[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ६ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय सहावा | आत्मसंयमयोगः | मग रायातें म्हणे संजयो| तोचि अभिप्रावो अवधारिजो| कृष्ण सांगती आतां जो| योगरूप || १|| सहजें ब्रह्मरसाचें पारणें| केलें अर्जुनालागीं नारायणें| कीं तेचि अवसरीं पाहुणे| पातलों आम्ही || २|| कैसी दैवाची आगळिक नेणिजे| जैसें तान्हेलिया तोय सेविजे| कीं तेंचि चवी करूनि पाहिजे| तंव अमृत आहे || ३|| तैसें आम्हां तुम्हां जाहलें| जे आडमुठीं तत्त्व फावलें| तंव धृतराष्ट्रें म्हणितलें| हें न पुसों तूतें || ४|| तया संजया येणें बोलें| रायाचें हृदय चोजवलें| जें अवसरीं आहे घेतलें| कुमारांचिया || ५|| हें जाणोनि मनीं हांसिला| म्हणे म्हातारा मोहें नाशिला| एऱ्हवीं बोलु तरी भला जाहला| अवसरीं इये || ६|| परि तें तैसें कैसेनि होईल| जात्यंधु कैसें पाहेल| तेवींचि ये रुसें घेईल| म्हणौनि बिहे || ७|| परि आपण चित्तीं आपुला| निकियापरी संतोषला| जे तो संवादु फावला| कृष्णार्जुनांचा || ८|| तेणें आनंदाचेनि धालेपणें| साभिप्राय अंतःकरणें| आतां आदरेंसीं बोलणें| घडेल तया || ९|| तो गीतेमाजी षष्ठींचा| प्रसंगु असे आयणीचा| जैसा क्षीरार्णवीं अमृताचा| निवाडु जाहला || १०|| तैसें गीतार्थाचें सार| जें विवेकसिंधूचें पार| नाना योगविभवभांडार| उघडलें कां || ११|| जें आदिप्रकृतीचें विसवणें| जें शब्दब्रह्मासि न बोलणें| जेथूनि गीतावल्लीचें ठाणें| प्ररोहो पावे || १२|| तो अध्यावो सहावा| वरि साहित्याचिया बरवा| सांगिजैल म्हणौनि परिसावा| चित्त देउनी || १३|| माझा मराठाचि बोलु कौतुकें| परि अमृतातेंही पैजां जिंके| ऐसीं अक्षरें रसिकें| मेळवीन || १४|| जिये कोंवळिकेचेनि पाडें| दिसती नादींचें रंग थोडे| वेधें परिमळाचें बीक मोडे| जयाचेनि || १५|| ऐका रसाळपणाचिया लोभा| कीं श्रवणींचि होति जिभा| बोले इंद्रियां लागे कळंभा| एकमेकां || १६|| सहजें शब्दु तरी विषो श्रवणाचा| परि रसना म्हणे हा रसु आमुचा| घ्राणासि भावो जाय परिमळाचा| हा तोचि होईल || १७|| नवल बोलतीये रेखेची वाहणी| देखतां डोळयांही पुरों लागे धणी| ते म्हणती उघडली खाणी| रूपाची हे || १८|| जेथ संपूर्ण पद उभारे| तेथ मनचि धांवे बाहिरें| बोलु भुजाही आविष्करें| आलिंगावया || १९|| ऐशीं इंद्रियें आपुलालिया भावीं| झोंबती परि तो सरिसेपणेंचि बुझावी| जैसा एकला जग चेववी| सहस्त्रकरु || २०|| तैसें शब्दाचें व्यापकपण| देखिजे असाधारण| पाहातयां भावज्ञां फावती गुण| चिंतामणीचे || २१|| हें असोतु या बोलांचीं ताटें भलीं| वरी कैवल्यरसें वोगरिलीं| ही प्रतिपत्ति मियां केली| निष्कामासी || २२|| आतां आत्मप्रभा नीच नवी| तेचि करूनि ठाणदिवी| जो इंद्रियांतें चोरूनि जेवी| तयासीचि फावे || २३|| येथ श्रवणाचेनि पांगें- | वीण श्रोतयां होआवें लागे| हे मनाचेनि निजांगें| भोगिजे गा || २४|| आहाच बोलाची वालीफ फेडिजे| आणि ब्रह्माचियाचि आंगा घडिजे| मग सुखेंसी सुरवाडिजे| सुखाचि