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Dnyaneshvari adhyay - 8 by ज्ञानेश्वरमहाराज

[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ८ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय आठवा |
 अक्षरब्रह्मयोगः | अर्जुन उवाच | किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम | अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते || १||
मग अर्जुनें म्हणितलें| हां हो जी अवधारिलें| जें म्यां पुसिलें| तें निरूपिजो || १||
 सांगा कवण तें ब्रह्म| कायसया नाम कर्म| अथवा अध्यात्म| काय म्हणिपे || २||
अधिभूत तें कैसें| एथ अधिदैव तें कवण असे| हें उघड मी परियेसें| ऐसें बोला || ३||
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन | प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः || २||
देवा अधियज्ञ तो काई| कवण पां इये देहीं| हें अनुमानासि कांहीं| दिठी न भरे || ४||
आणि नियता अंतःकरणीं| तूं जाणिजसी देहप्रयाणीं| तें कैसेनि हे शारङ्गपाणी| परिसवा मातें || ५||
देखा धवळारीं चिंतामणीचा| जरी पहुडला होय दैवाचा| तरी वोसणतांही बोलु तयाचा| सोपु न वचे || ६||
 तैसें अर्जुनाचिया बोलासवें| आलें तेंचि म्हणितलें देवें| तें परियेसें गा बरवें| जे पुसिलें तुवां || ७||
किरीटी कामधेनूचा पाडा| वरी कल्पतरूचा आहे मांदोडा| म्हणौनि मनोरथसिद्धीचिया चाडा| तो नवल नोहे || ८||
श्रीकृष्ण कोपोनि ज्यासी मारी| तो पावे परब्रह्मसाक्षात्कारीं| मा कृपेनें उपदेशु करी| तो कैशापरी न पवेल || ९||
जैं कृष्णचि होइजे आपण| तैं कृष्ण होय आपुलें अंतःकरण| मग संकल्पाचें आंगण| वोळगती सिद्धी || १०||
परि ऐसें जें प्रेम| तें अर्जुनींचि आथि निस्सीम| म्हणौनि तयाचें काम| सदां सफळ || ११||
या कारणें श्रीअनंतें| तें मनोगत तयाचें पुसतें| होईल जाणोनि आइतें| वोगरूनि ठेविलें || १२||
जें अपत्य थानीहूनि निगे| तयाची भूक ते मायेसीचि लागे| एऱ्हवीं तें शब्दें काय सांगें| मग स्तन्य दे येरी ? || १३||
म्हणौनि कृपाळुवा गुरूचिया ठायीं| हें नवल नोहे कांहीं| परि तें असो आइका काई| जें देव बोलते जाहले || १४||
श्रीभगवानुवाच | अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते | भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः || ३||
मग म्हणितलें सर्वेश्वरें| जें आकारीं इयें खोंकरें| कोंदलें असत न खिरे| कवणे काळीं || १५||
 एऱ्हवीं सपूरपण तयाचें पहावें| तरी शून्यचि नव्हे स्वभावें| वरी गगनाचेनि पालवें| गाळूनि घेतलें || १६||
 जें ऐसेंही परि विरुळें| इये विज्ञानाचिये खोळे| हालवलेंहि न गळे| तें परब्रह्म || १७||
 आणि आकाराचेनि जालेपणें| जन्मधर्मातें नेणें| आकारलोपीं निमणें| नाहीं कहीं || १८||
ऐशिया आपुलियाची सहजस्थिती| जया ब्रह्माची नित्यता असती| तया नाम सुभद्रापती| अध्यात्म गा || १९||
मग गगनीं जेविं निर्मळें| नेणों कैचीं एके वेळे| उठती घनपटळें| नानावर्णें || २०||
