Home Marathi
 

Dnyaneshvari adhyay - 2 by ज्ञानेश्वरमहाराज

[Oct 31, 2007]

.. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय २ .. ||
 ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय दुसरा |
 साङ्ख्ययोगः | संजय उवाच | तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् | विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः || १||
मग संजयो म्हणे रायातें| आईके तो पार्थु तेथें| शोकाकुल रुदनातें| करितु असे || १||
तें कुळ देखोनि समस्त| स्नेह उपनलें अद्भुत| तेणें द्रवलें असे चित्त| कवणेपरी || २||
 जैसें लवण जळें झळंबलें| ना तरी अभ्र वातें हाले| तैसें सधीर परी विरमलें| हृदय तयाचें || ३||
 म्हणौनि कृपा आकळिला| दिसतसे अति कोमाइला| जैसा कर्दमीं रुपला| राजहंस || ४||
तयापरी तो पांडुकुमरु| महामोहें अति जर्जरु| देखोनि श्रीशारङ्गधरु| काय बोले || ५||
श्रीभगवानुवाच | कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् | अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन || २||
 म्हणे अर्जुना आदि पाहीं| हें उचित काय इये ठायीं| तूं कवण हें कायी| करीत आहासी || ६||
 तुज सांगे काय जाहलें| कवण उणें आलें| करितां काय ठेलें| खेदु कायिसा || ७||
 तूं अनुचिता चित्त नेदिसी| धीरु कहीं न संडिसी| तुझेनि नामें अपयशी| दिशा लंघिजे || ८||
तूं शूरवृत्तीचा ठावो| क्षत्रियांमाजीं रावो| तुझिया लाठेपणाचा आवो| तिहीं लोकीं || ९||
तुवां संग्रामीं हरु जिंकिला| निवातकवचांचा ठावो फेडिला| पवाडा तुवां केला| गंधर्वांसीं || १०||
 पाहतां तुझेनि पाडें| दिसे त्रैलोक्यही थोकडें| ऐसें पुरुषत्व चोखडें| पार्था तुझें || ११||
 तो तूं कीं आजि एथें| सांडूनियां वीरवृत्तीतें| अधोमुख रुदनातें| करितु आहासी || १२||
विचारी तूं अर्जुनु| कीं कारुण्यें किजसी दीनु| सांग पां अंधकारें भानु| ग्रासिला आथी ? || १३||
ना तरी पवनु मेघासी बिहे ? | कीं अमृतासी मरण आहे ? | पाहें पां इंधनचि गिळोनि जाये| पावकातें ? || १४||
कीं लवणेंचि जळ विरे ? | संसर्गें काळकूट मरे ? | सांग पां महाफणी दर्दुरें| गिळिजे कायी ? || १५||
सिंहासी झोंबे कोल्हा| ऐसा अपाडु आथि कें जाहला ? | परी तो त्वां साच केला| आजि एथ || १६||
 म्हणौनि अझुनी अर्जुना| झणें चित्त देसी या हीना| वेगीं धीर करूनियां मना| सावधु होई || १७||
 सांडीं हें मूर्खपण| उठीं घे धनुष्यबाण| संग्रामीं हें कवण| कारुण्य तुझें ? || १८||
 हां गा तूं जाणता| तरी न विचारिसी कां आतां| सांगें झुंजावेळे सदयता| उचित कायी ? || १९||
 हे असतीये कीर्तीसी नाशु| आणि पारत्रिकासी अपभ्रंशु| म्हणे जगन्निवासु| अर्जुनातें || २०||
 क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते | क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप || ३||
 म्हणौनि शोकु न करी| तूं पुरता धीरु धरीं| हें शोच्यता अव्हेरीं| पंडुकुमरा || २१||
 तुज नव्हे हें उचित| येणें नासेल जोडलें बहुत| तूं अझुनी वरी हित| विचारीं पां || २२||
