Home Marathi
 

Dasbodh dashak - 10 by स्वामी रामदास समर्थ

[Oct 31, 2007]

.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक १० .. दशक दहावा. : .
जगज्जोतीनाम समास पहिला. : . अंतःकरणैकनिरुपण . . . .
|| श्रीराम ||
सकळांचे अंतःकरण येक| किंवा येक नव्हे अनेक | ऐसें हे निश्चयात्मक| मज निरोपावें || १||
ऐसें श्रोतयानें पुसिलें| अंतःकरण येक किं वेगळालें | याचे उत्तर ऐकिलें पाहिजे श्रोतीं || २||
समस्तांचे अंतःकर्ण येक निश्चयो जाणावा नेमक | हा प्रत्ययाचा विवेक| तुज निरोपिला || ३||
श्रोता म्हणे वक्तयासी| अंतःकरण येक समस्तांसी | तरी मिळेना येकायेकासी| काये निमित्य || ४||
येक जेवितां अवघे धाले| येक निवतां अवघे निवाले | येक मरतां अवघे मेले| पाहिजेत कीं || ५||
येक सुखी येक दुःखी| ऐसें वर्ततें लोकिकीं | येका अंतःकरणाची वोळखी| कैसी जाणावी || ६||
जनीं वेगळाली भावना| कोणास कोणीच मिळेना | म्हणौन हें अनुमाना| येत नाही || ७||
अंतःकरण येक असतें| तरी येकाचें येकास कळों येतें | कांहीं चोरितांच न येतें| गौप्य गुह्य || ८||
याकरणें अनुमानेना| अंतःकरण येक हें घडेना | विरोध लागला जना| काये निमित्य || ९||
सर्प डसाया येतो| प्राणी भेऊन पळतो | येक अंतःकरण तेरी तो| विरोध नसावा || १०||
ऐसी श्रोतयांची आशंका| वक्ता म्हणे चळों नका | सावध होऊन ऐका| निरूपण || ११||
अंतःकर्ण म्हणिजे जाणीव| जाणिव जाणता स्वभाव | देहरक्षणाचा उपाव| जाणती कळा || १२||
 सर्प जाणोन डंखूं आला| प्राणी जाणोन पळाला | दोहींकडे जाणीवेला| बरें पाहा || १३||
दोहींकडे जाणीवेसी पाहिलें| तरी अंतःकर्ण येकचि जालें | विचारितां प्रत्यया आलें| जाणीवरूपें || १४||
 जाणीवरूपें अंतःकर्ण| सकळांचे येक हें प्रमाण | जीवमात्रास जाणपण| येकचि असे || १५||
 येके दृष्टीचें देखणें| येके जिव्हेचें चाखणें | ऐकणें स्पर्शणें वास घेणें| सर्वत्रास येक || १६||
पशु पक्षी किडा मुंगी| जीवमात्र निर्माण जगीं | जाणीवकळा सर्वांलागीं| येकचि आहे || १७||
सर्वांस जळ तें सीतळ| सर्वांस अग्नि तेजाळ | सर्वांस अंतःकर्ण केवळ| जाणीव कळा || १८||
आवडे नावडे ऐसें जालें| तरी हें देहस्वभावावरी गेलें | परंतु हें कळों आलें| अंतःकर्णयोगें || १९||
सर्वांचे अंतःकर्ण येक| ऐसा निश्चयो निश्चयात्मक | जाणती याअचें कौतुक| चहुंकडे || २०||
इतुकेन फिटली आशंका| आतां अनुमान करूं नका | जाणणें तितुकें येका| अंतःकर्णाचें || २१||
जाणोन जीव चारा घेती| जाणोन भिती लपती | जाणोनियां पळोन जाती| प्राणीमात्र || २२||
किडामुंगीपासून ब्रह्मादिक| समस्तां अंतःकर्ण येक | ये गोष्टीचें कौतुक| प्रत्यें जाणावें || २३||
थोर लहान तरी अग्नी| थोडें बहु तरी पाणी | न्यून पूर्ण तरी प्राणी| अंतःकर्णें जाणती || २४||
कोठें उणें कोठें अधीक| परंतु जिनसमासला येक | जंगम प्राणी कोणीयेक| जाटिल्याविण नाहीं || २५||
 जाणीव म्हणिजे अंतःकर्ण| अंतःकर्ण विष्णूचा अंश जाण | विष्णु करितो पाळण| येणें प्रकारें || २६||
 नेणतां प्राणी संव्हारितो| नेणीव तमोगुण बोलिजेतो | तमोगुणें रुद्र संव्हारितो| येणें प्रकारें || २७||
कांही जाणीव कांही नेणीव| हा रजोगुणाचा स्वभाव | जाणतां नेणतां जीव| जन्मास येती || २८||
जाणीवेनें होतें सुख| नेणीवेनें होतें दुःख | सुखदुःख अवश्यक| उत्पत्तिगुणें || २९||
जाणण्यानेणण्याची बुद्धि| तोंचि देहीं जाणावा विधी | स्थोओळ देहीं ब्रह्मा त्रिशुद्धि| उत्पत्तिकर्ता || ३०||
 ऐसा उत्पत्ति स्थिति संहार| प्रसंगें बोलिला विचार | परंतु याचा निर्धार| प्रत्यें पाहावा || ३१||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे अंतःकर्णयेकनाम समास पहिला ||

