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Dasbodh dashak - 15 by स्वामी रामदास समर्थ

[Oct 31, 2007]

.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक १५ ..
 दशक पंधरावा. . : . .
आत्मदशक समास पहिला. . : . .
चातुर्य लक्षण . . . .
|| श्रीराम ||
अस्तिमांशांचीं शरीरें| त्यांत राहिजे जीवेश्वरें | नाना विकारीं विकारे| प्रविण होइजे || १||
 घनवट पोंचट स्वभावें| विवरोन जाणिजे जीवें | व्हावें न व्हावें आघवें| जीव जाणे || २||
येंकीं मागमागों घेणें| येकां न मागतांच देणें | प्रचीतीनें सुलक्षणें| ओळखावीं || ३||
जीव जीवांत घालावा| आत्मा आत्म्यांत मिसळावा | राहराहों शोध घ्यावा| परांतरांचा || ४||
जानवें हेंवडकारें जालें| ढिलेपणें हेवड आलें | नेमस्तपणें शोभलें| दृष्टीपुढें || ५||
 तैसेंचि हे मनास मन| विवेकें जावें मिळोन | ढिलेपणें अनुमान| होत आहे || ६||
अनुमानें अनुमान वाढतो| भिडेनें कार्यभाग नासतो | याकारणें प्रत्यये तो| आधीं पाहावा || ७||
 दुसऱ्याचें जीवीचें कळेना| परांतर तें जाणवेना | वश्य होती लोक नाना| कोण्या प्रकारें || ८||
आकल सांडून परती| लोक वश्यकर्ण करिती | अपूर्णपाणें हळु पडती| ठाईं ठाईं || ९||
 जगदीश आहे जगदांतरीं| चेटकें करावीं कोणावरी | जो कोणी विवेकें विवरी| तोचि श्रेष्ठ || १०||
 श्रेष्ठ कार्ये करी श्रेष्ठ| कृत्रिम करी तो कनिष्ठ | कर्मानुसार प्राणी नष्ट| अथवा भले || ११||
राजे जाती राजपंथें| चोर जाती चोरपंथें | वेडें ठके अल्पस्वार्थें| मूर्खपणें || १२||
मूर्खास वाटे मी शहाणा| परी तो वेडा दैन्यवाणा | नाना चातुर्याच्या खुणा| चतुर जाणे || १३||
 जो जगदांतरे मिळाला| तो जगदांतरचि जाला | अरत्रीं परत्रीं तयाला| काय उणें || १४||
बुद्धि देणें भगवंताचें| बुद्धिविण माणुस काचें | राज्य सांडून फुकाचे| भीक मागे || १५||
 जें जें जेंथें निर्माण जालं| तें तें तयास मानलें | अभिमान देऊन गोविलें| ठाईं ठाईं || १६||
अवघेच म्हणती आम्ही थोर| अवघेचि म्हणती आम्ही सुंदर | अवघेचि म्हणती आम्ही चतुर| भूमंडळीं || १७||
 ऐसा विचार आणितां मना| कोणीच लाहान म्हणविना | जाणते आणिती अनुमाना| सकळ कांहीं || १८||
 आपुलाल्या साभिमानें| लोक चालिले अनुमानें | परंतु हें विवेकानें| पाहिलें पाहिजे || १९||
 लटिक्याचा साभिमान घेणें| सत्य अवघेंच सोडणें | मूर्खपणाचीं लक्षणें| ते हे ऐसीं || २०||
सत्याचा जो साभिमान| तो जाणावा निराभिमान | न्याये अन्याये समान| कदापि नव्हे || २१||
न्याये म्हणिजे तो शाश्वत. अन्याये म्हणिजे तो अशाश्वत | बाष्कळ आणि नेमस्त| येक कैसा || २२||
येक उघड भाग्य भोगिती| येक तश्कर पळोन जाती | येकांची प्रगट महंती| येकांची कानकोंडी || २३||
 आचारविचारेंविण| जें जें करणें तो तो सीण | धूर्त आणि विचक्षण| तेचि शोधावे || २४||
उदंड बाजारी मिळाले| परी ते धूर्तेंचि आळिले | धूर्तांपासीं कांहीं न चले| बाजाऱ्यांचें || २५||
याकारणें मुख्य मुख्य| तयांसी करावे सख्य | येणेंकरितां असंख्य| बाजारी मिळती || २६||
