[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १७ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय सतरावा | श्रद्धात्रयविभागयोगः | विश्वविकासित मुद्रा| जया सोडी तुझी योगमुद्रा| तया नमोजी गणेंद्रा| श्रीगुरुराया || १|| त्रिगुणत्रिपुरीं वेढिला| जीवत्वदुर्गीं आडिला| तो आत्मशंभूनें सोडविला| तुझिया स्मृती || २|| म्हणौनि शिवेंसीं कांटाळा| गुरुत्वें तूंचि आगळा| तऱ्ही हळु मायाजळा- | माजीं तारूनि || ३|| जे तुझ्याविखीं मूढ| तयांलागीं तूं वक्रतुंड| ज्ञानियांसी तरी अखंड| उजूचि आहासी || ४|| दैविकी दिठी पाहतां सानी| तऱ्ही मीलनोन्मीलनीं| उत्पत्ति प्रळयो दोन्ही| लीलाचि करिसी || ५|| प्रवृत्तिकर्णाच्या चाळीं| उठली मदगंधानिळीं| पूजीजसी नीलोत्पलीं| जीवभृंगांच्या || ६|| पाठीं निवृत्तिकर्णताळें| आहाळली ते पूजा विधुळे| तेव्हां मिरविसी मोकळें| आंगाचें लेणें || ७|| वामांगीचा लास्यविलासु| जो हा जगद्रूप आभासु| तो तांडवमिसें कळासु| दाविसी तूं || ८|| हें असो विस्मो दातारा| तूं होसी जयाचा सोयरा| सोइरिकेचिया व्यवहारा| मुकेचि तो || ९|| फेडितां बंधनाचा ठावो| तूं जगद्बंधु ऐसा भावो| धरूं वोळगे उवावो| तुझाचि आंगीं || १०|| तंव दुजयाचेनि नांवें तया| देहही नुरेचि पैं देवराया| जेणें तूं आपणपयां| केलासि दुजा || ११|| तूंतें करूनि पुढें| जे उपायें घेती दवडे| तयां ठासी बहुवें पाडें| मागांचि तूं || १२|| जो ध्यानें सूये मानसीं| तयालागीं नाहीं तूं त्याचे देशीं| ध्यानही विसरे तेणेंसीं| वालभ तुज || १३|| तूतें सिद्धचि जो नेणे| तो नांदे सर्वज्ञपणें| वेदांही येवढें बोलणें| नेघसी कानीं || १४|| मौन गा तुझें राशिनांव| आतां स्तोत्रीं कें बांधों हाव| दिसती तेतुली माव| भजों काई || १५|| दैविकें सेवकु हों पाहों| तरी भेदितां द्रोहोचि लाहों| म्हणौनि आतां कांहीं नोहों| तुजलागीं जी || १६|| जैं सर्वथा सर्वही नोहिजे| तैं अद्वया तूतें लाहिजे| हें जाणें मी वर्म तुझें| आराध्य लिंगा || १७|| तरी नुरोनि वेगळेंपण| रसीं भजिन्नलें लवण| तैसें नमन माझें जाण| बहु काय बोलों || १८|| आतां रिता कुंभ समुद्रीं रिगे| तो उचंबळत भरोनि निगे| कां दशीं दीपसंगें| दीपुचि होय || १९|| तैसा तुझिया प्रणितीं| मी पूर्णु जाहलों श्रीनिवृत्ती| आतां आणीन व्यक्तीं| गीतार्थु तो || २०|| तरी षोडशाध्यायशेखीं| तिये समाप्तीच्या श्लोकीं| जो ऐसा निर्णयो निष्टंकीं| ठेविला देवें || २१|| जे कृत्याकृत्यव्यवस्था| अनुष्ठावया पार्था| शास्त्रचि एक सर्वथा| प्रमाण तुज || २२|| तेथ अर्जुन मानसें| म्हणे हें ऐसें कैसें| जे शास्त्रेंवीण नसे| सुटिका कर्मा || २३|| तरी तक्षकाची फडे| ठाकोनि कैं तो मणि काढे| कैं नाकींचा केशु जोडे| सिंहाचिये ? || २४|| मग तेणें तो वोंविजे| तरीच लेणें पाविजे| एऱ्हवीं काय असिजे| रिक्तकंठीं ? || २५|| तैसी शास्त्रांची मोकळी| यां कैं कोण पां वेंटाळी| एकवाक्यतेच्या फळीं| पैसिजे कैं ? || २६|| जालयाही एकवाक्यता| कां लाभें वेळु अनुष्ठितां| कैंचा पैसारु जीविता| येतुलालिया || २७|| आणि शास्त्रें अर्थें देशें काळें| या चहूंही जें एकफळे| तो उपावो कें मिळे| आघवयांसी ? || २८|| म्हणौनि शास्त्राचें घडतें| नोहें प्रकारें बहुतें| तरी मुर्खा मुमुक्षां येथें| काय गति पां ? || २९|| हा पुसावया अभिप्रावो| जो अर्जुन करी प्रस्तावो| तो सतराविया ठावो| अध्याया येथ || ३०|| तरी सर्वविषयीं वितृष्णु| जो सकळकळीं प्रवीणु| कृष्णाही नवल कृष्णु| अर्जुनत्वें जो || ३१|| शौर्या जोडला आधारु| जो सोमवंशाचा शृंगारु| सुखादि उपकारु| जयाची लीला || ३२|| जो प्रज्ञेचा प्रियोत्तमु| ब्रह्मविद्येचा विश्रामु| सहचरु मनोधर्मु| देवाचा जो || ३३|| अर्जुन उवाच | ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः | तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः || १|| तो अर्जुन म्हणे गा तमालश्यामा| इंद्रियां फांवलिया ब्रह्मा| तुझां बोलु आम्हा| साकांक्षु पैं जी || ३४|| जें शास्त्रेंवांचूनि आणिकें| प्राणिया स्वमोक्षु न देखे| ऐसें कां कैंपखें| बोलिलासी || ३५|| तरी न मिळेचि तो देशु| नव्हेचि काळा अवकाशु| जो करवी शास्त्राभ्यासु| तोही दुरी || ३६|| आणि अभ्यासीं विरजिया| होती जिया सामुग्रिया| त्याही नाहीं आपैतिया| तिये वेळीं || ३७|| उजू नोहेचि प्राचीन| नेदीचि प्रज्ञा संवाहन| ऐसें ठेलें आपादन| शास्त्राचें जया || ३८|| किंबहुना शास्त्रविखीं| एकही न लाहातीचि नखी| म्हणौनि उखिविखी| सांडिली जिहीं || ३९|| परी निर्धारूनि शास्त्रें| अर्थानुष्ठानें पवित्रें| नांदताति परत्रें| साचारें जे || ४०|| तयांऐसें आम्हीं होआवें| ऐसी चाड बांधोनि जीवें| घेती तयांचें मागावे| आचरावया || ४१|| धड्याचिया आखरां| तळीं बाळ लिहे दातारा| कां पुढांसूनि पडिकरा| अक्षमु चाले || ४२|| तैसें सर्वशास्त्रनिपुण| तयाचें जें आचरण| तेंचि करिती प्रमाण| आपलिये श्रद्धे || ४३|| मग शिवादिकें पूजनें| भूम्यादिकें महादानें| आग्निहोत्रादि यजनें| करिती जे श्रद्धा || ४४|| तयां सत्त्वरजतमां- /| माजीं कोण पुरुषोत्तमा| गति होय ते आम्हां| सांगिजो जी || ४५|| तंव वैकुंठपीठींचें लिंग| जो निगमपद्माचा पराग| जिये जयाचेनि हें जग| अंगच्छाया || ४६|| काळ सावियाचि वाढु| लोकोत्तर प्रौढु| आद्वितीय गूढु| आनंदघनु || ४७|| इयें श्लाघिजती जेणें बिकें| तें जयाचें आंगीं असिकें| तो श्रीकृष्ण स्वमुखें| बोलत असे || ४८|| श्री भगवानुवाच | त्रिविध भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा | सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु || २|| म्हणे पार्था तुझा अतिसो| हेंही आम्ही जाणतसों| जे शास्त्राभ्यासाचा आडसो| मानितोसि कीं || ४९|| नुसधियाची श्रद्धा| झोंबों पाहसी परमपदा| तरी तैसें हें प्रबुद्धा| सोहोपें नोहे || ५०|| श्रद्धा म्हणितलियासाठीं| पातेजों नये किरीटी| काय द्विजु अंत्यजघृष्टीं| अंत्यजु