समास दुसरा. : . देहआशंकानिरूपण . . . .
 || श्रीराम ||
स्वामीनें विचार दखविला| येथें विष्णूचा अभाव दिसोन आला | ब्रह्मा विष्णु महेशाला| उरी नाहीं || १||
 उप्तत्ति स्थिति संव्हार| ब्रह्मा विष्णु महेश्वर | याचा पाहातां विचार| प्रत्ययो नाहीं || २||
ब्रह्मा उत्पत्तिकर्ता चौंमुखांचा| येथें प्रत्ययो नाहीं त्याचा | पाळणकर्ता विष्णु चौभुजांचा| तो हि ऐकोन जाणों || ३||
 महेश संव्हार करितो| हाहि प्रत्यय कैसा येतो | लिंगमहिमा पुराणीं तो| विपरीत बोलिला || ४||
मूळमायेस कोणें केलें| हें तों पाहिजे कळलें | तिहीं देवांचें रूप जालें| ऐलिकडे || ५||
मूळमाया लोकजननी| तयेपासून गुणक्षोभिणी | गुणक्षोभिणीपासून त्रिगुणी| जन्म देवा || ६||
 ऐसें बोलती शास्त्रकारक| आणि प्रवृत्तीचेहि लोक | प्रत्ययें पुसतां कित्येक| अकांत करिती || ७||
म्हणोन त्यास पुसावेना| त्यांचेन प्रत्ययो आणवेना | प्रत्ययेंविण प्रेत्न नाना| ठकाठकी || ८||
प्रचितवीण वैद्य म्हणवी| उगीच करी उठाठेवी | तया मुर्खाला गोवी| प्राणीमात्र || ९||
तैसाच हाहि विचार| प्रत्यये करावा निर्धार | प्रत्ययें नस्तां अंधकार| गुरुशिष्यांसी || १०||
 बरें लोकास काये म्हणावें| लोक म्हणती तेंचि बरवें | परंतु स्वामीनें सांगावें| विशद करुनी || ११||
म्हणों देवीं माया केली| तरी देवांचीं रूपें मायेंत आलीं | जरी म्हणों मायेनें माया केली| तरी दुसरी नाहीं || १२||
जरी म्हणो भूतीं केली| तरी ते भूतांचीच वळली | म्हणावें जरी परब्रह्में केली| तरी ब्रह्मीं कर्तुत्व नाहीं || १३||
 आणी माया खरी असावी| तरी ब्रह्मीं कर्तुत्वाची गोवी | माया मिथ्या ऐसी जाणावी| तरी कर्तुत्व कैंचें || १४||
आतां हें अवघेंचि उगवें| आणी मनास प्रत्यये फावे | ऐसें केलें पाहिजें देवें| कृपाळूपणें || १५||
वेद मातृकावीण नाहीं| मातृका देहावीण नाहीं | देह निर्माण होत नाहीं| देहावेगळा || १६||
तया देहामधें नरदेहो| त्या नरदेहांत ब्राह्मणदेहो | तया ब्राह्मणदेहास पाहो| अधिकार वेदीं || १७||
असो वेद कोठून जाले| देह कासयाचे केले | दैव कैसे प्रगटले| कोण्या प्रकरें || १८||
 ऐसा बळावया अनुमान| केलें पाहिजे समाधान | वक्ता म्हणे सावधान| होईं आता| १९||
प्रत्यये पाहातां सांकडी| अवघी होते विघडाविघडी | अनुमानितां घडीनें घडी| काळ जातो || २०||
 लोकधाटी शास्त्रनिर्णये| येथें बहुधा निश्चये | म्हणोनियां येक प्रत्यये| येणार नाहीं || २१||
आतां शास्त्राची भीड धरावी| तरी सुटेना हे गथागोवी | गथागोवी हे उगवावी| तरी शास्त्रभेद दिसे || २२||
 शास्त्र रक्षून प्रत्यये आणिला| पूर्वपक्ष त्यागून सिद्धांत पाहिला | शहाणा मुर्ख समजाविला| येका वचनें || २३||
शास्त्रींच पूर्वपक्ष बोलिला| पूर्वपक्ष म्हणावें लटक्याला | विचार पाहातां आम्हांला| शब्द नाहीं || २४||
तथापि बोलों कांहींयेक| शास्त्र रक्षून कौतुक | श्रोतीं सादर विवेक| केला पाहिजे || २५||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे देहआशंकानाम समास दुसरा ||

