Dasbodh dashak - 11
by स्वामी रामदास समर्थ
[Oct 31, 2007]
.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक ११ ..
दशक अकरावा. : .
भीमदशक समास पहिला. : .
सिद्धांतनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
आकाशापासून वायो होतो| हा तों प्रत्यये येतो | वायोपासून अग्नी जो तो| सावध ऐका || १||
वायोची कठीण घिसणी| तेथें निर्माण जाला वन्ही | मंद वायो सीतळ पाणी| तेथुनि जालें || २||
आपापासून जाली पृथ्वी| ते नाना बीजरूप जाणावी | बीजापासून उत्पत्ति व्हावी| हा स्वभावचि आहे || ३||
मुळीं सृष्टी कल्पनेची| कल्पना आहे मुळींची | जयेपासून देवत्रयाची| काया जाली || ४||
निश्चळामधें चंचळ| ते चि कल्पना केवळ | अष्टधा प्रकृतीचें मूळ| कल्पनारूप || ५||
कल्पना तेचि अष्टधा प्रकृति| अष्टधा तेचि कल्पनामुर्ती | मुळाग्रापासून उत्पत्ति| अष्टधा जाणावी || ६||
पांच भूतें तीन गुण| आठ जालीं दोनी मिळोन | म्हणौनि अष्टधा प्रकृति जाण| बोलिजेते || ७||
मुळीं कल्पनारूप जाली| पुढें तेचि फापावली | केवळ जडत्वास आली| सृष्टिरूपें || ८||
मुळीं जाली ते मूळमाया| त्रिगुण जाले ते गुणमाया | जडत्व पावली ते अविद्या माया| सृष्टिरूपें || ९||
पुढें च्यारी खाणी जाल्या| च्यारी वाणी विस्तारल्या | नाना योनी प्रगटल्या| नाना वेक्ती || १०||
ऐसी जाली उभारणी| आतां ऐका संव्हारणी | मागील दशकीं विशद करूनि| बोलिलें असे || ११||
परंतु आतां संकळित| बोलिजेल संव्हारसंकेत | श्रोते वक्ते येथें चित्त| देऊन ऐका || १२||
शत वरुषें अनावृष्टि| तेथें आटेल जीवसृष्टि | ऐशा कल्पांताच्या गोष्टी| शास्त्रीं निरोपिल्या || १३||
बाराकळीं तपे सूर्य| तेणें पृथ्वीची रक्षा होये | मग ते रक्षा विरोन जाये| जळांतरीं || १४||
तें जळ शोषी वैश्वानरु| वन्ही झडपी समीरु | समीर वितुळे निराकारु| जैसें तैसें || १५||
ऐसी सृष्टिसंहारणी जाली| मागां विस्तारें बोलिली | मायानिरासें उरली| स्वरूपस्थिति || १६||
तेथें जीवशिव पिंडब्रह्मांड| अटोन गेलें थोतांड | मायेअविद्येचें बंड| वितळोन गेलें || १७||
विवेकेंचि बोलिला क्षये| म्हणोनि विवेकप्रळये | विवेकी जाणती काये| मूर्खास कळे || १८||
सृष्टि शोधितां सकळ| येक चंचळ येक निश्चळ | चंचळास कर्ता चंचळ| चंचळरूपी १९||
जो सकळ शरीरीं वर्ते| सकल कर्तुत्वास प्रवर्ते | करून अकर्ता हा वर्ते| शब्द जया || २०||
राव रंक ब्रह्मादिक| सकळांमधें वर्ते येक | नाना शरीरें चाळक| इंद्रियेंद्वारें || २१||
त्यास परमात्मा बोलती| सकळ कर्ता ऐसें जाणती | परि तो नासेल प्रचिती| विवेकें पाहावी || २२||
जो स्वानामधें गुरुगुरितो| जो सूकरांमधें कुरुकुरितो | गाढवीं भरोन भुंकतो| आटाहास्यें || २३||
लोक नाना देह देखती| विवेकी देहांत पाहाती | पंडित समदर्शनें घेती| येणें प्रकारें || २४||
