| |
Dnyaneshvari adhyay - 16
by ज्ञानेश्वरमहाराज
[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १६ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय सोळावा | दैवासुरसम्पद्विभागयोगः | मावळवीत विश्वाभासु| नवल उदयला चंडांशु| अद्वयाब्जिनीविकाशु| वंदूं आतां || १|| जो अविद्याराती रुसोनियां| गिळी ज्ञानाज्ञानचांदणिया| जो सुदिनु करी ज्ञानियां| स्वबोधाचा || २|| जेणें विवळतिये सवळे| लाहोनि आत्मज्ञानाचे डोळे| सांडिती देहाहंतेचीं अविसाळें| जीवपक्षी || ३|| लिंगदेहकमळाचा| पोटीं वेंचु तया चिद्भ्रमराचा| बंदिमोक्षु जयाचा| उदैला होय || ४|| शब्दाचिया आसकडीं| भेद नदीच्या दोहीं थडीं| आरडाते विरहवेडीं| बुद्धिबोधु || ५|| तया चक्रवाकांचें मिथुन| सामरस्याचें समाधान| भोगवी जो चिद्गगन| भुवनदिवा || ६|| जेणें पाहालिये पाहांटे| भेदाची चोरवेळ फिटे| रिघती आत्मानुभववाटे| पांथिक योगी || ७|| जयाचेनि विवेककिरणसंगें| उन्मेखसूर्यकांतु फुणगे| दीपले जाळिती दांगें| संसाराचीं || ८|| जयाचा रश्मिपुंजु निबरु| होता स्वरूप उखरीं स्थिरु| ये महासिद्धीचा पूरु| मृगजळ तें || ९|| जो प्रत्यग्बोधाचिया माथया| सोऽहंतेचा मध्यान्हीं आलिया| लपे आत्मभ्रांतिछाया| आपणपां तळीं || १०|| ते वेळीं विश्वस्वप्नासहितें| कोण अन्यथामती निद्रेतें| सांभाळी नुरेचि जेथें| मायाराती || ११|| म्हणौनि अद्वयबोधपाटणीं| तेथ महानंदाची दाटणी| मग सुखानुभूतीचीं घेणीं देणीं| मंदावो लागती || १२|| किंबहुना ऐसैसें| मुक्तकैवल्य सुदिवसें| सदा लाहिजे कां प्रकाशें| जयाचेनि || १३|| जो निजधामव्योमींचा रावो| उदैलाचि उदैजतखेंवो| फेडी पूर्वादि दिशांसि ठावो| उदोअस्तूचा || १४|| न दिसणें दिसणेंनसीं मावळवी| दोहीं झांकिलें ते सैंघ पालवी| काय बहु बोलों ते आघवी| उखाचि आनी || १५|| तो अहोरात्रांचा पैलकडु| कोणें देखावा ज्ञानमार्तंडु| जो प्रकाश्येंवीण सुरवाडु| प्रकाशाचा || १६|| तया चित्सूर्या श्रीनिवृत्ती| आतां नमों म्हणों पुढतपुढती| जे बाधका येइजतसे स्तुती| बोलाचिया || १७|| देवाचें महिमान पाहोनियां| स्तुति तरी येइजे चांगावया| जरी स्तव्यबुद्धीसीं लया| जाईजे कां || १८|| जो सर्वनेणिवां जाणिजे| मौनाचिया मिठीया वानिजे| कांहींच न होनि आणिजे| आपणपयां जो || १९|| तया तुझिया उद्देशासाठीं| पश्यंती मध्यमा पोटीं| सूनि परेसींही पाठीं| वैखरी विरे || २०|| तया तूतें मी सेवकपणें| लेववीं बोलकेया स्तोत्राचें लेणें| हें उपसाहावेंही म्हणतां उणें| अद्वयानंदा || २१|| परी रंकें अमृताचा सागरु| देखिलिया पडे उचिताचा विसरु| मग करूं धांवे पाहुणेरु| शाकांचा तया || २२|| तेथ शाकुही कीर बहुत म्हणावा| तयाचा हर्षवेगुचि तो घ्यावा| उजळोनि दिव्यतेजा हातिवा| ते भक्तीचि पाहावी || २३|| बाळा उचित जाणणें होये| तरी बाळपणचि कें आहे ? | परी साचचि