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Dasbodh dashak - 9 by स्वामी रामदास समर्थ

[Oct 31, 2007]

.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक ९ ..
दशक नववा. : . गुणरूप समास पहिला. : . आशंकानाम . . . .
|| श्रीराम ||
निराकार म्हणिजे काये| निराधार म्हणिजे काये | निर्विकल्प म्हणिजे काये| निरोपावें || १||
निराकार म्हणिजे आकार नाहीं| निराधार म्हणिजे आधार नाहीं | निर्विकल्प म्हणिजे कल्पना नाहीं| परब्रह्मासी || २||
निरामय म्हणिजे काये| निराभास म्हणिजे काये | निरावेव म्हणिजे काये| मज निरोपावें || ३||
निरामय म्हणिजे जळमये नाहीं| निराभास म्हणिजे भासचि नाहीं | निरावेव म्हणिजे अवेव नाहीं| परब्रह्मासी || ४||
निःप्रपंच म्हणिजे काये| निःकळंक म्हणिजे काये | निरोपाधी म्हणिजे काये| मज निरोपावें || ५||
निःप्रपंच म्हणिजे प्रपंच नाहीं| निःकळंक म्हणिजे कळंक नाहीं | निरोपाधी म्हणिजे उपाधी नाहीं| परब्रह्मासी || ६||
 निरोपम्य म्हणिजे काये| निरालंब म्हणिजे काये | निरापेक्षा म्हणिजे काये| मज निरोपावें || ७||
निरोपम्य म्हणिजे उपमा नाहीं| निरालंब म्हणिजे अवलंबन नाहीं | निरापेक्षा म्हणिजे अपेक्षा नाहीं| परब्रह्मासी || ८||
निरंजन म्हणिजे काये| निरंतर म्हणिजे काये | निर्गुण म्हणिजे काये| मज निरोपावें || ९||
 निरंजन म्हणिजे जनचि नाहीं| निरंतर म्हणिजे अंतर नाहीं | निर्गुण म्हणिजे गुणचि नाहीं| परब्रह्मासी || १०||
 निःसंग म्हणिजे काये| निर्मळ म्हणिजे काये | निश्चळ म्हणिजे काये| मज निरोपावें || ११||
निःसंग म्हणिजे संगचि नाहीं| निर्मळ म्हणिजे मळचि नाहीं | निश्चळ म्हणिजे चळण नाहीं| परब्रह्मासी || १२||
 निशब्द म्हणिजे काये| निर्दोष म्हणिजे काये | निवृत्ती म्हणिजे काये| मज निरोपावें || १३||
निशब्द म्हणिजे शब्दचि नाही| निर्दोष म्हणिजे दोषचि नाही | निवृत्ति म्हणिजे वृत्तिच नाहीं| परब्रह्मासी || १४||
 निःकाम म्हणिजे काये| निर्लेप म्हणिजे काये | निःकर्म म्हणिजे काये| मज निरोपावें || १५||
 निःकाम म्हणिजे कामचि नाहीं| निर्लेप म्हणिजे लेपचि नाहीं | निःकर्म म्हणिजे कर्मचि नाहीं| परब्रह्मासी || १६||
 अनाम्य म्हणिजे काये| अजन्मा म्हणिजे काये | अप्रत्यक्ष म्हणिजे काये| मज निरोपावें || १७||
अनाम्य म्हणिजे नामचि नाहीं| अजन्मा म्हणिजे जन्मचि नाहीं | अप्रत्यक्ष म्हणिजे प्रत्यक्ष नाहीं| परब्रह्म तें || १८||
अगणित म्हणिजे काये| अकर्तव्य म्हणिजे काये | अक्षै म्हणिजे काये| मज निरोपावें || १९||
अगणित म्हणिजे गणित नाहीं| अकर्तव्य म्हणिजे कर्तव्यता नाहीं | अक्षै म्हणिजे क्षयचि नाहीं| परब्रह्मासी || २०||
 अरूप म्हणिजे काये| अलक्ष म्हणिजे काये | अनंत म्हणिजे काये| मज निरोपावें || २१||
