Dasbodh dashak - 1
by स्वामी रामदास समर्थ
[Oct 31, 2007]
|| समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक १ || . . . .
|| स्तवननाम दशक प्रथम || १|| . . . . . .
|| श्रीराम ||
श्रोते पुसती कोण ग्रंथ| काय बोलिलें जी येथ | श्रवण केलियानें प्राप्त| काय आहे || १||
ग्रंथा नाम दासबोध| गुरुशिष्यांचा संवाद | येथ बोलिला विशद| भक्तिमार्ग || २||
नवविधा भक्ति आणि ज्ञान| बोलिलें वैराग्याचें लक्षण | बहुधा अध्यात्म निरोपण| निरोपिलें || ३||
भक्तिचेन योगें देव| निश्चयें पावती मानव | ऐसा आहे अभिप्राव| ईये ग्रंथीं || ४||
मुख्य भक्तीचा निश्चयो| शुद्धज्ञानाचा निश्चयो | आत्मस्थितीचा निश्चयो| बोलिला असे || ५||
शुद्ध उपदेशाचा निश्चयो| सायोज्यमुक्तीचा निश्चयो | मोक्षप्राप्तीचा निश्चयो| बोलिला असे || ६||
शुद्धस्वरूपाचा निश्चयो| विदेहस्थितीचा निश्चयो | अलिप्तपणाचा निश्चयो| बोलिला असे || ७||
मुख्य देवाचा निश्चयो| मुख्य भक्ताचा निश्चयो | जीवशिवाचा निश्चयो| बोलिला असे || ८||
मुख्य ब्रह्माचा निश्चयो| नाना मतांचा निश्चयो | आपण कोण हा निश्चयो| बोलिला असे || ९||
मुख्य उपासनालक्षण| नाना कवित्वलक्षण | नाना चातुर्यलक्षण| बोलिलें असे || १०||
मायोद्भवाचें लक्षण| पंचभूतांचे लक्षण | कर्ता कोण हें लक्षण| बोलिलें असे || ११||
नाना किंत निवारिले || नाना संशयो छेदिले | नाना आशंका फेडिले| नाना प्रश्न || १२||
ऐसें बहुधा निरोपिलें| ग्रंथगर्भी जें बोलिलें | तें अवघेंचि अनुवादलें| न वचे किं कदा || १३||
तथापि अवघा दासबोध| दशक फोडून केला विशद | जे जे दशकींचा अनुवाद| ते ते दशकीं बोलिला || १४||
नाना ग्रंथांच्या समती| उपनिषदें वेदांत श्रुती | आणि मुख्य आत्मप्रचीती| शास्त्रेंसहित || १५||
नाना समतीअन्वये| म्हणौनी मिथ्या म्हणतां न ये | तथापि हें अनुभवासि ये| प्रत्यक्ष आतां || १६||
मत्सरें यासी मिथ्या म्हणती| तरी अवघेचि ग्रंथ उछेदती | नाना ग्रंथांच्या समती| भगवद्वाक्यें || १७||
शिवगीता रामगीता| गुरुगीता गर्भगीता | उत्तरगीता अवधूतगीता| वेद आणी वेदांत || १८||
भगवद्गीता ब्रह्मगीता| हंसगीता पाण्डवगीता | गणेशगीता येमगीता| उपनिषदें भागवत || १९||
इत्यादिक नाना ग्रंथ| समतीस बोलिले येथ | भगवद्वाक्ये येथार्थ| निश्चयेंसीं || २०||
भगवद्वचनीं अविश्वासे| ऐसा कोण पतित असे | भगवद्वाक्याविरहित नसे| बोलणे येथीचें || २१||
पूर्णग्रंथ पाहिल्याविण| उगाच ठेवी जो दूषण | तो दुरात्मा दुराभिमान| मत्सरें करी || २२||
अभिमानें उठे मत्सर| मत्सरें ये तिरस्कार | पुढें क्रोधाचा विकार| प्रबळे बळें || २३||
ऐसा अंतरी नासला| कामक्रोधें खवळला | अहंभावे पालटला| प्रत्यक्ष दिसे || २४||
कामक्रोधें लिथाडिला| तो कैसा म्हणावा भला | अमृत सेवितांच पावला| मृत्य राहो || २५||
आतां असो हें बोलणें| अधिकारासारिखें घेणें | परंतु अभिमान त्यागणें| हें उत्तमोत्तम || २६||