समास तिसरा. : . देहआशंकाशोधन . . . .
 || श्रीराम ||
 उपाधिविण जें आकाश| तेंचि ब्रह्म निराभास | तें निराभासीं मूळमायेस| जन्म जाला || १||
 तें मूळमायेचे लक्षण| वायोस्वरूपचि जाण | पंचभूतें आणी त्रिगुण| वायोआंगीं || २||
आकाशापासून वायो जाला| तो वायोदेव बोलिला | वायोपासून अग्नि जाला| तो अग्निदेव || ३||
अग्निपासून जालें आप| तें नारायणाचें स्वरूप | आपापासून पृथ्वीचें रूप| तें बीजाकारें || ४||
ते पृथ्वीचे पोटीं पाषाण| बहु देवांचें लक्षण | नाना प्रचित प्रमाण| पाषाणदेवीं || ५||
 नाना वृक्ष मृत्तिका| प्रचित रोकडी विश्वलोकां | समस्त देवांचा थारा येका| वायोमध्यें || ६||
देव यक्षिणी कात्यायेणी| चामुंडा जखिणी मानविणी | नाना शक्ति नाना स्थानीं| देशपरत्वें || ७||
 पुरुषनामें कित्येक| देव असती अनेक | भूतें देवतें नपुषक| नामें बोलिजेती || ८||
देव देवतांदेवतेंभूतें| पृथ्वीमध्यें असंख्यातें | परंतु यां समस्तांतें| वायोस्वरूप बोलिजे || ९||
वायोस्वरूप सदा असणें| प्रसंगें नाना देह धरणें | गुप्त प्रगट होणें जाणें| समस्तांसी || १०||
वायोस्वरूपें विचरती| वायोमध्यें जगज्जोती | जाणीवकळा वासना वृत्ति| नाना भेदें || ११||
आकाशापासून वायो जाला| तो दों प्रकारें विभागला | सावधपणें विचार केला| पाहिजे श्रोतीं || १२||
येक वारा सकळ जणती| येक वायोमधील जगज्जोती | जगज्जोतीच्या अनंत मूर्ती| देवदेवतांच्या || १३||
 वायो बहुत विकारला| परंतु दों प्रकारें विभागला | आतां विचार ऐकिला| पाहिजे तेजाचा || १४||
वायोपाऊन तेज जालें| उष्ण सीतळ प्रकाशलें | द्विविध रूप ऐकिलें| पाहिजें तेजाचें || १५||
उष्णापासून जाला भानु| प्रकाशरूप दैदीप्यमानु | सर्वभक्षक हुताशनु| आणी विद्युल्यता || १६||
सीतळापासून आप अमृत| चंद्र तारा आणी सीत | आतां परिसा सावचित्त| होऊन श्रोते || १७||
तेज बहुत विकारलें| परंतु द्विविधाच बोलिलें | आपहि द्विविधाच निरोपिलें| आप आणि अमृत || १८||
ऐकें पृथ्वीचा विचार| पाषाण मृत्तिका निरंतर | आणीक दुसरा प्रकार| सुवर्ण परीस नाना रत्नें || १९||
 बहुरत्ना वसुंधरा| कोण खोटा कोण खरा | अवघें कळे विचारा-| रूढ होतां || २०||
मनुष्यें कोठून जालीं| हे मुख्य आशंका राहिली | पुढें वृत्ति सावध केली| पाहिजे श्रोतीं || २१||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे देहआशंकाशोधननाम समास तिसरा ||

