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Dasbodh dashak - 13 by स्वामी रामदास समर्थ

[Oct 31, 2007]

.. समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक १३ ..
 दशक तेरावा. : .
 नामरूप समास पहिला. : .
आत्मानात्मविवेक . . . .
 || श्रीराम ||
आत्मानात्मविवेक करावा| करून बरा विवरावा | ववरोन सदृढ धरावा| जीवामधें || १||
आत्मा कोण अनात्मा कोण| त्याचें करावें विवरण | तेंचि आतां निरूपण| सावध ऐका || २||
च्यारि खाणी च्यारि वाणी| चौऱ्यासि लक्ष जीवप्राणी | संख्या बोलिली पुराणीं| वर्तती आतां || ३||
नाना प्रकारीचीं शरीरें| सृष्टींत दिसती अपारें | तयामधें निर्धारें| आत्मा कवणु || ४||
दृष्टीमधें पाहातो| श्रवणामध्यें ऐकतो | रसनेमध्यें स्वाद घेतो| प्रत्यक्ष आतां || ५||
घ्राणामधें वास घेतो| सर्वांगी तो स्पर्शतो | वाचेमधें बोलवितो| जाणोनि शब्द || ६||
सावधान आणि चंचळ| चहुंकडे चळवळ | येकलाचि चालवी सकळ| इंद्रियेंद्वारा || ७||
पाये चालवी हात हालवी| भृकुटी पालवी डोळा घालवी | संकेतखुणा बोलवी| तोचि आत्मा || ८||
धिटाई लाजवी खाजवी| खोंकवी वोकवी थुंकवी | अन्न जेऊन उदक सेवी| तोचि आत्मा || ९||
 मळमूत्रत्याग करी| शरीरमात्र सावरी | प्रवृत्ति निवृत्ति विवरी| तोचि आत्मा || १०||
ऐके देखे हुंगे चाखे| नाना प्रकारें वोळखे | संतोष पावे आणी धाके| तोचि आत्मा || ११||
आनंद विनोद उदेग चिंता| काया छ्याया माया ममता | जीवित्वें पावे नाना वेथा| तोचि आत्मा || १२||
 पदार्थाची आस्था धरी| जनीं वाईट बरें करी | आपल्यां राखे पराव्यां मारी| तोचि आत्मा || १३||
 युध्ये होतां दोहीकडे| नाना शरीरीं वावडे | परस्परें पाडी पडे| तोचि आत्मा || १४||
 तो येतो जातो देहीं वर्ततो| हासतो रडतो प्रस्तावतो | समर्थ करंटा होतो| व्यापासारिखा || १५||
होतो लंडी होतो बळकट| होतो विद्यावंत होतो धट | न्यायेवंत होतो उत्धट| तोचि आत्मा || १६||
धीर उदार आणि कृपेण| वेडा आणि विचक्षण | उछक आणि सहिष्ण| तोचि आत्मा || १७||
विद्या कुविद्या दोहिकडे| आनंदरूप वावडे | जेथें तेथें सर्वांकडे| तोचि आत्मा || १८||
 निजे उठे बैसे चाले| धावे धावडी डोले तोले | सोइरे धायेरे केले| तोचि आत्मा || १९||
पोथी वाची अर्थ सांगे| ताळ धरी गाऊं लागे | वाद वेवाद वाउगे| तोचि आत्मा || २०||
आत्मा नस्तां देहांतरीं| मग तें प्रेत सचराचरीं | देहसंगें आत्मा करीं| सर्व कांहीं || २१||
 येकेंविण येक काये| कामा नये वायां जाये | म्हणोनि हा उपाये| देहयोगें || २२||
 देह अनित्य आत्मा नित्य| हाचि विवेक नित्यानित्य | अवघें सूक्ष्माचें कृत्य| जाणती ज्ञानी || २३||
पिंडी देहधर्ता जीव| ब्रह्मांडीं देहधर्ता शिव | ईश्वरतनुचतुष्टये सर्व| ईश्वर धर्ता || २४||
 त्रिगुणापर्ता जो ईश्वर| अर्धनारीनटेश्वर | सकळ सृष्टीचा विस्तार| तेथून जाला || २५||
बरवें विचारून पाहीं| स्त्री पुरुष तेथें नाहीं | चंचळरूप येतें कांहीं| प्रत्ययासी || २६||
 मुळींहून सेंवटवरी| ब्रह्मादि पिप्लीका देहधारी | नित्यानित्य विवेक चतुरीं| जाणिजे ऐसा || २७||