धूर्तासि धूर्तचि आवडे| धूर्त धूर्तींच पवाडे | उगेंचि हिंडती वेडे| कार्येंविण || २७||
 धूर्तासि धूर्तपण कळलें| तेणें मनास मनपण मिळालें | परी हें गुप्तरूपें केलें| पाहिजे सर्वे || २८||
समर्थाचें राखतां मन| तेथे येती उदंड जन | जन आणि सज्जन| आर्जव करिती || २९||
वोळखीनें वोळखी साधावी| बुद्धीनें बुद्धि बोधावी | नीतिन्यायें वाट रोधावी| पाषांडाची || ३०||
वेष धरावा बावळा| अंतरीं असाव्या नाना कळा | सगट लोकांचा जिव्हाळा| मोडूं नये || ३१||
 निस्पृह आणि नित्य नूतन| प्रत्ययाचें ब्रह्मज्ञान | प्रगट जाणतां सज्जन| दुल्लभ जगीं || ३२||
नाना जिनसपाठांतरें निवती सकळांचीं अंतरें | चंचळपणें तदनंतरें| सकळां ठाईं || ३३||
 येके ठाईं बैसोन राहिला| तरी मग व्यापचि बुडाला | सावधपणें ज्याला त्याला| भेटि द्यावी || ३४||
भेटभेटों जरी राखणें| हे चातुर्याचीं लक्षणें | मनुष्यमात्र उत्तम गुणें| समाधान पावे || ३५||
 इति श्रीदासबोचे गुरुशिष्यसंवादे चातुर्यलक्षणनाम समास पहिला ||

समास दुसरा. . : . . निःस्पृह व्याप . . . .
|| श्रीराम ||
 पृथ्वीमधें मानवी शरीरें| उदंड दाटलीं लाहान थोरें | पालटती मनोविकारें| क्षणाक्षणा || १||
जितुक्या मूर्ती तितुक्याच प्रकृती| सारिख्या नस्ती आदिअंतीं || नेमचि नाहीं पाहावें किती| काये म्हणोनी || २||
कित्येक म्लेंच होऊन गेले| कित्येक फिरंगणांत आटले | देशभाषानें रुधिले| कीतीयेक || ३||
मऱ्हाष्टदेश थोडा उरला| राजकारनें लोक रुधिला | अवकाश नाहीं जेवायाला| उदंड कामें || ४||
कित्येक युद्धप्रसंगी गुंतले| तेणें गुणें उन्मत्त जाले | रात्रंदिवस करूं लागले| युद्धचर्चा || ५||
उदिम्यास व्यासंग लागला| अवकाश नाहींसा जाला | अवघा पोटधंदाच लागला| निरंतर || ६||
शडदर्शनें नाना मतें| पाषांडें वाढली बहुतें | पृथिवीमधें जेथ तेथें| उपदेसिती || ७||
स्मार्थीं आणि वैष्णवी| उरलीं सुरलीं नेलीं आघवी | ऐसी पाहातां गथागोवी| उदंड जाली || ८||
 कित्येक कामनेचे भक्त| ठाइं ठाइं जालें आसक्त | युक्त अथवा अयुक्त| पाहातो कोण || ९||
 या गल्बल्यामधें गल्बला| कोणीं कोणीं वाढविला | त्यास देखों सकेनासा जाला| वैदिक लोक || १०||
त्याहिमधें हरिकीर्तन| तेथें वोढले कित्येक जन | प्रत्ययाचें ब्रह्मज्ञान| कोण पाहे || ११||
या कारणें ज्ञान दुल्लभ| पुण्यें घडे अलभ्य लाभ | विचारवंतां सुल्लभ| सकळ कांहीं || १२||
विचार कळला सांगतां नये| उदंड येती अंतराये | उपाय योजितां अपाये| आडवे येती || १३||
 त्याहिमधें तो तिक्षण| रिकामा जाऊं नेदी क्षण | धूर्त तार्किक विचक्षण| सकळां माने || १४||
नाना जिनस उदंड पाठ| वदों लागला घडघडाट | अव्हाटचि केली वाट| सामर्थ्यबळें || १५||
प्रबोधशक्तीचीं अनंत द्वारें| जाणें सकळांची अंतरें | निरूपणें तदनंतरें| चटक लागे || १६||
मतें मतांतरें सगट| प्रत्यये बोलोन करी सपाट | दंडक सांडून नीट| वेधी जना || १७||
 नेमकें भेदकें वचनें| अखंड पाहे प्रसंगमानें | उदास वृत्तिच्या गुमानें| उठोन जातो || १८||
