Dasbodh dashak - 14
by स्वामी रामदास समर्थ
[Oct 31, 2007]
.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक १४ ..
दशक चौदावा. : .
अखंडध्यान समास पहिला. : .
निस्पृह लक्षणनाम . . . .
|| श्रीराम ||
ऐका स्पृहाची सिकवण| युक्ति बुद्धि शाहाणपण | जेणें राहे समाधान| निरंतर || १||
सोपा मंत्र परी नेमस्त| साधें वोषध गुणवंत | साधें बोलणें सप्रचित| तैसें माझें || २||
तत्काळचि अवगुण जाती| उत्तम गुणाची होये प्राप्ती | शब्दवोषध तीव्र श्रोतीं| साक्षपें सेवावें || ३||
निस्पृहता धरूं नये| धरिली तरी सोडूं नये | सोडिली तरी हिंडों नये| वोळखीमधें || ४||
कांता दृष्टी राखों नये| मनास गोडी चाखऊं नये | धारिष्ट चळतां दाखऊं नये| मुख आपुलें || ५||
येकेस्थळीं राहों नये| कानकोंडें साहों नये | द्रव्य दारा पाहों नये| आळकेपणें || ६||
आचारभ्रष्ट होऊं नये| दिल्यां द्रव्य घेऊं नये | उणा शब्द येऊं नये| आपणावरी || ७||
भिक्षेविषीं लाजों नये| बहुत भिक्षा घेऊं नये | पुसतांहि देऊं नये| वोळखी आपली || ८||
धड मळिन नेसों नये| गोड अन्न खाऊं नये | दुराग्रह करूं नये| प्रसंगें वर्तावें || ९||
भोगीं मन असों नये| देहदुःखें त्रासों नये | पुढें आशा धरूं नये| जीवित्वाची || १०||
विरक्ती गळों देऊं नये| धारिष्ट चळों देऊं नये | ज्ञान मळिण होऊं नये| विवेकबळें || ११||
करुणाकीर्तन सोडूं नये| अंतर्ध्यान मोडूं नये || प्रेमतंतु तोडूं नये| सगुणमूर्तीचा || १२||
पोटीं चिंता धरूं नये| कष्टें खेद मानूं नये | समइं धीर सांडूं नये| कांहीं केल्या || १३||
अपमानितां सिणों नये| निखंदितां कष्टों नये | धिःकारितां झुरों नये| कांहीं केल्या || १४||
लोकलाज धरूं नये| लाजवितां लाजों नये | खिजवितां खिजों नये| विरक्त पुरुषें || १५||
शुद्ध मार्ग सोडूं नये| दुर्जनासीं तंडों नये | समंध पडों देऊं नये| चांडाळासी || १६||
तपीळपण धरूं नये| भांडवितां भांडों नये | उडवितां उडऊं नये| निजस्थिती आपुली || १७||
हांसवितां हासों नये| बोलवितां बोलों नये | चालवितां चालों नये| क्षणक्ष्णा || १८||
येक वेष धरूं नये| येक साज करूं नये | येकदेसी होऊं नये| भ्रमण करावें || १९||
सलगी पडों देऊं नये| प्रतिग्रह घेऊं नये | सभेमध्यें बैसों नये| सर्वकाळ || २०||
नेम आंगीं लाऊं नये| भरवसा कोणास देऊं नये | अंगीकार करूं नये| नेमस्तपणाचा || २१||
नित्यनेम सांडूं नये| अभ्यास बुडों देऊं नये | परतंत्र होऊं नये| कांहीं केल्यां || २२||
स्वतंत्रता मोडूं नये| निरापेक्षा तोडूं नये | परापेक्षा होऊं नये| क्षणक्ष्णा || २३||
वैभव दृष्टीं पाहों नये| उपाधीसुखें राहों नये | येकांत मोडूं देऊं नये| स्वरूपस्थितीचा || २४||
अनर्गळता करूं नये| लोकलाज धरूं नये | कोठेंतरी होऊं नये| आसक्त कदां || २५||
परंपरा तोडूं नये| उआपाधी मोडूं देऊं नये | ज्ञानमार्गे सोडूं नये| कदाकाळीं || २६||