जड तितुकें अनित्य| आणि सूक्ष्म तितुकें नित्य | याहिमध्यें नित्यानित्य| पुढें निरोपिलें || २८||
स्थूळ सूक्ष्म वोलांडिलें| कारण माहाकाराण सांडिलें | विराट हिरण्यगर्भ खंडिलें| विवेकानें || २९||
अव्याकृत मूळप्रकृती| तेथें जाऊन बैसली वृत्ती | तें वृत्ति व्हावया निवृत्ति| निरूपण ऐका || ३०||
आत्मानात्माविवेक बोलिला| चंचळात्मा प्रत्यया आला | पुढिले समासीं निरोपिला| सारासार विचार || ३१||
 इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे आत्मानात्माविवेकनाम समास पहिला ||

समास दुसरा. : . . सारासारनिरूपण
 || श्रीरामसमर्थ ||
 ऐका सारासार विचार| उभारलें जगडंबर | त्यांत कोण सार कोण असार| विवेकें वोळखावा || १||
दिसेल तें नासेल| आणि येईल तें जाईल | जें असतचि असेल| तेंचि सार || २||
मागां आत्मानात्माविवेक बोलिला| अनात्मा वोळखोन सांडिला | आत्मा जाणतां लागला| मुळींचा मूळतंतु || ३||
मुळीं जे राहिली वृत्ति| जाली पाहिले निवृत्ति | सारासार विचार श्रोतीं| बरा पाहावा || ४||
 नित्यानित्य विवेक केला| आत्मा नित्यसा निवडिला | निवृतीरूपें हेत उरला| निराकारीं || ५||
हेत म्हणिजे तो चंचळ| निर्गुण म्हणिजे निश्चळ | सारासारविचारें चंचळ| होऊन जातें || ६||
चळे म्हणोनि तें चंचळ| न चळे म्हणोनि निश्चळ | निश्चळीं उडे चंचळ| निश्चयेसीं || ७||
ज्ञान आणि उपासना| दोनी येकचि पाहाना | उपासनेकरितां जना| जगोद्धार || ८||
द्रष्टा साक्षी जाणता| ज्ञानधन चैतन्यसत्ता | ज्ञान देवचि तत्वता| बरें पाहा || ९||
 त्या ज्ञानाचें विज्ञान होतें| शोधून पाहा बहुत मतें | चंचळ अवघें नासतें| येणें प्रकारें || १०||
 नासिवंत नासेल किं नासेना| ऐसा अनुमानचि आहे मना | तरी तो पुरुष सहसा ज्ञाना| अधिकार नव्हे || ११||
 नित्य निश्चये केला| संदेह उरतचि गेला | तरी तो जाणावा वाहावला| माहा मृगजळीं || १२||
क्षयेचि नाहीं जो अक्षई| व्यापकपणें सर्वां ठाईं | तेथे हेत संदेह नाहीं| निर्विकारीं || १३||
 जें उदंड घनदाट| आद्य मध्य सेवट | अचळ अढळ अतुट| जैसें तैसें || १४||
पाहातां जैसें गगन| गगनाहून तें सघन | जनचि नाहीं निरंजन| सदोदित || १५||
 चर्मचक्षु ज्ञानचक्षु| हा तों अवघाच पूर्वपक्षु | निर्गुण ठाईंचा अलक्षु| लक्षवेना || १६||
संगत्यागेंविण कांहीं| परब्रह्म होणार नाहीं | संगत्याग करून पाहीं| मौन्यगर्भा || १७||
निर्शतां अवघेंचि निर्शलें| चंचळ तितुकें निघोन गेलें | निश्चळ परब्रह्म उरलें| तेंचि सार || १८||
 आठवा देह मूळ माया| निर्शोन गेल्या अष्टकाया | साधु सांगती उपाया| कृपाळुपणें || १९||
सोहं हंसा तत्वमसी| तें ब्रह्म तूं आहेसी | विचार पाहातां स्थिति ऐसी| सहजचि होते || २०||
साधक असोन ब्रह्म उरलें| तेथें वृत्तिसुन्य जालें | सारासार विचारिलें| येणें प्रकारें || २१||
तें तापेना ना निवेना| उजळेना ना काळवंडेना | डहुळेना ना निवळेना| परब्रह्म तें || २२||
दिसेना ना भासेना| उपजेना ना नासेना | तें येना ना जाईना| परब्रह्म तें || २३||