मागां श्रोतीं आक्षेपिलें| जी ये ग्रंथीं काय बोलिलें | तें सकळहि निरोपिलें| संकळीत मार्गे || २७||
आतां श्रवण केलियाचें फळ| क्रिया पालटे तत्काळ | तुटे संशयाचें मूळ| येकसरां || २८||
मार्ग सांपडे सुगम| न लगे साधन दुर्गम | सायोज्यमुक्तीचें वर्म| ठांइं पडे || २९||
नासे अज्ञान दुःख भ्रांती| शीघ्रचि येथें ज्ञानप्राप्ती | ऐसी आहे फळश्रुती| ईये ग्रंथीं || ३०||
योगियांचे परम भाग्य| आंगीं बाणे तें वैराग्य | चातुर्य कळे यथायोग्य| विवेकेंसहित || ३१||
भ्रांत अवगुणी अवलक्षण| तेंचि होती सुलक्षण | धूर्त तार्किक विचक्षण| समयो जाणती || ३२||
आळसी तेचि साक्षपी होती| पापी तेचि प्रस्तावती | निंदक तेचि वंदूं लागती| भक्तिमार्गासी || ३३||
बद्धची होती मुमुक्ष| मूर्ख होती अतिदक्ष | अभक्तची पावती मोक्ष| भक्तिमार्गें || ३४||
नाना दोष ते नासती| पतित तेचि पावन होती | प्राणी पावे उत्तम गती| श्रवणमात्रें || ३५||
नाना धोकें देहबुद्धीचे| नाना किंत संदेहाचे | नाना उद्वेग संसाराचे| नासती श्रवणें || ३६||
ऐसी याची फळश्रुती| श्रवणें चुके अधोगती | मनास होय विश्रांती| समाधान || ३७||
जयाचा भावार्थ जैसा| तयास लाभ तैसा | मत्सर धरी जो पुंसा| तयास तेंचि प्राप्त || ३८||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे ग्रंथारंभलक्षणनाम . . . . समास पहिला || १||
. . . . . . || श्रीराम || . . समास दुसरा : गणेशस्तवन. . . .
|| श्रीराम ||
ॐ नमोजि गणनायेका| सर्व सिद्धिफळदायेका | अज्ञानभ्रांतिछेदका| बोधरूपा || १||
माझिये अंतरीं भरावें| सर्वकाळ वास्तव्य करावें | मज वाग्सुंन्यास वदवावें| कृपाकटाक्षेंकरूनी || २||
तुझिये कृपेचेनि बळें| वितुळती भ्रांतीचीं पडळें | आणी विश्वभक्षक काळें| दास्यत्व कीजे || ३||
येतां कृपेची निज उडी| विघ्नें कापती बापुडीं | होऊन जाती देशधडी| नाममात्रें || ४||
म्हणौन नामें विघ्नहर| आम्हां अनाथांचे माहेर | आदिकरूनी हरीहर| अमर वंदिती || ५||
वंदूनियां मंगळनिधी| कार्य करितां सर्वसिद्धी | आघात अडथाळे उपाधी| बाधूं सकेना || ६||
जयाचें आठवितां ध्यान| वाटे परम समाधान | नेत्रीं रिघोनियां मन| पांगुळे सर्वांगी || ७||
सगुण रूपाची टेव| माहा लावण्य लाघव | नृत्य करितां सकळ देव| तटस्त होती || ८||
सर्वकाळ मदोन्मत्त| सदा आनंदे डुल्लत | हरूषें निर्भर उद्दित| सुप्रसन्नवदनु || ९||
भव्यरूप वितंड| भीममूर्ति माहा प्रचंड | विस्तीर्ण मस्तकीं उदंड| सिंधूर चर्चिला || १०||
नाना सुगंध परिमळें| थबथबा गळती गंडस्थळें | तेथें आलीं षट्पदकुळें| झुंकारशब्दें || ११||
मुर्डीव शुंडादंड सरळे| शोभे अभिनव आवाळें | लंबित अधर तिक्षण गळे| क्षणक्ष्णा मंदसत्वी || १२||
चौदा विद्यांचा गोसांवी| हरस्व लोचन ते हिलावी | लवलवित फडकावी| फडै फडै कर्णथापा || १३||
रत्नखचित मुगुटीं झळाळ| नाना सुरंग फांकती कीळ | कुंडलें तळपती नीळ| वरी जडिले झमकती || १४||
