[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ३ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय तिसरा | कर्मयोगः | ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन | तत् किं कर्मणि घोरे माम् नियोजयसि केशव || १|| मग आइका अर्जुनें म्हणितलें| देवा तुम्ही जें वाक्य बोलिलें| तें निकें म्यां परिसिलें| कमळापती || १|| तेथ कर्म आणि कर्ता| उरेचिना पाहतां| ऐसें मत तुझें श्रीअनंता| निश्चित जरी || २|| तरी मातें केवीं श्रीहरी| म्हणसी पार्था संग्रामु करीं| इये लाजसी ना महाघोरीं| कर्मीं सुतां || ३|| हां गा कर्म तूंचि अशेष| निराकरिसी निःशेष| तरी मजकरवीं हें हिंसक| कां करविसी || ४|| तरी हेंचि विचारीं ऋषीकेशा| तूं मानु देसी कर्मलेशां| आणि येसणी हे हिंसा| करवीतु आहासी || ५|| व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे | तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् || २|| देवा तुवांचि ऐसें बोलावें| तरी आम्हीं नेणती काय करावें| आतां संपले म्हण पां आघवें| विवेकाचें || ६|| हां गा उपदेश जरी ऐसा| तरी अपभ्रंशु तो कैसा| आतां पुरला आम्हां धिंवसा| आत्मबोधाचा || ७|| वैद्यु पथ्य वारूनि जाये| मग जरी आपणचि विष सुये| तरी रोगिया कैसनि जिये| सांगैं मज || ८|| जैसें आंधळें सुईजे आव्हांटा| कां माजवण दीजे मर्कटा| तैसा उपदेशु हा गोमटा| वोढवला आम्हां || ९|| मी आधींचि कांहीं नेणें| वरी कवळिलों मोहें येणें| श्रीकृष्णा विवेकु या कारणें| पुसिला तुज || १०|| तंव तुझी एकेक नवाई| एथ उपदेशामाजीं गोवाई| तरी अनुसरलिया काई| ऐसें कीजे ? || ११|| आम्हीं तनुमनुजीवें| तुझिया बोला वोटंगावें| आणि तुवांचि ऐसें करावें| तरी सरलें म्हण || १२|| आतां ऐसियापरी बोधिसी| तरी निकें आम्हां करिसी| एथ ज्ञानाची आस कायसी| अर्जुन म्हणे || १३|| तरी ये जाणिवेचें तरी सरलें| परी आणिक एक असे जाहलें| जें थितें हें डहुळलें| मानस माझें || १४|| तेवींचि श्रीकृष्णा हें तुझें| चरित्र कांहीं नेणिजे| जरी चित्त पाहसी माझें| येणे मिषें || १५|| ना तरी झकवीतु आहासी मातें| कीं तत्त्वचि कथिले ध्वनितें| हें अवगमितां निरुतें| जाणवेना || १६|| म्हणौनि आइकें देवा| हा भावार्थु आतां न बोलावा| मज विवेकु सांगावा| मऱ्हाटा जी || १७|| मी अत्यंत जड असें| परी ऐसाही निकें परियेसें| श्रीकृष्णा बोलावें तुवां तैसें| एकनिष्ठ || १८|| देखैं रोगातें जिणावें| औषध तरी देयावें| परी तें अति रुच्य व्हावें| मधुर जैसें || १९|| तैसें सकळार्थभरित| तत्त्व सांगावें उचित| परी बोधें माझें चित्त| जयापरी || २०|| देवा तुज ऐसा निजगुरु| आजि आर्तीधणी कां न करूं| एथ भीड कवणाची धरूं| तूं माय आमुची || २१|| हां गां कामधेनूचें दुभतें| दैवें जाहलें जरी आपैतें| तरीं कामनेची कां तेथें| वानी कीजे ? || २२|| जरी चिंतामणी हाता चढे| तरी वांछेचें कवण सांकडें| कां आपुलेनि सुरवाडें| इच्छावें ना ? || २३|| देखा