तें भिजेना ना वाळेना| तें विझेना ना जळेना | जयास कोणीच नेईना| परब्रह्म तें || २४||
जें सन्मुखचि चहुंकडे| जेथें दृश्य भास उडे | धन्य साधु तो पवाडे. निर्विकारीं || २५||
 निर्विकल्पीं कल्पनातीत| तोचि वोळखावा संत | येर अवघेचि असंत| भ्रमरूप || २६||
 खोटें सांडून खरें घ्यावें| तरीच परीक्षवंत म्हणावें असार सांडून सार घ्यावें| परब्रह्म तें || २७||
जाणतां जाणतां जाणीव जाते| आपली वृत्ति तद्रूप होते | आत्मनिवेदन भक्ति ते| ऐसी आहे || २८||
वाच्यांशें भक्ति मुक्ति बोलावी| लक्ष्यांशें तद्रूपता विवरावी | विवरतां हेतु नुरावी| ते तद्रूपता || २९||
सद्रूप चिद्रूप आणि तद्रूप| सस्वरूप म्हणिजे आपलें रूप | आपलें रूप म्हणिजे अरूप| तत्वनिर्शनाउपरी || ३०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे सारासारनिरूपणनाम समास दुसरा ||

समास तिसरा. : . . उभारणीनिरूपण
 || श्रीरामसमर्थ ||
ब्रह्म घन आणि पोकळ| आकाशाहून विशाळ | निर्मळ आणि निश्चळ| निर्विकारी || १||
ऐसेंचि असतां कित्येक काळ| तेथें आरंभला भूगोळ | तया भूगोळांचे मूळ| सावध ऐका || २||
परब्रह्म असतां निश्चळ| तेथें संकल्प उठिला चंचळ | तयास बोलिजे केवळ| आदिनारायेण || ३||
मूळमाया जगदेश्वर| त्यासीच म्हणिजे शड्गुणैश्वर | अष्टधा प्रकृतीचा विचार| तेथें पाहा || ४||
ऐलिकडे गुणक्षोभिणी| तेथें जन्म घेतला त्रिगुणीं | मूळ वोंकाराची मांडणी| तेथून जाणावी || ५||
अकर उकार मकार| तिनी मिळोन वोंकार | पुढें पंचभूतांचा विस्तार| विस्तारला || ६||
आकाश म्हणिजेतें अंतरात्म्यासी| तयापासून जन्म वायोसी | वायोपासून तेजासी| जन्म जाला || ७||
वायोचा कातरा घसवटे| तेणें उष्णें वन्हि पेटे | सूर्यबिंब तें प्रगटे| तये ठाईं || ८||
वारा वाजतो सीतळ| तेथें निर्माण जालें जळ | तें जळ आळोन भूगोळ| निर्माण जाला || ९||
 त्याअ भूगोळाचे पोटीं| अनंत बीजांचिया कोटी | पृथ्वी पाण्या होता भेटी| अंकुर निघती || १०||
 पृथ्वी वल्ली नाना रंग| पत्रें पुष्पांचे तरंग | नाना स्वाद ते मग| फळें जाली || ११||
पत्रें पुष्पें फळें मुळें| नाना वर्ण नाना रसाळें | नाना धान्यें अन्नें केवळें| तेथून जालीं || १२||
अन्नापासून जालें रेत| रेतापासून प्राणी निपजत | ऐसी हे रोकडी प्रचित| उत्पत्तीची || १३||
अंडज जारज श्वेतज उद्वीज| पृथ्वी पाणी सकळांचे बीज | ऐसें हें नवल चोज| सृष्टिरचनेचें || १४||
 च्यारि खाणी च्यारि वाणी| चौऱ्यासि लक्ष जीवयोनी | निर्माण झाले लोक तिनी| पिंडब्रह्मांड || १५||
मुळीं अष्टधा प्रकृती| अवघे पाण्यापासून जन्मती | पाणी नस्तां मरती| सकळ प्राणी || १६||
 नव्हे अनुमानाचें बोलणें| याचा बरा प्रत्ययें घेणें | वेदशास्त्रें पुराणें| प्रत्ययें घ्यावीं || १७||
जें आपल्या प्रत्यया येना| तें अनुमानिक घ्यावेना | प्रत्ययाविण सकळ जना| वेवसाये नाहीं || १८||
वेवसाये प्रवृत्ती निवृत्ती| दोहिंकडे पाहिजे प्रचिती | प्रचितीविण अनुमानें असती| ते विवेकहीन || १९||