येरी माये| म्हणौनि तोषे || २४|| हां गा गांवरसें भरलें| पाणी पाठीं पाय देत आलें| तें गंगा काय म्हणितलें| परतें सर ? || २५|| जी भृगूचा कैसा अपकारु| कीं तो मानूनि प्रियोपचारु| तोषेचिना शारङ्गधरु| गुरुत्वासीं ? || २६|| कीं आंधारें खतेलें अंबर| झालेया दिवसनाथासमोर| तेणें तयातें पऱ्हा सर| म्हणितलें काई ? || २७|| तेवीं भेदबुद्धीचिये तुळे| घालूनि सूर्यश्लेषाचें कांटाळे| तुकिलासि तें येकी वेळे| उपसाहिजो जी || २८|| जिहीं ध्यानाचा डोळां पाहिलासी| वेदादि वाचां वानिलासी| जें उपसाहिलें तयासी| तें आम्हांही करीं || २९|| परी मी आजि तुझ्या गुणीं| लांचावलों अपराधु न गणीं| भलतें करीं परी अर्धधणीं| नुठी कदा || ३०|| मियां गीता येणें नांवें| तुझें पसायामृत सुहावें| वानूं लाधलों तें दुणेन थावें| दैवलों दैवें || ३१|| माझिया सत्यवादाचें तप| वाचा केलें बहुत कल्प| तया फळाचें हें महाद्वीप| पातली प्रभु || ३२|| पुण्यें पोशिलीं असाधरणें| तियें तुझें गुण वानणें| देऊनि मज उत्तीर्णें| जालीं आजी || ३३|| जी जीवित्वाच्या आडवीं| आतुडलों होतों मरणगांवीं| ते अवदसाची आघवी| फेडिली आजी || ३४|| जे गीता येणें नांवें नावाणिगी| जे अविद्या जिणोनि दाटुगी| ते कीर्ती तुझी आम्हांजोगी| वानावया जाली || ३५|| पैं निर्धना घरीं वानिवसें| महालक्ष्मी येऊनि बैसे| तयातें निर्धन ऐसें| म्हणों ये काई ? || ३६|| कां अंधकाराचिया ठाया| दैवें सुर्यु आलिया| तो अंधारुचि जगा यया| प्रकाशु नोहे ? || ३७|| जया देवाची पाहतां थोरी| विश्व परमाणुही दशा न धरी| तो भावाचिये सरोभरी| नव्हेचि काई ? || ३८|| तैसा मी गीता वाखाणी| हे खपुष्पाची तुरंबणी| परी समर्थें तुवां शिरयाणी| फेडिली ते || ३९|| म्हणौनि तुझेनि प्रसादें| मी गीतापद्यें अगाधें| निरूपीन जी विशदें| ज्ञानदेवो म्हणे || ४०|| तरी अध्यायीं पंधरावा| श्रीकृष्णें तया पांडवा| शास्त्रसिद्धांतु आघवा| उगाणिला || ४१|| जे वृक्षरूपक परीभाषा| केलें उपाधि रूप अशेषा| सद्वैद्यें जैसें दोषा| अंगलीना || ४२|| आणि कूटस्थु जो अक्षरु| दाविला पुरुषप्रकारु| तेणें उपहिताही आकारु| चैतन्या केला || ४३|| पाठीं उत्तम पुरुष| शब्दाचें करूनि मिष| दाविलें चोख| आत्मतत्त्व || ४४|| आत्मविषयीं आंतुवट| साधन जें आंगदट| ज्ञान हेंही स्पष्ट| चावळला || ४५|| म्हणौनि इये अध्यायीं| निरूप्य नुरेचि कांहीं| आतां गुरुशिष्यां दोहीं| स्नेहो लाहणा || ४६|| एवं इयेविषयीं कीर| जाणते बुझावले अपार| परी मुमुक्षु इतर| साकांक्ष जाले || ४७|| त्या मज पुरुषोत्तमा| ज्ञानें भेटे जो सुवर्मा| तो सर्वज्ञु तोचि सीमा| भक्तीचीही || ४८|| ऐसें हें त्रैलोक्यनायकें| बोलिलें अध्यायांत श्लोकें| तेथें ज्ञानचि बहुतेकें| वानिलें तोषें || ४९|| भरूनि प्रपंचाचा घोंटु| कीजे देखतांचि देखतया द्रष्टु| आनंदसाम्राज्यीं