| |
Dnyaneshvari adhyay - 18
by ज्ञानेश्वरमहाराज
[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १८ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय अठरावा || मोक्षसंन्यासयोगः | जयजय देव निर्मळ| निजजनाखिलमंगळ| जन्मजराजलदजाळ| प्रभंजन || १|| जयजय देव प्रबळ| विदळितामंगळकुळ| निगमागमद्रुमफळ| फलप्रद || २|| जयजय देव सकल| विगतविषयवत्सल| कलितकाळकौतूहल| कलातीत || ३|| जयजय देव निश्चळ| चलितचित्तपानतुंदिल| जगदुन्मीलनाविरल| केलिप्रिय || ४|| जयजय देव निष्कळ| स्फुरदमंदानंदबहळ| नित्यनिरस्ताखिलमळ| मूळभूत || ५|| जयजय देव स्वप्रभ| जगदंबुदगर्भनभ| भुवनोद्भवारंभस्तंभ| भवध्वंस || ६|| जयजय देव विशुद्ध| विदुदयोद्यानद्विरद| शमदम- मदनमदभेद| दयार्णव || ७|| जयजय देवैकरूप| अतिकृतकंदर्पसर्पदर्प| भक्तभावभुवनदीप| तापापह || ८|| जयजय देव अद्वितीय| परीणतोपरमैकप्रिय| निजजनजित भजनीय| मायागम्य || ९|| जयजय देव श्रीगुरो| अकल्पनाख्यकल्पतरो| स्वसंविद्रुमबीजप्ररो| हणावनी || १०|| हे काय एकैक ऐसैसें| नानापरीभाषावशें| स्तोत्र करूं तुजोद्देशें| निर्विशेषा || ११|| जिहीं विशेषणीं विशेषिजे| तें दृश्य नव्हे रूप तुझें| हें जाणें मी म्हणौनि लाजें| वानणा इहीं || १२|| परी मर्यादेचा सागरु| हा तंवचि तया डगरु| जंव न देखे सुधाकरु| उदया आला || १३|| सोमकांतु निजनिर्झरींं| चंद्रा अर्घ्यादिक न करी| तें तोचि अवधारीं| करवी कीं जी || १४|| नेणों कैसी वसंतसंगें| अवचितिया वृक्षाचीं अंगें| फुटती तैं हे तयांहि जोगें| धरणें नोहे ? || १५|| पद्मिनी रविकिरण| लाहे मग लाजें कवण ? | . कां जळें शिवतलें लवण| आंग भुले || १६|| तैसा तूतें जेथ मी स्मरें| तेथ मीपण मी विसरें| मग जाकळिला ढेंकरें| तृप्तु जैसा || १७|| मज तुवां जी केलें तैसें| माझें मीपण दवडूनि देशें| स्तुतिमिषेंच पां पिसें| बांधलें वाचे || १८|| येऱ्हवीं तरी आठवीं| राहोनि स्तुति जैं करावी| तैं गुणागुणिया धरावी| सरोभरी कीं || १९|| तूं जी एकरसाचें लिंग| केवीं करूं गुणागुणीं विभाग| मोतीं फोडोनि सांधितां चांग| कीं तैसेंचि भलें || २०|| आणि बाप तूं माय| इहीं बोलीं ना स्तुति होय| डिंभोपाधिक आहे| विटाळु तेथें || २१|| जी जालेनि पाइकें आलें| तें गोसावीपण केवीं बोलें ? | ऐसें उपाधी उशिटलें| काय वर्णूं || २२|| जरी आत्मा तूं एकसरा| हेंही म्हणतां दातारा| तरी आंतुल तूं बाहेरा| घापतासी || २३|| म्हणौनि सत्यचि तुजलागीं| स्तुति न देखों जी जगीं| मौनावांचूनि लेणें आंगीं| सुसीना मा || २४|| स्तुति कांहीं न बोलणें| पूजा कांहीं न करणें| सन्निधी कांहीं न होणें| तुझ्या ठायीं || २५|| तरी जिंतलें जैसें भुली| पिसें आलापु घाली| तैसें वानूं तें माऊली| उपसाहावें तुवां || २६|| आतां गीतार्थाची मुक्तमुदी| लावीं माझिये वाग्वृद्धी| जे माने हे सभासदीं . सज्जनांच्या || २७|| तेथ म्हणितलें श्रीनिवृत्ती| नको हें पुढतपुढती| परीसीं लोहा घृष्टी किती| वेळवेळां कीजे गा || २८|| तंव विनवी ज्ञानदेवो| म्हणे हो कां जी पसावो| तरी अवधान देतु देवो| ग्रंथा आतां || २९|| जी गीतारत्नप्रासादाचा| कळसु अर्थचिंतामणीचा| सर्व गीतादर्शनाचा| पाढॐ जो || ३०|| लोकीं तरी आथी ऐसें| जे दुरूनि कळसु दिसे| आणी भेटीचि हातवसे| देवतेची तिये || ३१|| तैसेंचि एथही आहे| जे एकेचि येणें अध्यायें| आघवाचि दृष्ट होये| गीतागमु हा || ३२|| मी कळसु याचि कारणें| अठरावा अध्यायो म्हणें| उवाइला बादरायणें| गीताप्रासादा || ३३|| नोहे कळसापरतें कांहीं| प्रासादीं काम नाहीं| तें सांगतसे गीता ही| संपलेपणें || ३४|| व्यासु सहजें सूत्री बळी| तेणें निगमरत्नाचळीं| उपनिषदार्थाची माळी- | माजीं खांडिली || ३५|| तेथ त्रिवर्गाचा अणुआरु| आडऊ निघाला जो अपारु| तो महाभारतप्राकारु| भोंवता केला || ३६|| माजीं आत्मज्ञानाचें एकवट| दळवाडें झाडूनि चोखट| घडिलें पार्थवैकुंठ- | संवाद कुसरी || ३७|| निवृत्तिसूत्र सोडवणिया| सर्व शास्त्रार्थ पुरवणिया| आवो साधिला मांडणिया| मोक्षरेखेचा || ३८|| ऐसेनि करितां उभारा| पंधरा अध्यायांत पंधरा| भूमि निर्वाळलिया पुरा| प्रासादु जाहला || ३९|| उपरी सोळावा अध्यायो| तो ग्रीवघंटेचा आवो| सप्तदशु तोचि ठावो| पडघाणिये || ४०|| तयाहीवरी अष्टादशु| तो अपैसा मांडला कळसु| उपरि गीतादिकीं व्यासु| ध्वजें लागला || ४१|| म्हणौनि मागील जे अध्याये| ते चढते भूमीचे आये| तयांचें पुरें दाविताहे| आपुल्या आंगीं || ४२|| जालया कामा नाहीं चोरी| ते कळसें होय उजरी| तेवींं अष्टादशु विवरी| साद्यंत गीता || ४३|| ऐसा व्यासें विंदाणियें| गीताप्रासादु सोडवणिये| आणूनि राखिले प्राणिये| नानापरी || ४४|| एक प्रदक्षिणा जपाचिया| बाहेरोनि करिती यया| एक ते श्रवणमिषें छाया| सेविती ययाची || ४५|| एक ते अवधानाचा पुरा| विडापाऊड भीतरां| घेऊनि रिघती गाभारां| अर्थज्ञानाच्या || ४६|| ते निजबोधें उराउरी| भेटती आत्मया श्रीहरी| परी मोक्षप्रासादीं सरी| सर्वांही आथी || ४७|| समर्थाचिये पंक्तिभोजनें| तळिल्या वरील्या एकचि पक्वान्नें| तेवीं श्रवणें अर्थें पठणें| मोक्षुचि लाभे || ४८|| ऐसा गीता वैष्णवप्रासादु| अठरावा अध्याय कळसु विशदु| म्यां म्हणितला हा भेदु| जाणोनियां || ४९|| आतां सप्तदशापाठीं . अध्याय कैसेनि उठी| तो संबंधु सांगो दिठी| दिसे तैसा || ५०|| का गंगायमुना उदक| वोघबगें वेगळिक| दावी होऊनि एक| पाणीपणें || ५१|| न मोडितां दोन्ही आकार| घडिलें एक शरीर| हें अर्धनारी नटेश्वर- | रूपीं दिसें || ५२|| नाना वाढिली दिवसें| कळा बिंबीं पैसे| परी सिनानें लेवे जैसें| चंद्रीं नाहीं || ५३|| तैसीं सिनानीं चारीं पदें| श्लोक तो श्लोकावच्छेदें| अध्यावो अध्यायभेदें| गमे कीर || ५४|| परी प्रमेयाची उजरी| आनान रूप न धरी| नाना रत्नमणीं दोरी| एकचि