दंत शुभ्र सद्दट| रत्नखचित हेमकट्ट | तया तळवटीं पत्रें नीट| तळपती लघु लघु || १५||
लवथवित मलपे दोंद| वेष्टित कट्ट नागबंद | क्षुद्र घंटिका मंद मंद| वाजती झणत्कारें || १६||
चतुर्भुज लंबोदर| कासे कासिला पितांबर | फडके दोंदिचा फणीवर| धुधूकार टाकी || १७||
डोलवी मस्तक जिव्हा लाळी| घालून बैसला वेटाळी | उभारोनि नाभिकमळीं| टकमकां पाहे || १८||
नाना याति कुशुममाळा| व्याळपरियंत रुळती गळां | रत्नजडित हृदयकमळा- | वरी पदक शोभे || १९||
शोभे फरश आणी कमळ| अंकुश तिक्षण तेजाळ | येके करीं मोदकगोळ| तयावरी अति प्रीति || २०||
नट नाट्य कळा कुंसरी| नाना छंदें नृत्य करी | टाळ मृदांग भरोवरी| उपांग हुंकारे || २१||
स्थिरता नाहीं येक क्षण| चपळविशैइं अग्रगण | साअजिरी मूर्ति सुलक्षण| लावण्यखाणी || २२||
रुणझुणा वाजती नेपुरें| वांकी बोभाटती गजरें | घागरियासहित मनोहरें| पाउलें दोनी || २३||
ईश्वरसभेसी आली शोभा| दिव्यांबरांची फांकली प्रभा | साहित्यविशैइं सुल्लभा| अष्टनायका होती || २४||
ऐसा सर्वांगे सुंदरु| सकळ विद्यांचा आगरु | त्यासी माझा नमस्कारु| साष्टांग भावें || २५||
ध्यान गणेशाचें वर्णितां| मतिप्रकाश होये भ्रांता | गुणानुवाद श्रवण करितां| वोळे सरस्वती || २६||
जयासि ब्रह्मादिक वंदिती| तेथें मानव बापुडे किती | असो प्राणी मंदमती| तेहीं गणेश चिंतावा || २७||
जे मूर्ख अवलक्षण| जे कां हीणाहूनि हीण | तेचि होती दक्ष प्रविण| सर्वविशैइं || २८||
ऐसा जो परम समर्थ| पूर्ण करी मनोरथ | सप्रचीत भजनस्वार्थ| कल्लौ चंडीविनायेकौ || २९||
ऐसा गणेश मंगळमूर्ती| तो म्यां स्तविला येथामति | वांछ्या धरूनि चित्तीं| परमार्थाची || ३०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे गणेशस्तवननाम . . . . समास दुसरा || २||
. . . . . . || श्रीराम || समास तिसरा : शारदास्तवन . . . .
|| श्रीराम ||
आतां वंदीन वेदमाता| श्रीशारदा ब्रह्मसुता | शब्दमूल वाग्देवता| माहं माया || १||
जे उठवी शब्दांकुर| वदे वैखरी अपार | जे शब्दाचें अभ्यांतर| उकलून दावी || २||
जे योगियांची समाधी| जे धारिष्टांची कृतबुद्धी | जे विद्या अविद्या उपाधी| तोडून टाकी || ३||
जे माहापुरुषाची भार्या| अति सलग्न अवस्था तुर्या | जयेकरितां महत्कार्या| प्रवर्तले साधु || ४||
जे महंतांची शांती| जे ईश्वराची निज शक्ती | जे ज्ञानियांची विरक्ती| नैराशशोभा || ५||
जे अनंत ब्रह्मांडें घडी| लीळाविनोदेंचि मोडी | आपण आदिपुरुषीं दडी| मारून राहे || ६||
जे प्रत्यक्ष पाहातां आडळे| विचार घेतां तरी नाडळे | जयेचा पार न कळे| ब्रह्मादिकांसी || ७||
जे सर्व नाटक अंतर्कळा| जाणीव स्फूर्ती निर्मळा | जयेचेनी स्वानंदसोहळा| ज्ञानशक्ती || ८||
जे लावण्यस्वरूपाची शोभा| जे परब्रह्मसूर्याची प्रभा | जे शब्दीं वदोनि उभा| संसार नासी || ९||
जे मोक्षश्रिया माहांमंगळा| जे सत्रावी जीवनकळा | हे सत्त्वलीळा सुसीतळा| लावण्यखाणी || १०||