पाटु| बांधिजे जीवा || ५०|| येवढेया लाठेपणाचा उपावो| आनु नाहींचि म्हणे देवो| हा सम्यक्ज्ञानाचा रावो| उपायांमाजीं || ५१|| ऐसे आत्मजिज्ञासु जे होते| तिहीं तोषलेनि चित्तें| आदरें तया ज्ञानातें| वोंवाळिलें जीवें || ५२|| आतां आवडी जेथ पडे| तयाचि अवसरीं पुढें पुढें| रिगों लागें हें घडे| प्रेम ऐसें || ५३|| म्हणौनि जिज्ञासूंच्या पैकीं| ज्ञानी प्रतीती होय ना जंव निकी| तंव योग क्षेमु ज्ञानविखीं| स्फुरेलचि कीं || ५४|| म्हणौनि तेंचि सम्यक ज्ञान| कैसेनि होय स्वाधीन| जालिया वृद्धियत्न| घडेल केवीं || ५५|| कां उपजोंचि जें न लाहे| जें उपजलेंही अव्हांटा सूये| तें ज्ञानीं विरुद्ध काय आहे| हें जाणावें कीं || ५६|| मग जाणतयां जें विरू| तयाचीं वाट वाहती करूं| ज्ञाना हित तेंचि विचारूं| सर्वभावें || ५७|| ऐसा ज्ञानजिज्ञासु तुम्हीं समस्तीं| भावो जो धरिला असे चित्तीं| तो पुरवावया लक्ष्मीपती| बोलिजेल || ५८|| ज्ञानासि सुजन्म जोडे| आपली विश्रांतिही वरी वाढे| ते संपत्तीचे पवाडे| सांगिजेल दैवी || ५९|| आणि ज्ञानाचेनि कामाकारें| जे रागद्वेषांसि दे थारे| तिये आसुरियेहि घोरे| करील रूप || ६०|| सहज इष्टानिष्टकरणी| दोघीचि इया कवतुकिणी| हे नवमाध्यायीं उभारणी| केली होती || ६१|| तेथ साउमा घेयावया उवावो| तंव वोडवला आन प्रस्तावो| तरी तयां प्रसंगें आतां देवो| निरूपीत असे || ६२|| तया निरूपणाचेनि नांवें| अध्याय पद सोळावें| लावणी पाहतां जाणावें| मागिलावरी || ६३|| परी हें असो आतां प्रस्तुतीं| ज्ञानाच्या हिताहितीं| समर्था संपत्ती| इयाचि दोन्ही || ६४|| जे मुमुक्षुमार्गींची बोळावी| जे मोहरात्रीची धर्मदिवी| ते आधीं तंव दैवी| संपत्ती ऐका || ६५|| जेथ एक एकातें पोखी| ऐसे बहुत पदार्थ येकीं| संपादिजती ते लोकीं| संपत्ति म्हणिजे || ६६|| ते दैवी सुखसंभवी| तेथ दैवगुणें येकोपजीवीं| जाली म्हणौनि दैवी| संपत्ति हे || ६७|| श्री भगवानुवाच | अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितः | दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवं || १|| आतां तयाचि दैवगुणां- | माजीं धुरेचा बैसणा| बैसे तया आकर्णा| अभय ऐसें || ६८|| तरी न घालूनि महापुरीं| न घेपे बुडणयाची शियारी| कां रोगु न गणिजे घरीं| पथ्याचिया || ६९|| तैसा कर्माकर्माचिया मोहरा| उठूं नेदूनि अहंकारा| संसाराचा दरारा| सांडणें येणें || ७०|| अथवा ऐक्यभावाचेनि पैसें| दुजे मानूनि आत्मा ऐसें| भयवार्ता देशें| दवडणें जें || ७१|| पाणी बुडऊं ये मिठातें| तंव मीठचि पाणी आतें| तेवीं आपण जालेनि अद्वैतें| नाशे भय || ७२|| अगा अभय येणें नांवें| बोलिजे तें हें जाणावें| सम्यक्ज्ञानाचें आघवें| धांवणें हें || ७३|| आतां सत्त्वशुद्धी जे म्हणिजे| ते ऐशा चिन्हीं जाणिजे| तरी जळे ना विझे| राखोंडी जैसी || ७४|| कां पाडिवा