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Dasbodh dashak - 8 by स्वामी रामदास समर्थ

[Oct 31, 2007]

.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक ८ ..
दशक आठवा. : .
मायोद्भव समास पहिला : देवदर्शन . . . .
|| श्रीराम ||
श्रोतीं व्हावें सावध| विमळ ज्ञान बाळबोध | गुरुशिष्यांचा संवाद| अति सुगम परियेसा || १||
 नाना शास्त्रें धांडोळितां| आयुष्य पुरेना सर्वथा | अंतरी संशयाची वेथा| वाढोंचि लागे || २||
 नाना तीर्थें थोरथोरें| सृष्टिमध्यें अपारें | सुगमें दुर्गमें दुष्करें| पुण्यदायकें || ३||
 ऐसीं तीर्थें सर्वहि करी| ऐसा कोण रे संसारी | फिरों जातां जन्मवरी| आयुष्य पुरेना || ४||
 नाना तपें नाना दानें| नाना योग नाना साधनें | हें सर्वहि देवाकारणें| करिजेत आहे || ५||
पावावया देवाधिदेवा| बहुविध श्रम करावा | तेणें देव ठाईं पाडावा| हें सर्वमत || ६||
 पावावया भगवंतातें| नाना पंथ नाना मतें | तया देवाचें स्वरूप तें| कैसे आहें || ७||
बहुत देव सृष्टीवरी| त्यांची गनना कोण करी | येक देव कोणेपरी| ठाईं पडेना || ८||
बहुविध उपासना| ज्याची जेथें पुरे कामना | तो तेथेंचि राहिला मना| सदृढ करूनि || ९||
बहु देव बहु भक्त| इछ्या जाले आसक्त | बहु ऋषी बहु मत| वेगळालें || १०||
बहु निवडितां निवडेना| येक निश्चय घडेना | शास्त्रें भांडती पडेना| निश्चय ठाईं || ११||
बहुत शास्त्रीं बहुत भेद| मतांमतांस विरोध | ऐसा करितां वेवाद| बहुत गेले || १२||
सहस्त्रामधें कोणी येक| पाहे देवाचा विवेक | परी त्या देवाचें कौतुक| ठाईं न पडे || १३||
थाईं न पडे कैसें म्हणतां| तेथें लागली अहंता | देव राहिला परता| अहंतागुणें || १४||
आतां असो हें बोलणें| नाना योग ज्याकारणें | तो देव कोण्या गुणें| ठाईं पडे || १५||
 देव कोणासी म्हणावें| कैसें तयासी जाणावें | तेंचि बोलणें स्वभावें| बोलिजेल || १६||
जेणें केले चराचर| केले सृष्ट्यादि व्यापार | सर्वकर्ता निरंतर| नाम ज्याचें || १७||
तेणें केल्या मेघमाळा| चंद्रबिंबीं अमृतकळा | तेज दिधलें रविमंडळा| जया देवें || १८||
ज्याची मर्यादा सागरा| जेणें स्थापिलें फणिवरा | जयाचेनि गुणें तारा| अंतरिक्ष || १९||
च्यारी खाणी च्यारी वाणी| चौऱ्यासि लक्ष जीवयोनी | जेणें निर्मिले लोक तिनी| तया नाव देव || २०||
ब्रह्मा विष्णु आणी हर| हे जयाचे अवतार | तोचि देव हा निर्धार| निश्चयेंसीं || २१||
देव्हाराचा उठोनि देव| करूं नेणे सर्व जीव | तयाचेनि ब्रह्मकटाव| निर्मिला न वचे || २२||
 ठाईं ठाईं देव असती| तेहिं केली नाहीं क्षिती | चंद्र सूर्य तारा जीमूती| तयांचेनि नव्हे || २३||
सर्वकर्ता तोचि देव| पाहों जातां निरावेव | ज्याची कळा लीळा लाघव| नेणती ब्रह्मादिक || २४||
येथें आशंका उठिली| ते पुढिलीये समासीं फीटली | आतां वृत्ती सावध केली| पाहिजे श्रोतीं || २५||
 पैस अवकाश आकाश| कांहींच नाहीं जें भकास | तये निर्मळीं वायोस| जन्म जाला || २६||
वायोपासून जाला वन्ही| वन्हीपासुनी जालें पाणी | ऐसी जयाची करणी| अघटित घडली || २७||
 उदकापासून सृष्टि जाली| स्तंभेविण उभारली | ऐसी विचित्र कळा केली| त्या नाव देव || २८||
देवें निर्मिली हे क्षिती| तीचे पोटीं पाषाण होती | तयासचि देव म्हणती| विवेकहीन || २९||
जो सृष्टिनिर्माणकर्ता| तो ये सृष्टीपुर्वीं होता | मग हे तयाची सत्ता| निर्माण जाली || ३०||
