Dasbodh dashak - 12
by स्वामी रामदास समर्थ
[Oct 31, 2007]
.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक १२ ..
दशक बारावा. : .
विवेकवैराग्य समास पहिला. : .
विमळ लक्षण . . . .
|| श्रीराम ||
आधी प्रपंच करावा नेटका| मग घ्यावें परमार्थविवेका | येथें आळस करूं नका| विवेकी हो || १||
प्रपंच सांडून परमार्थ कराल| तेणें तुम्ही कष्टी व्हाल | प्रपंच परमार्थ चालवाल| तरी तुम्ही विवेकी || २||
प्रपंच सांडून परमार्थ केला| तरी अन्न मिळेना खायाला | मग तया करंट्याला| परमार्थ कैंचा || ३||
परमार्थ सांडून प्रपंच करिसी| तरी तूं येमयातना भोगिसी | अंतीं परम कष्टी होसी| येमयातना भोगितां || ४||
साहेबकामास नाहीं गेला| गृहींच सुरवडोन बैसला | तरी साहेब कुटील तयाला| पाहाती लोक || ५||
तेव्हां महत्वचि गेलें| दुर्जनाचें हासें जालें | दुःख उदंड भोगिलें| आपुल्या जीवें || ६||
तैसेचि होणार अंतीं| म्हणोन भजावें भगवंतीं | परमार्थाची प्रचिती| रोकडी घ्यावी || ७||
संसारीं असतां मुक्त| तोचि जाणावा संयुक्त | अखंड पाहे युक्तायुक्त| विचारणा हे || ८||
प्रपंची तो सावधान| तो परमार्थ करील जाण | प्रपंचीं जो अप्रमाण| तो परमार्थीं खोटा || ९||
म्हणौन सावधपणें| प्रपंच परमार्थ चालवणें | ऐसें न करिता भोगणें| नाना दुःखें || १०||
पर्णाळि पाहोन उचले| जीवसृष्टि विवेकें चाले | आणि पुरुष होऊन भ्रमले| यासी काय म्हणावें || ११||
म्हणौन असावी दीर्घ सूचना| अखंड करावी चाळणा | पुढील होणार अनुमाना| आणून सोडावें || १२||
सुखी असतो खबर्दार| दुःखी होतो बेखबर | ऐसा हा लोकिक विचार| दिसतचि आहे || १३||
म्हणौन सर्वसावधान| धन्य तयाचें महिमान | जनीं राखे समाधान| तोचि येक || १४||
चाळणेचा आळस केला| तरी अवचिता पडेल घाला | ते वेळे सावरायाला| अवकाश कैंचा || १५||
म्हणौन दीर्घसूचनेचे लोक| त्यांचा पाहावा विवेक | लोकांकरिता लोक| शाहाणे होती || १६||
परी ते शाहाणे वोळखावे| गुणवंताचे गुण घ्यावे | अवगुण देखोन सांडावे| जनामधें || १७||
मनुष्य पारखूं राहेना| आणि कोणाचें मन तोडीना | मनुष्यमात्र अनुमाना| आणून पाहे || १८||
दिसे सकळांस सारिखा| पाहातां विवेकी नेटका | कामी निकामी लोकां| बरें पाहे || १९||
जाणोन पाहिजेत सर्व| हेंचि तयाचें अपूर्व | ज्याचे त्यापरी गौरव| राखों जाणे || २०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे विमळलक्षणनाम समास पहिला ||
समास दुसरा. : . प्रत्ययनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
ऐका संसारासी आले हो| स्त्री पुरुष निस्पृह हो | सुचितपणें पाहो| अर्थांतर || १||
काये म्हणते वासना| काये कल्पिते कल्पना | अंतरींचे तरंग नाना| प्रकारें उठती || २||
बरें खावें बरें जेवावें| बरें ल्यावें बरें नेसावें | मनासारिखें असावें| सकळ कांहीं || ३||
ऐसें आहे मनोगत| तरी तें कांहींच न होत | बरें करितां अकस्मात| वाईट होतें || ४||