नोहे ? || ५१|| गंगोदक जरी जालें| तरी मद्यभांडां आलें| तें घेऊं नये कांहीं केलें| विचारीं पां || ५२|| चंदनु होय शीतळु| परी अग्नीसी पावे मेळु| तैं हातीं धरितां जाळूं| न शके काई ? || ५३|| कां किडाचिये आटतिये पुटीं| पडिलें सोळें किरीटी| घेतलें चोखासाठीं| नागवीना ? || ५४|| तैसें श्रद्धेचें दळवाडें| अंगें कीर चोखडें| परी प्राणियांच्या पडे| विभागीं जैं || ५५|| ते प्राणिये तंव स्वभावें| आनादिमायाप्रभावें| त्रिगुणाचेचि आघवे| वळिले आहाती || ५६|| तेथही दोन गुण खांचती| मग एक धरी उन्नती| तैं तैसियाचि होती वृत्ती| जीवांचिया || ५७|| वृत्तीऐसें मन धरिती| मनाऐसी क्रिया करिती| केलिया ऐसी वरीती| मरोनि देहें || ५८|| बीज मोडे झाड होये| झाड मोडे बीजीं सामाये| ऐसेनि कल्पकोडी जाये| परी जाति न नशे || ५९|| तियापरीं यियें अपारें| होत जात जन्मांतरें| परी त्रिगुणत्व न व्यभिचरें| प्राणियांचें || ६०|| म्हणूनि प्राणियांच्या पैकीं| पडिली श्रद्धा अवलोकीं| ते होय गुणासारिखी| तिहीं ययां || ६१|| विपायें वाढे सत्त्व शुद्ध| तेव्हां ज्ञानासी करी साद| परी एका दोघे वोखद| येर आहाती || ६२|| सत्त्वाचेनि आंगलगें| ते श्रद्धा मोक्षफळा रिगे| तंव रज तम उगे| कां पां राहाती ? || ६३|| मोडोनि सत्त्वाची त्राये| रजोगुण आकाशें जाये| तेव्हां तेचि श्रद्धा होये| कर्मकेरसुणी || ६४|| मग तमाची उठी आगी| तेव्हां तेचि श्रद्धा भंगी| हों लागे भोगालागीं| भलतेया || ६५|| सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत | श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यछ्रद्धः स एव सः || ३|| एवं सत्त्वरजतमा- /| वेगळी श्रद्धा सुवर्मा| नाहीं गा जीवग्रामा- /| माजीं यया || ६६|| म्हणौनि श्रद्धा स्वाभाविक| असे पैं त्रिगुणात्मक| रजतमसात्त्विक| भेदीं इहीं || ६७|| जैसें जीवनचि उदक| परी विषीं होय मारक| कां मिरयामाजीं तीख| उंसीं गोड || ६८|| तैसा बहुवसें तमें| जो सदाचि होय निमे| तेथ श्रद्धा परीणमे| तेंचि होऊनि || ६९|| मग काजळा आणि मसी| न दिसे विवंचना जैसी| तेवीं श्रद्धा तामसी| सिनी नाहीं || ७०|| तैसीच राजसीं जीवीं| रजोमय जाणावी| सात्त्विकीं आघवीं| सत्त्वाचीच || ७१|| ऐसेनि हा सकळु| जगडंबरु निखिळु| श्रद्धेचाचि केवळु| वोतला असे || ७२|| परी गुणत्रयवशें| त्रिविधपणाचें लासें| श्रद्धे जें उठिलें असे| तें वोळख तूं || ७३|| तरी जाणिजे झाड फुलें| कां मानस जाणिजे बोलें| भोगें जाणिजे केलें| पूर्वजन्मींचें || ७४|| तैसीं जिहीं चिन्हीं| श्रद्धेचीं रूपें तीन्हीं| देखिजती ते वानी| अवधारीं पां || ७५|| यजन्ते सात्त्विका देवान यक्षरक्षांसि राजसाः | प्रेतान भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः || ४|| तरी सात्त्विक श्रद्धा| जयांचा होय बांधा| तयां बहुतकरूनि मेधा| स्वर्गीं आथी || ७६|| ते विद्याजात पढती| यज्ञक्रिये निवडती| किंबहुना पडती| देवलोकीं || ७७|| आणि