कर्ममार्ग सांडूं नये| वैराग्य मोडूं देऊं नये | साधन भजन खंडूं नये| कदाकाळीं || २७||
अतिवाद करूं नये| अनित्य पोटीं धऊं नये | रागें भरीं भरों नये| भलतीकडे || २८||
न मनी त्यास सांगों नये| कंटाळवाणें बोलों नये | बहुसाल असो नये| येकें स्थळीं || २९||
कांहीं उपाधी करूं नये| केली तरी धरूं नये | धरिली तरी सांपडों नये| उपाधीमध्यें || ३०||
थोरपणें असो नये| महत्त्व धरून बैसों नये | कांहीं मान इछूं नये| कोठेंतरी || ३१||
साधेपण सोडूं नये| सानेपण मोडूं नये | बळात्कारें जोडूं नये| अभिमान आंगीं || ३२||
अधिकारेवीण सांगों नये| दाटून उपदेश देऊं नये | कानकोंडा करूं नये| परमार्थ कदा || ३३||
कठीण वैराग्य सोडूं नये| कठीण अभ्यास सांडूं नये | कठिणता धरूं नये| कोणेकेविशइं || ३४||
कठीण शब्द बोलों नये| कठीण आज्ञा करूं नये | कठीण धीरत्व सोडूं नये| कांहीं केल्यां || ३५||
आपण आसक्त होऊं नये| केल्यावीण सांगों नये | बहुसाल मागों नये| शिष्यवर्गांसी || ३६||
उत्धट शब्द बोलों नये| इंद्रियेंस्मरण करूं नये | शाक्तमार्गें भरों नये| मुक्तपणें भरीं || ३७||
नीच कृतीं लाजों नये| वैभव होतां माजों नये | क्रोधें भरीं भरों नये| जाणपणें || ३८||
थोरपणें चुकों नये| न्याये नीति सांडूं नये | अप्रमाण वर्तों नये| कांहीं केल्या || ३९||
कळल्यावीण बोलों नये| अनुमानें निश्चये करूं नये | सांगतां दुःख धरूं नये| मूर्खपणें || ४०||
सावधपण सोडुं नये| व्यापकपण सांडुं नये | कदा सुख मानूं नये| निसुगपणाचें || ४१||
विकल्प पोटीं धरूं नये| स्वार्थआज्ञा करूं नये | केली तरी टाकूं नये| आपणास पुढें || ४२||
प्रसंगेंवीण बोलों नये| अन्वयेंवीण गाऊं नये | विचारेंवीण जाऊं नये| अविचारपंथें || ४३||
परोपकार सांडूं नये| परपीडा करूंनये | विकल्प पडों देऊं नये| कोणीयेकासी || ४४||
नेणपण सोडूं नये| महंतपण सांडूं नये | द्रव्यासाठीं हिंडों नये| कीर्तन करीत || ४५||
संशयात्मक बोलों नये| बहुत निश्चये करूं नये | निर्वाहेंवीण धरूं नये| ग्रंथ हातीं || ४६||
जाणपणें पुसों नये| अहंभाव दिसों नये | सांगेन ऐसें म्हणों नये| कोणीयेकासी || ४७||
ज्ञानगर्व धरूं नये| सहसा छळणा करूं नये | कोठें वाद घालुं नये| कोणीयेकासी || ४८||
स्वार्थबुद्धी जडों नये| कारबारीं पडों नये | कार्यकर्ते होऊं नये| राजद्वारीं || ४९||
कोणास भर्वसा देऊं नये| जड भिक्षा मागों नये | भिक्षेसाथीं सांगों नये| परंपरा आपुली || ५०||
सोइरिकींत पडों नये| मध्यावर्ति घडों नये | प्रपंचाची जडों नये| उपाधी आंगीं || ५१||
प्रपंचप्रस्तीं जाऊं नये| बाष्कळ अन्न खाऊं नये | पाहुण्यासरिसें घेऊं नये| आमंत्रणें कदां || ५२||
श्राध पक्ष सटी सामासें| शांती फळशोबन बारसें | भोग राहात बहुवसें| नवस व्रतें उद्यापनें || ५३||
तेथें निस्पृहें जाऊं नये| त्याचें अन्न खाऊं नये | येळिलवाणें करूं नये| आपणासी || ५४||
लग्नमुहुर्तीं जाऊं नये| पोटासाठीं गाऊं नये | मोलें कीर्तन करूं नये| कोठेंतरी || ५५||