येक सुखी येक दुःखी| प्रत्यक्ष वर्ततें लोकीं | कष्टी होऊनियां सेखीं| प्रारब्धावरी घालिती || ५||
अचुक येत्न करवेना| म्हणौन केलें तें सजेना | आपला अवगुण जाणवेना| कांहीं केल्यां || ६||
जो आपला आपण नेणे| तो दुसऱ्याचें काये जाणे | न्याये सांडितां दैन्यवाणे| होती लोक || ७||
लोकांचे मनोगत कळेना| लोकांसारिखें वर्तवेना | मूर्खपणें लोकीं नाना| कळह उठती || ८||
मग ते कळो वाढती| परस्परें कष्टी होती | प्रेत्न राहातां अंतीं| श्रमचि होयें || ९||
ऐसी नव्हे वर्तणुक| परिक्षावे नाना लोक | समजलें पाहिजे नेमक| ज्याचें त्यापरी || १०||
शब्द परीक्षा अंतरपरीक्षा| कांहीं येक कळे दक्षा | मनोगत नतद्रक्षा| काय कळे || ११||
दुसऱ्यास शब्द ठेवणें| आपला कैपक्ष घेणें | पाहों जातां लोकिक लक्षणें| बहुतेक ऐसीं || १२||
लोकीं बरें म्हणायाकारणें| भल्यास लागतें सोसणें | न सोसितां भंडवाणें| सहजचि होये || १३||
आपणास जें मानेना| तेथें कदापि राहावेना | उरी तोडून जावेना| कोणीयेकें || १४||
बोलतो खरें चालतो खरें| त्यास मानिती लहानथोरें | न्याये अन्याये परस्परें| सहजचि कळे || १५||
लोकांस कळेना तंवरी| विवेकें क्ष्मा जो न करी | तेणेंकरितां बराबरी| होत जाते || १६||
जंवरी चंदन झिजेना| तंव तो सुगंध कळेना | चंदन आणि वृक्ष नाना| सगट होती || १७||
जंव उत्तम गुण न कळे| तों या जनास काये कळे | उत्तम गुण देखतां निवळे| जगदांतर || १८||
जगदांतर निवळत गेलें| जगदांतरी सख्य जालें | मग जाणावें वोळले| विश्वजन || १९||
जनींजनार्दन वोळला| तरी काये उणें तयाला | राजी राखावें सकळांला| कठीण आहे || २०||
पेरिलें तें उगवतें| उसिणें द्यावें घ्यावें लागतें | वर्म काढितां भंगतें| परांतर || २१||
लोकीकीं बरेपण केलें| तेणें सौख्य वाढलें | उत्तरासारिखें आलें| प्रत्योत्तर || २२||
हें आवघें आपणांपासीं| येथें बोल नाहीं जनासी | सिकवावें आपल्या मनासी| क्षणक्षणा || २३||
खळ दुर्जन भेटला| क्षमेचा धीर बुडाला | तरी मोनेंचि स्थळत्याग केला| पाहिजे साधकें || २४||
लोक नाना परीक्षा जाणती| अंतरपरीक्षा नेणती | तेणें प्राणी करंटे होती| संदेह नाहीं || २५||
आपणास आहे मरण| म्हणौन राखावें बरेंपण | कठिण आहे लक्षण| विवेकाचें || २६||
थोर लाहान समान| आपले पारिखे सकळ जन | चढतें वाढतें सनेधान| करितां बरें || २७||
बरें करितां बरें होतें| हें तों प्रत्ययास येतें | आतां पुढें सांगावें तें| कोणास काये || २८||
हरिकथानिरूपण| बरेपणें राजकारण | प्रसंग पाहिल्याविण| सकळ खोटें || २९||
विद्या उदंडचि सिकला| प्रसंगमान चुकतचि गेला | तरी मग तये विद्येला| कोण पुसे || ३०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे प्रत्ययनिरूपणनाम समास दुसरा ||
समास तिसरा. : . . भक्तनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
पृथ्वीमधें बहुत लोक| तेंहि पाहावा विवेक | इहलोक आणि परलोक| बरा पाहावा || १||
