| |
Dnyaneshvari adhyay - 15
by ज्ञानेश्वरमहाराज
[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १५ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय पंधरावा | पुरुषोत्तमयोगः | आतां हृदय हें आपुलें| चौफाळुनियां भलें| वरी बैसऊं पाउलें| श्रीगुरूंचीं || १|| ऐक्यभावाची अंजुळी| सर्वेंद्रिय कुड्मुळी| भरूनियां पुष्पांजुळी| अर्घ्यु देवों || २|| अनन्योदकें धुवट| वासना जे तन्निष्ठ| ते लागलेसे अबोट| चंदनाचें || ३|| प्रेमाचेनि भांगारें| निर्वाळूनि नूपरें| लेवऊं सुकुमारें| पदें तियें || ४|| घणावली आवडी| अव्यभिचारें चोखडी| तिये घालूं जोडी| आंगोळिया || ५|| आनंदामोदबहळ| सात्त्विकाचें मुकुळ| तें उमललें अष्टदळ| ठेऊं वरी || ६|| तेथे अहं हा धूप जाळूं| नाहं तेजें वोवाळूं| सामरस्यें पोटाळूं| निरंतर || ७|| माझी तनु आणि प्राण| इया दोनी पाउवा लेऊं श्रीगुरुचरण| करूं भोगमोक्ष निंबलोण| पायां तयां || ८|| इया श्रीगुरुचरणसेवा| हों पात्र तया दैवा| जे सकळार्थमेळावा| पाटु बांधे || ९|| ब्रह्मींचें विसवणेंवरी| उन्मेख लाहे उजरी| जें वाचेतें इयें करी| सुधासिंधु || १०|| पूर्णचंद्राचिया कोडी| वक्तृत्वा घापें कुरोंडी| तैसी आणी गोडी| अक्षरांतें || ११|| सूर्यें अधिष्ठिली प्राची| जगा राणीव दे प्रकाशाची| तैशी वाचा श्रोतयां ज्ञानाची| दिवाळी करी || १२|| नादब्रह्म खुजें| कैवल्यही तैसें न सजे| ऐसा बोलु देखिजे| जेणें दैवें || १३|| श्रवणसुखाच्या मांडवीं| विश्व भोगी माधवीं| तैसी सासिन्नली बरवी| वाचावल्ली || १४|| ठावो न पवता जयाचा| मनेंसी मुरडली वाचा| तो देवो होय शब्दाचा| चमत्कारु || १५|| जें ज्ञानासि न चोजवे| ध्यानासिही जें नागवे| तें अगोचर फावे| गोठीमाजीं || १६|| येवढें एक सौभग| वळघे वाचेचें आंग| श्रीगुरुपादपद्मपराग| लाहे जैं कां || १७|| तरी बहु बोलूं काई| आजि तें आनीं ठाईं| मातेंवाचूनि नाहीं| ज्ञानदेवो म्हणे || १८|| जे तान्हेनि मियां अपत्यें| आणि माझे गुरु एकलौतें| म्हणौनि कृपेंसि एकहातें| जालें तिये || १९|| पाहा पां भरोवरी आघवी| मेघ चातकांसी रिचवी| मजलागीं गोसावी| तैसें केलें || २०|| म्हणौनि रिकामें तोंड| करूं गेलें बडबड| कीं गीता ऐसें गोड| आतुडलें || २१|| होय अदृष्ट आपैतें| तैं वाळूचि रत्नें परते| उजू आयुष्य तैं मारितें| लोभु करी || २२|| आधणीं घातलिया हरळ| होती अमृताचे तांदुळ| जरी भुकेची राखे वेळ| श्रीजगन्नाथु || २३|| तयापरी श्रीगुरु| करिती जैं अंगीकारु| तैं होऊनि ठाके संसारु| मोक्षमय आघवा || २४|| पाहा पां श्रीनारायणें| तया पांडवांचें उणें| कीजेचि ना पुराणें| विश्ववंद्यें ? || २५|| तैसें श्रीनिवृत्तिराजें| अज्ञानपण हें माझें| आणिलें वोजें| ज्ञानाचिया || २६|| परी हें असो आतां| प्रेम रुळतसे बोलतां| कें गुरुगौरव वर्णितां| उन्मेष असे ? || २७|| आतां तेणेंचि पसायें| तुम्हां