अमृतसिंधूतें ठाकावें| मग ताहाना जरी फुटावें| तरी सायासु कां करावे| मागील ते ? || २४|| तैसा जन्मांतरीं बहुतीं| उपासितां श्रीलक्ष्मीपती| तूं दैवें आजि हातीं| जाहलासी जरी || २५|| तरी आपुलिया सवेशा| कां न मागावासि परेशा ? | देवा सुकाळु हा मानसा| पाहला असे || २६|| देखैं सकळार्तींचें जियाले| आजि पुण्य यशासि आलें| हें मनोरथ जहाले| विजयी माझे || २७|| जी जी परममंगळधामा| सकळ देवदेवोत्तमा| तूं स्वाधीन आजि आम्हां| म्हणौनियां || २८|| जैसें मातेच्या ठायीं| अपत्या अनवसरू नाहीं| स्तन्यालागूनि पाहीं| जियापरी || २९|| तैसें देवा तूतें| पुसिजतसे आवडे तें| आपुलेनि आर्तें| कृपानिधीं || ३०|| तरीं पारत्रिकीं हित| आणि आचरितां तरी उचित| तें सांगैं एक निश्चित| पार्थु म्हणे || ३१|| श्रीभगवानुवाच | लोकेऽस्मिन द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ | ज्ञानयोगेन सांख्यानाम् कर्मयोगेन योगिनाम् || ३|| या बोला श्रीअच्युतु| म्हणतसे विस्मितु| अर्जुना हा ध्वनितु| अभिप्रावो || ३२|| जे बुद्धियोगु सांगतां| सांख्यमतसंस्था| प्रकटिली स्वभावता| प्रसंगें आम्हीं || ३३|| तो उद्देशु तूं नेणसीचि| म्हणौनि क्षोभलासि वायांचि| तरी आतां जाणें म्यांचि| उक्त दोन्ही || ३४|| अवधारीं वीरश्रेष्ठा| ये लोकीं या दोन्ही निष्ठा| मजचिपासूनि प्रगटा| अनादिसिद्धा || ३५|| एकु ज्ञानयोगु म्हणिजे| जो सांख्यीं अनुष्ठिजे| जेथ ओळखीसवें पाविजें| तद्रूपता || ३६|| एक कर्मयोगु जाण| जेथ साधकजन निपुण| होऊनियां निर्वाण| पावती वेळे || ३७|| हे मार्गु तरी दोनी| परी एकवटतीं निदानीं| जैसी सिद्धसाध्य भोजनीं| तृप्ती एक || ३८|| कां पूर्वापर सरितां| भिन्न दिसती पाहतां| मग सिंधुमिळणीं ऐक्यता| पावती शेखीं || ३९|| तैसीं दोनीही मतें| सूचितीं एका कारणातें| परी उपास्ति ते योग्यते- | आधीन असे || ४०|| देखैं उत्प्लवनासरिसां| पक्षी फळासि झोंबें जैसा| सांगैं नरु केवीं तैसा| पावे वेगा ? || ४१|| तो हळूहळू ढाळेंढाळें| केउतेनि एके वेळे| तया मार्गाचेनि बळें| निश्चित ठाकी || ४२|| तैसे देख पां विहंगममतें| अधिष्ठूनि ज्ञानातें| सांख्य सद्य मोक्षातें| आकळिती || ४३|| येर योगिये कर्माधारें| विहितेंचि निजाचारें| पूर्णता अवसरें| पावते होती || ४४|| न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते | न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति || ४|| वांचोनि कर्मारंभ उचित| न करितां सिद्धवत| कर्महीना निश्चित| होईजेना || ४५|| कीं प्राप्तकर्म सांडिजे| येतुलेनि नैष्कर्म्य होईजे| हें अर्जुना वायां बोलिजे| मूर्खपणें || ४६|| सांगैं पैलतीरा जावें| ऐसें व्यसन कां जेथ पावे| तेथ नावेतें त्यजावें| घडे केवीं ? || ४७|| ना तरी तृप्ति इच्छिजे| तरी कैसेनि पाकु न कीजे| कीं सिद्धुही न सेविजे| केवीं सांगैं ? || ४८|| न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् | कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः || ५|| जंव निरार्तता नाहीं| तंव व्यापारु असे पाहीं| मग संतुष्टीच्या ठायीं| कुंठें सहजें || ४९|| म्हणौनि आईकें पार्था| जयां नैष्कर्म्यपदीं आस्था| तया उचित कर्म सर्वथा| त्याज्य नोहे || ५०|| आणि आपुलिये चाडे| आपादिलें हें मांडे| कीं त्यजिलें कर्म सांडे| ऐसें आहे ? || ५१|| हें वायांचि सैरा बोलिजे| उकलु तरी देखोनि पाहिजे| परी त्यजिता कर्म न त्यजे| निभ्रांत मानीं || ५२|| जंव प्रकृतीचें अधिष्ठान| तंव सांडी मांडी हें अज्ञान| जे चेष्टा ते गुणाधीन| आपैसी असे || ५३|| देखैं विहित कर्म जेतुलें| तें सळें जरी वोसंडिलें| तरी स्वभाव काय निमाले| इंद्रियांचे || ५४|| सांगै श्रवणीं ऐकावें ठेलें ? | कीं नेत्रींचें तेज गेलें ? | हें नासारंध्र बुझालें| परिमळु नेघे ? || ५५|| ना तरी प्राणापानगति| कीं निर्विकल्प जाहली मती| कीं क्षुधातृषादि आर्ति| खुंटलिया || ५६|| हे स्वप्नावबोधु ठेले| कीं चरण चालों विसरले| हें असो काय निमाले| जन्ममृत्यु ? || ५७|| हें न ठकेचि जरी कांहीं| तरी सांडिलें तें कायी| म्हणौनि कर्मत्यागु नाहीं| प्रकृतिमंता || ५८|| कर्म पराधीनपणें| निपजतसे प्रकृतिगुणें| येरी धरीं मोकलीं अंतःकरणें| वाहिजे वायां || ५९|| देखैं रथीं आरूढिजे| मग जरी निश्चळा बैसिजे| तरी चळु होऊनि हिंडिजे| परतंत्रा || ६०|| कां उचलिलें वायुवशें| चळे शुष्क पत्र जैसें| निचेष्ट आकाशें| परिभ्रमें || ६१|| तैसें प्रकृतिआधारें| कर्मेंद्रियविकारें| नैष्कर्म्यही व्यापारे| निरंतर || ६२|| म्हणौनि संगू जंव प्रकृतीचा| तंव त्यागु न घडे कर्माचा| ऐसियाहि करूं म्हणती तयांचा| आग्रहोचि उरे || ६३|| कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन | इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते || ६|| जे उचित कर्म सांडिती| मग नैष्कर्म्य होऊं पाहती| परी कर्मेंद्रियप्रवृत्ती| निरोधुनी || ६४|| तयां कर्मत्यागु न घडे| जें कर्तव्य मनीं सांपडे| वरी नटती तें फुडें| दरिद्र जाण || ६५|| ऐसे ते पार्था| विषयासक्त सर्वथा| ओळखावे तत्त्वता| भ्रांति नाहीं || ६६|| आतां देईं अवधान| प्रसंगें तुज सांगेन| या नैराश्याचें चिन्ह| धनुर्धरा || ६७|| यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्याऽऽरभतेऽर्जुन | कर्मैन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते || ७|| जो अंतरीं दृढ| परमात्मरूपीं गूढ| बाह्य भागु तरी रूढ| लौकिकु जैसा || ६८|| तो इंद्रियां आज्ञा न करी| विषयांचें भय न धरी| प्राप्त कर्म नाव्हेरी| उचित जें जें || ६९|| तो कर्मेंद्रियें कर्मीं| राहटतां तरी न नियमी| परी तेथिचेनि उर्मीं| झांकोळेना || ७०|| तो कामनामात्रें न घेपे| मोहमळें न लिंपें| जैसें जळीं जळें न शिंपे| पद्मपत्र || ७१|| तैसा संसर्गामाजीं असे| सकळांसारिखा दिसे| जैसें तोयसंगें आभासे| भानुबिंब || ७२|| तैसा सामान्यत्वें पाहिजे| तरी साधारणुचि