|| श्लोक || विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि | शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः || देह पाहातां वेगळाले| परंतु अंतर येकचि जालें | प्राणीमात्र देखिलें| येकांतरें || २५||
अनेक प्राणी निर्माण होती| परी येकचि कळा वर्तती | तये नांव जगज्जोती| जाणतीकळा || २६||
श्रोत्रीं नाना शब्द जाणे| त्वचेमधें सीतोष्ण जाणे | चक्षुमधें पाहों जाणे| नाना पदार्थ || २७||
रसनेमधें रस जाणे| घ्राणामधें वास तो जाणे | कर्मइंद्रियामधें जाणे| नाना विषयस्वाद || २८||
सूक्ष्म रूपें स्थूळ रक्षी| नाना सुखदुःखें परीक्षी | त्यास म्हणती अंतरसाक्षी| अंतरात्मा || २९||
आत्मा अंतरात्मा विश्वात्मा| चैतन्य सर्वात्मा सुक्ष्मात्मा | जीवात्मा शिवात्मा परमात्मा| द्रष्टा साक्षी सत्तारूप || ३०||
विकारामधील विकारी| अखंड नाना विकार करी | तयास वस्तु म्हणती भिकारी| परम हीन || ३१||
सर्व येकचि दिसती| अवघा येकंकार करिती | ते अवघी माईक स्थिती| चंचळामधें || ३२||
चंचळ माया ते माईक| निश्चळ परब्रह्म येक | नित्यानित्यविवेक| याकारणे || ३३||
जातो जीव तो प्राण| नेणे जीव तो अज्ञान | जन्मतो जीव तो जाण| वासनात्मक || ३४||
ऐक्य जीव तो ब्रह्मांश| जेथें पिंडब्रह्मांडनिरास | येथें सांगितले विशेष| चत्वार जीव || ३५||
असो हें अवघें चंचळ| चंचळ जाईल सकळ | निश्चळ तें निश्चळ| आदिअंतीं || ३६||
आद्य मध्य अवसान| जे वस्तु समसमान | निर्विकारी निर्गुण निरंजन| निःसंग निःप्रपंच || ३७||
उपाधीनिरासें तत्वता| जीवशिवास ऐक्यता | विवंचून पाहों जातां| उपाधि कैंची || ३८||
असो जाणणें तितुकें ज्ञान| परंतु होतें विज्ञान | मनें वोळखावें उन्मन| कोण्या प्रकारें || ३९||
वृत्तिस न कळे निवृत्ति| गुणास कैंची निर्गुणप्राप्ती | गुणातीत साधक संतीं| विवेकें केलें || ४०||
श्रवणापरीस मनन सार| मननें कळे सारासार | निजध्यासें साक्षात्कार| निःसंग वस्तु || ४१||
निर्गुणीं जे अनन्यता| तेचि मुक्ति सायोज्यता | लक्ष्यांश वाच्यांश आतां| पुरे जाला || ४२||
अलक्षीं राहिलें लक्ष| सिद्धांतीं कैंचा पूर्वपक्ष | अप्रत्यक्षास कैंचें प्रत्यक्ष| असोन नाहीं || ४३||
असोन माईक उपाधी| तेचि सहजसमाधी | श्रवणें बळावी बुद्धी| निश्चयाची || ४४||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे सिद्धांतनिरूपणनाम समास पहिला ||
समास दुसरा. : . चत्वारदेवनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
येक निश्चळ येक चंचळ| चंचळीं गुंतलें सकळ | निश्चळ तें निश्चळ| जैसें तैसें || १||
पाहे निश्चळाचा विवेक| ऐसा लक्षांमधें येक | निश्चळाऐसा निश्चयात्मक| निश्चळचि तो || २||
या निश्चळाच्या गोष्टी सांगती| पुन्हां चंचळाकडे धांवती | चंचळचक्रीं निघोन जाती| ऐसे थोडे || ३||
चंचळीं चंचळ जन्मलें| चंचळाचि मधें वाढलें | अवघें चंचळचि बिंबलें| जन्मवरी || ४||
पृथ्वी अवघी चंचळाकडे| करणें तितुकें चंचळीं घडे | चंचळ सांडून निश्चळीं पवाडे| ऐसा कैंचा || ५||