प्रत्यये बोलोन उठोन गेला| चटक लागली लोकांला | नाना मार्ग सांडून त्याला| शरण येती || १९||
परी तो कोठें आडळेना| कोणे स्थळीं सांपडेना | वेष पाहातां हीन दीना| सारिखा दिसे || २०||
उदंड करी गुप्तरूपें| भिकाऱ्यासारिखा स्वरूपें | तेथें येशकीर्तिप्रतापें| सीमा सांडिली || २१||
ठाइं ठाइं भजन लावी| आपण तेथून चुकावी | मछरमतांची गोवी| लागोंच नेदी || २२||
 खनाळामधें जाऊन राहे| तेथें कोणीच न पाहे | सर्वत्रांची चिंता वाहे| सर्वकाळ || २३||
अवघड स्थळीं कठीण लोक| तेथें राहणें नेमक | सृष्टीमधें सकळ लोक| धुंडीत येती || २४||
 तेथें कोणाचें चालेना| अनुमात्र अनुमानेना | कट्ट घालीन राजकारणा| लोक लावी || २५||
लोकीं लोक वाढविले| तेणें अमर्याद जाले | भूमंडळीं सत्त चाले| गुप्तरूपें || २६||
ठाइं ठाइं उदंड ताबे| मनुष्यमात्र तितुकें झोंबे | चहुंकडे उदंड लांबे| परमार्थबुद्धी || २७||
उपासनेचा गजर| स्थळोस्थळोओं थोर थोर | प्रत्ययानें प्राणीमात्र| सोडविले || २८||
 ऐसे कैवाडे उदंड जाणे| तेणें लोक होती शाहाणे | जेथें जेथें प्रत्यये बाणे| प्राणीमात्रासी || २९||
 ऐसी कीर्ति करून जावें| तरीच संसारास यावें | दास म्हणे हें स्वभावें| संकेतें बोलिलें || ३०||
 इति श्रीदासबोधे गुफ़ुशिष्यसंवादे निस्पृहव्यापनाम समास दुसरा ||

समास तिसरा. . : . . श्रेष्ठ अंतरात्मा . . . .
 || श्रीराम ||
 मुळापासून सैरावैरा| अवघा पंचीकर्ण पसारा | त्यांत साक्षत्वाचा दोरा| तोहि तत्त्वरूप || १||
 दुरस्त्या दाटल्या फौजा| उंच सिंहासनीं राजा | याचा विचार समजा| अंतर्यामी || २||
देहमात्र अस्तिमांशांचें| तैसेंचि जाणावें नृपतीचें | मूळापासून सृष्टीचें| तत्वरूप || ३||
 रायाचे सत्तेनें चालतें| परन्तु अवघीं पंचभूतें | मुळीं आधिक जाणिवेचे तें| अधिष्ठान आहे || ४||
विवेके बहुत पैसावले| म्हणौन अवतारी बोलिले | मनु चक्रवती जाले| येणेंचि न्यायें || ५||
जेथें उदंड जाणीव| तेचि तितुके सदेव | थोडे जाणिवेने नर्देव| होती लोक || ६||
व्याप आटोप करिती| धके चपेटे सोसिती | तेणें प्राणी सदेव होती| देखतदेखतां || ७||
ऐसें हें आतां वर्ततें| मुर्ख लोकांस कळेना तें | विवेकीं मनुष्य समजतें| सकळ कांहीं || ८||
थोर लाहान बुद्धीपासी| सगट कळेना लोकांसी | आधीं उपजलें तयासी| थोर म्हणती || ९||
वयें धाकुटा नृपती| वृद्ध तयास नमस्कार करिती | विचित्र विवेकाची गती| कळली पाहिजे || १०||
सामान्य लोकांचे ज्ञान| तो अवघाच अनुमान | दीक्षादंडकाचें लक्षण| येणेंचि पाडें || ११||
नव्हें कोणास म्हणावें| सामान्यास काये ठावें | कोणकोणास म्हणावें| किती म्हणोनी || १२||
धाकुटा भाग्यास चढला| तरी तुछ्य करिती तयाला | याकारणें सलगीच्या लोकांला| दूरी धरावें || १३||
नेमस्त कळेना वचन| नेमस्त नये राजकारण | उगेचि धरिती थोरपण| मूर्खपणें || १४||
नेमस्त कांहींच कळेना| नेमस्त कोणीच मानिना | आधी उपजलें त्या थोरपणा| कोण पुसे || १५||
 वडिलां वडिलपण नाहीं| धाकुट्यां धाकुटपण नाहीं | ऐसे बोलती त्यांस नाहीं| शाहाणपण || १६||