देखिजे| येरवीं निर्धारितां नेणिजे| सोय जयाची || ७३|| ऐशा चिन्हीं चिन्हितु| देखसी तोचि मुक्तु| आशापाशरहितु| वोळख पां || ७४|| अर्जुना तोचि योगी| विशेषिजे जो जगीं| म्हणौनि ऐसा होय यालागीं| म्हणिपे तूतें || ७५|| तूं मानसा नियमु करीं| निश्चळु होय अंतरीं| मग कर्मेंद्रियें व्यापारीं| वर्ततु सुखें || ७६|| नियतं कुरु कर्म त्वं ज्यायो ह्यकर्मणः | शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः || ८|| म्हणौनी नैष्कर्म्य होआवें| तरी एथ तें न संभवे| आणि निषिद्ध केवीं राहाटावें| विचारीं पां || ७७|| म्हणौनि जें जें उचित| आणि अवसरेंकरूनि प्राप्त| तें कर्म हेतुरहित| आचरें तूं || ७८|| पार्था आणीकही एक| नेणसी तूं हें कवतिक| जें ऐसें कर्ममोचक| आपैसें असे || ७९|| देखैं अनुक्रमाधारें| स्वधर्मु जो आचरे| तो मोक्षु तेणें व्यापारें| निश्चित पावे || ८०|| यज्ञाथात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः | तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचार || ९|| स्वर्धमु जो बापा| तोचि नित्ययज्ञु जाण पां| म्हणौनि वर्ततां तेथ पापा| संचारु नाहीं || ८१|| हा निजधर्मु जैं सांडे| आणि कुकर्मीं रति घडे| तैंचि बंधु पडे| संसारिक || ८२|| म्हणौनि स्वधर्मानुष्ठान| तें अखंड यज्ञ याजन| जो करी तया बंधन| कहींच न घडे || ८३|| हा लोकु कर्में बांधिला| जो परतंत्रा भूत झाला| तो नित्य यज्ञातें चुकला| म्हणौनियां || ८४|| आतां येचिविशीं पार्था| तुज सांगेन एक मी कथा| जैं सृष्ट्यादि संस्था| ब्रह्मेनें केली || ८५|| सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः | अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् || १०|| तैं नित्ययागसहितें| सृजिलीं भूतें समस्तें| परी नेणतीचि तियें यज्ञातें| सूक्ष्म म्हणौनि || ८६|| ते वेळीं प्रजीं विनविला ब्रह्मा| देवा काय आश्रयो एथ आम्हां| तंव म्हणे तो कमळजन्मा| भूतांप्रति || ८७|| तुम्हां वर्णविशेषवशें| आम्हीं हा स्वधर्मुचि विहिला असे| यातें उपासा मग आपैसे| पुरती काम || ८८|| तुम्हीं व्रतें नियमु न करावे| शरीरातें न पीडावें| दुरी केंही न वचावें| तीर्थासी गा || ८९|| योगादिकें साधनें| साकांक्ष आराधनें| मंत्रयंत्रविधानें| झणीं करा || ९०|| देवतांतरा न भजावें| हें सर्वथा कांहीं न करावें| तुम्हीं स्वधर्मयज्ञीं यजावें| अनायासें || ९१|| अहेतुकें चित्तें| अनुष्ठा पां ययातें| पतिव्रता पतीतें| जियापरी || ९२|| तैसा स्वधर्मरूपमखु| हाचि सेव्यु तुम्हां एकु| ऐसें सत्यलोकनायकु| बोलता जाहला || ९३|| देखा स्वधर्मातें भजाल| तरी कामधेनु हा होईल| मग प्रजाहो न संडील| तुमतें कदा || ९४|| देवांभावयताऽनेन ते देवाभावयन्तु वः | परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ || ११|| जैं येणेंकरूनि समस्तां| परितोषु होईल देवतां| मग ते तुम्हां ईप्सिता| अर्थातें देती || ९५|| या स्वधर्मपूजा पूजितां| देवतागणां