[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय पहिला | अर्जुनविषादयोगः | ॐ नमो जी आद्या| वेद प्रतिपाद्या| जय जय स्वसंवेद्या| आत्मरूपा || १|| देवा तूंचि गणेशु| सकलार्थमतिप्रकाशु| म्हणे निवृत्तिदासु| अवधारिजो जी || २|| हें शब्दब्रह्म अशेष| तेचि मूर्ति सुवेष| जेथ वर्णवपु निर्दोष| मिरवत असे || ३|| स्मृति तेचि अवयव| देखा आंगीक भाव| तेथ लावण्याची ठेव| अर्थशोभा || ४|| अष्टादश पुराणें| तींचि मणिभूषणें| पदपद्धति खेवणें| प्रमेयरत्नांचीं || ५|| पदबंध नागर| तेंचि रंगाथिले अंबर| जेथ साहित्य वाणें सपूर| उजाळाचें || ६|| देखा काव्य नाटका| जे निर्धारितां सकौतुका| त्याचि रुणझुणती क्षुद्रघंटिका| अर्थध्वनि || ७|| नाना प्रमेयांची परी| निपुणपणें पाहतां कुसरी| दिसती उचित पदें माझारीं| रत्नें भलीं || ८|| तेथ व्यासादिकांच्या मतीं| तेचि मेखळा मिरवती| चोखाळपणें झळकती| पल्लवसडका || ९|| देखा षड्दर्शनें म्हणिपती| तेची भुजांची आकृति| म्हणौनि विसंवादे धरिती| आयुधें हातीं || १०|| तरी तर्कु तोचि फरशु| नीतिभेदु अंकुशु| वेदांतु तो महारसु| मोदकु मिरवे || ११|| एके हातीं दंतु| जो स्वभावता खंडितु| तो बौद्धमतसंकेतु| वार्तिकांचा || १२|| मग सहजें सत्कारवादु| तो पद्मकरु वरदु| धर्मप्रतिष्ठा तो सिद्धु| अभयहस्तु || १३|| देखा विवेकवंतु सुविमळु| तोचि शुंडादंडु सरळु| जेथ परमानंदु केवळु| महासुखाचा || १४|| तरी संवादु तोचि दशनु| जो समता शुभ्रवर्णु| देवो उन्मेषसूक्ष्मेक्षणु| विघ्नराजु || १५|| मज अवगमलिया दोनी| मिमांसा श्रवणस्थानीं| बोधमदामृत मुनी| अली सेविती || १६|| प्रमेयप्रवाल सुप्रभ| द्वैताद्वैत तेचि निकुंभ| सरिसेपणें एकवटत इभ- | मस्तकावरी || १७|| उपरि दशोपनिषदें| जियें उदारें ज्ञानमकरंदे| तियें कुसुमें मुगुटीं सुगंधें| शोभती भलीं || १८|| अकार चरण युगल| उकार उदर विशाल| मकार महामंडल| मस्तकाकारें || १९|| हे तीन्ही एकवटले| तेथ शब्दब्रह्म कवळलें| तें मियां श्रीगुरुकृपा नमिलें| आदिबीज || २०|| आतां अभिनव वाग्विलासिनी| ते चातुर्यार्थकलाकामिनी| ते शारदा विश्वमोहिनी| नमिली मियां || २१|| मज हृदयीं सद्गुरु| जेणें तारिलों हा संसारपूरु| म्हणौनि विशेषें अत्यादरु| विवेकावरी || २२|| जैसें डोळ्यां अंजन भेटे| ते वेळीं दृष्टीसी फांटा फुटे| मग वास पाहिजे तेथ| प्रगटे महानिधी || २३|| कां चिंतामणी जालियां हातीं| सदा विजयवृत्ति मनोरथीं| तैसा मी पूर्णकाम श्रीनिवृत्ति| ज्ञानदेवो म्हणे || २४|| म्हणोनि जाणतेनें गुरु भजिजे| तेणें कृतकार्य होईजे| जैसें मुळसिंचनें सहजें| शाखापल्लव संतोषती || २५|| कां तीर्थें जियें त्रिभुवनीं| तियें घडती समुद्रावगाहनीं| ना तरी अमृतरसास्वादनीं| रस सकळ || २६|| तैसा पुढतपुढती तोचि| मियां अभिवंदिला श्रीगुरुचि| जो अभिलषित मनोरुचि| पुरविता तो || २७|| आतां अवधारा कथा गहन| जे सकळां कौतुकां