गुणेविण वडिलपण| हें तों आवघेंच अप्रमाण | त्याची प्रतीत प्रमाण| थोरपणीं || १७||
तथापि वडिलांस मानावें| वडिलें वडिलपण जाणावें | नेणतां पुढें कष्टावें| थोरपणीं || १८||
तस्मात वडिल अंतरात्मा| जेथें चेतला तेथें महिमा | हें तों प्रगटचि आहे आम्हा| शब्द नाहीं || १९||
याकारणें कोणी येकें| शाहाणपण सिकावें विवेकें | विवेक न सिकतां तुकें| तुटोन जाती || २०||
तुक तुटलें म्हणिजे गेलें| जन्मा येऊन काये केलें | बळेंचि सांदीस घातलें| आपणासी || २१||
 सगट बायेका सिव्या देती| सांदीस पडिला ऐसें म्हणती | मूर्खपणाची प्राप्ती| ठाकून आली || २२||
ऐसें कोणीयेकें न करावें| सर्व सार्थकचि करावें | कळेना तरी विवरावें| ग्रंथांतरीं || २३||
शाहाण्यास कोणीतरी बाहाती| मुर्खास लोक दवडून देती | जीवास आवडे संपत्ति| तरी शाहाणें व्हावें || २४||
आहो या शाहाणपणाकारणें| बहुतांचे कष्ट करणें | परंतु शाहाणपण शिकणें| हें उत्तमोत्तम || २५||
 जों बहुतांस मानला| तो जाणावा शाहाणा जाला | जनीं शाहाण्या मनुष्याला| काये उणें || २६||
आपलें हित न करी लोकिकीं| तो जाणावा आत्मघातकी | या मुर्खायेवढा पातकी| आणिक नाहीं || २७||
आपण संसारीं कष्टतो| लोकांकरवी रागेजोन घेतो | जनामध्यें शाहाणा तो| ऐसें न करी || २८||
साधकां सिकविलें स्वभावें| मानेल तरी सुखें घ्यावें | मानेना तरी सांडावें| येकिकडे || २९||
तुम्ही श्रोते परम दक्ष| अलक्षास लावितां लक्ष | हें तों सामान्य प्रत्यक्ष| जाणतसा || ३०||
इति श्रीदासबोधे गुफ़ुशिष्यसंवादे श्रेष्ठ अंतरात्मानिरूपणनाम समास तिसरा ||

समास चौथा. . : . . शाश्वतब्रह्मनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
पृथ्वीपासून जालीं झाडें| झाडापासून होती लांकडें | लांकडें भस्मोन पुढें| पृथ्वीच होये || १||
 पृथ्वीपासून वेल होती| नाना जिनस फापावती | वाळोन कुजोन मागुती| पृथ्वीच होये || २||
 नाना धान्यांचीं नाना अन्नें| मनुष्यें करिती भोजनें | नाना विष्ठा नाना वमनें| पृथ्वीच होये || ३||
नाना पक्षादिकीं भक्षिलें| तरी पुढें तैसेंचि जालें | वाळोन भस्म होऊन गेलें| पुन्हा पृथ्वी || ४||
 मनुष्यें मरतांच ऐका| क्रिमि भस्म कां मृत्तिका | ऐशा काया पडती अनेका| पुढें पृथ्वी || ५||
नाना तृण पदार्थ कुजती| पुढें त्याची होये माती | नाना किडे मरोन जाती| पुढें पृथ्वी || ६||
पदर्थ दाटले अपार| किति सांगावा विस्तार | पृथ्वीवांचून थार| कोणास आहे || ७||
झाड पाले आणि तृण| पशु भक्षितां होतें सेण | खात मूत भस्म मिळोन| पुन्हा पृथ्वी || ८||
उत्पत्तिस्थितिसंव्हारतें| तें तें पृथ्वीस मिळोन जातें | जितुकें होतें आणि जातें| पुन्हा पृथ्वी || ९||
नाना बीजांचिया रासी| विरढोने लागती गगनासी | पुढें सेवटीं पृथ्वीसी| मिळोन जाती || १०||
लोक नाना धातु पुरिती| बहुतां दिवसां होये माती | सुवर्णपाषाणाची गती| तैसीच आहे || ११||
मातीचें होते सुवर्ण| आणी मृत्तिकेचे होती पाषाण | माहा अग्निसंगें भस्मोन| पृथ्वीच होये || १२||