कुल्लाळ पात्रापुर्वीं आहे| पात्रें कांहीं कुल्लाळ नव्हे | तैसा देव पूर्वींच आहे| पाषाण नव्हे सर्वथा || ३१||
 मृत्तिकेचें शैन्य केलें| कर्ते वेगळे राहिले | कार्यकारण येक केलें| तरी होणार नाहीं || ३२||
 तथापि होईल पंचभूतिक| निर्गुण नव्हे कांहीं येक | कार्याकारणाचा विवेक| भूतांपरता नाहीं || ३३||
 अवघी सृष्टि जो कर्ता| तो ते सृष्टीहूनि पर्ता | तेथें संशयाची वार्ता| काढूंचि नये || ३४||
खांसूत्रींची बाहुली| जेणें पुरुषें नाचविली | तोचि बाहुली हे बोली| घडे केवी || ३५||
छायामंडपीची सेना| सृष्टिसारिखीच रचना | सूत्रें चाळी परी तो नाना| वेक्ति नव्हे || ३६||
तैसा सृष्टिकर्ता देव| परी तो नव्हे सृष्टिभाव | जेणें केले नाना जीव| तो जीव कैसेनी || ३७||
जें जें जया करणें पडे| तें तें तो हें कैसें घडे | म्हणोनि वायांचि बापुडे| संदेहीं पडती || ३८||
सृष्टि ऐसेंचि स्वभावें| गोपुर निर्मिलें बरवें | परी तो गोपुर कर्ता नव्हे| निश्चयेसीं || ३९||
तैसें जग निर्मिलें जेणें| तो वेगळा पूर्णपणें | येक म्हणती मूर्खपणें| जग तोचि जगदीश || ४०||
 एवं जगदीश तो वेगळा| जग निर्माण त्याची कळा | तो सर्वांमधें परी निराळा| असोन सर्वीं || ४१||
 म्हणोनि भूतांचा कर्दमु| यासी अलिप्त आत्मारामु | अविद्यागुणें मायाभ्रमु| सत्यचि वाटे || ४२||
 मायोपाधी जगडंबर| आहे सर्वहि साचार | ऐसा हा विपरीत विचार| कोठेंचि नाहीं || ४३||
म्हणोनि जग मिथ्या साच आत्मा| सर्वांपर जो परमात्मा | अंतर्बाह्य अंतरात्मा| व्यापूनि असे || ४४||
तयास म्हणावें देव| येर हें अवघेंचि वाव | ऐसा आहे अंतर्भाव| वेदांतीचा || ४५||
पदार्थवस्तु नासिवंत| हें तों अनुभवास येत | याकारणें भगवंत| पदार्थावेगळा || ४६||
 देव विमळ आणी अचळ| शास्त्रें बोलती सकळ | तया निश्चळास चंचळ| म्हणों नये सर्वथा || ४७||
 देव आला देव गेला| देव उपजला देव मेला | ऐसें बोलतां दुरिताला| काय उणें || ४८||
जन्म मरणाची वार्ता| देवास लागेना सर्वथा | देव अमर ज्याची सत्ता| त्यासी मृत्यु कैसेनी || ४९||
उपजणें आणी मरणें| येणें जाणें दुःख भोगणें | हें त्या देवाचें करणें| तो कारण वेगळा || ५०||
अंतःकरण पंचप्राण| बहुतत्वीं पिंडज्ञान | यां सर्वांस आहे चळण| म्हणोनि देव नव्हेती || ५१||
येवं कल्पनेरहित| तया नाव भगवंत | देवपणाची मात| तेथें नाहीं || ५२||
तव शिष्यें आक्षेपिलें| तरी कैसें ब्रह्मांड केलें | कर्तेपण कारण पडिलें| कार्यामधें || ५३||
 द्रष्टेपणें द्रष्टा दृश्यीं| जैसा पडे अनायांसीं | कर्तेपणे निर्गुणासी| गुण तैसे || ५४||
ब्रह्मांडकर्ता कवण| कैसी त्याची वोळखण | देव सगुण किं निर्गुण| मह निरोपावा || ५५||
येक म्हणती त्या ब्रह्मातें| इछ्यामात्रें सृष्टिकर्ते | सृष्टिकर्ते त्यापर्तें| कोण आहे || ५६||
आतां असो हे बहु बोली| सकळ माया कोठून जाली | ते हे आतां निरोपिली| पाहिजे स्वामी || ५७||
 ऐसें ऐकोनि वचन| वक्ता म्हणे सावधान | पुढिले समासीं निरूपण| सांगिजेल || ५८||
ब्रह्मीं माया कैसे जाली| पुढें असे निरोपिली | श्रोतीं वृत्ति सावध केली| पाहिजे आतां || ५९||
पुढें हेंचि निरूपण| विशद केलें श्रवण | जेणें होय समाधान| साधकांचें || ६०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे देवदर्शननाम समास पहिला || १||

समास दुसरा. : सूक्ष्मआशंकानिरूपण . . . .