अरूप म्हणिजे रूपचि नाहीं| अलक्ष म्हणिजे लक्षत नाहीं | अनंत म्हणिजे अंतचि नाहीं| परब्रह्मासी || २२||
अपार म्हणिजे काये| अढळ म्हणिजे काये | अतर्क्य म्हणिजे काये| मज निरोओपावें || २३||
अपार म्हणिजे पारचि नाहीं| अढळ म्हणिजे ढळचि नाहीं | अतर्क्ये म्हणिजे तर्कत नाहीं| परब्रह्म तें || २४||
 अद्वैत म्हणिजे काये| अदृश्य म्हणिजे काये | अच्युत म्हणिजे काये| मज निरोपावें || २५||
अद्वैत म्हणिजे द्वैतचि नाहीं| अदृश्य म्हणिजे दृश्यचि नाहीं | अच्युत म्हणिजे चेवत नाहीं| परब्रह्म तें || २६||
 अछेद म्हणिजे काये| अदाह्य म्हणिजे काये | अक्लेद म्हणिजे काये| मज निरोपावें || २७||
अछेद म्हणिजे छेदेना| अदाह्य म्हणिजे जळेना | अक्लेद म्हणिजे कालवेना| परब्रह्म तें || २८||
परब्रह्म म्हणिजे सकळांपरतें| तयास पाहातां आपणचि तें | हें कळे अनुभवमतें| सद्गुरु केलियां || २९||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे आशंकानाम समास पहिला ||

समास दुसरा. : . ब्रह्मनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
जें जें कांहीं साकार दिसे| तें तें कल्पांतीं नासे | स्वरूप तें असतचि असे| सर्वकाळ || १||
जें सकळांमधें सार| मिथ्या नव्हे तें साचार | जें कां नित्य निरंतर| संचले असे || २||
तें भगवंताचें निजरूप| त्यासि बोलिजे स्वरूप | याहि वेगळे अमूप| नामें तयाचीं || ३||
 त्यास नामाचा संकेत| कळावया हा दृष्टांत | परी तें स्वरूप नामातीत| असतचि असे || ४||
 दृश्यसबाह्य संचलें| परी तें विश्वास चोरले | जवळिच नाहीसें जालें| असतचि कैसें || ५||
ऐसा ऐकोनियां देव| उठे दृष्टीचा भाव | पाहों जातां दिसे सर्व| दृश्यचि आवघें || ६||
दृष्टीचा विषयो दृश्य| तोचि जालिया सादृश्य | तेणें दृष्टी पावे संतोष| परी तें देखणें नव्हे || ७||
दृष्टीस दिसे तें नासे| येतद्विषईं श्रुति असे | म्हणौन जें दृष्टीस दिसे| तें स्वरूप नव्हे || ८||
 स्वरूप तें निराभास| आणी दृश्य भासलें साभास | भासास बोलिलें नास| वेदांतशास्त्रीं || ९||
आणी पाहातां दृश्यचि भासे| वस्तु दृश्यावेगळी असे | स्वान्य्भवें पाहातां दिसे| तें दृश्यासबाह्य || १०||
जें निराभास निर्गुण| त्याची काये सांगावी खूण | परी तें स्वरूप जाण| सन्निधचि असें || ११||
जैसा आकाशीं भासला भास| आणी सकळांमध्यें आकाश | तैसा जाणिजे जगदीश| सबाह्य अभ्यांतरीं || १२||
 उदकामधें परी भिजेना| पृथ्वीमधें परी झिजेना | वन्हीमधें परी सिजेना| स्वरूप देवाचें || १३||
 तें रेंद्यामधें परी बुडेना| तें वायोमधें परी उडेना | सुवर्णीं असे परी घडेना| सुवर्णासारिखें || १४||
ऐसें जें संचलें सर्वदा| परी ते आकळेना कदा | अभेदामाजीं वाढवी भेदा| ते हे अहंता || १५||
तिच्या स्वरूपाची खूण| सांगों कांहीं वोळखण | अहंतेचें निरूपण| सावध ऐका || १६||
