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Dnyaneshvari adhyay - 7
by ज्ञानेश्वरमहाराज
[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ७ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय सातवा | ज्ञानविज्ञानयोगः | श्रीभगवानुवाच | मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु || १|| ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः | यज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ञातव्यमवशिष्यते || २|| आइका मग तो श्रीअनंतु| पार्थातें असे म्हणतु| पैं गा तूं योगयुक्तु| जालासि आतां || १|| मज समग्रातें जाणसी ऐसें| आपुलिया तळहातींचें रत्न जैसें| तुज ज्ञान सांगेन तैसें| विज्ञानेंसीं || २|| एथ विज्ञानें काय करावें| ऐसें घेसी जरी मनोभावें| तरी पैं आधीं जाणावें| तेंचि लागे || ३|| मग ज्ञानाचिये वेळे| झांकती जाणिवेचे डोळे| जैसी तीरीं नाव न ढळे| टेकलीसांती || ४|| तैसी जाणीव जेथ न रिघे| विचार मागुता पाउलीं निघे| तर्कु आयणी नेघे| आंगीं जयांच्या || ५|| अर्जुना तया नांव ज्ञान| येर प्रपंचु हें विज्ञान| तेथ सत्यबुद्धि तें अज्ञान| हेंही जाण || ६|| आतां अज्ञान अवघें हरपे| विज्ञान निःशेष करपे| आणि ज्ञान तें स्वरूपें| होऊनि जाइजे || ७|| जेणें सांगतयाचें बोलणें खुंटे| ऐकतयाचें व्यसन तुटे| हें जाणणें सानें मोठें| उरों नेदी || ८|| ऐसें वर्म जें गूढ| तें किजेल वाक्यारूढ| जेणें थोडेन पुरे कोड| बहुत मनींचें || ९|| मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये | यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः || ३|| पैं गा मनुष्यांचिया सहस्तशां- | माजीं विपाइले याचि धिंवसा| तैसें या धिंवसेकरां बहुवसां| माजीं विरळा जाणे || १०|| जैसा भरलेया त्रिभुवना- | आंतु एकएकु चांगु अर्जुना| निवडूनि कीजे सेना| लक्षवरी || ११|| कीं तयाही पाठीं| जे वेळीं लोह मांसातें घांटी| ते वेळीं विजयश्रियेच्या पाटीं| एकुची बैसे || १२|| तैसें आस्थेच्या महापुरीं| रिघताती कोटिवरी| परी प्राप्तीच्या पैलतीरीं| विपाइला निगे || १३|| म्हणौनि सामान्य गा नोहे| हें सांगतां वडिल गोठी आहे| परी तें बोलों येईल पाहें| आता प्रस्तुत ऐकें || १४|| भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च | अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा || ४|| तरी अवधारीं गा धनंजया| हे महदादिक माझी माया| जैसी प्रतिबिंबे छाया| निजांगाची || १५|| आणि इयेतें प्रकृति म्हणिजे| जे अष्टधा भिन्न जाणिजे| लोकत्रय निपजे| इयेस्तव || १६|| हे अष्टधा भिन्न कैसी| ऐसा ध्वनि धरिसी जरी मानसीं| तरी तेचि गा आतां परियेसीं| विवंचना || १७|| आप तेज गगन| मही मारुत मन| बुद्धि अहंकारु हे भिन्न| आठै भाग || १८|| अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् | जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् || ५|| या आठांची जे साम्यावस्था| ते माझी परम