जन्मस्थान| कीं अभिनव उद्यान| विवेकतरूचें || २८|| ना तरी सर्व सुखाचि आदि| जे प्रमेयमहानिधि| नाना नवरससुधाब्धि| परिपुर्ण हे || २९|| कीं परमधाम प्रकट| सर्व विद्यांचे मूळपीठ| शास्त्रजाता वसौट| अशेषांचें || ३०|| ना तरी सकळ धर्मांचें माहेर| सज्जनांचे जिव्हार| लावण्यरत्नभांडार| शारदेचें || ३१|| नाना कथारूपें भारती| प्रकटली असे त्रिजगतीं| आविष्करोनि महामतीं| व्यासाचिये || ३२|| म्हणौनि हा काव्यांरावो| ग्रंथ गुरुवतीचा ठावो| एथूनि रसां झाला आवो| रसाळपणाचा || ३३|| तेवींचि आइका आणिक एक| एथूनि शब्दश्री सच्छास्त्रिक| आणि महाबोधीं कोंवळीक| दुणावली || ३४|| एथ चातुर्य शहाणें झालें| प्रमेय रुचीस आलें| आणि सौभाग्य पोखलें| सुखाचें एथ || ३५|| माधुर्यीं मधुरता| श्रुंगारीं सुरेखता| रूढपण उचितां| दिसे भलें || ३६|| एथ कळाविदपण कळा| पुण्यासि प्रतापु आगळा| म्हणौनि जनमेजयाचे अवलीळा| दोष हरले || ३७|| आणि पाहतां नावेक| रंगीं सुरंगतेची आगळीक| गुणां सगुणपणाचें बिक| बहुवस एथ || ३८|| भानुचेनि तेजें धवळलें| जैसे त्रैलोक्य दिसे उजळिलें| तैसें व्यासमति कवळिलें| मिरवे विश्व || ३९|| कां सुक्षेत्रीं बीज घातलें| तें आपुलियापरी विस्तारलें| तैसें भारतीं सुरवाडलें| अर्थजात || ४०|| ना तरी नगरांतरीं वसिजे| तरी नागराचि होईजे| तैसें व्यासोक्तितेजें| धवळत सकळ || ४१|| कीं प्रथमवयसाकाळीं| लावण्याची नव्हाळी| प्रगटे जैसी आगळी| अंगनाअंगीं || ४२|| ना तरी उद्यानीं माधवी घडे| तेथ वनशोभेची खाणी उघडे| आदिलापासौनि अपाडें| जियापरी || ४३|| नानाघनीभूत सुवर्ण| जैसें न्याहाळितां साधारण| मग अलंकारीं बरवेपण| निवाडु दावी || ४४|| तैसें व्यासोक्ति अळंकारिलें| आवडे तें बरवेपण पातलें| तें जाणोनि काय आश्रयिलें| इतिहासीं || ४५|| नाना पुरतिये प्रतिष्ठेलागीं| सानीव धरूनि आंगीं| पुराणें आख्यानरूपें जगीं| भारता आलीं || ४६|| म्हणौनि महाभारतीं नाहीं| तें नोहेचि लोकीं तिहीं| येणें कारणें म्हणिपे पाहीं| व्यासोच्छिष्ट जगत्रय || ४७|| ऐसी जगीं सुरस कथा| जें जन्मभूमि परमार्था| मुनि सांगे नृपनाथा| जनमेजया || ४८|| जें अद्वितीय उत्तम| पवित्रैक निरुपम| परम मंगलधाम| अवधारिजो || ४९|| आतां भारतकमळपरागु| गीताख्यु प्रसंगु| जो संवादला श्रीरंगु| अर्जुनेंसीं || ५०|| ना तरी शदब्रह्माब्धि| मथियला व्यासबुद्धि| निवडिलें निरवधि| नवनीत हें || ५१|| मग ज्ञानाग्निसंपर्कें| कडसिलेंनि विवेकें| पद आलें परिपाकें| आमोदासी || ५२|| जें अपेक्षिजे विरक्तीं| सदा अनुभविजे संतीं| सोहंभावें पारंगतीं| रमिजे जेथ || ५३|| जें आकर्णिजें भक्तीं| जें आदिवंद्य त्रिजगतीं| तें भीष्मपर्वीं संगती| म्हणितली कथा || ५४|| जें भगवद्गीता म्हणिजे| जें ब्रह्मेशांनीं प्रशंसिजे| जें सनकादिकीं सेविजे| आदरेंसीं || ५५|| जैसें शारदीचिये चंद्रकळे| माजि अमृतकण कोंवळे| ते वेंचिती मनें मवाळें| चकोरतलगें || ५६|| तियापरी श्रोतां| अनुभवावी हे कथा| अतिहळुवारपण चित्ता| आणूनियां || ५७|| हें शब्देंवीण संवादिजे| इंद्रियां नेणतां भोगिजे| बोलाआधि झोंबिजे| प्रमेयासी || ५८|| जैसे भ्रमर परागु नेती| परी कमळदळें नेणती| तैसी परी आहे सेविती| ग्रंथीं इये || ५९|| कां आपुला ठावो न सांडितां| आलिंगिजे चंद्रु प्रकटतां| हा अनुरागु भोगितां| कुमुदिनी जाणे || ६०|| ऐसेनि गंभीरपणें| स्थिरावलोनि अंतःकरणें| आथिला तोचि जाणें| मानूं इये || ६१|| अहो अर्जुनाचिये पांती| जे परिसणया योग्य होती| तिहीं कृपा करूनि संतीं| अवधान द्यावें || ६२|| हें सलगी म्यां म्हणितलें| चरणां लागोनि विनविलें| प्रभू सखोल हृदय आपुलें| म्हणौनियां || ६३|| जैसा स्वभावो मायबापांचा| अपत्य बोले जरी बोबडी वाचा| तरी अधिकचि तयाचा| संतोष आथी || ६४|| तैसा तुम्हीं मी अंगिकारिला| सज्जनीं आपुला म्हणितला| तरी उणें सहजें उपसाहला| प्रार्थूं कायी || ६५|| परी अपराधु तो आणिक आहे| जे मी गीतार्थु कवळुं पाहें| तें अवधारा विनवूं लाहें| म्हणौनियां || ६६|| हें अनावर न विचारितां| वायांचि धिंवसा उपनला चित्ता| येऱ्हवीं भानुतेजीं काय खद्योता| शोभा आथी || ६७|| कीं टिटिभू चांचुवरी| माप सूये सागरीं| मी नेणतु त्यापरी| प्रवर्तें येथ || ६८|| आइका आकाश गिंवसावें| तरी आणीक त्याहूनि थोर होआवें| म्हणौनि अपाडू हें आघवें| निर्धारितां || ६९|| या गीतार्थाची थोरी| स्वयें शंभू विवरी| जेथ भवानी प्रश्नु करी| चमत्कारौनि || ७०|| तेथ हरु म्हणे नेणिजे| देवी जैसें कां स्वरूप तुझें| तैसें हें नित्य नूतन देखिजे| गीतातत्व || ७१|| हा वेदार्थ सागरु| जया निद्रिताचा घोरु| तो स्वयें सर्वेश्वरु| प्रत्यक्ष अनुवादला || ७२ || ऐसे जें अगाध| जेथ वेडावती वेद| तेथ अल्प मी मतिमंद| काई होये || ७३|| हें अपार कैसेनि कवळावें| महातेज कवणें धवळावें| गगन मुठीं सुवावें| मशकें केवीं ? || ७४|| परी एथ असे एकु आधारु| तेणेंचि बोले मी सधरु| जे सानुकूळ श्रीगुरु| ज्ञानदेवो म्हणे || ७५|| येऱ्हवीं तरी मी मुर्खु| जरी जाहला अविवेकु| तऱ्ही संतकृपादीपकु| सोज्वळु असे || ७६|| लोहाचें कनक होये| हें सामर्थ्य परिसींच आहे| कीं मृतही जीवित लाहे| अमृतसिद्धि || ७७|| जरी प्रकटे सिद्धसरस्वती| तरी मुकयाहि आथी भारती| एथ वस्तुसामर्थ्यशक्ति| नवल कयी || ७८|| जयातें कामधेनु माये| तयासी अप्राप्य कांहीं आहे| म्हणौनि मी प्रवर्तों लाहें| ग्रंथीं इये || ७९|| तरी न्यून ते पुरतें| अधिक तें सरतें| करूनि घेयावें हें तुमतें| विनवितु असे || ८०|| आतां देईजो अवधान| तुम्हीं बोलविल्या मी बोलेन| जैसे चेष्टे सूत्राधीन| दारुयंत्र || ८१|| तैसा मी अनुग्रहीतु| साधूंचा निरूपितु| ते आपुलियापरी अलंकारितु| भलतयापरी || ८२|| तंव श्रीगुरु म्हणती राहीं| हे तुज बोलावें नलगे कांहीं| आतां ग्रंथा चित्त देईं| झडकरी वेगां || ८३|| या बोला