तैसें अमूर्तीं तिये विशुद्धें| महदादि भूतभेदें| ब्रह्मांडाचे बांधे| होंचि लागती || २१||
 पैं निर्विकल्पाचिये बरडीं| फुटे आदिसंकल्पाची विरूढी| आणि तें सवेंचि मोडोनि ये ढोंढी| ब्रह्मगोळकांच्या || २२||
तया एकैकाचे भीतरीं पाहिजे| तंव बीजाचाचि भरिला देखिजे| माजीं होतिया जातिया नेणिजे| लेख जीवा || २३||
मग तया ब्रह्मगोळकांचें अंशांश| प्रसवती आदिसंकल्प असमसहास| हें असो ऐसी बहुवस| सृष्टी वाढे || २४||
परि दुजेनविण एकला| परब्रह्मींचि संचला| अनेकत्वाचा आला| पूर जैसा || २५||
 तैसें समविषमत्व नेणों कैचें| वायांचि चराचर रचे| पाहतां प्रसवतिया योनीचे| लक्ष दिसती || २६||
 येरी जीवभावाचिये पालविये| कांहीं मर्यादा करूं नये| पाहिजे कवण हें आघवें विये| तंव मूळ तें शून्य || २७||
म्हणौनि कर्ता मुदल न दिसे| आणि सेखीं कारणहीं कांहीं नसे| माजीं कार्यचि आपैसें| वाढों लागे || २८||
ऐसा करितेनवीण गोचरु| अव्यक्तीं हा आकारु| निपजे जो व्यापारु| तया नाम कर्म || २९||
 अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् | अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर || ४||
आतां अधिभूत जें म्हणिपे| तेंहि सांगों संक्षेपें| तरी होय आणि हारपे| अभ्र जैसें || ३०||
तैसें असतेपण आहाच| नाहीं होईजे हें साच| जयातें रूपा आणिती पांचपांच| मिळोनियां || ३१||
भूतांतें अधिकरूनि असे| आणि भूतसंयोगें तरी दिसे| जें वियोगवेळे भ्रंशें| नामरूपादिक || ३२||
तयातें अधिभूत म्हणिजे| मग अधिदैव पुरुष जाणिजे| जेणें प्रकृतीचें भोगिजे| उपार्जिलें || ३३||
जो चेतनेचा चक्षु| जो इंद्रियदेशींचा अध्यक्षु| जो देहास्तमानीं वृक्षु| संकल्प विहंगमाचा || ३४||
जो परमात्माचि परी दुसरा| जो अहंकारनिद्रा निदसुरा| म्हणौनि स्वप्नीचिया वोरबारा| संतोषें शिणे || ३५||
जीव येणें नांवें| जयातें आळविजे स्वभावें| तें अधिदैवत जाणावें| पंचायतनींचें || ३६||
आतां इयेचि शरीरग्रामीं| जो शरीरभावातें उपशमी| तो अधियज्ञु एथ गा मी| पंडुकुमरा || ३७||
येर अधिदैवाधिभूत| तेहि मीचि कीर समस्त| परि पंधरें किडाळा मिळत| तें काय सांके नोहे ? || ३८||
तरि तें पंधरेपण न मैळे| आणि किडाळाचियाही अंशा न मिळे| परि जंव असे तयाचेनि मेळें| तंव सांकेंचि म्हणिजे || ३९||
तैसें अधिभूतादि आघवें| हें अविद्येचेनि पालवें| झांकलें तंव मानावें| वेगळें ऐसें || ४०||
 तेचि अविद्येची जवनिका फिटे| आणि भेदभावाची अवधी तुटे| मग म्हणों एक होऊनि जरी आटे| तरी काय दोनी होती ? || ४१||
 पैं केशांचा गुंडाळा| वरि ठेविली स्फटिकशिळा| ते वरि पाहिजे डोळां| तंव भेदली गमती || ४२||
पाठीं केश परौते नेले| आणि भेदलेपण काय नेणों जाहालें| तरी डांक देऊनि सांदिलें| शिळेतें काई ? || ४३||
ना ते अखंडचि आयती| परि संगें भिन्न गमली होती| ते सारिलिया मागौती| जैसी कां तैसी || ४४||
तेवींचि अहंभावो जाये| तरी ऐक्य तें आधींचि आहे| हेंचि साचें जेथ होये| तो अधुयज्ञु मी || ४५||
पैं गा आम्हीं तुज| सकळ यज्ञ कर्मज| सांगितलें कां जें काज| मनीं धरूनि || ४६||