 || श्रीराम ||
 मागां श्रोतीं आक्षेपिलें| तें पाहिजे निरोपिलें | निरावेवीं कैसें जालें| चराचर || १||
याचें ऐसें प्रतिवचन| ब्रह्म जें कां सनातन | तेथें माया मिथ्याभान| विवर्तरूप भावे || २||
आदि येक परब्रह्म| नित्यमुक्त अक्रिय परम | तेथें अव्याकृत सूक्ष्म| जाली मूळमाया || ३||
 || श्लोक || आद्यमेकं परब्रह्म नित्यमुक्तमविक्रियम | तस्य माया समावेशो जीवमव्याकृतात्मकम || आशंका || येक ब्रह्मा निराकार| मुक्त अक्रिये निर्विकार | तेथें माया वोडंबर| कोठून आली || ४||
ब्रह्म अखंड निर्गुण| तेथें इछा धरी कोण | निर्गुणीं सगुणेंविण| इछा नाहीं || ५||
 मुळीं असेचिना सगुण| म्हणौनि नामें निर्गुण | तेथें जालें सगुण| कोणेपरी || ६||
निर्गुणचि गुणा आलें| ऐसें जरी अनुवादलें | लागों पाहे येणें बोलें| मूर्खपण || ७||
 येक म्हणती निरावेव| करून अकर्ता तो देव | त्याची लीळा बापुडे जीव| काये जाणती || ८||
येक म्हणती तो परमात्मा| कोण जाणे त्याचा महिमा | प्राणी बापुडा जीवात्मा| काये जाणे || ९||
 उगाच महिमा सांगती| शास्त्रार्थ अवघा लोपिती | बळेंचि निर्गुणास म्हणती| करूनि अकर्ता || १०||
मुळीं नाहीं कर्तव्यता| कोण करून अकर्ता | कर्ता अकर्ता हे वार्ता| समूळ मिथ्या || ११||
जें ठाईंचें निर्गुण| तेथें कैचें कर्तेपण | तरी हे इछा धरी कोण| सृष्टिरचाव्याची || १२||
इछा परमेश्वराची| ऐसी युक्ती बहुतेकांची | परी त्या निर्गुणास इछा कैंची| हें कळेना || १३||
तरी हे इतुकें कोणें केलें| किंवा आपणचि जालें | देवेंविण उभारलें| कोणेपरी || १४||
देवेंविण जालें सर्व| मग देवास कैंचा ठाव | येथें देवाचा अभाव| दिसोन आला || १५||
देव म्हणे सृष्टिकर्ता| तरी येवं पाहे सगुणता | निर्गुणपणाची वार्ता| देवाची बुडाली || १६||
 देव ठाईंचा निर्गुण| तरी सृष्टिकर्ता कोण | कर्तेपणाचें सगुण| नासिवंत || १७||
येथें पडिले विचार| कैसें जालें सचराचर | माया म्हणों स्वतंतर तरी हेंहि विपरीत दिसे || १८||
माया कोणीं नाहीं केली| हे आपणचि विस्तारली | ऐसें बोलतां बुडाली| देवाची वार्ता || १९||
देव निर्गुण स्वतसिद्ध| त्यासी मायेसि काये समंध | ऐसें बोलतां विरुद्ध| दिसोन आलें || २०||
 सकळ कांहीं कर्तव्यता| आली मायेच्याचि माथां तरी भक्तांस उद्धरिता| देव नाहीं कीं || २१||
 देवेंविण नुस्ती माया| कोण नेईल विलया | आम्हां भक्तां सांभाळाया| कोणीच नाहीं || २२||
 म्हणोनि माया स्वतंतर| ऐसा न घडे कीं विचार | मायेस निर्मिता सर्वेश्वर| तो येकचि आहे || २३||
 तरी तो कैसा आहे ईश्वर| मायेचा कैसा विचार | तरी हें आतां सविस्तर| बोलिलें पाहिजे || २४||