प्रकृति पार्था| तिये नाम व्यवस्था| जीवु ऐसी || १९|| जे जडातें जीववी| चेतनेतें चेतवी| मना करवीं मानवी| शोक मोहो || २०|| पैं बुद्धीच्या अंगीं जाणणें| तें जिये जवळिकेचें करणें| जिया अहंकाराचेनि विंदाणें| जगचि धरिजे || २१|| एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय | अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा || ६|| ते सूक्ष्म प्रकृति कोडें| जैं स्थूळाचिया आंगा घडे| तैं भूतसृष्टीची पडे| टांकसाळ || २२|| चतुर्विध ठसा| उमटों लागे आपैसा| मोला तरी सरसा| परी थरचि आनान || २३|| होती चौऱ्यांशीं लक्ष थरा| येरा मिती नेणिजे भांडारा| भरे आदिशून्याचा गाभारा| नाणेयांसी || २४|| ऐसें एकतुके पांचभौतिक| पडती बहुवस टांक| मग तिये समृद्धीचे लेख| प्रकृतीचि धरी || २५|| जे आखूनि नाणें विस्तारी| पाठी तयाची आटणी करी| माजीं कर्माकर्माचिया व्यवहारीं| प्रवर्तु दावी || २६|| हें रूपक परी असो| सांगों उघड जैसें परियेसों| तरी नामरूपाचा अतिसो| प्रकृतीच कीजे || २७|| आणि प्रकृति तंव माझ्या ठायीं| बिंबे येथें आन नाहीं| म्हणौनि आदि मध्य अवसान पाहीं| जगासि मी || २८|| मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय | मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव || ७|| हें रोहिणीचें जळ| तयाचें पाहतां येइजे मूळ| तैं रश्मि नव्हती केवळ| होय तें भानु || २९|| तयाचिपरी किरीटी| इया प्रकृती जालिये सृष्टी| जैं उपसंहरूनि कीजेल ठी| तैं मीचि आहें || ३०|| ऐसें होय दिसे न दिसे| हें मजचि माजीं असे| मियां विश्व धरिजे जैसें| सूत्रें मणि || ३१|| सुवर्णाचे मणी केले| ते सोनियाचे सुतीं वोविले| तैसें म्यां जग धरिलें| सबाह्याभ्यंतरीं || ३२|| रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः | प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु || ८|| पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ | जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु || ९|| म्हणौनि उदकीं रसु| कां पवनीं जो स्पर्शु| शशिसूर्यीं जो प्रकाशु| तो मीचि जाण || ३३|| तैसाचि नैसर्गिकु शुद्धु| मी पृथ्वीच्या ठायीं गंधु| गगनीं मी शब्दु| वेदीं प्रणवु || ३४|| नराच्या ठायीं नरत्व| जें अहंभाविये सत्त्व| तें पौरुष मी हें तत्त्व| बोलिजत असे || ३५|| अग्नि ऐसें आहाच| तेज नामाचें आहे कवच| तें परतें केलिया साच| निजतेज तें मी || ३६|| आणि नानाविध योनी| जन्मोनि भूतें त्रिभुवनीं| वर्तत आहाति जीवनीं| आपुलाल्या || ३७|| एकें पवनेंचि पिती| एकें तृणास्तव जिती| एकें अन्नाधारें राहती| जळें एकें || ३८|| ऐसें भूतांप्रति आनान| जें प्रकृतिवशें दिसे जीवन| तें आघवाठायीं अभिन्न| मीचि एक || ३९|| बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् | बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् || १०|| बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् | धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ || ११|| पैं आदिचेनि अवसरें| विरूढे गगनाचेनि अंकुरें| जे अंतीं गिळी अक्षरें| प्रणवपीठींचीं || ४०|| जंव हा विश्वाकारु असे| तंव जें विश्वाचिसारिखें दिसे| मग महाप्रळयदशे| कैसेंही नव्हे || ४१|| ऐसें अनादि जें सहज| तें मी गा विश्वबीज| हें हातातळीं तुज| देइजत असे || ४२|| मग उघड करूनि पांडवा| जैं हे आणिसील सांख्याचिया गांवा| तैं ययाचा उपेगु बरवा| देखशील || ४३|| परी हे अप्रासंगिक आलाप| आतां असतु न बोलों संक्षेप| जाण तपियांच्या ठायीं तप| तें रूप माझें || ४४|| बळियांमाजीं बळ| तें मी जाणें अढळ| बुद्धिमंतीं केवळ| बुद्धि तें मी || ४५|| भूतांच्या ठायीं कामु| तो मी म्हणे आत्मारामु| जेणें अर्थास्तव धर्मु| थोरु होय || ४६|| एऱ्हवीं विकाराचेनि पैसे| करी कीर इंद्रियांचि ऐसें| परी धर्मासि वेखासें| जावों नेदी || ४७|| जो अप्रवृत्तीचा अव्हांटा| सांडूनि विधीचिया निघे वाटा| तेवींचि नियमाचा दिवटा| सवें चाले || ४८|| कामु ऐसिया वोजा प्रवर्ते| म्हणौनि धर्मासि होय पुरतें| मोक्षतीर्थींचे मुक्तें| संसार भोगी || ४९|| जो श्रुतिगौरवाच्या मांडवीं| काम सृष्टीचा वेलु वाढवी| जंव कर्मफळेंसि पालवी| अपवर्गीं टेंके || ५०|| ऐसा नियुत कां कंदर्पु| जो भूतां या बीजरूपु| तो मी म्हणे बापु| योगियांचा || ५१|| हें एकेक किती सांगावें| आतां वस्तुजातचि आघवें| मजपासूनि जाणावें| विकारलें असे || ५२|| ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये | मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि || १२|| जे सात्त्विक हन भाव| कां रजतमादि सर्व| तें ममरूपसंभव| वोळखें तूं || ५३|| हे जाले तरी माझ्या ठायीं| परी तयामाजीं मी नाहीं| जैसी स्वप्नींच्या डोहीं| जागृति न बुडे || ५४|| जैसी रसाचीच सुघट| बीजकणिका घनवट| परी तियेस्तव होय काष्ठ| अंकुरद्वारें || ५५|| मग तया काष्ठाच्या ठायीं| सांग पां बीजपण असे काई ? | तैसा मी विकारीं नाहीं| जरी विकारला दिसे || ५६|| पैं गगनीं उपजे आभाळ| परी तेथ गगन नाहीं केवळ| अथवा आभाळीं होय सलिल| तेथ अभ्र नाहीं || ५७|| मग त्या उदकाचेनि आवेशें| प्रगटलें तेज जें लखलखीत दिसे| तिये विजूमाजीं असे| सलिल कायी ? || ५८|| सांगें अग्नीस्तव धूम होये| तिये धूमीं काय अग्नि आहे ? | तैसा विकारु हा मी नोहें| जरी विकारला असे || ५९|| त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् | मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् || १३|| परी उदकीं जाली बाबुळी| ते उदकातें जैसी झांकोळी| कां वायांचि आभाळीं| आकाश लोपे || ६०|| हां गा स्वप्न लटिकें म्हणों ये| परि निद्रावशें बाणलें होये| तंव आठवु काय देत आहे| आपणपेयां ? || ६१|| हें असो डोळ्यांचें| डोळांचि पडळ रचे| तेणें देखणेंपण डोळ्यांचे| न गिळजे कायी ? || ६२|| तैसी हे माझीच बिंबली| त्रिगुणात्मक साउली| कीं मजचि आड वोडवली| जवनिका जैसी || ६३|| म्हणौनि भूतें मातें