 येणें संग्रामाचेनि अवसरें| एथ कृपाळूपण नुपकरे| हे आतांचि काय सोयरे| जाहले तुज ? || २३||
 तूं आधींचि काय नेणसी ? | कीं हे गोत्रज नोळखसी ? | वायांचि काय करिसी| अतिशो आतां ? || २४||
 आजिचें हें झुंज| काय जन्मा नवल तुज ? | हें परस्परें तुम्हां व्याज| सदांचि आथी || २५||
 तरी आतां काय जाहलें| कायि स्नेह उपनलें| हें नेणिजे परी कुडें केलें| अर्जुना तुवां || २६||
 मोहो धरिलीया ऐसें होईल| जे असती प्रतिष्ठा जाईल| आणि परलोकही अंतरेल| ऐहिकेंसी || २७||
 हृदयाचें ढिलेपण| एथ निकयासी नव्हे कारण| हें संग्रामीं पतन जाण| क्षत्रियांसीं || २८||
 ऐसेनि तो कृपावंतु| नानापरी असे शिकवितु| हें ऐकोनि पंडुसुतु| काय बोले || २९||
 अर्जुन उवाच | कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन | इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन || ४||
 देवा हें येतुलेवरी| बोलावें नलगे अवधारीं| आधीं तूंचि विचारीं| संग्रामु हा || ३०||
हें झुंज नव्हे प्रमादु| एथ प्रवर्तलिया दिसतसे बाधु| हा उघड लिंगभेदु| वोढवला आम्हां || ३१||
देखें मातापितरें अर्चिजती| सर्वस्वें तोषु पावविजती| तिये पाठीं केवीं वधिजती| आपुलिया हातीं || ३२||
देवा संतवृंद नमस्कारिजे| कां घडे तरी पूजिजे| हें वांचूनि केवीं निंदिजे| स्वयें वाचा ? || ३३||
 तैसे गोत्रगुरु आमुचे| हे पूजनीय आम्हां नियमाचे| मज बहुत भीष्मद्रोणांचें| वर्ततसे || ३४||
 जयांलागीं मनें विरूं| आम्ही स्वप्नींही न शकों धरूं| तयां प्रत्यक्ष केवीं करूं| घातु देवा ? || ३५||
 वरी जळो हें जियालें| एथ आघवेयांसि हेंचि काय जाहले| जे यांच्या वधीं अभ्यासिले| मिरविजे आम्हीं || ३६||
 मी पार्थु द्रोणाचा केला| येणें धनुर्वेदु मज दिधला| तेणें उपकारें काय आभारैला| वधी तयातें ? || ३७||
 जेथींचिया कृपा लाहिजे वरु| तेथेंचि मनें व्यभिचारु| तरी काय मी भस्मासुरु| अर्जुन म्हणे || ३८||
 गुरुनहत्वा हि महानुभावान श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके | हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान || ५||
 देवा समुद्र गंभीर आइकिजे| वरि तोहि आहाच देखिजे| परी क्षोभु मनीं नेणिजे| द्रोणाचिये || ३९||
 हें अपार जें गगन| वरी तयाही होईल मान| परि अगाध भलें गहन| हृदय याचें || ४०||
वरी अमृतही विटे| कीं काळवशें वज्रही फुटे| परी मनोधर्मु न लोटे| विकरविलाही || ४१||
स्नेहालागीं माये| म्हणिपे तें कीरु होये| परी कृपा ते मूर्त आहे| द्रोणीं इये || ४२||
हा कारुण्याची आदि| सकल गुणांचा निधि| विद्यासिंधु निरवधि| अर्जुन म्हणे || ४३||
 हा येणें मानें महंतु| वरी आम्हांलागीं कृपावंतु| आतां सांग पां येथ घातु| चिंतूं येईल || ४४||
 ऐसे हे रणीं वधावे| मग आपण राज्यसुख भोगावें| तें मना न ये आघवें| जीवितेसीं || ४५||
हें येणें मानें दुर्धर| जे याहीहुनी भोग सधर| ते असतु येथवर| भिक्षा मागतां भली || ४६||
ना तरी देशत्यागें जाइजे| कां गिरिकंदर सेविजे| परी शस्त्र आतां न धरिजे| इयांवरी || ४७||
 देवा नवनिशतीं शरीं| वावरोनी यांच्या जिव्हारीं| भोग गिंवसावे रुधिरीं| बुडाले जे || ४८||