इहलोक साधायाकारणें| जाणत्याची संगती धरणें | परलोक साधायाकारणें| सद्गुरु पाहिजे || २||
सद्गुरुसी पाय पुसावें| हेंहि कळेना स्वभावें | अनन्यभावें येकभावें| दोनी गोष्टी पुसाव्या || ३||
दोनी गोष्टी त्या कोण| देव कोण आपण कोण | या गोष्टींचे विवरण| केलेंचि करावें || ४||
आधीं मुख्य देव तो कोण| मग आपण भक्त तो कोण | पंचीकर्ण माहावाक्यविवरण| केलेंचि करावें || ५||
सकळ केलियाचें फळ| शाश्वत वोळखावें निश्चळ | आपण कोण का केवळ| शोध घ्यावा || ६||
सारासार विचार घेतां| पदास नाहीं शाश्वतता | आधी कारण भगवंता| वोळखिलें पाहिजे || ७||
निश्चळ चंचळ आणि जड| अवघा मायेचा पवाड | यामधें वस्तु जाड| जाणार नाहीं || ८||
तें परब्रह्म धुंडावें| विवेकें त्रैलोक्य हिंडावें | माईक विचार खंडावें| परीक्षवंतीं || ९||
खोटें सांडून खरें घ्यावें| परीक्षवंतीं परीक्षावें | मायेचें अवघेचि जाणावें| रूप माईक || १०||
पंचभूतिक हे माया| माईक जाये विलया | पिंडब्रह्मांड अष्टकाया| नसिवंत || ११||
दिसेल तितुकें नासेल| उपजेल तितुकें मरेल | रचेल तितुकें खचेल| रूप मायेचें || १२||
वाढेल तितुकें मोडेल| येईल तितुलें जाईल | भूतांस भूत खाईल| कल्पांतकाळीं || १३||
देहधारक तितुके नासती| हे तों रोकडी प्रचिती | मनुष्येंविण उत्पत्ति| रेत कैंचें || १४||
अन्न नस्तां रेत कैंचें| वोषधी नस्तां अन्न कैंचें | वोषधीस जिणें कैंचें| पृथ्वी नस्तां || १५||
आप नस्तां पृथ्वी नाहीं| तेज नस्तां आप नाहीं | वायो नस्तां तेज नाहीं| ऐसें जाणावें || १६||
अंतरात्मा नस्तां वायो कैंचा| विकार नस्तां अंतरात्मा कैंचा | निर्विकारीं विकार कैंचा| बरें पाहा || १७||
पृथ्वी नाहीं आप नाहीं| तेज नाहीं वायो नाहीं | अंतरात्मा विकार नाहीं| निर्विकारीं || १८||
निर्विकार जें निर्गुण| तेचि शाश्वताची खूण | अष्टधा प्रकृति संपूर्ण| नासिवंत || १९||
नासिवंत समजोन पाहिलें| तों तें अस्तांचि नस्तें जालें | सारासारें कळों आलें| समाधान || २०||
विवेकें पाहिला विचार| मनास आलें सारासार | येणेंकरितां विचार| सदृढ जाला || २१||
शाश्वत देव तो निर्गुण| ऐसीं अंतरीं बाणली खूण | देव कळला मी कोण| कळलें पाहिजे || २२||
मी कोण पाहिजे कळलें| देहतत्व तितुकें शोधिलें | मनोवृत्तीचा ठाईं आलें| मीतूंपण || २३||
सकळ देहाचा शोध घेतां| मीपण दिसेना पाहातां | मीतूंपण हें तत्वता| तत्वीं मावळलें || २४||
दृश्य पदार्थचि वोसरे| तत्वें तत्व तेव्हां सरे | मीतूंपण हें कैंचें उरे| तत्वता वस्तु || २५||
पंचीकर्ण तत्वविवर्ण| माहावाक्यें वस्तु आपण | निसंगपणें निवेदन| केले पाहिजे || २६||
देवाभक्तांचे मूळ| शोधून पाहातां सकळ | उपाधिवेगला केवळ| निरोपाधी आत्मा || २७||
मीपण तें बुडालें| विवेकें वेगळेपण गेलें | निवृत्तिपदास प्राप्त जालें| उन्मनीपद || २८||
विज्ञानीं राहिलें ज्ञान| ध्येये राहिलें ध्यान | सकळ कांहीं कार्याकारण| पाहोन सांडिलें || २९||