चंचळ कांहीं निश्चळेना| निश्चळ कदापी चळेना | नित्यानित्यविवेकें जना| उमजे कांहीं || ६||
कांहीं उमजलें तरी नुमजे| कांहीं समजलें तरी न समजे | कांहीं बुझे तरी निर्बुजे| किंचित मात्र || ७||
संदेह अनुमान आणी भ्रम| अवघा चंचळामधें श्रम | निश्चळीं कदा नाहीं वर्म| समजलें पाहिजे || ८||
चंचळाकरी तितुकी माया| माईक जाले विलया | लहान थोर म्हणावया| कार्य नाहीं || ९||
सगट माया विस्तारली| अष्टधा प्रकृति फांपावली | चित्रविचित्र विकारली| नाना रूपें || १०||
नाना उत्पत्ती नाना विकार| नाना प्राणी लाहान थोर | नाना पदार्थ मकार| नाना रूपें || ११||
विकारवंत विकारलें| सूक्ष्म जडत्वा आलें | अमर्याद दिसों लागलें| कांहींचाबाहीं || १२||
मग नाना शरीरें निर्माण जालीं| नाना नामाभिधानें ठेविलीं | भाषा परत्वें कळों आलीं| काहीं कांहीं || १३||
मग नाना रीति नाना दंडक| आचार येकाहून येक | वर्तों लागले सकळ लोक| लोकाचारें || १४||
अष्टधा प्रकृतीचीं शरीरें| निर्माण जालीं लाहानथोरें | पुढें आपुलाल्या प्रकारें| वर्तों लागती || १५||
नाना मत्तें निर्माण जालीं| नाना पाषांडें वाढलीं | नाना प्रकारीचीं उठिलीं || नाना बंडें || १६||
जैसा प्रवाह पडिला| तैसाच लोक चालिला | कोण वारील कोणाला| येक नाहीं || १७||
पृथ्वीचा जाला गळांठा| येकाहून येक मोठा | कोण खरा कोण खोटा| कोण जाणे || १८||
आचार बहुकाचेंत पडिला| कित्येक पोटासाठीं बुडाला | अवघा वरपंगचि जाला| साभिमानें || १९||
देव जाले उदंड| देवांचें मांडलें भंड | भूतादेवतांचें थोतांड| येकचि जालें || २०||
मुख्य देव तो कळेना| काशास कांहींच मिळेना | येकास येक वळेना| अनावर || २१||
ऐसा नासला विचार| कोण पाहातो सारासार | कैचा लहान कैंचा थोर| कळेचिना || २२||
शास्त्रांचा बाजार भरला| देवांचा गल्बला जाला | लोक कामनेच्या व्रताला| झोंबोन पडती || २३||
ऐसें अवघें नासलें| सत्यासत्य हारपलें | अवघें अनायेक जालें| चहूंकडे || २४||
मतामतांचा गल्बला| कोणी पुसेना कोणाला | जो जे मतीं सांपडला| तयास तेंचि थोर || २५||
असत्याचा अभिमान| तेणें पाविजे पतन | म्हणोनियां ज्ञाते जन| सत्य शोधिती || २६||
लोक वर्तती सकळ| तें ज्ञात्यास करतळामळ | आतां एइका केवळ| विवेकी हो || २७||
लोक कोण्या पंथें जाती| आणि कोण्या देवास भजती | ऐसी हे रोकडी प्रचिती| सावध ऐका || २८||
मृत्तिका धातु पाषाणादिक| ऐसिया प्रतिमा अनेक | बहुतेक लोकांचा दंडक| प्रतिमादेवीं || २९||
नाना देवांचे अवतार| चरित्रें ऐकती येक नर | जप ध्यान निरंतर| करिती पूजा || ३०||
येक सकळांचा अंतरात्मा| विश्वीं वर्ते जो विश्वात्मा | द्रष्टा साक्षी ज्ञानात्मा| मानिती येक || ३१||
येक ते निर्मळ निश्चळ| कदापी नव्हेति चंचळ | अनन्यभावें केवळ| वस्तुच ते || ३२||
येक नाना प्रतिमा| दुसरा अवतारमहिमा | तिसरा तो अंतरात्मा| चौथा तो निर्विकारी || ३३||
ऐसे हे चत्वार देव| सृष्टीमधील स्वभाव | यावेगळा अंतर्भाव| कोठेंचि नाहीं || ३४||