संताचे मी पायें| वोळगेन अभिप्रायें| गीतेचेनि || २८|| तरी तोचि प्रस्तुतीं| चौदाविया अध्यायाच्या अंतीं| निर्णयो कैवल्यपती| ऐसा केला || २९|| जें ज्ञान जयाच्या हातीं| तोचि समर्थु मुक्ति| जैसा शतमख संपत्ती| स्वर्गींचिये || ३०|| कां शत एक जन्मां| जो जन्मोनि ब्रह्मकर्मा| करी तोचि ब्रह्मा| आनु नोहे || ३१|| नाना सूर्याचा प्रकाशु| लाहे जेवीं डोळसु| तेवीं ज्ञानेंचि सौरसु| मोक्षाचा तो || ३२|| तरी तया ज्ञानालागीं| कवणा पां योग्यता आंगीं| हें पाहतां जगीं| देखिला एकु || ३३|| जें पाताळींचेंही निधान| दावील कीर अंजन| परी होआवे लोचन| पायाळाचे || ३४|| तैसें मोक्ष देईल ज्ञान| येथें कीर नाहीं आन| परी तेंचि थारे ऐसें मन| शुद्ध होआवें || ३५|| तरी विरक्तीवांचूनि कहीं| ज्ञानासि तगणेंचि नाहीं| हें विचारूनि ठाईं| ठेविलें देवें || ३६|| आतां विरक्तीची कवण परी| जे येऊनि मनातें वरी| हेंही सर्वज्ञें श्रीहरी| देखिलें असे || ३७|| जे विषें रांधिली रससोये| जैं जेवणारा ठाउवी होये| तैं तो ताटचि सांडूनि जाये| जयापरी || ३८|| तैसी संसारा या समस्ता| जाणिजे जैं अनित्यता| तैं वैराग्य दवडितां| पाठी लागे || ३९|| आतां अनित्यत्व या कैसें| तेंचि वृक्षाकारमिषें| सांगिजत असे विश्वेशें| पंचदशीं || ४०|| उपडिलें कवतिकें| झाड येरिमोहरा ठाके| तें वेगें जैसें सुके| तैसें हें नोहे || ४१|| यातें एकेपरी| रूपकाचिया कुसरी| सारीतसे वारी| संसाराची || ४२|| करूनि संसार वावो| स्वरूपीं अहंते ठावो| होआवया अध्यावो| पंधरावा हा || ४३|| आतां हेंचि आघवें| ग्रंथगर्भींचें चांगावें| उपलविजेल जीवें| आकर्णिजे || ४४|| तरी महानंद समुद्र| जो पूर्ण पूर्णीमा चंद्र| तो द्वारकेचा नरेंद्र| ऐसें म्हणे || ४५|| अगा पैं पंडुकुमरा| येतां स्वरूपाचिया घरा| करीतसे आडवारा| विश्वाभासु जो || ४६|| तो हा जगडंबरु| नोहे येथ संसारु| हा जाणिजे महातरु| थांवला असे || ४७|| परी येरां रुखांसारिखा| हा तळीं मूळें वरी शाखा| तैसा नोहे म्हणौनि लेखा| नयेचि कवणा || ४८|| आगी कां कुऱ्हाडी| होय रिगावा जरी बुडीं| तरी हो कां भलतेवढी| वरिचील वाढी || ४९|| जे तुटलिया मूळापाशीं| उलंडेल कां शाखांशीं| परी तैशी गोठी कायशी| हा सोपा नव्हे || ५०|| अर्जुना हें कवतिक| सांगतां असे अलौकिक| जे वाढी अधोमुख| रुखा यया || ५१|| जैसा भानू उंची नेणों कें| रश्मिजाळ तळीं फांके| संसार हें कावरुखें| झाड तैसें || ५२|| आणि आथी नाथी तितुकें| रुंधलें असे येणेंचि एकें| कल्पांतींचेनि उदकें| व्योम जैसें || ५३|| कां रवीच्या अस्तमानीं| आंधारेनि कोंदे रजनी| तैसा हाचि गगनीं| मांडला असे || ५४|| यया फळ ना चुंबितां| फूल ना तुरंबितां| जें कांहीं पंडुसुता| तें रुखुचि हा || ५५|| हा ऊर्ध्वमूळ आहे| परी उन्मूळिला नोहे| येणेंचि हा होये| शाड्वळु गा || ५६|| आणि ऊर्ध्वमूळ ऐसें| निगदिलें