तो हा सकळ जीवांचा विसांवा| नैष्कर्म्य सुखाचा ठेवा| परि उघड करूनि पांडवा| दाविजत असे || ४७||
पहिलिया वैराग्यइंधन परिपूर्तीं| इंद्रियानळीं प्रदीप्तीं| विषयद्रव्याचिया आहुती| देऊनियां || ४८||
मग वज्रासन तेचि उर्वी| शोधूनि आधारमुद्रा बरवी| वेदिका रचे मांडवीं| शरीराच्या || ४९||
तेथ संयमाग्नीचीं कुंडें| इंद्रियद्रव्याचेनि पवाडें| यजिजती उदंडें| युक्तिघोषें || ५०||
मग मनप्राणसंयमु| हाचि हवनसंपदेचा संभ्रमु| येणें संतोषविजे निर्धूमु| ज्ञानानळु || ५१||
ऐसेनि हें सकळ ज्ञानीं समर्पें| मग ज्ञान तें ज्ञेयीं हारपे| पाठी ज्ञेयचि स्वरूपें| निखिल उरे || ५२||
तया नांव गा अधियज्ञु| ऐसें बोलिला जंव सर्वज्ञु| तंव अर्जुन अतिप्राज्ञु| तया पातलें तें || ५३||
हें जाणोनि म्हणितलें देवें| पार्था परिसतु आहासि बरवें| या कृष्णाचिया बोलासवें| येरु सुखाचा जाहला || ५४||
 देखा बालकाचिया धणि धाइजे| कां शिष्याचेनि जाहलेपणें होइजे| हें सद्गुरूचि एकलेनि जाणिजे| कां प्रसवतिया || ५५||
म्हणौनि सात्त्विक भावांची मांदी| कृष्णाआंगीं अर्जुनाआधीं| न समातसे परी बुद्धी| सांवरूनि देवें || ५६||
मग पिकलिया सुखाचा परिमळु| कीं निवालिया अमृताचा कल्लोळु| तैसा कोंवळा आणि सरळु| बोलु बोलिला || ५७||
 म्हणे परिसणेयांचिया राया| आइकें बापा धनंजया| ऐसी जळों सरलिया माया| तेथ जाळितें तेंही जळे || ५८||
 अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् | यः प्रयाति स मद्भवं याति नास्त्यत्र संशयः || ५||
जें आतांचि सांगितलें होतें| अगा अधियज्ञ म्हणितला जयातें| जे आदींचि तया मातें| जाणोनि अंतीं || ५९||
ते देह झोल ऐसें मानुनी| ठेले आपणपें आपण होउनी| जैसा मठ गगना भरुनी| गगनींचि असे || ६०||
ये प्रतीतीचिया माजघरीं| तया निश्चयाची वोवरी| आली म्हणौनि बाहेरी| नव्हेचि से || ६१||
ऐसें सबाह्य ऐक्य संचलें| मीचि होऊनि असतां रचिलें| बाहेरि भूतांचीं पांचही खवलें| नेणतांचि पडिलीं || ६२||
आतां उभेयां उभेपण नाहीं जयाचें| मा पडिलिया गहन कवण तयाचें| म्हणौनि प्रतीतीचिये पोटींचें| पाणी न हाले || ६३||
 ते ऐक्याची आहे वोतिली| कीं नित्यतेचिया हृदयीं घातली| जैसी समरससमुद्रीं धुतली| रुळेचिना || ६४||
 पैं अथावीं घट बुडाला| तो आंतबाहेरी उदकें भरला| पाठीं दैवगत्या जरी फुटला| तरी उदक काय फुटे ? || ६५||
नातरी सर्पें कवच सांडिलें| कां उबारेनें वस्त्र फेडिलें| तरी सांग पां काय मोडलें| अवेवामाजीं ? || ६६||
तैसा आकारु हा आहाच भ्रंशे| वांचूनी वस्तु ते सांचलीचि असे| तेचि बुद्धि जालिया विसकुसे| कैसेनि आतां || ६७||
 म्हणौनि यापरी मातें| अंतकाळीं जाणतसाते| जे मोकलिती देहातें| ते मीचि होती || ६८||
एऱ्हवीं तरी साधारण| उरीं आदळलिया मरण| जो आठवु धरी अंतःकरण| तेंचि होईजे || ६९||
जैसा कवणु एकु काकुळती| पळतां पवनगती| दुपाउलीं अवचितीं| कुहामाजीं पडियेला || ७०||
आतां तया पडणयाआरौतें| पडण चुकवावया परौतें| नाहीं म्हणौनि तेथें| पडावेंचि पडे || ७१||