ऐसा सृष्टिरचनेचा विचार| संकळित बोलिला प्रकार | आतां विस्ताराचा संहार| तोहि ऐका || २०||
मुळापासून सेवटवरी| अवघा आत्मारामचि करी | करी आणि विवरी| येथायोग्य || २१||
पुढेंसंव्हार निरोपिला| श्रोतीं पाहिजे ऐकिला | इतुक्याउपरी जाला| समास पूर्ण || २२||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे उभारणिनिरूपणनाम समास तिसरा ||

समास चौथा. : . . प्रलयनिरूपण
 || श्रीरामसमर्थ ||
पृथ्वीस होईल अंत| भूतांस मांडेल कल्पांत | ऐसा समाचार साध्यंत| शास्त्रीं निरोपिला || १||
शत वरुषें अनावृष्टि| तेणें जळेल हे सृष्टि | पर्वत माती ऐसी पृष्ठी| भूमीची तरके || २||
बारा कळीं सूर्यमंडळा| किर्णापासून निघती ज्वाळा | शत वरुषें भूगोळा| दहन होये || ३||
 सिंधुरवर्ण वसुंधरा| ज्वाळा लागती फणिवरा | तो आहाळोन सरारां| विष वमी || ४||
 त्या विषाच्या ज्वाळा निघती| तेणें पाताळें जळती | माहापावकें भस्म होती| पाताळ लोक || ५||
तेथें माहाभूतें खवळती| प्रळयेवात सुटती | प्रळयेपावक वाढती| चहूंकडे || ६||
 तेथें अक्रा रुद्र खवळले| बारा सूर्य कडकडिले | पावकमात्र येकवटले| प्रळयेकाळीं || ७||
वायो विजांचे तडाखे| तेणें पृथ्वी अवघी तरखे | कठिणत्व अवघेंचि फांके| चहुंकडे || ८||
 तेथें मेरूची कोण गणना| कोण सांभाळिल कोणा | चंद्र सूर्य तारांगणा. मूस जाली || ९||
पृथ्वीनें विरी सांडिली| अवघी धगधगायेमान जाली | ब्रह्मांडभटी जळोन गेली| येकसरां || १०||
 जळोनि विरी सांडिली| विशेष माहावृष्टी जाली || तेणें पृथ्वी विराली| जळामधें || ११||
भाजला चुना जळीं विरे| तैसा पृथ्वीस धीर न धरे | विरी सांडुनिया त्वरें| जळीं मिळाली || १२||
 शेष कूर्म वाऱ्हाव गेला| पृथ्वीचा आधार तुटला | सत्व सांडून जळाला| मिळोन गेली || १३||
तेथें प्रळयेमेघ उचलले| कठिण घोषें गर्जिनले | अखंड विजा कडकडिले| ध्वनि घोष || १४||
पर्वतप्राये पडती गारा| पर्वत उडती ऐसा वारा | निबिड तया अंधकारा| उपमाचि नाहीं || १५||
सिंधु नद्या एकवटल्या| नेणो नभींहून रिचवल्या | संधिच नाहीं धारा मिळाल्या| अखंड पाणी || १६||
तेथें मछ मूर्म सर्प पडती| पर्वतासारिखे दिसती | गर्जना होतां मिसळती. जळांत जळें || १७||
 सप्त सिंधु आवर्णीं गेले| आवर्णवेडे मोकळे जाले | जळरूप जालियां खवळले| प्रळयेपावक || १८||
ब्रह्मांडाऐसा तप्त लोहो| शोषी जळाचा समूहो | तैसे जळास जालें पाहो| अपूर्व मोठें || १९||
 तेणें आटोन गेलें पाणी| असंभाव्य माजला वन्ही | तया वन्हीस केली झडपणी| प्रळयवातें || २०||
दीपास पालव घातला| तैसा प्रळयेपावक विझाला | पुढें वायो प्रबळला| असंभाव्य || २१||
उदंड पोकळी थोडा वारा| तेणें वितळोन गेला सारा | पंचभूतांचा पसारा| आटोपला || २२||
 महद्भूत मूळमाया| विस्मरणें वितुळे काया | पदार्थमात्र राहावया| ठाव नाहीं || २३||
दृश्य हलकालोळें नेलें| जड चंचळ वितुळलें | याउपरी शाश्वत उरलें| परब्रह्म तें || २४||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे प्रळयेनाम समास चौथा ||

समास पांचवा. : . . कहाणीनिरूपण