नेणती| माझींच परी मी नव्हती| जैसी जळींचि जळीं न विरती| मुक्ताफळें || ६४|| पैं पृथ्वीयेचा घटु कीजे| सवेंचि पृथ्वीसि मिळे तरी मेळविजे| एऱ्हवीं तोचि अग्निसंगें सिजे| तरी वेगळा होय || ६५|| तैसें भूतजात सर्व| हे माझेचि कीर अवयव| परि मायायोगें जीव- | दशे आले || ६६|| म्हणौनि माझेचि मी नव्हती| माझेचि मज नोळखती| अहंममताभ्रांती| विषयांध जाले || ६७|| दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया | मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते || १४|| आतां महदादि हे माझी माया| उतरोनियां धनंजया| मी होईजे हें आया| कैसेनि ये ? || ६८|| जिये ब्रह्माचळाचा आधाडा| पहिलिया संकल्पजळाचा उभडा| सवेंचि महाभूतांचा बुडबुडा| साना आला || ६९|| जे सृष्टिविस्ताराचेनि वोघें| चढत काळकळनेचेनि वेगें| प्रवृत्तिनिवृत्तीचीं तुंगें| तटें सांडी || ७०|| जे गुणघनाचेनि वृष्टिभरें| भरली मोहाचेनि महापूरें| घेऊनि जात नगरें| यमनियमांचीं || ७१|| जे द्वेषाच्या आवर्तीं दाटत| मत्सराचे वळसे पडत| माजीं प्रमादादि तळपत| महामीन || ७२|| जेथ प्रपंचाचीं वळणें| कर्माकर्मांचीं वोभाणें| वरी तरताती वोसाणें| सुखदुःखांचीं || ७३|| रतीचिया बेटा| आदळती कामाचिया लाटा| जेथ जीवफेन संघटा| सैंघ दिसे || ७४|| अहंकाराचिया चळिया| वरि मदत्रयाचिया उकळिया| जेथ विषयोर्मीच्या आकळिया| उल्लाळ घेती || ७५|| उदयास्ताचे लोंढे| पाडीत जन्ममरणाचे चोंढे| जेथ पांचभौतिक बुडबुडे| होती जाती || ७६|| सम्मोह विभ्रम मासे| गिळिताती धैर्याचीं आविसें| तेथ देव्हडे भोंवत वळसे| अज्ञानाचे || ७७|| भ्रांतीचेनि खडुळें| रेवले आस्थेचे अवगाळें| रजोगुणाचेनि खळाळें| स्वर्गु गाजे || ७८|| तमाचे धारसे वाड| सत्त्वाचें स्थिरपण जाड| किंबहुना हे दुवाड| मायानदी || ७९|| पैं पुनरावृत्तीचेनि उभडें| झळंबती सत्यलोकींचे हुडे| घायें गडबडती धोंडे| ब्रह्मगोळकाचे || ८०|| तया पाणियाचेनि वहिलेपणें| अझुनी न धरिती वोभाणें| ऐसा मायापूर हा कवणें| तरिजेल गा ? || ८१|| येथ एक नवलावो| जो जो कीजे तरणोपावो| तो तो अपावो| होय तें एक || ८२|| एक स्वयंबुद्धीच्या बाहीं| रिगाले तयांची शुद्धीचि नाहीं| एक जाणिवेचे डोहीं| गर्वेंचि गिळिले || ८३|| एकीं वेदत्रयाचिया सांगडी| घेतल्या अहंभावाचिया धोंडी| ते मदमीनाच्या तोंडीं| सगळेचि गेले || ८४|| एकीं वयसेचें जाड बांधले| मग मन्मथाचिये कांसे लागले| ते विषयमगरीं सांडिले| चघळूनियां || ८५|| आतां वार्धक्याच्या तरंगा- | माजीं मतिभ्रंशाचा जरंगा| तेणें कवळिजताती पैं गा| चहूंकडे || ८६|| आणि शोकाचा कडा उपडत| क्रोधाच्या आवर्तीं दाटत| आपदागिधीं चुंबिजत| उधवला ठायीं || ८७|| मग दुःखाचेनि बरबटें बोंबले| पाठीं मरणाचिये रेवे रेवले| ऐसे कामाचे कांसे लागले| ते गेले वायां || ८८|| एकीं यजनक्रियेची पेटी| बांधोनि घातली पोटीं| ते स्वर्गसुखाच्या कपाटीं| शिरकोनि ठेले || ८९|| एकीं मोक्षीं लागावयाचिया आशा| केला कर्मबाह्यांचा भरंवसा| परी ते पडिले