जे अवेक्त पुरुषाची वेक्ती| विस्तारें वाढली इच्छाशक्ती | जे कळीकाळाची नियंती| सद्गुरुकृपा || ११||
जे परमार्थमार्गींचा विचार- | निवडून, दावी सारासार | भवसिंधूचा पैलपार| पाववी शब्दबळें || १२||
ऐसी बहुवेषें नटली| माया शारदा येकली | सिद्धचि अंतरी संचली| चतुर्विधा प्रकारें || १३||
तींहीं वाचा अंतरीं आलें| तें वैखरिया प्रगट केलें | म्हणौन कर्तुत्व जितुकें जालें| तें शारदागुणें || १४||
जे ब्रह्मादिकांची जननी| हरीहर जयेपासुनी | सृष्टिरचना लोक तिनी| विस्तार जयेचा || १५||
जे परमार्थाचें मूळ| नांतरी सद्विद्याची केवळ | निवांत निर्मळ निश्चळ| स्वरूपस्थिती || १६||
जे योगियांचे ध्यानीं| जे साधकांचे चिंतनीं | जे सिद्धांचे अंतःकर्णीं| समाधिरूपें || १७||
जे निर्गुणाची वोळखण| जे अनुभवाची खूण | जे व्यापकपणें संपूर्ण| सर्वांघटीं || १८||
शास्त्रें पुराणें वेद श्रुति| अखंड जयेचें स्तवन करिती | नाना रूपीं जयेसी स्तविती| प्राणीमात्र || १९||
जे वेदशास्त्रांची महिमा| जे निरोपमाची उपमा | जयेकरितां परमात्मा| ऐसें बोलिजे || २०||
नाना विद्या कळा सिद्धी| नाना निश्चयाची बुद्धी | जे सूक्ष्म वस्तूची शुद्धी| ज्ञेप्तीमात्र || २१||
जे हरिभक्तांची निजभक्ती| अंतरनिष्ठांची अंतरस्तिथी | जे जीवन्मुक्तांची मुक्ती| सायोज्यता ते || २२||
जे अनंत माया वैष्णवी| न कळे नाटक लाघवी | जे थोराथोरासी गोवी| जाणपणें || २३||
जें जें दृष्टीनें देखिलें| जें जें शब्दें वोळखिलें | जें जें मनास भासलें| तितुकें रूप जयेचें || २४||
स्तवन भजन भक्ति भाव| मायेंवाचून नाहीं ठाव | या वचनाचा अभिप्राव| अनुभवी जाणती || २५||
म्हणौनी थोराहुनि थोर| जे ईश्वराचा ईश्वर | तयेसी माझा नमस्कार| तदांशेंचि आतां || २६||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे शारदास्तवननाम . . . . समास तिसरा || ३||
. . . . . . .. श्रीराम .. समास चवथा : सद्गुरुस्तवन . . . . . .
|| श्रीराम ||
आतां सद्गुरु वर्णवेना| जेथें माया स्पर्शों सकेना | तें स्वरूप मज अज्ञाना| काये कळे || १||
न कळे न कळे नेति नेति| ऐसें बोलतसे श्रुती | तेथें मज मूर्खाची मती| पवाडेल कोठें || २||
मज न कळे हा विचारु| दुऱ्हूनि माझा नमस्कारु | गुरुदेवा पैलपारु| पाववीं मज || ३||
होती स्तवनाची दुराशा| तुटला मायेचा भर्वसा | आतां असाल तैसे असा| सद्गुरु स्वामी || ४||
मायेच्या बळें करीन स्तवन| ऐसें वांछित होतें मन | माया जाली लज्यायमान| काय करूं || ५||
नातुडे मुख्य परमात्मा| म्हणौनी करावी लागे प्रतिमा | तैसा मायायोगें महिमा| वर्णीन सद्गुरूचा || ६||
आपल्या भावासारिखा मनीं| देव आठवावा ध्यानीं | तैसा सद्गुरु हा स्तवनीं| स्तौउं आतां || ७||
जय जया जि सद्गुरुराजा| विश्वंभरा बिश्वबीजा | परमपुरुषा मोक्षध्वजा| दीनबंधु || ८||