आपली भिक्षा सोडूं नये| वारें अन्न खाऊं नये | निस्पृहासि घडों नये| मोलयात्रा || ५६||
मोलें सुकृत करूं नये| मोलपुजारी होऊं नये | दिल्हा तरी घेऊं नये| इनाम निस्पृहें || ५७||
कोठें मठ करूं नये| केला तरी तो धरूं नये | मठपती होऊन बैसों नये| निस्पृह पुरुषें || ५८||
निस्पृहें अवघेंचि करावें| परी आपण तेथें न सांपडावें | परस्परें उभारावें| भक्तिमार्गासी || ५९||
प्रेत्नेंविण राहों नये| आळस दृष्टी आणूं नये | देह अस्तां पाहों नये| वियोग उपासनेचा || ६०||
उपाधीमध्यें पडों नये| उपाधी आंगीं जडों नये | भजनमार्ग मोडूं नये| निसंगळपणें || ६१||
बहु उपाधी करूं नये| उपाधीविण कामा नये | सगुणभक्ति सोडूं नये| विभक्ति खोटी || ६२||
बहुसाल धांवों नये| बहुसाल साहों नये | बहुत कष्ट करूं नये| असुदें खोटें || ६३||
बहुसाल बोलों नये| अबोलणें कामा नये | बहुत अन्न खाऊं नये| उपवास खोटा || ६४||
बहुसाल निजों नये| बहुत निद्रा मोडुं नये | बहुत नेम धरूं नये| बाश्कळ खोटें || ६५||
बहु जनीं असों नये| बहु आरण्य सेऊं नये | बहु देह पाळूं नये| आत्महत्या खोटी || ६६||
बहु संग धरूं नये| संतसंग सांडुं नये | कर्मठपण कामा नये| अनाचार खोटा || ६७||
बहु लोकिक सांडुं नये| लोकाधेन होऊं नये | बहु प्रीती कामा नये| निष्ठुरता खोटी || ६८||
बहु संशये धरूं नये| मुक्तमार्ग कामा नये | बहु साधनीं पडों नये| साधनेंवीण खोटें || ६९||
बहु विषये भोगूं नये| विषयत्याग करितां नये | देहलोभ धरूं नये| बहु त्रास खोटा || ७०||
वेगळा अनुभव घेऊं नये| अनुभवेंवीण कामा नये | आत्मस्थिती बोलों नये| स्तब्धता खोटी || ७१||
मन उरों देऊं नये| मनेंवीण कामा नये | अलक्ष वस्तु लक्षा नये| लक्षेंवीण खोटें || ७२||
मनबुद्धिअगोचर| बुद्धीवीण अंधकार | जाणीवेचा पडो विसर| नेणीव खोटी || ७३||
ज्ञातेपण धरूं नये| ज्ञानेंवीण कामा नये | अतर्क्य वस्तु तर्का न ये| तर्केंवीण खोटें || ७४||
दृश्यस्मरण काम नये| विस्मरण पडों नये | कांहीं चर्चा करूं नये| केलियावीण न चले || ७५||
जगीं भेद कामा नये| वर्णसंकर करूं नये | आपला धर्म उडऊं नये| अभिमान खोटा || ७६||
आशाबद्धत बोलों नये| विवेकेंवीण चालों नये | समाधान हालों नये| कांहीं केल्यां || ७७||
अबद्ध पोथी लेहों नये| पोथीवीण कामा नये | अबद्ध वाचूं नये| वाचिल्यावीण खोटें || ७८||
निस्पृहें वगत्रुत्व सांडूं नये| आशंका घेतां भांडों नये | श्रोतयांचा मानूं नये| वीट कदा || ७९||
हें सिकवण धरितां चित्तीं| सकळ सुखें वोळगती | आंगीं बाणें महंती| अकस्मात || ८०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे निस्पृहलक्षणनाम समास पहिला ||
समास दुसरा. . : . . भिक्षानिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
ब्रह्माणाची मुख्य दीक्षा| मागितली पाहिजे भिक्षा | वों भवति या पक्षा| रक्षिलें पाहिजे || १||