माजीं || २५|| ऐसें हळुवारपण जरी येईल| तरीच हें उपेगा जाईल| एऱ्हवीं आघवी गोठी होईल| मुकिया बहिरयाची || २६|| परी तें असो आतां आघवें| नलगे श्रोतयांतें कडसावें| जे अधिकारिये एथ स्वभावें| निष्कामकामु || २७|| जिहीं आत्मबोधाचिया आवडी| केली स्वर्गसंसाराची कुरोंडी| तेवांचूनि एथींची गोडी| नेणती आणिक || २८|| जैसा वायसीं चंद्र नोळखिजे| तैसा प्राकृतीं हा ग्रंथु नेणिजे| आणि तो हिमांशुचि जेविं खाजें| चकोराचें || २९|| तैसा सज्ञानासी तरी हा ठावो| आणि अज्ञानासी आन गांवो| म्हणौनि बोलावया विषय पहा हो| विशेषु नाहीं || ३०|| परी अनुवादलों मी प्रसंगें| तें सज्जनीं उपसाहावें लागे| आतां सांगेन काय श्रीरंगें| निरोपिलें जें || ३१|| तें बुद्धीही आकळितां सांकडें| म्हणौनि बोलीं विपायें सांपडे| परी श्रीनिवृत्तिकृपादीप उजियेडें| देखैन मी || ३२|| जें दिठीही न पविजे| तें दिठीविण देखिजे| जरी अतींद्रिय लाहिजे| ज्ञानबळ || ३३|| ना तरी जें धातुवादाही न जोडे| तें लोहींचि पंधरें सांपडे| जरी दैवयोगें चढे| परिसु हातां || ३४|| तैसी गुरुकृपा होये| तरी करितां काय आपु नोहे| म्हणौनि तें अपार मातें आहे| ज्ञानदेवो म्हणे || ३५|| तेणें कारणें मी बोलेन| बोलीं अरूपाचें रूप दावीन| अतींद्रिय परी भोगवीन| इंद्रियांकरवीं || ३६|| आइका यश श्री औदार्य| ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य| हे साही गुणवर्य| वसती जेथ || ३७|| म्हणौनि तो भगवंतु| जो निःसंगाचा सांगातु| तो म्हणे पार्था दत्तचित्तु| होईं आतां || ३८|| श्रीभगवानुवाच | अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः | स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः || १|| आइकें योगी आणि संन्यासी जनीं| हे एकचि सिनानें झणीं मानीं| एऱ्हवीं विचारिजती जंव दोन्ही| तंव एकचि ते || ३९|| सांडिजे दुजया नामाचा आभासु| तरी योगु तोचि संन्यासु| पाहतां ब्रह्मीं नाहीं अवकाशु| दोहींमाजीं || ४०|| जैसें नामाचेनि अनारिसेपणें| एका पुरुषातें बोलावणें| कां दोहींमार्गीं जाणें| एकाचि ठाया || ४१|| नातरी एकचि उदक सहजें| परि सिनाना घटीं भरिजे| तैसें भिन्नत्व जाणिजे| योगसंन्यासांचें || ४२|| आइकें सकळ संमतें जगीं| अर्जुना गा तोचि योगी| जो कर्में करूनि रागी| नोहेचि फळीं || ४३|| जैसी मही हे उद्भिजें| जनी अहंबुद्धीवीण सहजें| आणि तेथिंचीं तियें बीजें| अपेक्षीना || ४४|| तैसा अन्वयाचेनि आधारें| जातीचेनि अनुकारें| जें जेणें अवसरें| करणें पावे || ४५|| तें तैसेंचि उचित करी| परी साटोपु नोहे शरीरीं| आणि बुद्धीही करोनि फळवेरी| जायेचिना || ४६|| ऐसा तोचि संन्यासी| पार्था गा परियेसीं| तोचि भरंवसेनिसीं| योगीश्वरु || ४७|| वांचूनि उचित कर्म प्रासंगिक| तयातें म्हणे हे सांडावें बद्धक| तरी टांकोटांकीं आणिक| मांडीचि तो || ४८|| जैसा क्षाळूनियां लेपु एकु| सवेंचि लाविजे आणिकु| तैसेनि आग्रहाचा पाइकु| विचंबे वायां || ४९|| गृहस्थाश्रमाचें वोझें| कपाळीं आधींचि