अवघें येकचि मानिती| ते साक्ष देव जाणती | परंतु अष्टधा प्रकृति| वोळखिली पाहिजे || ३५||
प्रकृतीमधील देव| तो प्रकृतीचा स्वभाव | भावातीत माहानभाव| विवेकें जाणावा || ३६||
जो निर्मळास ध्याईल| तो निर्मळचि होईल | जो जयास भजेल| तो तद्रूप जाणावा || ३७||
क्षीर नीर निवडिती| ते राजहंस बोलिजेती | सारासार जाणती| ते माहानभाव || ३८||
अरे जो चंचळास ध्याईल| तो सहजचि चळेल | जो निश्चळास भजेल| तो निश्चळचि || ३९||
प्रकृतीसारिखें चालावें| परी अंतरीं शाश्वत वोळखावें | सत्य होऊन वर्तावें| लोकांऐसें || ४०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे चत्वारदेवनिरूपणनाम समास दुसरा ||
समास तिसरा. : . शिकवण निरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
बहुतां जन्मांचा सेवट| नरदेह सांपडे अवचट | येथें वर्तावें चोखट| नितिन्यायें || १||
प्रपंच करावा नेमक| पाहावा परमार्थविवेक | जेणेंकरितां उभय लोक| संतुष्ट होती || २||
शत वरुषें वय नेमिलें| त्यांत बाळपण नेणतां गेलें | तारुण्य अवघें वेचलें| विषयांकडे || ३||
वृद्धपणीं नाना रोग| भोगणें लागे कर्मभोग | आतां भगवंताचा योग| कोणे वेळे || ४||
राजिक देविक उदेग चिंता| अन्न वस्त्र देहममता | नाना प्रसंगें अवचिता| जन्म गेला || ५||
लोक मरमरों जाती| वडिलें गेलीं हे प्रचिती | जाणत जाणत निश्चिती| काये मानिलें || ६||
अग्न गृहासी लागला| आणि सावकास निजेला | तो कैसा म्हणावा भला| आत्महत्यारा || ७||
पुण्यमार्ग अवघा बुडाला| पापसंग्रह उदंड जाला | येमयातनेचा झोला| कठीण आहे || ८||
तरी आतां ऐसें न करावें| बहुत विवेकें वर्तावें || इक लोक परत्र साधावें| दोहीकडे || ९||
आळसाचें फळ रोकडें| जांभया देऊन निद्रा पडे | सुख म्हणौन आवडे| आळसी लोकां || १०||
साक्षेप करितां कष्टती| परंतु पुढें सुरवाडती | खाती जेविती सुखी होती| येत्नेंकरूनी || ११||
आळस उदास नागवणा| आळस प्रेत्नबुडवणा | आळसें करंटपणाच्या खुणा| प्रगट करिती || १२||
म्हणौन आळस नसावा| तरीच पाविजे वैभवा | अरत्रीं परत्रीं जीवा| समाधान || १३||
प्रेत्न करावा तो कोण| हेंचि ऐका निरूपण | सावध करून अंतःकरण| निमिष्य येक || १४||
प्रातःकाळी उठावें| कांहीं पाठांतर करावे | येथानशक्ती आठवावें सर्वोत्तमासी || १५||
मग दिशेकडे जावें| जे कोणासिच नव्हे ठावें | शौच्य आचमन करावें| निर्मळ जळें || १६||
मुखमार्जन प्रातःस्नान| संध्या तर्पण देवतार्चन | पुढें वैश्यदेवउपासन| येथासांग || १७||
कांहीं फळाहार घ्याव| मग संसारधांदा करावा | सुशब्दें राजी राखावा| सकळ लोक || १८||
ज्या ज्याचा जो व्यापार| तेथें असावे खबर्दार | दुश्चितपणें तरी पोर| वेढा लावी || १९||
चुके ठके विसरे सांडी| आठवण जालियां चर्फडी | दुश्चित आळसाची रकडी| प्रचित पाहा || २०||
याकारणें सावधान| येकाग्र असावें मन | तरी मग जेवितां भोजन| गोड वाटे || २१||
