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Dnyaneshvari adhyay - 4
by ज्ञानेश्वरमहाराज
[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ४ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय चवथा | ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः | आजि श्रवणेंद्रियां पाहलें| जें येणें गीतानिधान देखिलें| आतां स्वप्नचि हें तुकलें| साचासरिसें || १|| आधींचि विवेकाची गोठी| वरी प्रतिपादी श्रीकृष्ण जगजेठी| आणि भक्तराजु किरीटी| परिसत असे || २|| जैसा पंचमालापु सुगंधु| कीं परिमळु आणि सुस्वादु| तैसा भला जाहला विनोदु| कथेचा इये || ३|| कैसी आगळिक दैवाची| जे गंगा जोडली अमृताची| हो कां जपतपें श्रोतयांचीं| फळा आलीं || ४|| आतां इंद्रियजात आघवें| तिहीं श्रवणाचें घर रिघावें| मग संवादसुख भोगावें| गीताख्य हें || ५|| हा अतिसो अतिप्रसंगें| सांडूनि कथाचि ते सांगें| जे कृष्णार्जुन दोघे| बोलत होते || ६|| ते वेळीं संजयो रायातें म्हणे| अर्जुनु अधिष्ठिला दैवगुणें| जे अतिप्रीति श्रीनारायणें| बोलतु असे || ७|| जें न संगेचि पितया वसुदेवासी| जें न संगेचि माते देवकीसी| जें न संगेचि बंधु बळिभद्रासी| तें गुह्य अर्जुनेंशीं बोलत || ८|| देवी लक्ष्मीयेवढी जवळिक| परी तेही न देखे या प्रेमाचें सुख| आजि कृष्णस्नेहाचें बिक| यातेंचि आथी || ९|| सनकादिकांचिया आशा| वाढीनल्या होतिया कीर बहुवसा| परी त्याही येणें मानें यशा| येतीचिना || १०|| या जगदीश्वराचें प्रेम| एथ दिसतसें निरुपम| कैसें पार्थें येणें सर्वोत्तम| पुण्य केलें || ११|| हो कां जयाचिया प्रीती| अमूर्त हा आला व्यक्ती| मज एकवंकी याची स्थिती| आवडतु असे || १२|| एऱ्हवीं हा योगियां नाडळे| वेदार्थासी नाकळे| जेथ ध्यानाचेही डोळे| पावतीना || १३|| तो हा निजस्वरूप| अनादि निष्कंप| परी कवणें मानें सकृप| जाहला आहे || १४|| हा त्रैलोक्यपटाची घडी| आकारची पैलथडी| कैसा याचिये आवडी| आवरला असे || १५|| श्रीभगवानुवाच | इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् | विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् || १|| मग देव म्हणे अगा पंडुसुता| हाचि योगु आम्हीं विवस्वता| कथिला परी ते वार्ता| बहुतां दिवसांची || १६|| मग तेणें विवस्वतें रवी| हे योगस्थिति आघवी| निरूपिली बरवी| मनूप्रती || १७|| मनूनें आपण अनुष्ठिली| मग इक्ष्वाकुवा उपदेशिली| ऐसी परंपरा विस्तारिली| आद्य हे गा || १८|| एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः | स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप || २|| मग आणिकही या योगातें| राजर्षि जाहले जाणते| परी तेथोनि आतां सांप्रतें| नेणिजे कोण्ही || १९|| जे प्राणियां कामीं भरु| देहाचिवरी आदरु| म्हणौनि पडिला विसरु| आत्मबोधाचा || २०|| अव्हांटलिया आस्थाबुद्धि| विषयसुखची परमावधि| जीवु तैसा उपाधि| आवडे लोकां || २१|| एरव्हीं तरी खवणेयांच्या गांवीं| पाटाउवें काय करावीं| सांगें जात्यंधा रवी| काय आथी ? || २२|| कां बहिरयांच्या आस्थानीं| कवण गीतातें मानीं| कीं कोल्हेया चांदणीं| आवडी उपजें ? || २३|| पैं चंद्रोदया आरौतें| जयांचे डोळे फुटती असते| ते काउळे केवीं चंद्रातें| वोळखती ? || २४|| तैसी वैराग्याची शिंव न देखती| जे विवेकाची भाष नेणती ? | ते मूर्ख केंवीं पावती| मज ईश्वरातें ? || २५|| कैसा नेणों मोहो वाढीनला| तेणें बहुतेक काळु व्यर्थ गेला| म्हणौनि योगु हा लोपला| लोकीं इये || २६|| स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः | भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् || ३|| तोचि हा आजि आतां| तुजप्रती कुंतीसुता| सांगितला आम्हीं तत्त्वतां| भ्रांति न करीं || २७|| हें जीवींचें निज गुज| परी