वाढी न मगे| अंवसे तुटी सांडूनि मागे| माजीं अतिसूक्ष्म अंगें| चंद्रु जैसा राहे || ७५|| नातरी वार्षिया नाहीं मांडिली| ग्रीष्में नाहीं सांडिली| माजीं निजरूपें निवडली| गंगा जैसी || ७६|| तैसी संकल्पविकल्पाची वोढी| सांडूनि रजतमाची कावडी| भोगितां निजधर्माची आवडी| बुद्धि उरे || ७७|| इंद्रियवर्गीं दाखविलिया| विरुद्धा अथवा भलीया| विस्मयो कांहीं केलिया| नुठी चित्तीं || ७८|| गांवा गेलिया वल्लभु| पतिव्रतेचा विरहक्षोभु| भलतेसणी हानिलाभु| न मनीं जेवीं || ७९|| तेवीं सत्स्वरूप रुचलेपणें| बुद्धी जें ऐसें अनन्य होणें| ते सत्त्वशुद्धी म्हणे| केशिहंता || ८०|| आतां आत्मलाभाविखीं| ज्ञानयोगामाजीं एकीं| जे आपुलिया ठाकी| हांवें भरे || ८१|| तेथ सगळिये चित्तवृत्ती| त्यागु करणें या रीती| निष्कामें पूर्णाहुती| हुताशीं जैसी || ८२|| कां सुकुळीनें आपुली| आत्मजा सत्कुळींचि दिधली| हें असो लक्ष्मी स्थिरावली| मुकुंदीं जैसी || ८३|| तैसे निर्विकल्पपणें| जें योगज्ञानींच या वृत्तिक होणें| तो तिजा गुण म्हणे| श्रीकृष्णनाथु || ८४|| आतां देहवाचाचित्तें| यथासंपन्नें वित्तें| वैरी जालियाही आर्तातें| न वंचणे जें कां || ८५|| पत्र पुष्प छाया| फळें मूळ धनंजया| वाटेचा न चुके आलिया| वृक्षु जैसा || ८६|| तैसें मनौनि धनधान्यवरी| विद्यमानें आल्या अवसरीं| श्रांताचिये मनोहारीं| उपयोगा जाणें || ८७|| तयां नांव जाण दान| जें मोक्षनिधानाचें अंजन| हें असो आइक चिन्ह| दमाचें तें || ८८|| तरी विषयेंद्रियां मिळणी| करूनि घापे वितुटणी| जैसें तोडिजे खड्गपाणी| पारकेया || ८९|| तैसा विषयजातांचा वारा| वाजों नेदिजे इंद्रियद्वारां| इये बांधोनि प्रत्याहारा| हातीं वोपी || ९०|| आंतुला चित्ताचें अंगवरीं| प्रवृत्ति पळे पर बाहेरी| आगी सुयिजे दाहींहि द्वारीं| वैराग्याची || ९१|| श्वासोश्वासाहुनी बहुवसें| व्रतें आचरे खरपुसें| वोसंतिता रात्रिदिवसें| नाराणुक जया || ९२|| पैं दमु ऐसा म्हणिपे| तो हा जाण स्वरूपें| यागार्थुही संक्षेपें| सांगों ऐक || ९३|| तरी ब्राह्मण करूनि धुरे| स्त्रियादिक पैल मेरे| माझारीं अधिकारें| आपुलालेनि || ९४|| जया जे सर्वोत्तम| भजनीय देवताधर्म| ते तेणें यथागम| विधी यजिजे || ९५|| जैसा द्विज षट्कर्में करी| शूद्र तयातें नमस्कारी| कीं दोहींसही सरोभरी| निपजे यागु || ९६|| तैसें अधिकारपर्यालोचें| हें यज्ञ करणें सर्वांचें| परी विषय विष फळाशेचें| न घापे माजीं || ९७|| आणि मी कर्ता ऐसा भावो| नेदिजे देहाचेनि द्वारें जावों| ना वेदाज्ञेसि तरी ठावो| होइजे स्वयें || ९८|| अर्जुना एवं यज्ञु| सर्वत्र जाण साज्ञु| कैवल्यमार्गींचा अभिज्ञु| सांगाती हा || ९९|| आतां चेंडुवें भूमी हाणिजे| नव्हे तो हाता आणिजे| कीं शेतीं बीं विखुरिजे| परी पिकीं लक्ष || १००|| नातरी ठेविलें देखावया| आदर कीजे दिविया| कां