ते काढूनि काय किजती ? | लिप्त केवी सेविजती ? | मज नये हे उपपत्ती| याचिलागीं || ४९||
ऐसें अर्जुन तिये अवसरी| म्हणे श्रीकृष्णा अवधारीं| परी तें मना नयेचि मुरारी| आइकोनियां || ५०||
हें जाणोनि पार्थु बिहाला| मग पुनरपि बोलों लागला| म्हणे देवो कां चित्त या बोला| देतीचिना || ५१||
 न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः | यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः || ६||
 येऱ्हवीं माझ्या चित्तीं जें होतें| तें मी विचारूनि बोलिलों एथें| परी निकें काय यापरौतें| तें तुम्हीं जाणा || ५२||
 पैं वीरु जयांसी ऐकिजे| आणि या बोलींचि प्राणु सांडिजे| ते एथ संग्रामव्याजें| उभे आहाती || ५३||
 आतां ऐसियांतें वधावें| कीं अव्हेरूनियां निघावें| या दोहींमाजीं बरवें| तें नेणों आम्ही || ५४||
 कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः | यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् || ७||
आम्हां काय उचित| तें पाहतां न स्फुरे एथ| जें मोहें येणें चित्त| व्याकुळ माझें || ५५||
तिमिरावरुद्ध जैसें| दृष्टीचें तेज भ्रंशे| मग पासींच असतां न दिसे| वस्तुजात || ५६||
देवा तैसें मज जाहलें| जें मन हें भ्रांती ग्रासिलें| आतां काय हित आपुलें| तेंही नेणें || ५७||
तरी श्रीकृष्णा तुवां जाणावें| निकें तें आम्हां सांगावें| जे सखा सर्वस्व आघवें| आम्हांसि तूं || ५८||
तूं गुरु बंधु पिता| तूं आमुची इष्ट देवता| तूंचि सदा रक्षिता| आपदीं आमुतें || ५९||
जैसा शिष्यांतें गुरु| सर्वथा नेणें अव्हेरु| कीं सरितांतें सागरु| त्यजीं केवी || ६०||
नातरी अपत्यांतें माये| सांडूनि जरी जाये| तरी तें कैसेंनि जिये| ऐकें कृष्णा || ६१||
तैसा सर्वांपरी आम्हांसी| देवा तूंचि एक आहासी| आणि बोलिलें जरी न मानिसी| मागील माझें || ६२||
 तरी उचित काय आम्हां| जें व्यभिचरेना धर्मा| तें झडकरी पुरुषोत्तमा| सांगें आतां || ६३||
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् | अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् || ८||
 हें सकळ कुळ देखोनि| जो शोकु उपनलासे मनीं| तो तुझिया वाक्यावांचुनी| न जाय आणिकें || ६४||
एथ पृथ्वीतळ आपु होईल| हें महेंद्रपदही पाविजेल| परी मोह हा न फिटेल| मानसींचा || ६५||
जैसीं बीजें सर्वथा आहाळलीं| तीं सुक्षेत्रीं जऱ्ही पेरिलीं| तरी न विरूढती सिंचिलीं| आवडे तैसीं || ६६||
ना तरी आयुष्य पुरलें आहे| तरी औषधें कांहीं नोहे| एथ एकचि उपेगा जाये| परमामृत || ६७||
तैसे राज्यभोगसमृद्धि| उज्जीवन नोहे जीव बुद्धि| एथ जिव्हाळा कृपानिधि| कारुण्य तुझें || ६८||
ऐसें अर्जुन तेथ बोलिला| जंव क्षण एक भ्रांति सांडिला| मग पुनरपि व्यापिला| उर्मी तेणें || ६९||
कीं मज पाहतां उर्मी नोहे| हें अनारिसें गमत आहे| तो ग्रासिला महामोहें| काळसर्पें || ७०||
सवर्म हृदयकल्हारीं| तेथ कारुण्यवेळेच्या भरीं| लागला म्हणोनि लहरी| भांजेचिना ? || ७१||
हें जाणोनि ऐसी प्रौढी| जो दृष्टीसवेंचि विष फेडी| तो धांवया श्रीहरी गारुडी| पातला कीं || ७२||