जे स्वरूपाकडे पावे| अनुभवासवें झेंपावे | अनुभवाचे शब्द आघवे| बोलोन दावी || १७||
म्हणे आतां मीच स्वरूप| तेंचि अहंतेचें रूप | निराकारीं आपे ंआप| वेगळी पडे || १८||
स्वयें मीच आहे ब्रह्म| ऐसा अहंतेचा भ्रम | ऐसियें सूक्ष्मीं सूक्ष्म| पाहातां दिसे || १९||
कल्पना आकळी हेत| वस्तु कल्पनातीत | म्हणौन नाकळे अंत| अनंताचा || २०||
अन्वये आणि वीतरेक| हा शब्द कोणीयेक | निशब्दाच अंतरविवेक| शोधिला पाहिजे || २१||
आधीं घेईजे वाच्यंश| मग वोळखिजे लक्ष्यांश | लक्ष्यांशीं पाहातां वाच्यांश| असेल कैंचा || २२||
 सर्वब्रह्म आणी विमळब्रह्म| हा वाच्यांशाचा अनुक्रम | शोधितां लक्ष्यांशाचें वर्म| वाच्यांश नसे || २३||
 सर्व विमळ दोनी पक्ष| वाच्यांशीं आटती प्रत्यक्ष | लक्ष्यांशी लावीता लक्ष| पक्षपात घडे || २४||
हें लक्ष्यांशें अनुभवणें| येथें नाहीं वाच्यांश बोलणे | मुख्य अनुभवाचे खुणे| वाचारंभ कैंचा || २५||
परा पश्यंती मधेमां वैखरी| जेथें वोसरती च्यारी | तेथें शब्द कळाकुंसरी| कोण काज || २६||
 शब्द बोलतां सवेंच नासे| तेथें शाश्वतता कोठें असे | प्रत्यक्षास प्रमाण नसे| बरें पाहा| २७||
शब्द प्रत्यक्ष नासिवंत| म्हणोन घडे पक्षपात | सर्व विमळ ऐसा हेत| अनुभवीं नाहीं || २८||
ऐक अनुभवाचें लक्षण| अनुभव म्हणिजे अनन्य जाण | ऐक अनन्याचें लक्षण| ऐसें असे || २९||
अनन्य म्हणिजे अन्य नसे| आत्मनिवेदन जैसें | संगभंगें असतचि असे| आत्मा आत्मपणें || ३०||
 आत्म्यास नाहीं आत्मपण| हेंचि निःसंगाचें लक्षण | हें वाच्यांशें बोलिले जाण| कळावया कारणें || ३१||
 येरवीं लक्ष्यांश तो वाच्यांशें| सांगिजेल हें घडे कैसें | वाक्य विवरणें अपैसें| कळों लागे || ३२||
करावें तत्वविवरण| शोधावें ब्रह्म निर्गुण | पाहावें आपणास आपण| म्हणिजे कळे || ३३||
 हें न बोलतांच विवरिजे| विवरोन विरोन राहिजे | मग अबोलणेंचि साजे| माहापुरुषीं || ३४||
शब्दचि निशब्द होती| श्रुति नेति नेति नेति म्हणती | हें तों आलें आत्मप्रचिती| प्रत्यक्ष आतां || ३५||
प्रचित आलियां अनुमान| हा तों प्रत्यक्ष दुराभिमान | तरी आतां मी अज्ञान| मज कांहींच न कळे || ३६||
मी लटिका माझें बोलणें लटिकें| मी लटिका माझें चालणें लटिकें | मी माझें अवघेंचि लटिकें| काल्पनिक || ३७||
 मज मुळींच नाहीं ठाव| माझे बोलणें अवघेंचि वाव | हा प्रकृतीचा स्वभाव| प्रकृती लटिकी || ३८||
प्रकृती आणी पुरुष| यां दोहींस जेथें निरास | तें मीपण विशेष| हें केवि घडे || ३९||
जेथें सर्व हि अशेष जालें| तेथें विशेष कैंचे आलें | मी मौनी म्हणतां भंगलें| मौन्य जैसें || ४०||
आतां मौन्य न भंगावें| करून कांहींच न करावें | असोन निशेष नसावें| विवेकबळें || ४१||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे ब्रह्मनिरूपणनाम समास दुसरा ||

समास तिसरा. : . निःसंदेह निरूपण . . . .