जैसी || ५५|| मोतियें मिळोनि बहुवें| एकावळीचा पाडु आहे| परी शोभे रूप होये| एकचि तेथ || ५६|| फुलांफुलसरां लेख चढे| द्रुतीं दुजी अंगुळी न पडे| श्लोक अध्याय तेणें पाडें| जाणावे हे || ५७|| सात शतें श्लोक| अध्यायां अठरांचे लेख| परी देवो बोलिले एक| जें दुजें नाहीं || ५८|| आणि म्यांही न सांडूनि ते सोये| ग्रंथ व्यक्ति केली आहे| प्रस्तुत तेणें निर्वाहे| निरूपण आइका || ५९|| तरी सतरावा अध्यावो| पावतां पुरता ठावो| जें संपतां श्लोकीं देवो| बोलिले ऐसें || ६०|| अर्जुना ब्रह्मनामाच्याविखीं. बुद्धि सांडूनि आस्तिकीं| कर्मे कीजती तितुकीं| असंतें होतीं || ६१|| हा ऐकोनि देवाचा बोलु| अर्जुना आला डोलु| म्हणे कर्मनिष्ठां मळु| ठेविला देखों || ६२|| तो अज्ञानांधु तंव बापुडा| ईश्वरुचि न देखे एवढा| तेथ नामचि एक पुढां| कां सुझे तया || ६३|| आणि रजतमें दोन्हीं| गेलियावीण श्रद्धा सानी| ते कां लागे अभिधानीं| ब्रह्माचिये ? || ६४|| मग कोता खेंव देणें| वार्तेवरील धावणें| सांडी पडे खेळणें| नागिणीचें तें || ६५|| तैसीं कर्में दुवाडें| तयां जन्मांतराची कडे| दुर्मेळावे येवढे| कर्मामाजीं || ६६|| ना विपायें हें उजू होये| तरी ज्ञानाची योग्यता लाहे| येऱ्हवीं येणेंचि जाये| निरयालया || ६७|| कर्मीं हा ठायवरी| आहाती बहुवा अवसरी| आतां कर्मठां कैं वारी| मोक्षाची हे || ६८|| तरी फिटो कर्माचा पांगु| कीजो अवघाचि त्यागु| आदरिजो अव्यंगु| संन्यासु हा || ६९|| कर्मबाधेची कहीं| जेथ भयाची गोठी नाहीं| तें आत्मज्ञान जिहीं| स्वाधीन होय || ७०|| ज्ञानाचें आवाहनमंत्र| जें ज्ञान पिकतें सुक्षेत्र| ज्ञान आकर्षितें सूत्र| तंतु जे का || ७१|| ते दोनी संन्यास त्याग| अनुष्ठूनि सुटे जग| तरी हेंचि आतां चांग| व्यक्त पुसों || ७२|| ऐसें म्हणौनि पार्थें| त्यागसंन्यासव्यवस्थे| रूप होआवया जेथें| प्रश्नु केला || ७३|| तेथ प्रत्युत्तरें बोली| श्रीकृष्णें जे चावळिली| तया व्यक्ति जाली| अष्टादशा || ७४|| एवं जन्यजनकभावें| अध्यावो अध्यायातें प्रसवे| आतां ऐका बरवें| पुसिलें जें || ७५|| तरी पंडुकुमरें तेणें| देवाचें सरतें बोलणें| जाणोनि अंतःकरणें| काणी घेतली || ७६|| येऱ्हवीं तत्वविषयीं भला| तो निश्चितु असे कीर जाहला| परी देवो राहे उगला| तें साहावेना || ७७|| वत्स धालयाही वरी| धेनू न वचावी दुरी| अनन्य प्रीतीची परी| ऐसी आहे || ७८|| तेणें काजेवीणही बोलावें| तें देखीलें तरी पाहावें| भोगितां चाड दुणावे| पढियंतयाठायीं || ७९|| ऐसी प्रेमाची हे जाती| आणि पार्थ तंव तेचि मूर्ती| म्हणौनि करूं लाहे खंती| उगेपणाची || ८०|| आणि संवादाचेनि मिषें| जे अव्यवहारी वस्तु असे . ते भोगिजे कीं जैसें| आरिसां रूप || ८१|| मग संवादु तोही पारुखे| तरी भोगितां भोगणें थोके| हें कां साहवेल सुखें| लांचावलेया ? || ८२|| यालागीं त्याग संन्यास| पुसावयाचें घेऊनि