तैसिया पंडुकुमरा व्याकुळा| मिरवतसे श्रीकृष्ण जवळा| तो कृपावशें अवलीळा| रक्षील आतां || ७३||
म्हणोनि तो पार्थु| मोहफणिग्रस्तु| म्यां म्हणितला हा हेतु| जाणोनियां || ७४||
मग देखा तेथ फाल्गुनु| घेतला असे भ्रांती कवळूनु| जैसा घनपटळीं भानु| आच्छादिजे || ७५||
तयापरी तो धनुर्धरु| जाहलासे दुःखें जर्जरु| जैसा ग्रीष्मकाळीं गिरिवरु| वणवला कां || ७६||
म्हणोनि सहजें सुनीळु| कृपामृतें सजळु| तो वोळलासे श्रीगोपाळु| महामेघु || ७७||
 तेथ सुदशनांची द्युति| तेचि विद्युल्लता झळकती| गंभीर वाचा ते आयती| गर्जनेची || ७८||
 आतां तो उदार कैसा वर्षेल| तेणें अर्जुनाचळु निवेल| मग नवी विरूढी फुटेल| उन्मेषाची || ७९||
ते कथा आइका| मनाचिया आराणुका| ज्ञानदेवो म्हणे देखा| निवृत्तिदासु || ८०||
संजय उवाच | एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप | न योत्स्य इति गोविंमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह || ९||
 ऐसें संजयो असे सांगतु| म्हणे राया तो पार्थु| पुनरपि शोकाकुळितु| काय बोले || ८१||
आइके सखेदु बोले श्रीकृष्णातें| आतां नाळवावें तुम्हीं मातें| मी सर्वथा न झुंजें एथें| भरंवसेनी || ८२||
ऐसें येकि हेळां बोलिला| मग मौन धरूनि ठेला| तेथ श्रीकृष्णा विस्मो पातला| देखोनि तयातें || ८३||
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत | सेनयोरूभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः || १०||
 मग आपुलां चित्तीं म्हणे| एथ हें कायी आदरिलें येणें| अर्जुन सर्वथा कांहीं नेणें| काय कीजे || ८४||
 हा उमजे आतां कवणेपरी| कैसेनि धीरू स्वीकारी| जैसा ग्रहातें पंचाक्षरी| अनुमानी कां || ८५||
ना तरी असाध्य देखोनि व्याधि| अमृतासम दिव्य औषधि| वैद्य सूचि निरवधि| निदानीची || ८६||
तैसे विवरीतु असे श्रीअनंतु| तया दोन्ही सैन्याआंतु| जयापरी पार्थु| भ्रांती सांडी || ८७||
तें कारण मनीं धरिलें| मग सरोष बोलों आदरिलें| जैसे मातेच्या कोपीं थोकुलें| स्नेह आथी || ८८||
कीं औषधाचिया कडुवटपणीं| जैसी अमृताची पुरवणीं| ते आहाच न दिसे परी गुणीं| प्रकट होय || ८९||
तैसीं वरिवरी पाहतां उदासें| आंत तरी अतिसुरसें| तियें वाक्यें हृषीकेशें| बोलों आदरिलीं || ९०||
श्रीभगवानुवाच | अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे | गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः || ११||
मग अर्जुनातें म्हणितलें| आम्हीं आजि हें नवल देखिलें| जें तुवां एथ आदरिलें| माझारींचि || ९१||
तूं जाणता तरी म्हणविसी| परी नेणिवेतें न संडिसी| आणि शिकवूं म्हणों तरी बोलसी| बहुसाल नीति || ९२||
जात्यंधा लागे पिसें| मग तें सैरा धांवे जैसें| तुझे शहाणपण तैसें| दिसतसे || ९३||
तूं आपणपें तरी नेणसी| परी या कौरवांतें शोचूं पहासी| हा बहु विस्मय आम्हांसी| पुढतपुढती || ९४||
तरी सांग पां अर्जुना| तुजपासूनि स्थिति या त्रिभुवना ? | हे अनादि विश्वरचना| तें लटके कायी ? || ९५||
 एथ समर्थु एक आथी| तयापासूनि भूतें होती| तरी हें वायांचि काय बोलती| जगामाजीं ? || ९६||