शाखा फळें यावया| सिंपिजे मूळ || १०१|| हें बहु असो आरिसा| आपणपें देखावया जैसा| पुढतपुढती बहुवसा| उटिजे प्रीती || १०२|| तैसा वेदप्रतिपाद्यु जो ईश्वरु| तो होआवयालागीं गोचरु| श्रुतीचा निरंतरु| अभ्यासु करणें || १०३|| तेंचि द्विजांसीच ब्रह्मसूत्र| येरा स्तोत्र कां नाममंत्र| आवर्तवणें पवित्र| पावावया तत्त्व || १०४|| पार्था गा स्वाध्यावो| बोलिजे तो हा म्हणे देवो| आतां तप शब्दाभिप्रावो| आईक सांगों || १०५|| तरी दानें सर्वस्व देणें| वेंचणें तें व्यर्थ करणें| जैसे फळोनि स्वयें सुकणें| इंद्रावणी जेवीं || १०६|| नाना धूपाचा अग्निप्रवेशु| कनकीं तुकाचा नाशु| पितृपक्षु पोषिता ऱ्हासु| चंद्राचा जैसा || १०७|| तैसा स्वरूपाचिया प्रसरा - | लागीं प्राणेंद्रियशरीरां| आटणी करणें जें वीरा| तेंचि तप || १०८|| अथवा अनारिसें| तपाचें रूप जरी असे| तरी जाण जेवीं दुधीं हंसें| सूदली चांचू || १०९|| तैसें देहजीवाचिये मिळणीं| जो उदयजत सूये पाणी| तो विवेक अंतःकरणीं| जागवीजे || ११०|| पाहतां आत्मयाकडे| बुद्धीचा पैसु सांकडें| सनिद्र स्वप्न बुडे| जागणीं जैसें || १११|| तैसा आत्मपर्यालोचु| प्रवर्ते जो साचु| तपाचा हा निर्वेचु| धनुर्धरा || ११२|| आतां बाळाच्या हितीं स्तन्य| जैसें नानाभूतीं चैतन्य| तैसें प्राणिमात्रीं सौजन्य| आर्जव तें || ११३|| अहिंसा सत्यमक्रोध्स्त्यागः शान्तिरपैशुनम् | दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् || २|| आणि जगाचिया सुखोद्देशें| शरीरवाचामानसें| राहाटणें तें अहिंसे| रूप जाण || ११४|| आतां तीख होऊनि मवाळ| जैसें जातीचें मुकुळ| कां तेज परी शीतळ| शशांकाचें || ११५|| शके दावितांचि रोग फेडूं| आणि जिभे तरी नव्हे कडु| ते वोखदु नाहीं मा घडू| उपमा कैंची || ११६|| तरी मऊपणें बुबुळे| झगडतांही परी नाडळे| एऱ्हवीं फोडी कोंराळें| पाणी जैसें || ११७|| तैसें तोडावया संदेह| तीख जैसें कां लोह| श्राव्यत्वें तरी माधुर्य| पायीं घालीं || ११८|| ऐकों ठातां कौतुकें| कानातें निघती मुखें| जें साचारिवेचेनि बिकें| ब्रह्मही भेदी || ११९|| किंबहुना प्रियपणे| कोणातेंही झकऊं नेणे| यथार्थ तरी खुपणें| नाहीं कवणा || १२०|| एऱ्हवीं गोरी कीर काना गोड| परी साचाचा पाखाळीं कीड| आगीचें करणें उघड| परी जळों तें साच || १२१|| कानीं लागतां महूर| अर्थें विभांडी जिव्हार| तें वाचा नव्हे सुंदर| लांवचि पां || १२२|| परी अहितीं कोपोनि सोप| लालनीं मऊ जैसें पुष्प| तिये मातेचें स्वरूप| जैसें कां होय || १२३|| तैसें श्रवणसुख चतुर| परीणमोनि साचार| बोलणें जें अविकार| तें सत्य येथें || १२४|| आतां घालितांही पाणी| पाषाणीं न निघे आणी| कां मथिलिया लोणी| कांजी नेदी || १२५|| त्वचा पायें शिरीं| हालेयाही फडे न करी| वसंतींही अंबरीं| न होती फुलें || १२६|| नाना रंभेचेनिहì
|
|
|
|