केवीं राखों तुज| जे पढियेसी तूं मज| म्हणौनियां || २८|| तूं प्रेमाचा पुतळा| भक्तीचा जिव्हाळा| मैत्रियेचि चित्कळा| धनुर्धरा || २९|| तूं अनुसंगाचा ठावो| आतां तुज काय वंचूं जावों ? | जऱ्ही संग्रामारूढ आहों| जाहलों आम्ही || ३०|| तरी नावेक हें सहावें| गाजाबज्यही न धरावें| परी तुझें अज्ञानत्व हरावें| लागे आधीं || ३१|| अर्जुन उवाच | अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः | कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति || ४|| तंव अर्जुन म्हणे श्रीहरी| माय आपुलेयाचा स्नेहो करी| एथ विस्मयो काय अवधारीं| कृपानिधी || ३२|| तूं संसारश्रांतांची साउली| अनाथ जीवांची माउली| आमुतें कीर प्रसवली| तुझीच कृपा || ३३|| देवा पांगुळ एकादें विजे| तरी जन्मौनि जोजारु साहिजे| हें बोलों काय तुझें| तुजचि पुढां || ३४|| आतां पुसेन जें मी कांहीं| तेथ निकें चित्त देईं| तेवींचि देवें कोपावें ना कांहीं| बोला एका || ३५|| तरी मागील जे वार्ता| तुवां सांगितली होती अनंता| ते नावेक मज चित्ता| मानेचिना || ३६|| जे तो विवस्वतु म्हणजे कायी| ऐसें हें वडिलां ठाउवें नाहीं| तरी तुवांचि केवीं पाहीं| उपदेशिला ? || ३७|| तो तरी आइकिजे बहुतां काळांचा| आणि तूं तंव श्रीकृष्ण सांपेचा| म्हणौनि गा इये मातुचा| विसंवादु || ३८|| तेवींचि देवा चरित्र तुझें| आपण कांहींचि नेणिजे| हें लटिकें केवीं म्हणिजे| एकिहेळां ? || ३९|| परि हेचि मातु आघवी| मी परियेसें ऐशी सांगावी| जे तुवांचि रवी केवीं| पाही उपदेशु केला || ४०|| श्रीभगवानुवाच | बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन | तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप || ५|| तंव श्रीकृष्ण म्हणे पंडुसुता| तो विवस्वतु जैं होता| तैं आम्हीं नसों ऐसी चित्ता| भ्रांति जरी तुज || ४१|| तरी तूं गा हें नेणसी| पैं जन्में आम्हां तुम्हासी| बहुतें गेलीं परी तियें न स्मरसी| आपुलीं तूं || ४२|| मी जेणें जेणें अवसरें| जें जें होऊनि अवतरें| तें समस्तही स्मरें| धनुर्धरा || ४३|| अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीष्वरोऽपि सन | प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया || ६|| म्हणौनि हें आघवें| मागील मज आठवें| मी अजुही परि संभवें| प्रकृतियोगें || ४४|| माझें अव्ययत्व तरी न नसे| परी होणें जाणें एक दिसे| तें प्रतिबिंबें मायावशें| माझ्याचि ठायीं || ४५|| माझी स्वतंत्रता तरी न मोडे| परी कर्माधीनु ऐसा आवडे| तेही भ्रांतिबुद्धि तरी घडे| एऱ्हवीं नाहीं || ४६|| कीं एकचि दिसे दुसरें| तें दर्पणाचेनि आधारें| एऱ्हवीं काय वस्तुविचारें| दुजें आहे ? || ४७|| तैसा अमूर्तचि मी किरीटी| परी प्रकृति जैं अधिष्ठीं| तैं साकारपणें नट नटीं| कार्यालागीं || ४८|| यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || ७|| जें धर्मजात आघवें| युगायुगीं म्यां रक्षावें| ऐसा ओघु हा स्वभावें| आद्यु असे || ४९|| म्हणौनि अजत्व परतें ठेवीं| मी अव्यक्तपणही नाठवीं| जे वेळीं धर्मातें अभिभवी| अधर्मु हा || ५०|| परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे || ८|| ते वेळीं आपुल्याचेनि कैवारें| मी साकारु होऊनि अवतरें| मग अज्ञानाचें आंधारें| गिळूनि घालीं || ५१|| अधर्माची अवधी तोडीं| दोषांचीं लिहिलीं फाडीं| सज्जनांकरवीं गुढी| सुखाची उभवीं || ५२|| दैत्यांचीं कुळें नाशीं| साधूंचा मानु गिंवशीं| धर्मासीं नीतीशीं| शेंस भरीं || ५३|| मी अविवेकाची काजळी| फेडूनि विवेकदीप उजळीं| तैं योगियां पाहे दिवाळी| निरंतर || ५४|| सत्सुखें विश्व कोंदे| धर्मुचि जगीं नांदें| भक्तां निघती दोंदे| सात्त्विकाचीं || ५५|| तै पापांचा अचळु फिटे| पुण्याची पहांट फुटे| जैं मूर्ति माझी प्रगटे| पंडुकुमरा || ५६|| ऐसेया काजालागीं| अवतरें मी युगीं युगीं| परि हेंचि वोळखें जो जगीं| तो विवेकिया || ५७|| जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः | त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन || ९|| माझें अजत्वें जन्मणें| अक्रियताचि कर्म करणें| हें अविकार जो जाणे| तो परममुक्त || ५८|| तो चालिला संगें न चळे| देहींचा देहा नाकळे| मग पंचत्वीं तंव मिळे| माझ्याचि रूपीं || ५९|| वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः | बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भवमागताः || १०|| एऱ्हवीं परापर न शोचिती| जे कामनाशून्य होती| वाटा कें वेळीं न वचती| क्रोधाचिया || ६०|| सदा मियांचि आथिले| माझिया सेवा जियाले| कीं आत्मबोधें तोषले| वीतराग जे || ६१|| जे तपोतेजाचिया राशी| कीं एकायतन ज्ञानासी| जे पवित्रता तीर्थांसी| तीर्थरूप || ६२|| ते मद्भावा सहजें आले| मी तेचि ते होऊनि ठेले| जे मज तयां उरले| पदर नाहीं || ६३|| सांगैं पितळेची गंधिकाळिक| जैं फिटली होय निःशेख| तैं सुवर्ण काई आणिक| जोडूं जाइजे ? || ६४|| तैसे यमनियमीं कडसले| जे तपोज्ञानें चोखाळले| मी तेचि ते जाहले| एथ संशयो कायसा ? || ६५|| ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् | मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः || ११|| एऱ्हवीं तरी पाहीं| जे जैसे माझ्या ठायीं| भजती तयां मीही| तैसाचि भजें || ६६|| देखैं मनुष्यजात सकळ| हें स्वभावता भजनशीळ| जाहलें असे केवळ| माझ्याचि ठायीं || ६७|| परी ज्ञानेंवीण नाशिले| जे बुद्धिभेदासी आले| तेणेंचि त्या कल्पिलें| अनेकत्व || ६८|| म्हणौनि अभेदीं भेदु देखती| यया अनाम्या नामें ठेविती| देवी देवो म्हणती| अचर्चातें || ६९|| जे सर्वत्र सदा सम| तेथ विभाग अधमोत्तम| मतिवशें संभ्रम| विवंचिती || ७०|| काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धि यजन्त हि देवताः | क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा || १२|| मग नानाहेतुप्रकारें| यथोचितें उपचारें| मानिलीं देवतांतरें| उपासिती || ७१|| तेथ जें जें अपेक्षित| तें तैसेंचि पावती समस्त| परी तें कर्मफळ निश्चित| वोळख तूं || ७२|| वांचून देतें घेतें आणिक| निभ्रांत नाहीं सम्यक| एथ कर्मचि फळसूचक| मनुष्यलोकीं || ७३|| जैसें क्षेत्रीं जें पेरिजे| तें वांचूनि आन न निपजे| कां पाहिजे तेंचि देखिजे| दर्पणाधारें || ७४|| नातरी कडेयातळवटीं| जैसा आपुलाचि बोलू किरीटी| पडिसादु होऊनि उठी| निमित्तयोगें || ७५|| तैसा समस्तां यां भजना| मी साक्षिभूतु पैं अर्जुना| एथ प्रतिफळे भावना| आपुलाली || ७६|| चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः | तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् || १३|| आतां याचिपरी जाण| चाऱ्ही हे वर्ण| सृजिलें म्यां गुण- | कर्मविभागें || ७७|| जे प्रकृतीचेनि आधारें| गुणाचेनि व्यभिचारें| कर्में तदनुसारें| विवंचिली || ७८|| एथ एकचि हे धनुष्यपाणी| परी जाहले गा चहूं वर्णीं| ऐसी गुणकर्मकडसणी| केली सहजें || ७९|| म्हणौनि आइकें पार्था| हे वर्णभेदसंस्था| मीं कर्ता नव्हें सर्वथा| याचिलागीं || ८०|| न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा | इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते || १४|| हें मजचिस्तव जाहलें| परी म्यां नाहीं केलें| ऐसें जेणें जाणितलें| तो सुटला गा || ८१|| एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः | कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् || १५|| मागील मुमुक्षु जे होते| तिहीं ऐशिया जाणोनि मातें| कर्में केलीं समस्तें| धनुर्धरा || ८२|| परि तें बीजें जैसीं दग्धलीं| नुगवतींचि