 || श्रीराम ||
श्रोतीं केला अनुमान| ऐसें कैसें ब्रह्मज्ञान | कांहींच नाहीं असोन| हें केवि घडे || १||
सकळ करून अकर्ता| सकळ भोगून अभोक्ता | सकळांमधें अलिप्तता| येईल कैसी || २||
तथापि तुम्ही म्हणतां| योगी भोगून अभोक्ता | स्वर्गनरकहि आतां| येणेंचि न्यायें || ३||
जन्म मृत्यु भोगिलेच भोगी| परी तो भोगून अभोक्ता योगी | यातना हि तयालागीं| येणेंचि पाडें || ४||
कुटून नाहीं कुटिला| रडोन नाहीं रडला | कुंथोन नाहीं कुंथिला| योगेश्वर || ५||
जन्म नसोन घातला| पतित नसोन जाला | यातना नसोन पावला| नानापरी || ६||
ऐसा श्रोतयांचा अनुमान| श्रोतीं घेतलें आडरान | आतां याचें समाधान| केलें पाहिजे || ७||
वक्ता म्हणे सावध व्हावें| तुम्ही बोलतां बरवें | परी हें तुमच्याच अनुभवें| तुम्हास घडे || ८||
 ज्याचा अनुभव जैसा| तो तो बोलतो तैसा | संपदेविण हो धिवसा| तो निरार्थक || ९||
नाहीं ज्ञानाची संपदा| अज्ञानदारिद्रें आपदा | भोगिल्याच भोगी सदा| शब्दज्ञानें || १०||
योगी वोळखावा योगेश्वरें| ज्ञानी वोळखावा ज्ञानेश्वरें | माहाचतुर तो चतुरें| वोळखावा || ११||
अनुभवी अनुभवियास कळे| अलिप्त अलिप्तपणें निवळें | विदेहाचा देहभाव गळे| विदेही देखतां || १२||
 बद्धासारिखा सिद्ध| आणी सिद्धासारिखा बद्ध | येक भावील तो अबद्ध| म्हणावाच नलगे || १३||
झडपला तो देहधारी| आणी देहधारक पंचाक्षरी | परंतु दोघां येकसरी| कैसी द्यावी || १४||
तैसा अज्ञान पतित| आणी ज्ञानी जीवन्मुक्त | दोघे समान मानील तो युक्त| कैसा म्हणावा || १५||
आतां असो हे दृष्टांत| प्रचित बोलों कांहीं हेत | येथें श्रोतीं सावचित्त| क्षणयेक व्हावें || १६||
जो जो ज्ञानें गुप्त जाला| जो विवेकें विराला | जोअनन्यपणें उरला| नाहींच कांहीं || १७||
तयास कैसें गवसावें| शोधूं जातां तोचि व्हावें | तोचि होतां म्हणावें| नलगे कांहीं || १८||
देहीं पाहातां देसिना| तत्वें शोधितां भासेना | ब्रह्म आहे निवडेना| कांहीं केल्यां || १९||
दिसतो तरी देहधारी| परी कांहींच नाहीं अंतरीं | तयास पाहातां वरिवरी| कळेल कैसा || २०||
कळाया शोधावें अंतर| तंव तो नित्य निरंतर | जयास धुंडितां विकार| निर्विकार होती || २१||
 तो परमात्मा केवळ| तयास नाहीं मायामळ | अखंड हेतूचा विटाळ| जालाच नाहीं || २२||
ऐसा जो योगीराज| तो आत्मा सहजीं सहज | पूर्णब्रह्म वेदबीज| देहाकारें कळेना || २३||
देह भावितां देहचि दिसे| परी अंतर अनारिसें असे | तयास शोधितां नसे| जन्म मरण || २४||
 जयास जन्ममरण व्हावें| तें तो नव्हेचि स्वभावें | नाहींच तें आणावें| कोठून कैंचें || २५||
निर्गुणास जन्म कल्पिला| अथवा निर्गुण उडविला | तरी उडाला आणी जन्मला| आपला आपण || २६||
माध्यांनीं थुंकितां सूर्यावरी| तो थुंका पडेल आपणांच वरी | दुसऱ्यास चिंतितां अंतरीं| आपणास घडे || २७||
समर्थ रायाचे महिमान| जाणतां होते समाधान | परंतु भुंकों लागलें स्वान| तरी तें स्वानचि आहे || २८||
 ज्ञानी तो सत्यस्वरूप| अज्ञान देखे मनुष्यरूप | भावासारिखा फळद्रूप| देव तैसा || २९||
देव निराकार निर्गुण| लोक भाविती पाषाण | पाषाण फुटतो निर्गुण| फुटेल कैसा || ३०||