भिक्षा मागोन जो जेविला| तो निराहारी बोलिला | प्रतिग्रहावेगळा जाला| भिक्षा मागतां || २||
संतासंत जे जन| तेथें कोरान्न मागोन करी भोजन | तेनें केलें अमृतप्राशन| प्रतिदिनीं || ३||
|| श्लोक || भिक्षाहारी निराहारी| भिक्षा नैव प्रतिग्रहः | असंतो वापि संतो वा| सोमपानं दिने दिने || ऐसा भिक्षेचा महिमा| भिक्षा माने सर्वोत्तमा | ईश्वराचा अगाध महिमा| तोहि भिक्षा मागे || ४||
दत्त गोरक्ष आदिकरुनी| सिद्ध भिक्षा मागती जनीं | निस्पृहता भिक्षेपासुनी| प्रगट होये || ५||
वार लाऊन बैसला| तरी तो पराधेन जाला | तैसीच नित्यावळीला| स्वतंत्रता कैंची || ६||
आठां दिवसां धान्य मेळविलें| तरी तें कंटाळवाणें जालें | प्राणी येकायेकीं चेवलें| नित्यनूतनतेपासुनी || ७||
नित्य नूतन हिंडावें| उदंड देशाटण करावें | तरीच भिक्षा मागतां बरवें| श्लाघ्यवाणें || ८||
अखंड भिक्षेच अभ्यास| तयास वाटेना परदेश | जिकडे तिकडे स्वदेश| भुवनत्रैं || ९||
भिक्षां मागतां किरकों नये| भिक्षा मागतां लाजो नये | भिक्षा मागतां भागों नये| परिभ्रमण करावें || १०||
भिक्षा आणि चमत्कार| च्चाकाटती लहानथोर | कीर्ति वर्णी निरंतर| भगवंताची || ११||
भिक्षा म्हणिजे कामधेनु| सदा फळ नव्हे सामान्यु | भिक्षेस करी जो अमान्यु| तो करंटा जोगी || १२||
भिक्षेनें वोळखी होती| भिक्षेनें भरम चुकती | सामान्य भिक्षा मान्य करिती| सकळ प्राणी || १३||
भिक्षा म्हणिजे निर्भये स्थिति| भिक्षेनें प्रगटे महंती | स्वतंत्रता ईश्वरप्राप्ती| भिक्षागुणें || १४||
भिक्षेस नाहीं आडथळा| भिक्षाहारी तो मोकळा | भिक्षेकरितां सार्थक वेअळा| काळ जातो || १५||
भिक्षा म्हणिजे अमरवल्ली| जिकडे तिकडे लगवली | अवकाळीं फळदायेनी जाली| निर्ल्लजासी || १६||
पृथ्वीमधें देश नाना| फिरतां उपवासी मरेना | कोणे येके ठाईं जना| जड नव्हे || १७||
गोरज्य वाणिज्य कृषी| त्याहून प्रतिष्ठा भिक्षेसी | विसंभों नये झोळीसी| कदाकाळीं || १८||
भिक्षेऐसें नाहीं वैराग्य| वैराग्यापरतें नाहीं भाग्य | वैराग्य नस्तां अभाग्य| येकदेसी || १९||
कांहीं भिक्षा आहे म्हणावें| अल्पसंतोषी असावें | बहुत आणितां घ्यावें| मुष्टी येक || २०||
सुखरूप भिक्षा मागणें| ऐसी निस्पृहतेचीं लक्षणें | मृद वागविळास करणें| परम सौख्यकारी || २१||
ऐसी भिक्षेची स्थिती| अल्प बोलिलें येथामती | भिक्षा वांचवी विपत्ती| होणार काळीं || २२||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे भिक्षानिरूपणनाम समास दुसरा ||
समास तिसरा. . : . . कवित्वकाआ निरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
कवित्व शब्दसुमनमाळा| अर्थ परिमळ आगळा | तेणें संतषट्पदकुळा| आनंद होये || १||
ऐसी माळा अंतःकरणीं| गुंफुन पूजा रामचरणीं | वोंकारतंत अखंडपणीं| खंडूं च नये || २||
परोपकाराकारणें| कवित्व अगत्य करणें | तया कवित्वाचीं लक्षणें| बोलिजेती || ३||
जेणें घडे भगवद्भक्ती| जेणें घडे विरक्ती | ऐसिया कत्वाची युक्ती| आधीं वाढवावी || ४||