मिस| मग उपलविलें दुस| गीतेंचें तें || ८३|| अठरावा अध्यावो नोहे| हे एकाध्यायी गीताचि आहे| जैं वांसरुचि गाय दुहे . तैं वेळु कायसा || ८४|| तैसी संपतां अवसरीं| गीता आदरविली माघारीं| स्वामी भृत्याचा न करी| संवादु काई ? || ८५|| परी हें असो ऐसें| अर्जुनें पुसिजत असे . म्हणे विनंती विश्वेशें| अवधारिजो || ८६|| अर्जुन उवाच | संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् | त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन || १|| हां जी संन्यासु आणि त्यागु| इयां दोहीं एक अर्थीं लागु| जैसा सांघातु आणि संघु| संघातेंचि बोलिजे || ८७|| तैसेंचि त्यागें आणि संन्यासें| त्यागुचि बोलिजतु असे| . आमचेनि तंव मानसें| जाणिजे हेंचि || ८८|| ना कांहीं आथी अर्थभेदु| तो देवो करोतु विशदु| तेथ म्हणती श्रीमुकुंदु| भिन्नचि पैं || ८९|| तरी अर्जुना तुझ्या मनीं| त्याग संन्यास दोनी| एकार्थ गमलें हें मानीं| मीही साच || ९०|| इहीं दोहीं कीर शब्दीं| त्यागुचि बोलिजे त्रिशुद्धी| परी कारण एथ भेदीं| येतुलेंचि || ९१|| जें निपटूनि कर्म सांडिजे| तें सांडणें संन्यासु म्हणिजे| आणि फलमात्र का त्यजिजे| तो त्यागु गा || ९२|| तरी कोणा कर्माचें फळ| सांडिजे कोण कर्म केवळ| हेंही सांगों विवळ| चित्त दे पां || ९३|| तरी आपैसीं दांगें डोंगर| झाडें डाळती अपार| तैसें लांबे राजागर| नुठिती ते || ९४|| न पेरितां सैंघ तृणें| उठती तैसें साळीचें होणें| नाहीं गा राबाउणें| जियापरी || ९५|| कां अंग जाहलें सहजें| परी लेणें उद्यमें कीजे| नदी आपैसी आपादिजे| विहिरी जेवीं || ९६|| तैसें नित्य नैमित्तिक| कर्म होय स्वाभाविक| परी न कामितां कामिक| न निफजे जें || ९७|| श्रीभगवानुवाच | काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः | सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः || २|| कां कामनेचेनि दळवाडें| जें उभारावया घडे| अश्वमेधादिक फुडे| याग जेथ || ९८|| वापी कूप आराम| अग्रहारें हन महाग्राम| आणीकही नाना संभ्रम| व्रतांचे ते || ९९|| ऐसें इष्टापूर्त सकळ| जया कामना एक मूळ| जें केलें भोगवी फळ| बांधोनियां || १००|| देहाचिया गांवा अलिया| जन्ममृत्यूचिया सोहळिया| ना म्हणों नये धनंजया| जियापरी || १०१|| का ललाटींचें लिहिलें| न मोडे गा कांहीं केलें| काळेगोरेपण धुतलें| फिटों नेणे || १०२|| केलें काम्य कर्म तैसें| फळ भोगावया धरणें बैसे| न फेडितां ऋण जैसें| वोसंडीना || १०३|| कां कामनाही न करितां| अवसांत घडे पंडुसुता| तरी वायकांडें न झुंजतां| लागे जैसें || १०४|| गूळ नेणतां तोंडीं| घातला देचि गोडी| आगी मानूनि राखोंडी| चेपिला पोळी || १०५|| काम्यकर्मी हें एक| सामर्थ्य आथी स्वाभाविक| म्हणौनि नको कौतुक| मुमुक्षु एथ || १०६|| किंबहुना पार्था ऐसें| जें काम्य कर्म गा असे . तें त्यजिजे विष जैसें| वोकूनियां || १०७|| मग तया त्यागातें जगीं| संन्यासु ऐसया भंगीं| बोलिजे अंतरंगीं| सर्वद्रष्टा || १०८|| हें काम्य कर्म सांडणें| तें कामनेतेंचि उपडणें| द्रव्यत्यागें दवडणें| भय जैसें || १०९|| आणि सोमसूर्यग्रहणें| येऊनि करविती पार्वणें| का मातापितरमरणें| अंकित जे दिवस || ११०|| अथवा अतिथी हन पावे| हें ऐसैसें पडे जैं करावें| तैं तें कर्म जाणावें| नौमित्तिक गा || १११|| वार्षिया क्षोमे गगन| वसंतें दुणावे वन| देहा श्रृंगारी यौवन- | दशा जैसी || ११२|| का सोमकांतु सोमें पघळें . सूर्यें फांकती कमळें| एथ असे तेंचि पाल्हाळे . आन नये || ११३|| तैसें नित्य जें का कर्म| तेंचि निमित्ताचे लाहे नियम| एथ उंचावे तेणें नाम| नैमित्तिक होय || ११४|| आणि सायंप्रातर्मध्यान्हीं| जें कां करणीय प्रतिदिनीं| परी दृष्टि जैसी लोचनीं| अधिक नोहे || ११५|| कां नापादितां गती| चरणीं जैसी आथी| नातरी ते दीप्ती| दीपबिंबीं || ११६|| वासु नेदितां जैसे| चंदनीं सौरभ्य असे | अधिकाराचे तैसें| रूपचि जें || ११७|| नित्य कर्म ऐसें जनीं| पार्था बोलिजे तें मानीं| एवं नित्य नैमित्तिक दोन्हीं| दाविलीं तुज || ११८|| हेंचि नित्य नैमित्तिक| अनुष्ठेय आवश्यक| म्हणौनि म्हणोंं पाहती एक| वांझ ययातें || ११९|| परी भोजनीं जैसें होये| तृप्ति लाहे भूक जाये| तैसे नित्यनैमित्तिकीं आहे| सर्वांगीं फळ || १२०|| कीड आगिठां पडे| तरी मळु तुटे वानी चढे| यया कर्मा तया सांगडें| फळ जाणावें || १२१|| जे प्रत्यवाय तंव गळे| स्वाधिकार बहुवें उजळे| तेथ हातोफळिया मिळे| सद्गतीसी || १२२|| येवढेवरी ढिसाळ| नित्यनैमित्तिकीं आहे फळ| परी तें त्यजिजे मूळ| नक्षत्रीं जैसें || १२३|| लता पिके आघवी| तंव च्यूत बांधे पालवीं| मग हात न लावित माधवीं| सोडूनि घाली || १२४|| तैसी नोलांडितां कर्मरेखा| चित्त दीजे नित्यनैमित्तिका| पाठीं फळा कीजे अशेखा| वांताचे वानी || १२५|| यया कर्म फळत्यागातें| त्यागु म्हणती पैं जाणते| एवं त्याग संन्यास तूतें| परीसविले || १२६|| हा संन्यासु जैं संभवे| तैं काम्य बाधूं न पावे| निषिद्ध तंव स्वभावें| निषेधें गेलें || १२७|| आणि नित्यादिक जें असे . तें येणें फलत्यागें नसे| शिर लोटलिया जैसें| येर आंग || १२८|| मग सस्य फळपाकांत| तैसें निमालिया कर्मजात| आत्मज्ञान गिंवसीत| अपैसें ये || १२९|| ऐसिया निगुती दोनी| त्याग संन्यास अनुष्ठानीं| पडले गा आत्मज्ञानीं . बांधती पाटु || १३०|| नातरी हे निगुती चुके| मग त्यागु कीजे हाततुकें| तैं कांहीं न त्यजे अधिकें| गोंवींचि पडे || १३१|| जें औषध व्याधी अनोळख| तें घेतलिया परतें विख| कां अन्न न मानितां भूक| मारी ना काय ? || १३२|| म्हणौनि त्याज्य जें नोहे| तेथ त्यागातें न सुवावें| त्याज्यालागीं नोहावें| लोभापर || १३३|| चुकलिया त्यागाचें वेझें| केला सर्वत्यागुही होय वोझें| न देखती सर्वत्र दुजें| वì
|
|
|
|