श्रोतां व्हावें सावधान| येकाग्र करूनियां मन | आतां कथानुसंधान| सावध ऐका || २५||
येके आशंकेचा भाव| जनीं वेगळाले अनुभव | तेहि बोलिजेती सर्व| येथानुक्रमें || २६||
 येक म्हणती देवें केली| म्हणोनि हे विस्तारली | देवास इछ्या नस्ती जाली| तरी हे माया कैंची || २७||
 येक म्हणती देव निर्गुण| तेथें इछा करी कोण | माया मिथ्या हे आपण| जालीच नाही || २८||
येक म्हणती प्रत्यक्ष दिसे| तयेसी नाहीं म्हणतां कैसें | माया हे अनादि असे| शक्ती ईश्वराची || २९||
येक म्हणती साच असे| तरी हे ज्ञानें कैसी निरसे | साचासारिखीच दिसे| परी हे मिथ्या || ३०||
येक म्हणती मिथ्या स्वभावें| तरी साधन कासया करावें | भक्तिसाधन बोलिलें देवें| मायात्यागाकारणें || ३१||
 येक म्हणती मिथ्या दिसतें| भयें अज्ञानसन्येपातें | साधन औषधही घेईजेतें| परी तें दृश्य मिथ्या || ३२||
अनंत साधनें बोलिलीं| नाना मतें भांबावलीं | तरी माया न वचे त्यागिली| मिथ्या कैसी म्हणावी || ३३||
 मिथ्या बोले योगवाणी| मिथ्या वेदशास्त्रीं पुराणीं | मिथ्या नाना निरूपणीं| बोलिली माया || ३४||
माया मिथ्या म्हणतां गेली| हे वार्ता नाहीं ऐकिली | मिथ्या म्हणतांच लागली| समागमें || ३५||
जयाचे अंतरीं ज्ञान| नाहीं वोळखिले सज्जन | तयास मिथ्याभिमान| सत्यचि वाटे || ३६||
जेणें जैसा निश्चये केला| तयासी तैसाचि फळला | पाहे तोचि दिसे बिंबला| तैसी माया || ३७||
येक म्हणती माया कैंची| आहे ते सर्व ब्रह्मचि | थिजल्या विघुरल्या घृताची| ऐक्यता न मोडे || ३८||
 थिजलें आणी विघुरलें| हें स्वरूपीं नाहीं बोलिलें | साहित्य भंगलें येणें बोलें| म्हणती येक || ३९||
येक म्हणती सर्व ब्रह्म| हें न कळे जयास वर्म | तयाचें अंतरींचा भ्रम| गेलाच नाहीं || ४०||
येक म्हणती येकचि देव| तेथें कैंचें आणिलें सर्व | सर्व ब्रह्म हें अपूर्व| आश्चिर्य वाटे || ४१||
येक म्हणती येकचि खरें| आनुहि नाहीं दुसरें | सर्व ब्रह्म येणें प्रकारें| सहजचि जालें || ४२||
सर्व मिथ्या येकसरें| उरलें तेंचि ब्रह्म खरें | ऐसीं वाक्यें शास्त्राधारें| बोलती येक || ४३||
आळंकार आणी सुवर्ण| तेथें नाहीं भिन्नपण | आटाआटी वेर्थ सीण| म्हणती येक || ४४||
हीन उपमा येकदेसी| कैसी साहेल वस्तूसी | वर्णवेक्ती अव्यक्तासी| साम्यता न घडे || ४५||
सुवर्णीं दृष्टी घालितां| मुळीच आहे वेक्तता | आळंकार सोनें पाहतां सोनेंचि असे || ४६||
मुळीं सोनेंचि हें वेक्त| जड येकदेसी पीत | पूर्णास अपूर्णाचा दृष्टांत| केवीं घडे || ४७||
दृष्टांत तितुका येकदेसी| देणें घडे कळायासी | सिंधु आणी लहरीसी| भिन्नत्व कैंचें || ४८||
उत्तम मधेम कनिष्ठ| येका दृष्टांतें कळे पष्ट | येका दृष्टांतें नष्ट| संदेह वाढे || ४९||