जन्ममरणाचें चुकलें| पाप अवघेंचि बुडालें | येमयातनेचें जालें| निसंतान || ३०||
निर्बंद अवघाचि तुटला| विचारें मोक्ष प्राप्त जाला | जन्म सार्थकचि वाटला| सकळ कांहीं || ३१||
नाना किंत निवारले| धोके अवघेचि तुटले | ज्ञानविवेकें पावन जालें| बहुत लोक || ३२||
पतितपावनाचे दास| तेहि पावन करिती जगास | ऐसी हे प्रचित मनास| बहुतांच्या आली || ३३||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे भक्तनिरूपणनाम समास तिसरा ||
समास चौथा. : . . विवेकवैराग्यनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
महद्भाग्य हातासी आलें| परी भोगूं नाहीं जाणितलें | तैसें वैराग्य उत्पन्न जालें| परी विवेक नाहीं || १||
आदळतें आफळतें| कष्टी होतें दुःखी होतें | ऐकतें देखते येतें| वैराग्य तेणें || २||
नाना प्रपंचाच्या वोढी || नाना संकटें सांकडीं | संसार सांडुनी देशधडी| होये तेणें || ३||
तो चिंतेपासून सुटला| पराधेनतेपासुनि पळाला | दुःखत्यागें मोकळा जाला| रोगी जैसा || ४||
परी तो होऊं नये मोकाट| नष्ट भ्रष्ट आणि चाट | सीमाच नाहीं सैराट| गुरूं जैंसें || ५||
विवेकेंविण वैराग्ये केलें| तरी अविवेकें अनर्थीं घातलें | अवघें वेर्थचि गेलें| दोहिंकडे || ६||
ना प्रपंच ना परमार्थ| अवघें जिणेंचि जालें वेर्थ | अविवेकें अनर्थ| ऐसा केला || ७||
कां वेर्थचि ज्ञान बडबडिला| परी वैराग्ययोग नाहीं घडला | जैसा कारागृहीं अडकला| पुरुषार्थ सांगे || ८||
वैराग्येंविण ज्ञान| तो वेर्थचि साभिमान | लोभदंभें घोळसून| कासाविस केला || ९||
स्वान बांधलें तरी भुंके| तैसा स्वार्थमुळें थिंकें पराधीक देखों न सके| साभिमानें || १०||
हें येकेंविण येक| तेणें उगाच वाढे शोक | आतां वैराग्य आणि विवेक| योग ऐका || ११||
विवेकें अंतरीं सुटला| वैराग्यें प्रपंच तुटला | अंतर्बाह्य मोकळा जाला| निःसंग योगी || १२||
जैसें मुखें ज्ञान बोले| तैसीच सवें क्रिया चाले | दीक्षा देखोनी चक्कित जाले| सुचिस्मंत || १३||
आस्था नाहीं त्रिलोक्याची| स्थिती बाणली वैराग्याची | येत्नविवेकधारणेची| सीमा नाहीं || १४||
संगीत रसाळ हरिकीर्तन| तालबद्ध तानमान | प्रेमळ आवडीचें भजन| अंतरापासुनी || १५||
तत्काळचि सन्मार्ग लागे| ऐसा अंतरीं विवेक जागे | वगत्रृत्व करितां न भंगे| साहित्य प्रत्ययाचें || १६||
सन्मार्गें जगास मिळाला| म्हणिजे जगदीश वोळला | प्रसंग पाहिजे कळला| कोणीयेक || १७||
प्रखर वैराग्य उदासीन| प्रत्ययाचें ब्रह्मज्ञान | स्नानसंध्या भगवद्भजन| पुण्यमार्ग || १८||
विवेकवैराग्य तें ऐसें| नुस्तें वैराग्य हेंकाडपिसें | शब्दज्ञान येळिलसें| आपणचि वाटे || १९||
म्हणौन विवेक आणि वैराग्य| तेंचि जाणिजे महद्भाग्य | रामदास म्हणे योग्य| साधु जाणती || २०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे विवेकवैराग्यनिरूपणनाम समास चौथा ||
समास पांचवा. : . . आत्मनिवेदन . . . .