आहे सहजें| कीं तेंचि संन्याससवा ठेविजे| सरिसें पुढती || ५०|| म्हणौनि अग्निसेवा न सांडितां| कर्माची रेखा नोलांडितां| आहे योगसुख स्वभावता| आपणपांचि || ५१|| यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव | न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन || २|| ऐकें संन्यासी तोचि योगी| ऐसी एकवाक्यतेची जगीं| गुढी उभविली अनेगीं| शास्त्रांतरीं || ५२|| जेथ संन्यासिला संकल्पु तुटे| तेथचि योगाचें सार भेटे| ऐसें हें अनुभवाचेनि धटें| साचें जया || ५३|| आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते | योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते || ३|| आतां योगाचळाचा निमथा| जरी ठाकावा आथि पार्था| तरी सोपाना या कर्मपथा| चुका झणी || ५४|| येणें यमनियमांचेनि तळवटें| रिगे आसनाचिये पाउलवाटें| येई प्राणायामाचेनि आडकंठें| वरौता गा || ५५|| मग प्रत्याहाराचा अधाडा| जो बुद्धीचियाही पायां निसरडा| जेथ हटिये सांडिती होडा| कडेलग || ५६|| तरी अभ्यासाचेनि बळें| प्रत्याहारीं निराळें| नखीं लागेल ढाळें ढाळें| वैराग्याची || ५७|| ऐसा पवनाचेनि पाठारें| येतां धारणेचेनि पैसारें| क्रमी ध्यानाचें चवरें| सांपडे तंव || ५८|| मग तया मार्गाची धांव| पुरेल प्रवृत्तीची हांव| जेथ साध्यसाधना खेंव| समरसें होय || ५९|| जेथ पुढील पैसु पारुखे| मागील स्मरावें तें ठाके| ऐसिये सरिसीये भूमिके| समाधि राहे || ६०|| येणें उपायें योगारूढु| जो निरवधि जाहला प्रौढु| तयाचिया चिन्हांचा निवाडु| सांगैन आइकें || ६१|| यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते | सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते || ४|| तरी जयाचिया इंद्रियांचिया घरा| नाहीं विषयांचिया येरझारा| जो आत्मबोधाचिया वोवरां| पहुडला असे || ६२|| जयाचें सुखदुःखाचेनि आंगें| झगटलें मानस चेवो नेघे| विषय पासींही आलियां से न रिगे| हें काय म्हणौनि || ६३|| इंद्रियें कर्माच्या ठायीं| वाढीनलीं परि कहीं| फळहेतूची चाड नाहीं| अंतःकरणीं || ६४|| असतेनि देहें एतुला| जो चेतुचि दिसे निदेला| तोचि योगारूढु भला| वोळखें तूं || ६५|| तेथ अर्जुन म्हणे अनंता| हें मज विस्मो बहु आइकतां| सांगे तया ऐसी योग्यता| कवणें दीजे || ६६|| उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् | आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः || ५|| तंव हांसोनि श्रीकृष्ण म्हणे| तुझें नवल ना हें बोलणें| कवणासि काय दिजेल कवणें| अद्वैतीं इये || ६७|| पैं व्यामोहाचिये शेजे| बळिया अविद्या निद्रितु होइजे| ते वेळी दुःस्वप्न हा भोगिजे| जन्ममृत्यूंचा || ६८|| पाठीं अवसांत ये चेवो| तैं तें अवघेंचि होय वावो| ऐसा उपजे नित्य सद्भावो| तोहि आपणपांचि || ६९|| म्हणौनि आपणचि आपणयां| घातु कीजतु असे धनंजया| चित्त देऊनि नाथिलिया| देहाभिमाना || ७०|| बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः | अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् || ६|| हा विचारूनि अहंकारु सांडिजे| मग असतीचि वस्तु होईजे| तरी आपली स्वस्ति सहजें| आपण केली || ७१|| एऱ्हवीं कोशकीटकाचिया परी| तो आपणया आपण वैरी| जो आत्मबुद्धि शरीरीं| चारुस्थळीं || ७२|| कैसे प्राप्तीचिये वेळे| निदैवा अंधळेपणाचे डोहळे| कीं असते आपुले डोळे| आपण झांकी || ७३|| कां कवण एकु भ्रमलेपणें| मी तो नव्हे गा चोरलों म्हणे| ऐसा नाथिला छंदु अंतःकरणें| घेऊनि ठाके || ७४|| एऱ्हवीं होय तें तोचि आहे| परि काई कीजे बुद्धि तैशी नोहे| देखा स्वप्नींचेनि घायें| कीं मरे साचें || ७५|| जैशी ते शुकाचेनि आंगभारें| नळिका भोविन्नली एरी मोहरें| तेणें उडावें परी न पुरे| मनशंका || ७६|| वायांचि मान पिळी| अटुवें हियें आंवळी| टिटांतु नळी| धरूनि ठाके || ७७|| म्हणे बांधला मी फुडा| ऐसिया भावनेचिया पडे खोडां| कीं मोकळिया पायांचा चवडा| गोंवी अधिकें || ७८|| ऐसा काजेंवीण आंतुडला| तो सांग पां काय आणिकें बांधिला| मग न सोडीच जऱ्ही नेला| तोडूनि अर्धा || ७९|| म्हणौनि आपणयां आपणचि रिपु| जेणें वाढविला हा संकल्पु| येर स्वयंबुद्धी म्हणे बापु| जो नाथिलें नेघे || ८०|| जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः | शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः || ७|| तया स्वांतःकरणजिता| सकळकामोपशांता| परमात्मा परौता| दुरी नाहीं || ८१|| जैसा किडाळाचा दोषु जाये| तरी पंधरें तेंचि होये| तैसें जीवा ब्रह्मत्व आहे| संकल्पलोपीं || ८२|| हा घटाकारु जैसा| निमालिया तया अवकाशा| नलगे मिळों जाणें आकाशा| आना ठाया || ८३|| तैसा देहाहंकारु नाथिला| हा समूळ जयाचा नाशिला| तोचि परमात्मा संचला| आधींचि आहे || ८४|| आतां शीतोष्णाचिया वाहणी| तेथ सुखदुःखाची कडसणीं| इयें न समाती कांहीं बोलणीं| मानापमानांचीं || ८५|| जे जिये वाटा सूर्यु जाये| तेउतें तेजाचें विश्व होये| तैसें तया पावे तें आहे| तोचि म्हणौनी || ८६|| देखैं मेघौनि सुटती धारा| तिया न रुपती जैसिया सागरा| तैशीं शुभाशुभें योगीश्वरा| नव्हती आनें || ८७|| ज्ञ्यानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः | युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः || ८|| जो हा विज्ञानात्मकु भावो| तया विवरितां जाहला वावो| मग लागला जंव पाहों| तंव ज्ञान तें तोचि || ८८|| आतां व्यापकु कीं एकदेशी| हे ऊहापोही जे ऐसी| ते करावी ठेली आपैशी| दुजेनवीण || ८९|| ऐसा शरीरीचि परी कौतुकें| परब्रह्माचेनि पाडें तुकें| जेणें जिंतलीं एकें| इंद्रियें गा || ९०|| तो जितेंद्रियु सहजें| तोचि योगयुक्तु म्हणिजे| जेणे सानें थोर नेणिजे| कवणें काळीं || ९१|| देखैं सोनयाचें निखळ| मेरुयेसणें ढिसाळ| आणि मातियेचें डिखळ| सरिसेंचि मानी || ९२|| पाहतां पृथ्वीचें मोल थोडें| ऐसें अनर्घ्य रत्न चोखडें| देखें दगडाचेनि पाडें| निचाडु ऐसा || ९३|| सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु | साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते || ९|| तेथ सुहृद आणि शत्रु| कां उदासु आणि मित्रु| हा भावभेदु विचित्रु| कल्पूं कैंचा || ९४|| तया बंधु कोण काह्याचा| द्वेषिया कवणु तयाचा| मीचि विश्व ऐसा जयाचा| बोधु जाहला || ९५|| मग तयाचिये दिठी| अधमोत्तम असे किरीटी ? | काय परिसाचिये कसवटी| वानिया कीजे ? || ९६|| ते जैशी निर्वाण वर्णुचि करी| तैशी जयाची बुद्धी चराचरीं| होय साम्याची उजरी| निरंतर || ९७|| जे ते विश्वालंकाराचें विसुरे| जरी आहाती आनानें आकारें| तरी घडले एकचि भांगारें| परब्रह्में || ९८|| ऐसें जाणणें जें बरवें| तें फावलें तया आघवें| म्हणौनि आहाचवाहाच न झकवे| येणें आकारचित्रें || ९९|| घापे पटामाजि दृष्टी| दिसे तंतूंची सैंघ सृष्टी| परी तो एकवांचूनि गोठी| दुजी नाहीं || १००|| ऐसेनि प्रतीती हें गवसे| ऐसा अनुभव जयातें असे| तोचि समबुद्धि हे अनारिसें| नव्हे जाणें || १०१|| जयाचें नांव तीर्थरावो| दर्शनें प्रशस्तीसि ठावो| जयाचेनि संगें ब्रह्मभावो| भ्रांतासही || १०२|| जयाचेनि बोलें धर्मु जिये| दिठी महासिद्धितें विये| देखैं स्वर्गसुखादि इयें| खेळु जयाचा || १०३|| विपायें जरी आठवला चित्ता| तरी दे आपुली योग्यता| हें असो तयातें प्रशंसितां| लाभु आथि || १०४|| योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः | एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः || १०|| पुढती अस्तवेना ऐसें| जया पाहलें अद्वैतदिवसें| मग आपणपांचि आपणु असे| अखंडित || १०५|| ऐसिया दृष्टी जो विवेकी| पार्था तो एकाकी| सहजें अपरिग्रही जो तिहीं लोकीं| तोचि म्हणौनि || १०६|| ऐसियें असाधारणें| निष्पन्नाचीं लक्षणें| आपुलेनि बहुवसपणें| श्रीकृष्ण बोले || १०७|| जो ज्ञानियांचा बापु| देखणेयांचे दिठीचा दीपु| जया दादुलयाचा संकल्पु| विश्व रची || १०८|| प्रणवाचिये पेठे| जाहलें शब्दब्रह्म माजिठे| तें जयाचिया यशा धाकुटें| वेढूं न पुरे || १०९|| जयाचेनि आंगिकें तेजें| आवो रविशशीचिये वणिजे| म्हणौनि जग हें वेशजे- | वीण असे तया || ११०|| हां गा नामचि एक जयाचें| पाहतां गगनही दिसे टांचें| गुण एकैक काय तयाचे| आकळशील तूं || १११|| म्हणौनि असो हें वानणें| सांगों नेणों कवणाचीं लक्षणें| दावावीं मिषें येणें| कां बोलिलों तें || ११२|| ऐकें द्वैताचा ठावोचि फेडी| ते ब्रह्मविद्या कीजेल उघडी| तरी अर्जुना पढिये हे गोडी| नासेल हन || ११३|| म्हणौनि तें तैसे बोलणें| नव्हे सपातळ आड लावणें| केलें मनचि वेगळवाणें| भोगावया ||
Heh Heh Heh...My parents are both busy professional people and have trouble finding time for chores and home maintenance. On weekends they each make a list of things to be done. Father's list is never completely crossed off, but Mother's always is. Puzzled, I asked her how she managed that. "Simple," she answered with a satisfied grin. "I do the chore first, and then I put it on the list and cross it off!"