हो कां सांप्रत ऐसें जाहलें| जे हे जन्ममृत्यु तुवां सृजिलें| आणि नाशु पावे नाशिलें| तुझेनि कायी || ९७||
तूं भ्रमलेपणें अहंकृती| यांसि घातु न धरिसी चित्तीं| तरी सांगें कायि हे होती| चिरंतन || ९८||
कीं तूं एक वधिता| आणि सकळ लोकु हा मरता| ऐसी भ्रांति झणें चित्ता| येवों देसी || ९९||
अनादिसिद्ध हें आघवें| होत जात स्वभावें| तरी तुवां कां शोचावें| सांगें मज || १००||
 परी मूर्खपणें नेणसी| न चिंतावें तें चिंतीसी| आणि तूंचि नीति सांगसी| आम्हांप्रति || १०१||
देखैं विवेकी जे होती| ते दोहीतेंहीं न शोचिती| जे होय जाय हे भ्रांती| म्हणौनियां || १०२||
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः | न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् || १२||
अर्जुना सांगेन आइक| एथ आम्ही तुम्ही देख| आणि हे भूपति अशेख| आदिकरुनी || १०३||
नित्यता ऐसेचि असोनी| ना तरी निश्चित क्षया जाउनी| हे भ्रांति वेगळी करुनी| दोन्ही नाहीं || १०४||
हे उपजे आणि नाशे| तें मायावशें दिसे| एऱ्हवीं तत्त्वता वस्तु जें असे| तें अविनाशचि || १०५||
जैसें पवनें तोय हालविलें| आणि तरंगाकार जाहलें| तरी कवण कें जन्मलें| म्हणों ये तेथ ? || १०६||
तेंचि वायूचें स्फुरण ठेलें| आणि उदक सहज सपाट जाहलें| तरी आतां काय निमालें| विचारीं पां || १०७||
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा | तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति || १३||
आइकें शरीर तरी एक| परी वयसा भेद अनेक| हें प्रत्यक्षचि देख| प्रमाण तूं || १०८||
एथ कौमारत्व दिसे| मग तारुण्यीं तें भ्रंशे| परी देहचि हा न नाशे| एकेकासवें || १०९||
तैसीं चैतन्याच्या ठायीं| इयें शरीरांतरें होती जाती पाहीं| ऐसें जाणे तया नाहीं| व्यामोहदुःख || ११०||
 मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदा | आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४||
%Sh एथ कौमारत्व दिसे| मग तारुण्यीं तें भ्रंशे| परी देहचि हा न नाशे| एकेकासवें || १०९||
तैसीं चैतन्याच्या ठायीं| इयें शरीरांतरें होती जाती पाहीं| ऐसें जाणे तया नाहीं| व्यामोहदुःख || ११०||
 एथ नेणावया हेंचि कारण| जें इंद्रियां आधीनपण| तिहीं आकळिजे अंतःकरण| म्हणऊनि भ्रमे || १११||
इंद्रियें विषय सेविती| तेथ हर्ष शोक उपजती| ते अंतर आप्लविती| संगें येणें || ११२||
जयां विषयांच्या ठायीं| एकनिष्ठता क

Browse Pages

About ज्ञानेश्वरमहाराज
Categories

Did you know?
Braces were first invented by Pierre Fauchard in 1728. The braces were made by a flat strip of metal, which was connected to the teeth by thread.

Heh Heh Heh...
Emma was telling her mummy a story about a witch who arrived at a hotel without her broom because the broom was late.
“Why was the broom late, Emma?” asked her mummy.
“Because it over swept, mummy. And, mummy, do you know what the witch asked for when she went to reception?”
“What did she ask for, Emma?”
“Broom service.”

© 2008 Saj Infotech • All rights reserved.