कीर असे| परी अधींही असोसें| मूळें यया || ५७|| प्रबळला चौमेरी| पिंपळा कां वडाचिया परी| जे पारंबियांमाझारीं| डहाळिया असती || ५८|| तेवींचि गा धनंजया| संसारतरु यया| अधींचि आथी खांदिया| हेंही नाहीं || ५९|| तरी ऊर्ध्वाहीकडे| शाखांचे मांदोडे| दिसताति अपाडें| सासिन्नलें || ६०|| जालें गगनचि पां वेलिये| कां वारा मांडला रुखाचेनि आयें| नाना अवस्थात्रयें| उदयला असे || ६१|| ऐसा हा एकु| विश्वाकार विटंकु| उदयला जाण रुखु| ऊर्ध्वमूळु || ६२|| आतां ऊर्ध्व या कवण| येथें मूळ तें किं लक्षण| कां अधोमुखपण| शाखा कैसिया || ६३|| अथवा द्रुमा यया| अधीं जिया मूळिया| तिया कोण कैसिया| ऊर्ध्व शाखा || ६४|| आणि अश्वत्थु हा ऐसी| प्रसिद्धी कायसी| आत्मविदविलासीं| निर्णयो केला || ६५|| हें आघवेंचि बरवें| तुझिये प्रतीतीसि फावे| तैसेनि सांगों सोलिंवें| विन्यासें गा || ६६|| परी ऐकें गा सुभगा| हा प्रसंगु असे तुजचि जोगा| कानचि करीं हो सर्वांगा| हियें आथिलिया || ६७|| ऐसें प्रेमरसें सुरफुरें| बोलिलें जंव यादववीरें| तंव अवधान अर्जुनाकारें| मूर्त जालें || ६८|| देव निरूपिती तें थेंकुलें| येवढें श्रोतेपण फांकलें| जैसे आकाशा खेंव पसरिलें| दाही दिशीं || ६९|| श्रीकृष्णोक्तिसागरा| हा अगस्तीचि दुसरा| म्हनौनि घोंटु भरों पाहे एकसरा| अवघेयाचा || ७०|| ऐसी सोय सांडूनि खवळिली| आवडी अर्जुनीं देवें देखिली| तेथ जालेनि सुखें केली| कुरवंडी तया || ७१|| श्रीभगवानुवाच | ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् | छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् || १|| मग म्हणे धनंजया| तें ऊर्ध्व गा तरू यया| येणें रुखेंचि कां जया| ऊर्ध्वता गमे || ७२|| एऱ्हवीं मध्योर्ध्व अध| हे नाहीं जेथ भेद| अद्वयासीं एकवद| जया ठायीं || ७३|| जो नाइकिजतां नादु| जो असौरभ्य मकरंदु| जो आंगाथिला आनंदु| सुरतेविण || ७४|| जया जें आऱ्हां परौतें| जया जें पुढें मागौतें| दिसतेविण दिसतें| अदृश्य जें || ७५|| उपाधीचा दुसरा| घालितां वोपसरा| नामरूपाचा संसारा| होय जयातें || ७६|| ज्ञातृज्ञेयाविहीन| नुसधेंचि जें ज्ञान| सुखा भरलें गगन| गाळींव जें || ७७|| जें कार्य ना कारण| जया दुजें ना एकपण| आपणयां जें जाण| आपणचि || ७८|| ऐसें वस्तु जें साचें| तें ऊर्ध्व गा यया तरूचें| तेथ आर घेणें मूळाचें| तें ऐसें असे || ७९|| तरी माया ऐसी ख्याती| नसतीच यया आथी| कां वांझेची संतती| वानणें जैशी || ८०|| तैशी सत ना असत होये| जे विचाराचें नाम न साहे| ऐसेया परीची आहे| अनादि म्हणती || ८१|| जे नानातत्त्वांंची मांदुस| जे जगदभ्राचें आकाश| जे आकारजाताचें दुस| घडी केलें || ८२|| जे भवद्रुमबीजिका| जे प्रपंचचित्र भूमिका| विपरीत ज्ञानदीपिका| सांचली जे || ८३|| ते माया वस्तूच्या ठायीं| असे जैसेनि नाहीं| मग वस्तुप्रभाचि पाही| प्रगट होये || ८४|| जेव्हां