|| श्रीराम ||
रेखेचें गुंडाळें केलें| मात्रुकाक्षरीं शब्द जाले | शब्द मेळऊन चाले| श्लोक गद्य प्रबंद || १||
वेदशास्त्रें पुराणें| नाना काव्यें निरूपणें | ग्रंथभेद अनुवादणें| किती म्हणोनि || २||
नाना ऋषी नाना मतें| पाहों जातां असंख्यातें | भाषा लिपी जेथ तेथें| काये उणें || ३||
वर्ग ऋचा श्रुति स्मृति| अधे स्वर्ग स्तबक जाती | प्रसंग मानें समास पोथी| बहुधा नामें || ४||
नाना पदें नाना श्लोक| नाना बीर नाना कडक | नाना साख्या दोहडे अनेक| नामाभिधानें || ५||
डफगाणें माचिगाणें| दंडिगाणें कथागाणें | नाना मानें नाना जसनें| नाना खेळ || ६||
ध्वनि घोष नाद रेखा| चहुं वाचामध्यें देखा | वाचारूपेंहि ऐका| नाना भेद || ७||
उन्मेष परा ध्वनि पश्यंति| नाद मध्यमा शब्द चौथी | वैखरीपासून उमटती| नाना शब्दरत्नें || ८||
अकार उकार मकार| अर्धमात्राचें अंतर | औटमात्रा तदनंतर| बावन मात्रुका || ९||
नाना भेद रागज्ञान| नृत्यभेद तानमान | अर्थभेद तत्वज्ञान| विवंचना || १०||
तत्वांमध्यें मुख्य तत्व| तें जाणावें शुद्धसत्व | अर्धमात्रा महत्तत्व| मूळमाया || ११||
नाना तत्वें लाहानथोरे| मिळोन अष्टहि शरीरें | अष्टधा प्रकृतीचें वारें| निघोन जातें || १२||
वारें नस्तां जें गगन| तैसें परब्रह्म सघन | अष्ट देहाचें निर्शन| करून पाहावें || १३||
ब्रह्मांडपिंडउभार| पिंडब्रह्मांडसंव्हार | दोहिवेगळें सारासार| विमळब्रह्म || १४||
पदार्थ जड आत्मा चंचळ| विमळब्रह्म तें निश्चळ | विवरोन विरे तत्काळ| तद्रूप होये || १५||
पदार्थ मनें काया वाचा| मी हा अवघाचि देवाचा | जड आत्मनिवेदनाचा| विचार ऐसा || १६||
चंचळकर्ता तो जगदीश| प्राणीमात्र तो त्याचा अंश | त्याचा तोचि आपणास| ठाव नाहीं || १७||
चंचळ आत्मनिवेदन| याचें सांगितलें लक्षण | कर्ता देव तो आपण| कोठेंचि नाहीं || ८||
चंचळ चळे स्वप्नाकार| निश्चळ देव तो निराकार | आत्मनिवेदनाचा प्रकार| जाणिजे ऐसा || १९||
ठावचि नाईं चंचळाचा| तेथें आधीं आपण कैंचा | निश्चळ आत्मनिवेदनाचा| विवेक ऐसा || २०||
तिहिं प्रकारें आपण| नाहीं नाहीं दुजेपण | आपण नस्तां मीपण| नाहींच कोठें || २१||
पाहातां पाहातां अनुमानलें| कळतां कळतां कळों आलें | पाहातां अवघेंचि निवांत जालें| बोलणें आतां || २२||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे आत्मनिवेदननाम समास पांचवा ||
समास सहावा. : . . सृष्टिक्रमनिरूपण . . . .
|| श्रीराम ||
ब्रह्म निर्मळ निश्चळ| शाश्वत सार अमळ विमळ | अवकाश घन पोकळ| गगनाऐसें || १||
तयास करणें ना धरणें| तयास जन्म ना मरणें | तेथें जाणणें ना नेणणें| सुन्यातीत || २||
तें रचेना ना खचेना| तें होयेना ना जायेना | मायातीत निरंजना पारचि नाहीं || ३||
पुढें संकल्प उठिला| षडगुणेश्वर बोलिजे त्याला | अर्धरारीनटेश्वराला| बोलिजेतें || ४||
सर्वेश्वर सर्वज्ञ| साक्षी द्रष्टा ज्ञानघन | परेश परमात्मा जगजीवन| मूळपुरुष || ५||
ते मूळमाया बहुगुणी| अ