कैंचा सिंधु कैंची लहरी| अचळास चळाची सरी | साचा ऐसी वोडंबरी| मानूंच नये || ५०||
वोडंबरी हे कल्पना| नाना भास दाखवी जना | येरवी हे जाणा| ब्रह्मचि असे || ५१||
ऐसा वाद येकमेकां| लागतां राहिली आशंका | तेचि आतां पुढें ऐका| सावध होऊनी || ५२||
माया मिथ्या कळों आली| परी ते ब्रह्मीं कैसी जाली | म्हणावी ते निर्गुणें केली| तरी ते मुळींच मिथ्या || ५३||
 मिथ्या शब्दीं कांहींच नाहीं| तेथें केलें कोणें काई | करणें निर्गुणाचा ठाईं| हेंहि अघटित || ५४||
कर्ता ठाईंचा अरूप| केलें तेंहि मिथ्यारूप | तथापी फेडूं आक्षेप| श्रोतयांचा || ५५||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे सूक्ष्मआशंकानिरूपण समास दुसरा || २||

समास तिसरा. : . सूक्ष्मआशंकानिरूपण . . . .
 || श्रीराम ||
 अरे जे जालेंचि नाहीं| त्याची वार्ता पुससी काई | तथापि सांगों जेणें कांहीं| संशय नुरे || १||
 दोरीकरितां भुजंग| जळाकरितां तरंग | मार्तंडाकरितां चांग| मृगजळ वाहे || २||
कल्पेनिकरितां स्वप्न दिसे| सिंपीकरितां रुपें भासे | जळाकरितां गार वसे| निमिष्य येक || ३||
मातीकरितां भिंती जाली| सिन्धुकरितां लहरी आली | तिळाकरितां पुतळी| दिसों लागे || ४||
 सोन्याकरितां अळंकार| तंतुकरितां जालें चीर | कासवाकरितां विस्तार| हातापायांचा || ५||
तूप होतें तरी थिजलें| तरीकरितां मीठ जालें | बिंबाकरितां बिंबलें| प्रतिबिंब || ६||
पृथ्वीकरितां जालें झाड| झाडाकरितां छ्याया वाड | धातुकरितां पवाड| उंच नीच वर्णाचा || ७||
आतां असो हा दृष्टांत| अद्वैतास कैंचें द्वैत | द्वैतेंविण अद्वैत| बोलतांच न ये || ८||
 भासाकरितां भास भासे| दृश्याकरितां अदृश्य दिसे | अदृश्यास उपमा नसे| म्हणोनि निरोपम || ९||
कल्पेनेविरहित हेत| दृश्यावेगळा दृष्टांत | द्वैतावेगळें द्वैत| कैसें जालें || १०||
विचित्र भगवंताची करणी| वर्णवेना सहस्त्रफणी | तेणें केली उभवणी| अनंत ब्रह्मांडाची || ११||
परमात्मा परमेश्वरु| सर्वकर्ता जो ईश्वरू | तयापासूनि विस्तारु| सकळ जाला || १२||
 ऐसीं अनंत नामें धरी| अनंत शक्ती निर्माण करी | तोचि जाणावा चतुरीं| मूळपुरुष || १३||
 त्या मूळपुरुषाची वोळखण| ते मूळमायाचि आपण | सकळ कांहीं कर्तेपण| तेथेंचि आलें || १४||
 || श्लोक || कार्यकारण कर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते || हे उघड बोलतां न ये| मोडों पाहातो उपाये | येरवीं हें पाहतां काय| साच आहे || १५||
 देवापासून सकळ जालें| हें सर्वांस मानलें | परी त्या देवास वोळखिलें| पाहिजे कीं || १६||
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