आपणया आली निद| करी आपणपें जेवीं मुग्ध| कां काजळी आणी मंद| प्रभा दीपीं || ८५|| स्वप्नीं प्रियापुढें तरुणांगी| निदेली चेववूनि वेगीं| आलिंगिलेनिवीण आलिंगी| सकामु करी || ८६|| तैसी स्वरूपीं जाली माया| आणी स्वरूप नेणे धनंजया| तेंचि रुखा यया| मूळ पहिलें || ८७|| वस्तूसी आपुला जो अबोधु| तो ऊर्ध्वीं आठुळैजे कंदु| वेदांतीं हाचि प्रसिद्धु| बीजभावो || ८८|| घन अज्ञान सुषुप्ती| तो बीजांकुरभावो म्हणती| येर स्वप्न हन जागृती| हा फळभावो तियेचा || ८९|| ऐसी यया वेदांतीं| निरूपणभाषाप्रतीती| परी तें असो प्रस्तुतीं| अज्ञान मूळ || ९०|| तें ऊर्ध्व आत्मा निर्मळें| अधोर्ध्व सूचिती मूळें| बळिया बांधोनि आळें| मायायोगाचें || ९१|| मग आधिलीं सदेहांतरें| उठती जियें अपारें| ते चौपासि घेऊनि आगारें| खोलावती || ९२|| ऐसें भवद्रुमाचें मूळ| हें ऊर्ध्वीं करी बळ| मग आणियांचें बेंचळ| अधीं दावी || ९३|| तेथ चिद्वृत्ति पहिलें| महत्तत्त्व उमललें| तें पान वाल्हेंदुल्हें| एक निघे || ९४|| मग सत्त्वरजतमात्मकु| त्रिविध अहंकारु जो एकु| तो तिवणा अधोमुखु| डिरु फुटे || ९५|| तो बुद्धीची घेऊनि आगारी| भेदाची वृद्धि करी| तेथे मनाचे डाळ धरी| साजेपणें || ९६|| ऐसा मूळाचिया गाढिका| विकल्परस कोंवळिका| चित्तचतुष्टय डाहाळिका| कोंभैजे तो || ९७|| मग आकाश वायु द्योतक| आप पृथ्वी हें पांच फोंक| महाभूतांचें सरोख| सरळे होती || ९८|| तैसीं श्रोत्रादि तन्मात्रें| तियें अंगवसां गर्भपत्रें| लुळलुळितें विचित्रें| उमळती गा || ९९|| तेथ शब्दांकुर वरिपडी| श्रोत्रा वाढी देव्हडी| होता करित कांडीं| आकांक्षेचीं || १००|| अंगत्वचेचे वेलपल्लव| स्पर्शांकुरीं घेती धांव| तेथ बांबळ पडे अभिनव| विकारांचें || १०१|| पाठीं रूपपत्र पालोवेलीं| चक्षु लांब तें कांडें घाली| ते वेळीं व्यामोहता भली| पाहाळीं जाय || १०२|| आणि रसाचें आंगवसें| वाढतां वेगें बहुवसें| जिव्हे आर्तीची असोसें| निघती बेंचें || १०३|| तैसेंचि कोंभैलेनि गंधें| घ्राणाची डिरी थांबुं बांधे| तेथ तळु घे स्वानंदें| प्रलोभाचा || १०४|| एवं महदहंबुद्धि| मनें महाभूतसमृद्धी| इया संसाराचिया अवधी| सासनिजे || १०५|| किंबहुना इहीं आठें| आंगीं हा अधिक फांटे| परी शिंपीचियेवढें उमटे| रुपें जेवीं || १०६|| कां समुद्राचेनि पैसारें| वरी तरंगता आसारे| तैसें ब्रह्मचि होय वृक्षाकारें| अज्ञानमूळ || १०७|| आतां याचा हाचि विस्तारु| हाचि यया पैसारु| जैसा आपणपें स्वप्नीं परिवारु| येकाकिया || १०८|| परी तें असो हें ऐसें| कावरें झाड उससे| यया महदादि आरवसें| अधोशाखा || १०९|| आणि अश्वत्थु ऐसें ययातें| म्हणती जे जाणते| तेंही परिस हो येथें| सांगिजैल || ११०|| तरी श्वः म्हणिजे उखा| तोंवरी एकसारिखा| नाहीं निर्वाहो यया रुखा| प्रपंचरूपा || १११|| जैसा न लोटतां क्षणु| मेघु होय नानावर्णु| कां विजु