समास चवथा. : . बीजलक्षण . . . .
 || श्रीराम ||
आतां पाहों जातां उत्पत्ति| मनुष्यापासून मनुष्यें होती | पशुपासून पशु निपजती| प्रत्यक्ष आतां || १||
 खेंचरें आणी भूचरें| वनचरें आणी जळचरें | नाना प्रकारीचीं शरीरें| शरीरांपासून होती || २||
 प्रत्ययास आणी प्रमाण| निश्चयास आणी अनुमान | मार्ग देखोन आडरान| घेऊंच नये || ३||
विपरीतपासून विपरीतें होती| परी शरीरेंच बोलिजेती | शरीरावांचून उत्पत्ती| होणार नाहीं || ४||
तरी हे उत्पत्ति कैसी जाली| कासयाची कोणें केली | जेणें केली त्याची निर्मिली| काया कोणें || ५||
ऐसें पाहातां उदंड लांबलें| परी मुळीं शेरीर जैसें जालें | कासयाचें उभारिलें| कोणें कैसें || ६||
ऐसी हे मागील आशंका| राहात गेली ते ऐका | कदापी जाजु घेऊं नका| प्रत्ययो आलियानें || ७||
प्रत्ययोचि आहे प्रमाण| मूर्खास वाटे अप्रमाण | पिंडें प्रचितशब्दें जाण| विश्वासासी || ८||
ब्रह्मीं मूळमाया जाली| तेचि अष्टधा प्रकृती बोलिली | भूतीं त्रिगुणीं कालवली| मूळमाया || ९||
तें मूळमाया वायोस्वरूप| वायोमध्यें जाणीवेचें रूप | तेचि इच्छा परी आरोप| ब्रह्मीं न घडे || १०||
तथापि ब्रह्मीं कल्पिला| तरी तो शब्द वायां गेला | आत्मा निर्गुण संचला| शब्दातीत || ११||
आत्मा निर्गुण वस्तु ब्रह्म| नाममात्र तितुका भ्रम | कल्पून लाविला संभ्रम| तरी तो लागणार नाहीं || १२||
 तथापि आग्रहें लाविला| जरी धोंडा मारिला आकाशाला | आकाशावरी थुंकिला| तरी तें तुटेना || १३||
 तैसें ब्रह्म निर्विकार| निर्विकारीं लाविती विकार | विकार नासे निर्विकार| जैसें तैसें || १४||
 आतां ऐका प्रत्ययो| जाणोनि धरावा निश्चयो | तरीच पाविजे जयो| अनुभवाचा || १५||
 मायाब्रह्मीं जो समीर| त्यांत जाणता तो ईश्वर | ईश्वर आणि सर्वेश्वर| तयासीच बोलिजे || १६||
तोचि ईश्वर गुणासी आला| त्याचा त्रिगुणभेद जाला | ब्रह्मा विष्णु महेश उपजला| तये ठाईं || १७||
सत्व रज आणी तम| हे त्रिगुण उत्तमोत्तम | यांच्या स्वरूपाचा अनुक्रम| मागां निरोपिला || १८||
जाणता विष्णु भगवान| जाणता नेणता चतुरानन | नेणता महेश पंचानन| अत्यंत भोळा || १९||
 त्रिगुण त्रिगुणीं कालवले| कैसे होती वेगळाले | परी विशेष न्यून भासले| ते बोलावे लागती || २०||
 वायोमध्यें विष्णु होता| तो वायोस्वरूपचि तत्वता | पुढें जाला देहधर्ता| चतुर्भुज || २१||
 तैसाच ब्रह्मा आणी महेश| देह धरिती सावकास | गुप्त प्रगट होतां तयास| वेळ नाहीं || २२||
आतां रोकडी प्रचिती| मनुष्यें गुप्त प्रगटती | मां त्या देवांच्याच मूर्ती| सामर्थ्यवंत || २३||
देव देवता भूतें देवतें| चढतें सामर्थ्य तेथें | येणेंचि न्यायें राक्षसांतें| सामर्थ्यकळा || २४||
झोटींग वायोस्वरूप असती| सवेंच खुळखुळां चालती | खोबरीं खारिका टाकून देती| अकस्मात || २५||
अवघेंचि न्याल अभावें| तरी तें बहुतेकांस ठावें | आपुल्याला अनुभवें| विश्वलोक जाणती || २६||
मनुष्यें धरती शरीरवेष| नाना परकाया प्रवेश | मां तो परमात्मा जगदीश| कैसा न धरी || २७||