तुझीयेन अभयंकरें| अनावर माया हे वोसरे | जैसें सूर्यप्रकाशें अंधारें| पळोन जाये || ९||
आदित्यें अंधकार निवारे| परंतु मागुतें ब्रह्मांड भरे | नीसी जालियां नंतरें| पुन्हां काळोखें || १०||
तैसा नव्हे स्वामीराव| करी जन्ममृत्य वाव | समूळ अज्ञानाचा ठाव| पुसून टाकी || ११||
सुवर्णाचें लोहो कांहीं| सर्वथा होणार नाहीं | तैसा गुरुदास संदेहीं| पडोंचि नेणे सर्वथा || १२||
कां सरिता गंगेसी मिळाली| मिळणी होतां गंगा जली | मग जरी वेगळी केली| तरी होणार नाहीं सर्वथा || १३||
परी ते सरिता मिळणीमागें| वाहाळ मानिजेत जगें | तैसा नव्हे शिष्य वेगें| स्वामीच होये || १४||
परीस आपणा ऐसें करीना| सुवर्णें लोहो पालटेना | उपदेश करी बहुत जना| अंकित सद्गुरूचा || १५||
शिष्यास गुरुत्व प्राप्त होये| सुवर्णें सुवर्ण करितां न ये | म्हणौनी उपमा न साहे| सद्गुरूसी परिसाची || १६||
उपमे द्यावा सागर| तरी तो अत्यंतची क्षार | अथवा म्हणों क्षीरसागर| तरी तो नासेल कल्पांतीं || १७||
उपमे द्यावा जरी मेरु| तरी तो जड पाषाण कठोरु | तैसा नव्हे कीं सद्गुरु| कोमळ दिनाचा || १८||
उपमे म्हणों गगन| तरी गगनापरीस तें निर्गुण | या कारणें दृष्टांत हीण| सद्गुरूस गगनाचा || १९||
धीरपणे|म उपमूं जगती| तरी हेहि खचेल कल्पांतीं | म्हणौन धीरत्वास दृष्टांतीं| हीण वसुंधरा || २०||
आतां उपमावा गभस्ती| तरी गभस्तीचा प्रकाश किती | शास्त्रें मर्यादा बोलती| सद्गुरु अमर्याद || २१||
म्हणौनी उपमे उणा दिनकर| सद्गुरुज्ञानप्रकाश थोर | आतां उपमावा फणीवर| तरी तोहि भारवाही || २२||
आतां उपमे द्यावें जळ| तरी तें काळांतरीं आटेल सकळ | सद्गुरुरूप तें निश्चळ| जाणार नाहीं || २३||
सद्गुरूसी उपमावे|म अमृत| तरी अमर धरिती मृत्यपंथ | सद्गुरुकृपा यथार्थ| अमर करी || २४||
सद्गुरूसी म्हणावें कल्पतरु| तरी हा कल्पनेतीत विचारु | कल्पवृक्षाचा अंगिकारु| कोण करी || २५||
चिंता मात्र नाहीं मनीं| कोण पुसे चिंतामणी | कामधेनूचीं दुभणीं| निःकामासी न लगती || २६||
सद्गुरु म्हणों लक्ष्मीवंत| तरी ते लक्ष्मी नाशिवंत | ज्याचे द्वारीं असे तिष्टत| मोक्षलक्ष्मी || २७||
स्वर्गलोक इंद्र संपती| हे काळांतरीं विटंबती | सद्गुरुकृपेची प्राप्ती| काळांतरीं चळेना || २८||
हरीहर ब्रह्मादिक| नाश पावती सकळिक | सर्वदा अविनाश येक| सद्गुरुपद || २९||
तयासी उपमा काय द्यावी| नाशिवंत सृष्टी आघवी | पंचभूतिक उठाठेवी| न चले तेथें || ३०||
म्हणौनी सद्गुरु वर्णवेना| हे गे हेचि माझी वर्णना | अंतरस्थितीचिया खुणा| अंतर्निष्ठ जाणती || ३१||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे सद्गुरुस्तवननाम . . . . समास चवथा || ४||
. . . . . . .. श्रीराम .. समास पांचवा : संतस्तवन . . . . . .
|| श्रीराम ||
आतां वंदीन सज्जन| जे परमार्थाचें अधिष्ठान | जयांचेनि गुह्यज्ञान| प्रगटे जनीं || १||
जे वस्तु परम दुल्लभ| जयेचा अलभ्य लाभ | तेंचि होये सुल्लभ| संतसंगे