वळसां| विधिनिषेधांच्या || ९०|| जेथ वैराग्याची नाव न रिगे| विवेकाचा तागा न लगे| वरि कांहीं तरों ये योगें| तरी विपाय तो || ९१|| ऐसें तरी जीवाचिये आंगवणें| इये मायानदीचें तरणें| हें कासयासारिखें बोलणें| म्हणावें पां || ९२|| जरी अपथ्यशीळा व्याधी| कळे साधूसी दुर्जनाची बुद्धी| कीं रागी सांडी रिद्धी| आली सांती || ९३|| जरी चोरां सभा दाटे| अथवा मीनां गळु घोटे| ना तरी भेडा उलटे| विवसी जरी || ९४|| पाडस वागुर करांडी| कां मुंगी मेरु वोलांडी| तरी मायेची पैलथडी| देखती जीव || ९५|| म्हणौनि गा पंडुसुता| जैसी सकामा न जिणवेचि वनिता| तेवीं मायामय हे सरिता| न तरवें जीवां || ९६|| येथ एकचि लीला तरले| जे सर्वभावें मज भजले| तयां ऐलीच थडी सरलें| मायाजळ || ९७|| जयां सद्गुरुतारूं फुडें| जे अनुभवाचे कांसे गाढे| जयां आत्मनिवेदन तरांडे| आकळलें || ९८|| जे अहंभावाचें वोझें सांडुनी| विकल्पाचिया झुळका चुकाउनी| अनुरागाचा निरुता होउनि| पाणिढाळु || ९९|| जया ऐक्याचिया उतारा| बोधाचा जोडला तारा| मग निवृत्तीचिया पैल तीरा| झेंपावले जे || १००|| ते उपरतीच्या वांवीं सेलत| सोऽहंभावाचेनि थावें पेलत| मग निघाले अनकळित| निवृत्तितटीं || १०१|| येणें उपायें मज भजले| ते हे माझी माया तरले| परि ऐसे भक्त विपाइले| बहुवस नाहीं || १०२|| न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः | माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः || १५|| चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन | आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ || १६|| जे बहुतां एकां अव्हांतरु| अहंकाराचा भूतसंचारु| जाहला म्हणौनि विसरु| आत्मबोधाचा || १०३|| ते वेळीं नियमाचें वस्त्र नाठवे| पुढील अधोगतीची लाज नेणवे| आणि करिताति जें न करावें| वेदु म्हणे || १०४|| पाहें पां शरीराचिया गांवा| जयालागीं आले पांडवा| तो कार्यार्थु आघवा| सांडूनियां || १०५|| इंद्रियग्रामींचे राजबिदीं| अहंममतेचिया जल्पवादीं| विकारांतरांचि मांदीं| मेळवूनियां || १०६|| दुःखशोकांच्या घाईं| मारिलियाची सेचि नाहीं| हे सांगावया कारण काई| जे ग्रासिले माया || १०७|| म्हणौनि ते मातें चुकले| ऐका चतुर्विध मज भजले| जिहीं आत्महित केलें| वाढतें गा || १०८|| तो पहिला आर्तु म्हणिजे| दुसरा जिज्ञासु बोलिजे| तिजा अर्थार्थी जाणिजे| ज्ञानिया चौथा || १०९|| तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते | प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः || १७|| तेथ आर्तु तो आर्तीचेनि व्याजें| जिज्ञासु तो जाणावयालागीं भजे| तिजेनि तेणें इच्छिजे| अर्थसिद्धि || ११०|| मग चौथियाच्या ठायीं| कांहींचि करणें नाहीं| म्हणौनि भक्तु एकु पाहीं| ज्ञानिया जो || १११|| जे तया ज्ञानाचेनि प्रकाशें| फिटलें भेदाभेदांचें कडवसें| मग मीचि जाहला समरसें| आणि भक्तुही तेवींचि || ११२|| परि आणिकांच
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