 || श्रीरामसमर्थ ||
कोणी येक दोघे जण| पृथ्वी फिरती उदासीन | काळक्रमणें लागून| कथा आरंभिली || १||
श्रोता पुसे वक्तयासी| काहाणी सांगा जी बरवीसी | वक्ता म्हणे श्रोतयासी| सावध ऐकें || २||
येकें स्त्रीपुरुषें होतीं| उभयेतांमधें बहु प्रीति | येकरूपेंचि वर्तती| भिन्न नाहीं || ३||
ऐसा कांहीं येक काळ लोटला| तयांस येक पुत्र जाला | कार्यकर्ता आणि भला| सर्वविषीं || ४||
पुढें त्यासहि जाला कुमर| तो पित्याहून आतुर | कांहीं तदर्ध चतुर| व्यापकपणें || ५||
तेणें व्याप उदंड केला| बहुत कन्यापुत्र व्याला | उदंड लोक संचिला| नाना प्रकारें || ६||
त्याचा पुत्र जेष्ठ| तो अज्ञान आणि रागिट | अथवा चुकता नीट| संव्हार करी || ७||
पिता उगाच बैसला| लेकें बहुत व्याप केला | सर्वज्ञ जाणता भला| जेष्ठ पुत्र || ८||
नातु त्याचें अर्ध जाणें| पणतु तो कांहींच नेणे | चुकतां संव्हारणें| माहा क्रोधी || ९||
लेक सकळांचे पाळण करी| नातु मेळवी वरिचावरी | पणतु चुकल्यां संव्हार करी| अकस्मात || १०||
नेमस्तपणें वंश वाढला| विस्तार उदंडचि जाला | ऐसा बहुत काळ गेला| आनंदरूप || ११||
विस्तार वाढला गणवेना| वडिलांस कोणीच मानिना | परस्परें किंत मना| बहुत पडिला || १२||
उदंड घरकळ्हो लागला| तेणें कित्येक संव्हार जाला | विपट पडिलें थोर थोरांला| बेबंद जालें || १३||
 नेणपणें भरी भरले| मग ते अवघेच संव्हारले | जैसे यादव निमाले| उन्मत्तपणें || १४||
 बाप लेक नातु पणतु| सकळांचा जाला निपातु | कन्या पुत्र हेतु मातु| अणुमात्र नाहीं || १५||
ऐसी काहाणी जो विवरला| तो जन्मापासून सुटला | श्रोता वक्ता धन्य जाला| प्रचितीनें || १६||
ऐसी काहाणी अपूर्व जे ते| उदंड वेळ होत जाते | इतकें बोलोन गोसावी ते| निवांत जाले || १७||
आमची काहाणी सरो| तुमचे अंतरीं भरो | ऐसें बोलणें विवरो| कोणीतरी || १८||
चुकत वांकत आठवलें| एतुकें संकळित बोलिलें | न्यूनपूर्ण क्ष्मा केलें| पाहिजे श्रोतीं || १९||
ऐसी काहाणी निरंतर| विवेकें ऐकती जे नर | दास म्हणे जग्गोधार| तेचि आरिती || २०||
त्या जगोद्धाराचें लक्षण| केले पाहिजे विवरण | सार निवडावें निरूपण| यास बोलिजे || २१||
निरूपणीं प्रत्ययें विवरावें| नाना तत्वकोडें उकलावें | समजतां समजतां व्हावें| निःसंदेह || २२||
विवरोन पाहातां अष्ट देह| पुढें सहजचि निःसंदेह | अखंड निरूपणें राहे| समाधान || २३||
तत्वांचा गल्बला जेथें| निवांत कैचें असेल तेथें | याकारणें गुल्लिपरतें| कोणीयेकें असावें || २४||
ऐसा सूक्

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Heh Heh Heh...
A boy was taking care of his baby sister while his parents went shopping. He decided to go fishing so he took her with him.
"I'll never do that again!" he told his mother that evening. "I didn't catch a thing!"
"Oh, next time I'm sure she'll be quiet and not scare the fish away," his mother said.
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