क्रियेवीण शब्दज्ञान| तया न मानिती सज्जन | म्हणौनी देव प्रसन्न| अनुतापें करावा || ५||
देवाचेन प्रसन्नपणें| जें जें घडे बोलणें | तें तें अत्यंत श्लाघ्यवाणें| या नाव प्रासादिक || ६||
धीट पाठ प्रसादिक| ऐसें बोलती अनेक | तरी हा त्रिविध विवेक| बोलिजेल || ७||
धीट म्हणिजे धीटपणें केलें| जें जें आपुल्या मनास आलें | बळेंचि कवित्व रचिलें| या नाव धीट बोलिजे || ८||
पाठ म्हणिजे पाठांतर| बहुत पाहिलें ग्रंथांतर | तयासरिखा उतार| आपणचि केला || ९||
सीघ्रचि कवित्व जोडिलें| दृष्टि पडिलें तें चि वर्णिलें | भक्तिवांचून जें केलें| त्या नाव धीटपाठ || १०||
कामिक रसिक श्रृंघारिक| वीर हास्य प्रस्ताविक | कौतुक विनोद अनेक| या नाव धीटपाठ || ११||
मन जालें कामाकार| तैसेचि निघती उद्गार | धीटपाठें परपार| पाविजेत नाहीं || १२||
व्हावया उदरशांती| करणें लागे नरस्तुती | तेथें केली जे वित्पत्ति| त्या नाव धीटपाठ || १३||
कवित्व नसावें धीटपाठ| कवित्व नसावें खटपट | कवित्व नसावें उद्धट| पाषांडमत || १४||
कवित्व नसावें वादांग| कवित्व नसावें रसभंग | कवित्व नसावें रंगभंग| दृष्टांतहीन || १५||
कवित्व नसावें पाल्हाळ| कवित्व नसावें बाष्कळ | कवित्व नसावें कुटीळ| लक्षुनियां || १६||
हीन कवित्व नसावें| बोलिलेंचि न बोलावें | छंदभंग न करावें| मुद्राहीन || १७||
वित्पत्तिहीन तर्कहीन| कळाहीन शब्दहीन | भक्तिज्ञानवैराग्यहीन| कवित्व नसावें || १८||
भक्तिहीन जें कवित्व| तेंचि जाणावें ठोंबें मत | आवडीहीन जें वगत्रृत्व| कंटाळवाणें || १९||
भक्तिविण जो अनुवाद| तोचि जाणावा विनोद | प्रीतीविण संवाद| घडे केवी || २०||
असो धीट पाठ तें ऐसें| नाथिलें अहंतेचें पिसें | आतां प्रसादिक तें कैसें| सांगिजेल || २१||
वैभव कांता कांचन| जयास वाटे हें वमन | अंतरीं लागलें ध्यान| सर्वोत्तमाचें || २२||
जयास घडीनें घडी| लागे भगवंतीं आवडी | चढती वाढती गोडी| भगद्भजनाची || २३||
जो भगवद्भजनेंवीण| जाऊं नेदी येक क्षण | सर्वकाळ अंतःकरण| भक्तिरंगें रंगलें || २४||
जया अंतरी भगवंत| अचळ राहिला निवांत | तो स्वभावें जें बोलत| तें ब्रह्मनिरूपण || २५||
अंतरी बैसला गोविंद| तेणें लागला भक्तिछंद | भक्तीविण अनुवाद| आणीक नाहीं || २६||
आवडी लागली अंतरीं| तैसीच वदे वैखरी | भावें करुणाकीर्तन करी| प्रेमभरें नाचतु || २७||
भगवंतीं लागलें मन| तेणें नाठवे देहभान | शंका लज्या पळोन| दुरी ठेली || २८||
तो प्रेमरंगें रंगला| तो भक्तिमदें मातला | तेणें अहंभाव घातला| पायांतळीं || २९||
गात नाचत निशंक| तयास कैचे दिसती लोक | दृष्टीं त्रैलोक्यनायेक| वसोन ठेला || ३०||
ऐसा भगवंतीं रंगला| आणीक कांहीं नलगे त्याला | स्वइछा वर्णूं लागला| ध्यान कीर्ती प्रताप || ३१||
नाना ध्यानें नाना मूर्ती| नाना प्रताप नाना कीर्ती | तयापुढें नरस्तुती| त्रुणतुल्य वाटे || ३२||
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