तेविं मृत्यूचेनि अवसरें एकें| जें येऊनि जीवासमोर ठाके| तें होणें मग न चुके| भलतयापरी || ७२||
आणि जागता जंव असिजे| तंव जेणें ध्यानें भावना भाविजे| डोळां लागतखेंवो देखिजे| तेंचि स्वप्नीं || ७३||
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् | तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः || ६||
 तेविं जितेनि अवसरें| जें आवडोनि जीवीं उरे| तेंचि मरणाचिये मेरे| फार हों लागे || ७४||
आणि मरणीं जया जें आठवे| तो तेचि गतीतें पावे| म्हणौनि सदा स्मरावें| मातेंचि तुवां || ७५||
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च | मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् || ७||
डोळां जें देखावें| कां कानीं हन ऐकावें| मनीं जें भावावें| बोलावें वाचें || ७६||
 तें आंत बाहेरी आघवें| मीचि करूनि घालावें| मग सर्वीं काळीं स्वभावें| मीचि आहें || ७७||
अर्जुना ऐसें जाहालिया| मग न मरिजे देह गेलिया| मा संग्रामु केलिया| भय काय तुज ? || ७८||
तूं मन बुद्धि सांचेंसीं| जरी माझिया स्वरूपीं अर्पिसी| तरी मातेंचि गा पावसी| हे माझी भाक || ७९||
हेंच कायिसया वरी होये| ऐसा जरी संदेहो वर्ततु आहे| तरी अभ्यासूनि आदीं पाहें| मग नव्हे तरी कोपें || ८०||
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना | परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन || ८||
येणेंचि अभ्यासेंसी योगु| चित्तासि करी पां चांगु| अगा उपायबळें पंगु| पहाड ठाकी || ८१||
तेविं सदभ्यासें निरंतर| चित्तासि परमपुरुषाची मोहर| लावीं मग शरीर| राहो अथवा जावो || ८२||
जें नानागतीतें पाववितें| तें चित्त वरील आत्मयातें| मग कवण आठवी देहातें| गेलें कीं आहे ? || ८३||
पैं सरितेचेनि ओघें| सिंधुजळा मीनलें घोघें| तें काय वर्तत आहे मागें| म्हणौनि पाहों येती ? || ८४||
 ना तें समुद्रचि होऊन ठेलें| तेविं चित्ताचें चैतन्य जाहालें| जेथ यातायात निमालें| घनानंद जें || ८५||
 कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः | सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् || ९||
जयाचें आकारावीण असणें| जया जन्म ना निमणें| जें आघवेंचि आघवेंपणें| देखत असे || ८६||
 जें गगनाहूनि जुनें| जें परमाणुहूनि सानें| जयाचेनि सन्निधानें| विश्व चळे || ८७||
जें सर्वांते यया विये| विश्व सर्व जेणें जिये| हेतु जया बिहे| अचिंत्य जें || ८८||
देखे वोळंबा इंगळु न चरे| तेजीं तिमिर न शिरे| जे दिहाचे अंधारें| चर्मचक्षूसीं || ८९||
सुसडा सूर्यकणांच्या राशी| जो नित्य उदो ज्ञानियांसी| अस्तमानाचे जयासी| आडनांव नाहीं || ९०||
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव | भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् || १०||
तया अव्यंगवाणेया ब्रह्मातें| प्रयाणकाले प्राप्ते| जो स्थिरावलेनि चित्तें| जाणोनि स्मरे || ९१||
 बाहेरी पद्मासन रचुनी| उत्तराभिमुख बैसोनि| जीवीं सुख सूनि| क्रमयोगाचे || ९२||