पुढें भोजन जालियांवरी| कांहीं वाची चर्चा करी | येकांतीं जाऊन विवरी| नाना ग्रंथ || २२||
तरीच प्राणी शाहाणा होतो| नाहींतरी मूर्खचि राहातो | लोक खाती आपण पाहातो| दैन्यवाणा || २३||
ऐक सदेवपणाचें लक्षण| रिकाम्या जाऊं नेदी येक क्षण | प्रपंचवेवसायाचें ज्ञान| बरें पाहे || २४||
कांहीं मेळवी मग जेवी| गुंतल्या लोकांस उगवी | शरीर कारणीं लावी| कांहीं तरी || २५||
कांहीं धर्मचर्चा पुराण| हरीकथा निरूपण | वायां जऊं नेदी क्षण| दोहींकडे || २६||
ऐसा जो सर्वसावध| त्यास कैंचा असेल खेद | विवेकें तुटला समंध| देहबुद्धीचा || २७||
आहे तितुकें देवाचें| ऐसें वर्तणें निश्चयाचें | मूळ तुटें उद्वेगाचें| येणें रीतीं || २८||
प्रपंचीं पाहिजे सुवर्ण| परमार्थीं पंचिकर्ण | माहावाक्याचें विवरण| करितां सुटे || २९||
कर्म उपासना आणि ज्ञान| येणें राहे समाधान | परमार्थाचें जें साधन| तेंचि ऐकत जावें || ३०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे सिकवणनिरूपणनाम समास तीसरा ||
समास चवथा. : . सारविवेकनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
ब्रह्म म्हणिजे निराकार| गगनासारिखा विचार | विकार नाहीं निर्विकार| तेंचि ब्रह्म || १||
ब्रह्म म्हणिजे निश्चळ| अंतरात्मा तो चंचळ | द्रष्टा साक्षी केवळ| बोलिजे तया || २||
तो अंतरात्मा म्हणिजे देव| त्याचा चंचळ स्वभाव | पाळिताहे सकळ जीव| अंतरी वसोनी || ३||
त्यावेगळे जड पदार्थ| तेणेंवीण देह वेर्थ | तेणेंचि कळे परमार्थ| सकळ कांही || ४||
कर्ममार्ग उपासना मार्ग| ज्ञानमार्ग सिद्धांतमार्ग | प्रवृत्तिमार्ग निवृत्तिमार्ग| देवची चालवी || ५||
चंचळेविण निश्चळ कळेना| चंचळ तरी स्थिरावेना | ऐसें हे विचार नाना| बरे पाहा || ६||
चंचळनिश्चळाची संधी| तेथें भांबावते बुद्धि | कर्ममार्गाचे जे विधी| ते मग ऐलिकडे || ७||
देव या सकळांचे मूळ| देवास मूळ ना डाळ | परब्रह्म तें निश्चळ| निर्विकारी || ८||
निर्विकारी आणि विकारी| येक म्हणेल तो भिकारी | विचाराची होते वारी| देखतदेखतां || ९||
सकळ परमार्थास मूळ| पंचीकर्ण माहावाक्य केवळ | तेंची करावें प्रांजळ| पुनःपुन्हां || १०||
पहिला देह स्थूळकाया| आठवा देह मूळमाया | अष्ट देह निर्शलियां| विकार कैंचा || ११||
याकारणें विकारी| साचाऐसी बाजीगरी | येक समजे येक खरी| मानिताहे || १२||
उत्पत्ति स्थिती संव्हार| यावेगळा निर्विकार | कळायासाठीं सारासार| विचार केला || १३||
सार असार दोनी येक| तेथें कैंचा उरला विवेक | परिक्षा नेणती तंक| पापी करंटे || १४||
जो येकचि विस्तारला| तो अंतरात्मा बोलिला | नाना विकारीं विकारला| निर्विकारी नव्हे || १५||
ऐसें प्रगटचि आहे| आपुल्या प्रत्ययें पाहे | काय राहे काय न राहे| हें कळेना || १६||
जें अखंड होत जातें| जें सर्वदा संव्हारतें | रोकडें प्रचितीस येतें| जनामधें || १७||
येक रडे येक चर्फडी| येकांची धरी नरडी | येकमेकां झोंबती बराडी| दुकळ्ळले जैसे || १८||
नाहीं न