पेरिलीं| तैशीं कर्मेंचि परि तयां जाहलीं| मोक्षहेतु || ८३|| एथ आणिकही एक अर्जुना| हे कर्माकर्मविवंचना| आपुलिये चाडें सज्ञाना| योग्यु नोहे || ८४|| किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः | तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् || १६|| कर्म म्हणिपे तें कवण| अथवा अकर्मा काय लक्षण| ऐसें विचारितां विचक्षण| गुंफोनि ठेले || ८५|| जैसें कां कुडें नाणें| खऱ्याचेनि सारखेपणें| डोळ्यांचेंहि देखणें| संशयीं घाली || ८६|| तैसें नैष्कर्म्यतेचेनि भ्रमें| गिंवसिजत आहाती कर्में| जे दुजी सृष्टी मनोधर्में| करूं सकती || ८७|| वांचूनि मूर्खाची गोठी कायसी| एथ मोहले गा क्रांतदर्शी| म्हणौनि आतां तेंचि परियेसीं| सांगेन तुज || ८८|| कर्मण्यो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः | अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः || १७|| तरी कर्म म्हणजे स्वभावें| जेणें विश्वाकारु संभवे| तें सम्यक आधीं जाणावें| लागे एथ || ८९|| मग वर्णाश्रमासि उचित| जें विशेष कर्म विहित| तेंही वोळखावें निश्चित| उपयोगेंसी || ९०|| पाठीं जें निषिद्ध म्हणिपे| तेंही बुझावें स्वरूपें| येतुलेनि कांहीं न गुंफे| आपैसेंचि || ९१|| एऱ्हवीं जग हें कर्माधीन| ऐसी याची व्याप्ती गहन| परी तें असो आइकें चिन्ह| प्राप्तांचें गा || ९२|| कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः | स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् || १८|| जो सकळकर्मीं वर्ततां| देखैं आपुली नैष्कर्म्यता| कर्मसंगें निराशता| फळाचिया || ९३|| आणि कर्तव्यतेलागीं| जया दुसरें नाहीं जगीं| ऐसिया नैष्कर्म्यता तरी चांगीं| बोधला असे || ९४|| तरी क्रियाकलापु आघवा| आचरतु दिसे बरवा| तोचि तो ये चिन्हीं जाणावा| ज्ञानिया गा || ९५|| जैसा कां जळापाशीं उभा ठाके| तो जरी आपणपें जळामाजिं देखे| तरी तो निभ्रांत वोळखे| म्हणे मी वेगळा आहें || ९६|| अथवा नावें हन जो रिगे| तो थडियेचें रुख जातां देखे वेगें| तेचि साचोकारें जों पाहों लागे| तंव रुख म्हण अचळ || ९७|| तैसें सर्व कर्मीं असणें| ते फुडें मानूनि वायाणें| मग आपणया जो जाणे| नैष्कर्म्यु ऐसा || ९८|| आणि उदोअस्तुचेनि प्रमाणें| जैसें न चालतां सूर्याचें चालणें| तैसें नैष्कर्म्यत्व जाणें| कर्मींचि असतां || ९९|| तो मनुष्यासारिखा तरी आवडे| परी मनुष्यत्व तया न घडे| जैसें जळामाजीं न बुडे| भानुबिंब || १००|| तेणें न पाहतां विश्व देखिलें| न करितां सर्व केलें| न भोगितां भोगिलें| भोग्यजात || १०१|| एकेचि ठायीं बैसला| परि सर्वत्र तोचि गेला| हें असो विश्व जाहला| आंगेंचि तो || १०२|| यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः | ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः || १९|| जया पुरुषाच्या ठायीं| कर्माचा तरी खेदु नाहीं| परी फलापेक्षा कहीं| संचरेना || १०३|| आणि हें कर्म मी करीन| अथवा आदरिलें सिद्धी नेईन| येणें संकल्पेंहीं जयाचें मन| विटाळेना || १०४|| ज्ञानाग्नीचेनि मुखें| जेणें जाळिलीं कर्में अशेखें| तो परब्रह्मचि मनुष्यवेखें| वोळख तूं || १०५|| त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः | कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः || २०|| जो शरीरीं उदासु| फळभोगीं निरासु| नित्यता उल्हासु| होऊनि असे || १०६|| जो संतोषाचा गाभारा| आत्मबोधाचिये वोगरां| पुरे न म्हणेचि धनुर्धरा| आरोगितां || १०७|| निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः | शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || २१|| यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः | समः सिद्ध&
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