म्हणोनि वायोस्वरूपें देह धरिलें| ब्रह्मा विष्णु महेश जालें | पुढें तेचि विस्तारलें| पुत्रपौत्रीं || २८||
अंतरींच स्त्रिया कल्पिल्या| तों त्या कल्पितांच निर्माण जाल्या | परी तयापासून प्रजा निर्मिल्या| नाहींत कदा || २९||
 इछून पुत्र कल्पिले| ते ते प्रसंगीं निर्माण जाले | येणें प्रकारें वर्तले| हरिहरादिक || ३०||
पुढें ब्रह्मयानें सृष्टी कल्पिली| इछेसरिसी सृष्टी जाली | जीवसृष्टि निर्माण केली| ब्रह्मदेवें || ३१||
नाना प्रकारीचे प्राणी कल्पिले| इछेसरिसे निर्माण जाले | अवघे जोडेचि उदेले| अंडजजारजादिक || ३२||
 येक जळस्वेदापासून जाले| ते प्राणी स्वेदज बोलिले | येक वायोकरितां जाले| अकस्मात उद्भिज || ३३||
 मनुष्याची गौडविद्या| राक्षसांची वोडंबरी विद्या | ब्रह्मयाची सृष्टिविद्या| येणें प्रकरें || ३४||
 कांहीयेक मनुष्यांची| त्याहून विशेष राक्षसांची | त्याहून विशेष ब्रह्मयाची| सृष्टिविद्या || ३५||
 जाणते नेणते प्राणी निर्मिले| वेद वदोन मार्ग लाविले | ब्रह्मयानें निर्माण केले| येणें प्रकारें || ३६||
मग शरीपासून शरीरें| सृष्टी वाढली विकारें | सकळ शरीरें येणें प्रकारें| निर्माण जाली || ३७||
येथें आशंका फिटली| सकळ सृष्टी विस्तारली | विचार पाहातं प्रत्यया आली| येथान्वयें || ३८||
 ऐसी सृष्टी निर्माण केली| पुढें विष्णुनें कैसी प्रतिपाळिली | हेहि विवंचना पाहिली| पाहिजे श्रोतीं || ३९||
 सकळ प्राणी निर्माण जाले| ते मूळरूपें जाणोन पाळिले | शरीरें दैत्य निर्दाळिले| नाना प्रकारींचे || ४०||
 नाना अवतार धरणें| दुष्टांचा संहार करणें | धर्म स्थापायाकारणें| विष्णुस जन्म || ४१||
म्हणोन धर्मस्थापनेचे नर| तेंहि विष्णुचे अवतार | अभक्त दुर्जन रजनीचर| सहजचि जाले || ४२||
 आतां प्राणी जे जन्मले| ते नेणोन संव्हारिले | मूळरूपें संव्हारिलें| येणें प्रकारें || ४३||
शरीरें रुद्र खवळेल| तैं जीवसृष्टि संव्हारेल | अवघें ब्रह्मांडचि जळेल| संव्हारकाळीं || ४४||
एवं उत्पत्ति स्थिती संव्हार| याचा ऐसा आहे विचार | श्रोतीं होऊन तत्पर| अवधान द्यावें || ४५||
कल्पांतीं संव्हार घडेल| तोचि पुढें सांगिजेल | पंचप्रळय वोळखेल| तोचि ज्ञानी || ४६||

समास पांचवा. : . प/न्चप्रळयनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
ऐका प्रळयाचें लक्षण| पिंडीं दोनी पî

Browse Pages

About स्वामी रामदास समर्थ
Categories

Did you know?
Did you know that you can tell the temperature by listening to the chirping of a cricket? To get a rough idea of the temperature in degrees Fahrenheit, count the number of chirps in 15 seconds and then add 37. The number you get will be an approximation of the outside temperature.

Heh Heh Heh...
Little Morris was telling his friend Cyril all about his Chanukah presents.
“My daddy bought me a mouth organ. It’s the best present I've ever had.”
“Why?”
“Because my mummy gives me extra money every week if I don’t play it.”

© 2008 Saj Infotech • All rights reserved.