निवृत्तिदासु| पावूनि परम उल्हासु| म्हणे परियसा मना अवकाशु| देऊनियां || ८४|| धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय || १|| तरी पुत्रस्नेहें मोहितु| धृतराष्ट्र असे पुसतु| म्हणे संजया सांगे मातु| कुरुक्षेत्रींची || ८५|| जें धर्मालय म्हणिजे| तेथ पांडव आणि माझे| गेले असती व्याजें| जुंझाचेनि || ८६|| तरी तेचि येतुला अवसरीं| काय किजत असे येरयेरीं| ते झडकरी कथन करी| मजप्रती || ८७|| संजय उवाच | दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा | आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् || २|| तिये वेळीं तो संजय बोले| म्हणे पांडव सैन्य उचललें| जैसें महाप्रळयीं पसरलें| कृतांतमुख || ८८|| तैसें तें घनदाट| उठावलें एकवाट| जैसें उसळलें काळकूट| धरी कवण || ८९|| नातरी वडवानळु सादुकला| प्रळयवातें पोखला| सागरु शोषूनि उधवला| अंबरासी || ९०|| तैसें दळ दुर्धर| नानाव्यूहीं परीकर| अवगमलें भयासुर| तिये काळीं || ९१|| तें देखोनियां दुर्योधनें| अव्हेरिलें कवणें मानें| जैसे न गणिजे पंचाननें| गजघटांतें || ९२|| पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् | व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता || ३|| मग द्रोणापासीं आला| तयांतें म्हणे हा देखिला| कैसा दळभारू उचलला| पांडवांचा || ९३|| गिरिदुर्ग जैसे चालते| तैसे विविध व्यूह सभंवते| रचिले आथी बुद्धिमंतें| द्रुपदकुमरें || ९४|| जो हा तुम्हीं शिक्षापिला| विद्या देऊनि कुरुठा केला| तेणें हा सैन्यसिंहु पाखरिला| देख देख || ९५|| अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि | युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः || ४|| आणिकही असाधारण| जे शस्त्रास्त्रीं प्रवीण| क्षात्रधर्मीं निपुण| वीर आहाती || ९६|| जे बळें प्रौढी पौरुषें| भीमार्जुनांसारिखे| ते सांगेन कौतुकें| प्रसंगेची || ९७|| एथ युयुधानु सुभटु| आला असे विराटु| महारथी श्रेष्ठु| द्रुपद वीरु || ९८|| धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान | पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः || ५|| युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान | सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः || ६|| चेकितान धृष्टकेतु| काशिराज वीर विक्रांतु| उत्तमौजा नृपनाथु| शैब्य देख || ९९|| हा कुंतिभोज पाहें| एथ युधामन्यु आला आहे| आणि पुरुजितादि राय हे| सकळ देख || १००|| हा सुभद्राहृदयनंदनु| जो अपरु नवार्जुनु| तो अभिमन्यु म्हणे दुर्योधनु| देखें द्रोणा || १०१|| आणीकही द्रौपदीकुमर| हे सकळही महारथी वीर| मिती नेणिजे परी अपार| मीनले असती || १०२|| अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम | नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते || ७|| भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || ८|| आतां आमुच्या दळीं नायक| जे रूढवीर सैनिक| ते प्रसंगें आइक| सांगिजती || १०३|| उद्देशें एक दोनी| जायिजती बोलोनी| तुम्ही आदिकरूनी| मुख्य जे जें || १०४|| हा भीष्म गंगानंदनु| जो प्रतापतेजस्वी भानु| रिपुगजपंचाननु| कर्णवीरु || १०५|| या एकेकाचेनी मनोव्यापारें| हें विश्व होय संहरे| हा कृपाचार्यु न पुरे| एकलाचि || १०६|| एथ विकर्ण वीरु आहे| हा अश्वत्थामा पैल पाहें| याचा आडदरु सदां वाहे| कृतांतु मनीं || १०७|| अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः | नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः || ९|| समितिंजयो सौमदत्ती| ऐसे आणीकही बहुत आहाती| जयांचिया बळा मिती| धाताही नेणें || १०८|| जे शास्त्रविद्यापारंगत| मंत्रावतार मूर्त| हो कां जें अस्त्रजात| एथूनि रूढ || १०९|| हे अप्रतिमल्ल जगीं| पुरता प्रतापु अंगीं| परी सर्व प्राणें मजलागीं| आरायिले असती || ११०|| पतिव्रतेचें हृदय जैसें| पतिवांचूनि न स्पर्शे| मी सर्वस्व या तैसें| सुभटांसी || १११|| आमुचिया काजाचेनि पाडें| देखती आपुलें जीवित थोकडें| ऐसे निरवधि चोखडें| स्वामिभक्त || ११२|| झुंजती कुळकणी जाणती| कळे किर्तीसी जिती| हे बहु असो क्षात्रनीति| एथोनियां || ११३|| ऐसे सर्वांपरि पुरते| वीर दळीं आमुते| आतं काय गणूं यांतें| अपार हे || ११४|| अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् | पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् || १०|| वरी क्षत्रियांमाजी श्रेष्ठु| जो जगजेठी जगीं सुभटु| तया दळवैपणाचा पाटु| भीष्मासि पैं || ११५|| आतां याचेनि बळें गवसलें| हे दुग जैसे पन्नासिलें| येणें पाडें थेकुलें| लोकत्रय || ११६|| आधींच समुद्र पाहीं| तेथ दुवाडपण कवणा नाहीं| मग वडवानळु तैसे याही| विरजा जैसा || ११७|| ना तरीं प्रळयवन्ही महावातु| या दोघां जैसा सांधातु| तैसा हा गंगासुतु| सेनापति || ११८|| आतां येणेंसि कवण भिडे| हें पांडवसैन्य कीर थोकडें| परि वरचिलेनि पाडें| दिसत असे || ११९|| वरी भीमसेनु बेथु| तो जाहला असे सेनानाथु| ऐसें बोलोनियां मातु| सांडिली तेणें || १२०|| अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः | भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि || ११|| मग पुनरपि काय बोले| सकळ सैनिकांतें म्हणितलें| आतां दळभार आपुलाले| सरसे करा || १२१|| जया जिया अक्षौहिणी| तेणें तिया आरणी| वरगण कवणकवणी| महारथीया || १२२|| तेणें तिया आवरिजे| भीष्मातळीं राहिजे| द्रोणातें म्हणे पाहिजे| तुम्ही सकळ || १२३|| हाचि एक
Heh Heh Heh...I was getting my hair cut at a neighborhood shop, and I asked the barber when would be the best time to bring in my two-year-old son for his first haircut. Without hesitation, the barber answered, "When he's four."