नसे संपूर्णु| निमेषभरी || ११२|| ना कांपतया पद्मदळा| वरीलिया बैसका नाहीं जळा| कां चित्त जैसें व्याकुळा| माणुसाचें || ११३|| तैसीचि ययाची स्थिती| नासत जाय क्षणक्षणाप्रती| म्हणौनि ययातें म्हणती| अश्वत्थु हा || ११४|| आणि अश्वत्थु येणें नांवें| पिंपळु म्हणती स्वभावें| परी तो अभिप्राय नव्हे| श्रीहरीचा || ११५|| एऱ्हवीं पिंपळु म्हणतां विखीं| मियां गति देखिली असे निकी| परी तें असो काय लौकिकीं| हेतु काज || ११६|| म्हणौनि हा प्रस्तुतु| अलौकिकु परियेसा ग्रंथु| तरी क्षणिकत्वेंचि अश्वत्थु| बोलिजे हा || ११७|| आणीकुही येकु थोरु| यया अव्ययत्वाचा डगरु| आथी परी तो भीतरु| ऐसा आहे || ११८|| जैसा मेघांचेनि तोंडें| सिंधु एके आंगें काढे| आणि नदी येरीकडे| भरितीच असती || ११९|| तेथ वोहटे ना चढे| ऐसा परिपूर्णुचि आवडे| परी ते फुली जंव नुघडे| मेघानदींची || १२०|| ऐसें या रुखाचें होणें जाणें| न तर्के होतेनि वहिलेपणें| म्हणौनि ययातें लोकु म्हणे| अव्ययु हा || १२१|| एऱ्हवीं दानशीळु पुरुषु| वेंचकपणेंचि संचकु| तैसा व्ययेंचि हा रुखु| अव्ययो गमे || १२२|| जातां वेगें बहुवसें| न वचे कां भूमीं रुतलें असे| रथाचें चक्र दिसे| जियापरी || १२३|| तैसें काळातिक्रमें जे वाळे| ते भूतशाखा जेथ गळे| तेथ कोडीवरी उमाळे| उठती आणिक || १२४|| परी येकी केधवां गेली| शाखाकोडी केधवां जाली| हें नेणवे जेवीं उमललीं| आषाढाभ्रें || १२५|| महाकल्पाच्या शेवटीं| उदेलिया उमळती सृष्टी| तैसेंचि आणिखीचें दांग उठी| सासिन्नलें || १२६|| संहारवातें प्रचंडें| पडती प्रळयांतींचीं सालडें| तंव कल्पादीचीं जुंबाडें| पाल्हेजती || १२७|| रिगे मन्वंतर मनूपुढें| वंशावरी वंशांचे मांडे| जैसी इक्षुवृद्धी कांडेंनकांडें| जिंके जेवीं || १२८|| कलियुगांतीं कोरडीं| चहुं युगांची सालें सांडी| तंव कृतयुगाची पेली देव्हडी| पडे पुढती || १२९|| वर्ततें वर्ष जाये| तें पुढिला मुळहारी होये| जैसा दिवसु जात कीं येत आहे| हें चोजवेना || १३०|| जैशा वारियाच्या झुळकां| सांदा ठाउवा नव्हे देखा| तैसिया उठती पडती शाखा| नेणों किती || १३१|| एकी देहाची डिरी तुटे| तंव देहांकुरीं बहुवी फुटे| ऐसेनि भवतरु हा वाटे| अव्ययो ऐसा || १३२|| जैसें वाहतें पाणी जाय वेगें| तैसेंचि आणिक मिळे मागें| येथ असंतचि असिजे जगें| मानिजे संत || १३३|| कां लागोनि डोळां उघडे| तंव कोडीवरी घडे मोडे| नेणतया तरंगु आवडे| नित्यु ऐसा || १३४|| वायसा एकें बुबुळें दोहींकडे| डोळा चाळीतां अपाडें| दोन्ही आथी ऐसा पडे| भ्रमु जेवीं जगा || १३५|| पैं भिंगोरी निधिये पडली| ते गमे भूमीसी जैसी जडली| ऐसा वेगातिशयो भुली| हेतु होय || १३६|| हें बहु असो झडती| आंधारें भोवंडितां कोलती| ते दिसे जैसी आयती| चक्राकार || १३७|| हा संसारवृक्षु तैसा| मोडतु मांडतु सहसा| न देखोनि लोकु पिसा| अव्ययो मानी || १३८|| प
|
|
|
|