देव सदोदित संचला| लोकीं बहुविध केला | परंतु बहुविध जाला| हें तों घडेना || ३१||
 तैसा साधु आत्मज्ञानी| बोधें पूर्ण समाधानी | विवेकें आत्मनिवेदनी| आत्मरूपी || ३२||
जळोन काष्ठाचा आकार| अग्नि दिसे काष्ठाकार | परी काष्ठ होईल हा विचार| बोलोंच नये || ३३||
कर्पूर असे तों जळतां दिसे| तैसा ज्ञानीदेह भासे | तयास जन्मवितां कैसें| कर्दळीउदरीं || ३४||
बीज भाजलें उगवेना| वस्त्र जळालें उकलेना | वोघ निवडितां निवडेना| गंगेमधें || ३५||
 वोघ गंगेमागें दिसे| गंगा येकदेसी असे | साधु कांहींच न भासे| आणी आत्मा सर्वगत || ३६||
सुवर्ण नव्हे लोखंड| साधूस जन्म थोतांड | अज्ञान प्राणी जडमूढ| तयास हें उमजेचिना || ३७||
अंधास कांहींच न दिसे| तरी ते लोक आंधळे कैसे | सन्नपातें बरळतसे| सन्नपाती || ३८||
 जो स्वप्नामधें भ्याला| तो स्वप्नभयें वोसणाला | तें भये जागत्याला| केवि लागे || ३९||
मुळी सर्पाकार देखिली| येक भ्याला येकें वोळखिली | दोघांची अवस्था लेखिली| सारिखीच कैसी || ४०||
हतीं धरितां हि डसेना| हें येकास भासेना | तरी ते त्याची कल्पना| तयासीच बाधी || ४१||
विंचु सर्प डसला| तेणें तोचि जाकळला | तयाचेनि लोक जाला| कासावीस कैसा || ४२||
आतां तुटला अनुमान| ज्ञानियास कळे ज्ञान | अज्ञानास जन्ममरण| चुकेचिना || ४३||
येका जाणण्यासाठीं| लोक पडिले अटाटीं | नेणपणें हिंपुटी होती| जन्ममृत्यें || ४४||
तेंचि कथानुसंधान| पुढें केलें परिछिन्न | सावधान सावधान| म्हणे वक्ता || ४५||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे निःसंदेहनिरूपणनाम समास तिसरा ||

समास चवथा. : . जाणपणनिरूपण . . . .
 || श्रीराम ||
पृथ्वीमधें लोक सकळ| येक संपन्न येक दुर्बळ | येक निर्मळ येक वोंगळ| काय निमित्य || १||
कित्येक राजे नांदती| कित्येक दरिद्र भोगिती | कितीयेकांची उत्तम स्थिती| कित्येक अधमोद्धम || २||
 ऐसें काय निमित्य जालें| हें मज पाहिजे निरोपिलें | याचे उत्तर ऐकिलें| पाहिजे श्रोतीं || ३||
हे सकळ गुणापासीं गती| सगुण भाग्यश्री भोगिती | अवगुणास दरिद्रप्राप्ती| येदर्थीं संदेह नाहीं || ४||
जो जो जेथें उपजला| तो ते वेवसाईं उमजला | तयास लोक म्हणती भला| कार्यकर्ता || ५||
जाणता तो कार्य करी| नेणतां कांहींच न करी | जाणता तो पोट भरी| नेणता भीक मागे || ६||
हें तों प्रकटचि असे| जनीं पाहातां प्रत्यक्ष दिसे | विद्येवीण करंटा वसे| विद्या तो भाग्यवंत || ७||
आपुली विद्या न सिकसी| तरी काये भीक मागसी | जेथें तेथें बुद्धी ऐसी| वडिलें सांगती || ८||
वडिल आहे करंटा| आणी समर्थ होये धाकुटा | कां जे विद्येनें मोटा| म्हणोनिया || ९||
विद्या नाही बुद्धी नाही| विवेक नाहीं साक्षेप नाहीं | कुशळता नाहीं व्याप नाहीं| म्हणौन प्राणी करंटा || १०||
इतुकें हि जेथें वसे| तेथें वैभवास उणें नसे | वैभव सांडितां अपैसें| पाठीं लागे || ११||
वडिल समर्थ धाकुटा भिकारी| ऐका याची कैसी परी | वडिला ऐसा व्याप न करी| म्हणोनियां || १२||
जैसी विद्या तैसी हा&

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