समस्तां| योगक्षेमु निश्चिता| करिती तुमचा || ९६|| तुम्हीं देवांतें भजाल| देव तुम्हां तुष्टतील| ऐसी परस्परें घडेल| प्रीति जेथ || ९७|| तेथ तुम्हीं जें करूं म्हणाल| तें आपैसें सिद्धि जाईल| वांछितही पुरेल| मानसींचें || ९८|| वाचासिद्धि पावाल| आज्ञापक होआल| म्हणियें तुमतें मागतील| महाऋद्धि || ९९|| जैसें ऋतुपतीचें द्वार| वनश्री निरंतर| वोळगे फळभार| लावण्येसी || १००|| इष्टांभोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः | तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः || १२|| तैसें सर्व सुखेंसहित| दैवचि मूर्तिमंत| येईल देखा काढत| तुम्हांपाठीं || १०१|| ऐसें समस्त भोगभरित| होआल तुम्ही अनार्त| जरी स्वधर्मेंनिरत| वर्ताल बापा || १०२|| कां जालिया सकळ संपदा| जो अनुसरेल इंद्रियमदा| लुब्ध होऊनियां स्वादा| विषयांचिया || १०३|| तिहीं यज्ञभाविकीं सुरीं| जे हे संपत्ति दिधली पुरी| तयां स्वधर्मीं सर्वेश्वरीं| न भजेल जो || १०४|| अग्निमुखीं हवन| न करील देवता पूजन| प्राप्तवेळे भोजन| ब्राह्मणाचें || १०५|| विमुख होईल गुरुभक्ती| आदर न करील अतिथी| संतोष नेदील ज्ञाती| आपुलिये || १०६|| ऐसा स्वधर्मक्रियारहितु| आथिलेपणें प्रमत्तु| केवळ भोगासक्तु| होईल जो || १०७|| तया मग अपावो थोर आहे| जेणें तें हातींचें सकळ जाये| देखा प्राप्तही न लाहे| भोग भोगूं || १०८|| जैसें गतायुषी शरीरीं| चैतन्य वासु न करी| कां निदैवाच्या घरीं| न राहे लक्ष्मी || १०९|| तैसा स्वधर्मु जरी लोपला| तरी सर्व सुखांचा थारा मोडला| जैसा दीपासवें हरपला| प्रकाशु जाय || ११०|| तैसी निजवृत्ति जेथ सांडे| तेथ स्वतंत्रते वस्ती न घडे| आइका प्रजाहो हे फुडें| विरंचि म्हणे || १११|| म्हणौनि स्वधर्मु जो सांडील| तयातें काळु दंडील| चोरु म्हणौनि हरील| सर्वस्व तयाचें || ११२|| मग सकळ दोषु भंवते| गिंवसोनि घेति तयातें| रात्रिसमयीं स्मशानातें| भूतें जैसीं || ११३|| तैसीं त्रिभुवनींचीं दुःखें| आणि नानाविधें पातकें| दैन्यजात तितुकें| तेथेंचि वसे || ११४|| ऐसें होय तया उन्मत्ता| मग न सुटे बापा रुदतां| कल्पांतींही सर्वथा| प्राणिगणहो || ११५|| म्हणौनि निजवृत्ती हे न संडावी| इंद्रियें बरळों नेदावीं| ऐसें प्रजांतें शिकवी| चतुराननु || ११६|| जैसे जळचरा जळ सांडे| आणि तत्क्षणीं मरण मांडे| हा स्वधर्मु तेणें पाडें| विसंबों नये || ११७|| म्हणौनि तुम्हीं समस्तीं| आपुलालिया कर्मीं उचितीं| निरत व्हावें पुढत पुढती| म्हणिपत असे || ११८|| यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः | भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् || १३|| देखा विहित क्रियाविधि| निर्हेतुका बुद्धि| जो असतिये समृद्धि| विनियोगु करी || ११
Heh Heh Heh...Father: That's strange. You usually chat on the phone for at least an hour. The last call lasted just 15 minutes. Daughter: It was wrong number.