आंतु मीनलेनि मनोधर्में| स्वरूपप्राप्तीचेनि प्रेमें| आपेआप संभ्रमें| मिळावया || ९३||
आकळलेनि योगें| मध्यमा मध्य मार्गें| अग्निस्थानौनि निगे| ब्रह्मरंध्रा || ९४||
तेथ अचेत चित्ताचा सांगातु| आहाचवाणा दिसे मांडतु| जेथ प्राणु गगनाआंतु| संचरे कां || ९५||
 परी मनाचेनि स्थैर्यें धरिला| भक्तीचिया भावना भरला| योगबळें आवरला| सज्ज होऊनि || ९६||
तो जडाजडातें विरवितु| भ्रूलतामाजीं संचरतु| जैसा घंटानाद लयस्तु| घंटेसीच होय || ९७||
कां झांकलिया घटींचा दिवा| नेणिजे काय जाहला केव्हां| या रीतीं जो पांडवा| देह ठेवी || ९८||
तो केवळ परब्रह्म| जया परमपुरुष ऐसें नाम| तें माझें निजधाम| होऊनि ठाके || ९९||
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः | यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये || ११||
सकळां जाणणेयां जे लाणी| तिये जाणिवेची जे खाणी| तयां ज्ञानियांचिये आयणी| जयातें अक्षरु म्हणिपे || १००||
 चंडवातेंही न मोडे| तें गगनचि की फुडें| वांचूनि जरी होईल मेहुडें| तरी उरेल कैंचें ? || १०१||
तेविं जाणणेया जें आकळिलें| तें जाणिवलेपणेंचि उमाणलें| मग नेणवेचि तया म्हणितलें| अक्षर सहजें || १०२||
म्हणौनि वेदविद नर| म्हणती जयातें अक्षर| जें प्रकृतीसी पर| परमात्मरूप || १०३||
आणि विषयांचे विष उलंडूनि| जे सर्वेंद्रियां प्रायश्चित्त देऊनि| आहाति देहाचिया बैसोनि| झाडातळीं || १०४||
 ते यापरी विरक्त| जयाची निरंतर वाट पाहात| निष्कामासि अभिप्रेत| सर्वदा जें || १०५||
जयाचिया आवडी| न गणिती ब्रह्मचर्याचीं सांकडीं| निष्ठुर होऊनि बापुडीं| इंद्रियें करिती || १०६||
 ऐसें जें पद| दुर्लभ आणि अगाध| जयाचिये थडिये वेद| चुबुकळिले ठेले || १०७||
तें ते पुरुष होती| जे यापरी लया जाती| तरी पार्था हेचि स्थिती| एकवेळ सांगों || १०८||
तेथ अर्जुनें म्हणितलें स्वामी| हेंचि म्हणावया होतों पां मी| तंव सहजें कृपा केली तुम्हीं| तरी बोलिजो कां || १०९||
परि बोलावें तें अति सोहोपें| तेथें म्हणितलें त्रिभुवनदीपें| तुज काय नेणों संक्षेपें| सांगेन ऐक || ११०||
तरी मना या बाहेरिलीकडे| यावयाची साविया सवे मोडे| हें हृदयाचिया डोहीं बुडे| तैसें कीजे || १११||
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च | मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् || १२||
परी हे तरीच घडे| जरी संयमाचीं अखंडें| सर्वद्वारीं कवाडें| कळासती || ११२||
तरी सहजें मन कोंडलें| हृदयींचि असेल उगलें| जैसें करचरणीं मोडलें| परिवरु न संड

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Doctor: I have some good news and some very bad news. The good news is that the lab called with your test results. They said you have 24 hours to live.
Patient: 24 hours! That's terrible!! What would be the WORSE?
Doctor: I've been trying to reach you since yesterday.

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