श्रद्धा राजसा| घडले जे वीरेशा| ते भजती राक्षसां| खेचरां हन || ७८|| श्रद्धां जे कां तामसी| ते मी सांगेन तुजपाशीं| जे कां केवळ पापराशी| आतिकर्कशी निर्दयत्वें || ७९|| जीववधें साधूनि बळी| भूतप्रेतकुळें मैळीं| स्मशानीं संध्याकाळीं| पूजिती जे || ८०|| ते तमोगुणाचें सार| काढूनि निर्मिले नर| जाण तामसियेचें घर| श्रद्धेचें तें || ८१|| ऐसी इहीं तिहीं लिंगीं| त्रिविध श्रद्धा जगीं| पैं हें ययालागीं| सांगतु असें || ८२|| जे हे सात्त्विक श्रद्धा| जतन करावी प्रबुद्धा| येरी दोनी विरुद्धा| सांडाविया || ८३|| हे सात्त्विकमति जया| निर्वाहती होय धनंजया| बागुल नोहे तया| कैवल्य तें || ८४|| तो न पढो कां ब्रह्मसूत्र| नालोढो सर्व शास्त्र| सिद्धांत न होत स्वतंत्र| तयाच्या हातीं || ८५|| परी श्रुतिस्मृतींचे अर्थ| जे आपण होऊनि मूर्त| अनुष्ठानें जगा देत| वडील जे हे || ८६|| तयांचीं आचरती पाउलें| पाऊनि सात्त्विकी श्रद्धा चाले| तो तेंचि फळ ठेविलें| ऐसें लाहे || ८७|| पैं एक दीपु लावी सायासें| आणिक तेथें लॐ बैसें| तरी तो काय प्रकाशें| वंचिजे गा ? || ८८|| कां येकें मोल अपार| वेंचोनि केलें धवळार| तो सुरवाडु वस्तीकर| न भोगी काई ? || ८९|| हें असो जो तळें करी| तें तयाचीच तृषा हरी| कीं सुआरासीचि अन्न घरीं| येरां नोहे ? || ९०|| बहुत काय बोलों पैं गा| येका गौतमासीचि गंगा| येरां समस्तां काय जगां| वोहोळ जाली ? || ९१|| म्हणौनि आपुलियापरी| शास्त्र अनुष्ठीती कुसरी| जाणे तयांते श्रद्धाळु जो वरी| तो मूर्खुही तरे || ९२|| अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः | दंभाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः || ५|| ना शास्त्राचेनि कीर नांवें| खाकरोंही नेणती जीवें| परी शास्त्रज्ञांही शिवें| टेंकों नेदिती || ९३|| वडिलांचिया क्रिया| देखोनि वाती वांकुलिया| पंडितां डाकुलिया| वाजविती || ९४|| आपलेनीचि आटोपें| धनित्वाचेनि दर्पें| साचचि पाखंडाचीं तपें| आदरिती || ९५|| आपुलिया पुढिलांचिया| आंगीं घालूनि कातिया| रक्तमांसा प्रणीतया| भर भरु || ९६|| रिचविती जळतकुंडीं| लाविती चेड्याच्या तोंडीं| नवसियां देती उंडी| बाळकांची || ९७|| आग्रहाचिया उजरिया| क्षुद्र देवतां वरीया| अन्नत्यागें सातरीया| ठाकती एक || ९८|| अगा आत्मपरपीडा| बीज तमक्षेत्रीं सुहाडा| पेरिती मग पुढां| तेंचि पिके || ९९|| बाहु नाहीं आपुलिया| आणि नावेतेंही धनंजया| न धरी होय तया| समुद्रीं जैसें || १००|| कां वैद्यातें करी सळा| रसु सांडी पाय खोळां| तो रोगिया जेवीं जिव्हाळा| सवता होय || १०१|| नाना पडिकराचेनि सळें| काढी आपुलेचि डोळे| तें वानवसां आंधळें| जैसें ठाके || १०२|| तैसें तयां आसुरां होये| निंदूनि शास्त्रांची सोये| सैंघ धांवताती मोहें| आडवीं जे कां || १०३|| कामु करवी तें करिती| क्रोधु मारवी ते मारिती| किंबहुना मातें पुरिती| दुःखाचा गुंडां || १०४|| कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः | मां चैवान्तः शरीरस्थं तान विद्ध्यासुरनिश्चयान || ६|| आपुलां परावां देहीं| दुःख देती जें जें कांहीं| मज आत्मया तेतुलाही| होय शीणु || १०५|| पैं वाचेचेनिही पालवें| पापियां तयां नातळावें| परी पडिलें सांगावें| त्यजावया || १०६|| प्रेत बाहिरें घालिजे| कां अंत्यजु संभाषणीं त्यजिजे| हें असो हातें क्षाळिजे| कश्मलातें ? || १०७|| तेथ शुद्धीचिया आशा| तो लेपु न मनवे जैसा| तयांतें सांडावया तैसा| अनुवादु हा || १०८|| परी अर्जुना तूं तयांतें| देखसी तैं स्मर हो मातें| जे आन प्रायश्चित्त येथें| मानेल ना || १०९|| म्हणौनि जे श्रद्धा सात्त्विकी| पुढती तेचि पैं येकी| जतन करावी निकी| सर्वांपरी || ११०|| तरी धरावा तैसा संगु| जेणें पोखे सात्त्विक लागु| सत्त्ववृद्धीचा भागु| आहारु घेपें || १११|| एऱ्हवीं तरी पाहीं| स्वभाववृद्धीच्या ठाईं| आहारावांचूनि नाहीं| बळी हेतु || ११२|| प्रत्यक्ष पाहें पां वीरा| जो सावध घे मदिरा| तो होऊनि ठाके माजिरा| तियेचि क्षणीं || ११३|| कां जो साविया अन्नरसु सेवी| तो व्यापिजे वातश्लेष्मस्वभावीं| काय ज्वरु जालिया निववी| पयादिक ? || ११४|| नातरी अमृत जयापरी| घेतलिया मरण वारी| कां आपुलियाऐसें करी| जैसें विष || ११५|| तेवीं जैसा घेपे आहारु| धातु तैसाचि होय आकारु| आणि धातु ऐसा अंतरु| भावो पोखे || ११६|| जैसें भांडियाचेनि तापें| आंतुलें उदकही तापे| तैसी धातुवशें आटोपे| चित्तवृत्ती || ११७|| म्हणौनि सात्त्विकु रसु सेविजे| तैं सत्त्वाची वाढी पाविजे| राजसा तामसा होईजे| येरी रसीं || ११८|| तरी सात्त्विक कोण आहारु| राजसा तामसा कायी आकारु| हें सांगों करीं आदरु| आकर्णनीं || ११९|| आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः | यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिम शृणु || ७|| आणि एकसरें आहारा| कैसेनि तिनी मोहरा| जालिया तेही वीरा| रोकडें दॐ || १२०|| तरी जेवणाराचिया रुची| निष्पत्ति कीं बोनियांची| आणि जेवितां तंव गुणांची| दासी येथ || १२१|| जे जीव कर्ता भोक्ता| तो गुणास्तव स्वभावता| पावोनियां त्रिविधता| चेष्टे त्रिधा || १२२|| म्हणौनि त्रिविधु आहारु| यज्ञुही त्रिप्रकारु| तप दान हन व्यापारु| त्रिविधचि ते || १२३|| पैं आहार लक्षण पहिले? | सांगों जें म्हणितलें| तें आईक गा भलें| रूप करूं || १२४|| आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिवर्धनाः | रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः || ८|| तरी सत्त्वगुणाकडे| जें दैवें भोक्ता पडे| तैं मधुरीं रसीं वाढे| मेचु तया || १२५|| आंगेंचि द्रव्यें सुरसें| जे आंगेंचि पदा
Heh Heh Heh..."Steven," the teacher said, "I happen to know that the reason you didn't come to school yesterday was that you were out playing football." "That's a rotten lie!" Steven protested. "And I have the fish to prove it!"