सुवर्णाचें जर होतें| जर सेवटीं कुजोन जातें | रस होऊन वितुळतें| पुन्हा पृथ्वी || १३||
पृथ्वीपासून धातु निपजती| अग्निसंगें रस होती | तया रसाची होये जगती| कठीणरूपें || १४||
 नाना जळासी गंधी सुटे| तेथें पृथ्वीचें रूप प्रगटे | देवसेंदिवस जळ आटे| पुढें पृथ्वी || १५||
 पत्रें पुष्पें फळें येती| नाना जीव खाऊन जाती | ते जीव मरतां जगती| नेमस्त होये || १६||
जितुका कांहीं जाला आकार| तितुक्यास पृथ्वीचा आधार | होती जाती प्राणीमात्र| सेवट पृथ्वी || १७||
हें किती म्हणौन सांगावें| विवेकें अवघेचि जाणावें | खांजणीभाजणीचें समजावें| मूळ तैसे || १८||
आप आळोन पृथ्वी जालोओ| पुन्हां आपींच विराली | अग्नियोगें भस्म जाली| म्हणोनियां || १९||
आप जालें तेजापासुनी| पुढें तेजें घेतलें सोखुनी | तें तेज जालें वायोचेनी| पुढें वायो झडपी || २०||
वायो गगनीं निर्माण जाला| पुढें गगनींच विराला | ऐसें खांजणीभाजणीला| बरें पाहा || २१||
जें जें जेथें निर्माण होतें| तें तें तेथें लया जातें | येणें रितीं पंचभूतें| नाश पावती || २२||
भूत म्हणिजे निर्माण जालें| पुन्हां मागुतें निमालें | पुढें शाश्वत उरलें| परब्रह्म तें || २३||
तें परब्रह्म जों कळेना| तो जन्ममृत्यु चुकेना | चत्वार खाणी जीव ना| होणें घडे || २४||
जडाचें मूळ तें चंचळ| चंचळाचें मूळ तें निश्चळ | निश्चळासी नाहीं मूळ| बरें पाहा || २५||
पूर्वपक्ष म्हणिजे जालें| सिद्धांत म्हणिजे निमालें | पक्षातीत जें संचलें| परब्रह्म तें || २६||
हें प्रचितीनें जाणावें| विचारें खुणेंसी बाणावें | विचारेंविण सिणावें| तेंचि मूर्खपणें || २७||
 ज्ञानी भिडेने दडपला| निश्चळ परब्रह्म कैंचें त्याला | उगाच करितो गल्बला| मायेंमधें || २८||
 माया निशेष नासली| पुढें स्थिति कैसी उरली | विचक्षणें विवरिली| पाहिजे स्वयें || २९||
निशेष मायेचें निर्शन| होतां आत्मनिवेदन | वाच्यांश नाहीं विज्ञान| कैसें जाणावें || ३०||
 लोकांचे बोलीं जो लागला| तो अनुमानेंच बुडाला | याकारणें प्रत्ययाला| पाहिलेंच पाहावें || ३१||
 इति श्रीदासबोधे गुफ़ुशिष्यसंवादे शाश्वतब्रह्मनिरूपणनाम समास चौथा ||

समास पांचवा. . : . . चंचळ लक्षण . . . .
|| श्रीराम ||
दोघां ऐसीं तीन चालती| अगुणी अष्टधा प्रकृती | अधोर्ध सांडून वर्तती| इंद्रफणी ऐसीं || १||
पणतोंडें भक्षितो पणजा| मूल बापास मारी वोजा | चुकाऱ्या गेला राजा| चौघां जणां

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Heh Heh Heh...
Hanging in the hallway at the High School are the basketball team pictures from the past 40 years. A player in the center of the front row in each picture holds a basketball identifying the year -- "62-63," "63-64," "64-65," etc.
One day I spotted a freshman looking curiously at the photos. Turning to me, he said, "Isn't it strange how the teams always lost by one point?"

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