्यपाताळीं| येक नदी तीन ताळीं | मेघोदक अंतराळीं| वृष्टी करी || २९||
पृथ्वीचें मूळ जीवन| जीवनाचें मूळ दहन | दहनाचें मूळ पवन| थोराहून थोर || ३०||
त्याहून थोर परमेश्वर| महद्भूतांचा विचार | त्याहून थोर परात्पर| परब्रह्म जाणावें || ३१||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे आपनिरूपणनाम समास चौथा ||
समास पांचवा. . : . . अग्निनिरूपण
|| श्रीरामसमर्थ ||
धन्य धन्य हा वैश्वानरु| होये रघुनाथाचा श्वशुरु | विश्वव्यापक विश्वंभरु| पिता जानकीचा || १||
ज्याच्या मुखें भगवंत भोक्ता| जो ऋषीचा फळदाता | तमहिमरोगहर्ता| भर्ता विश्वजनाचा || २||
नाना वर्ण नाना भेद| जीवमात्रास अभेद | अभेद आणी परम शुध| ब्रम्हादिकासी || ३||
अग्नीकरितां सृष्टी चाले| अग्नीकरितां लोक धाले | अग्नीकरितां सकळ ज्याले| लाहानथोर || ४||
अग्नीनें आळलें भूमंडळ| लोकांस राहव्या जालें स्थळ | दीप दीपिका नाना ज्वाळ| जेथें तेथें || ५||
पोटामधें जठराग्नी| तेणें क्षुधा लागे जनीं | अग्नीकरितां भोजनीं| रुची येते || ६||
अग्नी सर्वांगीं व्यापक| उष्णें राहे कोओणी येक | उष्ण नस्तां सकळ लोक| मरोन जाती || ७||
आधीं अग्नी मंद होतो| पुढें प्राणी तो नासतो | ऐसा हा अनुभव येतो| प्राणीमात्रासी || ८||
असतां अग्नीचें बळ| शत्रु जिंके तात्काळ | अग्नी आहे तावत्काळ| जिणें आहे || ९||
नाना रस निर्माण जाले| अग्नीकरितां निपजले | माहांरोगी आरोग्य जाले| निमिषमात्रें || १०||
सूर्य सकळांहून विशेष| सूर्याउपरी अग्नीप्रवेश | रात्रभागीं लोक अग्नीस| साहें करिती || ११||
अंत्यजगृहींचा अग्नी आणिला| त्यास दोष नाहीं बोलिला | सकळां गृहीं पवित्र जाला| वैश्वानरु || १२||
अग्नीहोत्र नाना याग| अग्नीकरितां होती सांग | अग्नी त्रुप्त होतां मग| सुप्रसन्न होतो || १३||
देव दानव मानव| अग्नीकरितां चाले सर्व | सकळ जनासी उपाव| अग्नी आहे || १४||
लग्नें करिती थोर थोर| नाना दारूचा प्रकार | भूमंडळीं यात्रा थोर| दारूनें शोभती || १५||
नाना लोक रोगी होती| उष्ण औशधें सेविती | तेणे लोक आरोग्य होती| वन्हीकरितां || १६||
ब्रह्मणास तनुमनु| सूर्यदेव हुताशनु | येतद्विषईं अनुमानु| कांहींच नाहीं || १७||
लोकामध्यें जठरानळु| सागरीं आहे वडवनाळु | भूगोळाबाहेर आवर्णानळु| शिवनेत्रीं विदुल्यता || १८||
कुपीपासून अग्नी होतो| उंचदर्पणीं अग्नी निघतो | काष्ठमंथनी प्रगटतो| चकमकेनें || १९||
अग्नी सकळां ठाईं आहे| कठीण घिसणीं प्रगट होये | आग्यासर्पें दग्ध होये| गिरिकंदरें || २०||
अग्नीकरितां नाना उपाये| अग्नीकरितां नाना अपाय | विवेकेंविण सकल होये| निरार्थक || २१||
भूमंडळीं लाहानथोर| सकळांस वन्हीचा आधार | अग्निमुखें परमेश्वर| संतुष्ट होये || २२||
ऐसा अग्नीचा महिमा| बोलिजे तितुकी उणी उपमा | उत्तरोत्तर अगाध महि