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Dnyaneshvari adhyay - 10 by ज्ञानेश्वरमहाराज

[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १० .. ||
 ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय दहावा |
 विभूतियोगः | नमो विशदबोधविदग्धा| विद्यारविंदप्रबोधा| पराप्रमेयप्रमदा| विलासिया || १||
नमो संसारतमसूर्या| अपरिमितपरमवीर्या| तरुणतरतूर्या| लालनलीला || २||
 नमो जगदखिलपालना| मंगळमणिनिधाना| सज्जनवनचंदना| आराध्यलिंगा || ३||
 नमो चतुरचित्तचकोरचंद्रा| आत्मानुभवनरेंद्रा| श्रुतिसारसमुद्रा| मन्मथमन्मथा || ४||
 नमो सुभावभजनभाजना| भवेभकुंभभंजना| विश्वोद्भवभुवना| श्रीगुरुराया || ५||
 तुमचा अनुग्रहो गणेशु| जैं दे आपुला सौरसु| तैं सारस्वतीं प्रवेशु| बाळकाही आथी || ६||
जी दैविकीं उदार वाचा| जैं उद्देशु दे नाभिकाराचा| तैं नवरससुधाब्धीचा| थावो लाभे || ७||
जी आपुलिया स्नेहाची वागेश्वरी| जरी मुकेयातें अंगिकारी| तो वाचस्पतीशीं करी| प्रबंधुहोडा || ८||
 हें असो दिठी जयावरी झळके| कीं हा पद्मकरु माथां पारुखे| तो जीवचि परि तुके| महेशेंसीं || ९||
एवढें जिये महिमेचें करणें| तें वाचाबळें वानूं मी कवणें| कां सूर्याचिया आंगा उटणें| लागत असे ? || १०||
 केउता कल्पतरुवरी फुलौरा ? | कायसेनि पाहुणेरु क्षीरसागरा ? | कवणें वासीं कापुरा| सुवासु देवों ? || ११||
चंदनातें कायसेनि चर्चावें| अमृतातें केउतें रांधावें| गगनावरी उभवावें| घडे केवीं ? || १२||
 तैसें श्रीगुरूचें महिमान| आकळितें कें असे साधन ? | हें जाणोनि मियां नमन| निवांत केलें || १३||
 जरी प्रज्ञेचेनि आथिलेपणें| श्रीगुरूसामर्थ्या रूप करूं म्हणे| तरि तें मोतियां भिंग देणें| तैसें होईल || १४||
 कां साडेपंधरया रजतवणी| तैशीं स्तुतींचीं बोलणीं| उगियाचि माथा ठेविजे चरणीं| हेंचि भलें || १५||
 मग म्हणितलें जी स्वामी| भलेनि ममत्वें देखिलें तुम्हीं| म्हणौनि कृष्णार्जुनसंगमीं| प्रयागवटु जाहलों || १६||
मागां दूध दे म्हणतलियासाठीं| आघविया क्षीराब्धीची करूनि वाटी| उपमन्यूपुढें धूर्जटी| ठेविली जैसी || १७||
 ना तरी वैकुंठपीठनायकें| रुसला ध्रुव कवतिकें| बुझाविला देऊनि भातुकें| ध्रुवपदाचें || १८||
तैसी जे ब्रह्मविद्यारावो| सकळ शास्त्रांचा विसंवता ठावो| ते भगवद्गीता वोंविये गावों| ऐसें केलें || १९||
जे बोलणियाचे रानीं हिंडतां| नायकिजे फळलिया अक्षराची वार्ता| परि ते वाचाचि केली कल्पलता| विवेकाची || २०||
होती देहबुद्धी एकसरी| ते आनंदभांडारा केली वोवरी| मन गीतार्थसागरीं| जळशयन जालें || २१||
ऐसें एकेक देवांचें करणें| तें अपार बोलों केवीं मी जाणें| तऱ्ही अनुवादलों धीटपणें| ते उपसाहिजो जी || २२||
आतां आपुलेनि कृपाप्रसादें| मियां भगवद्गीता वोंवीप्रबंधें| पूर्वखंड विनोदें| वाखाणिलें || २३||
प्रथमीं अर्जुनाचा विषादु| दुजीं बोलिला योगु विशदु| परि सांख्यबुद्धीसि भेदु| दाऊनियां || २४||
तिजीं केवळ कर्म प्रतिष्ठिलें| तेंचि चतुर्थीं ज्ञानेंशीं प्रगटिलें| पंचमीं गव्हरिलें| योगतत्त्व || २५||
तेचि षष्ठामाजीं प्रगट| आसनालागोनि स्पष्ट| जीवात्मभाव एकवट| होती जेणें || २६||
तैसी जे योगस्थिती| आणि योगभ्रष्टां जे गती| तें आघवीचि उपपत्ती| सांगितली षष्ठीं || २७||
तयावरी सप्तमीं| प्रकृतिपरिहार उपक्रमीं| करूनि भजती जे पुरुषोत्तमीं| ते बोलिले चाऱ्ही || २८||
पाठीं सप्तप्रश्नविधि| बोलोनि प्रयाणसमयसिद्धी . एवं सकळ वाक्यावधि| अष्टमाध्यायीं || २९||
मग शब्दब्रह्मीं असंख्याकें| जेतुला कांहीं अभिप्राय पिके| तेतुला महाभारतें एकें| लक्षें जोडे || ३०||
तिये आघवांचि जें महाभारतीं| तें लाभे कृष्णार्जुनवाचोक्तीं| आणि जो अभिप्रावो सातेंशतीं| तो एकलाचि नवमीं || ३१||
म्हणौनि नवमींचिया अभिप्राया| सहसा मुद्रा लावावया| बिहाला मग मी वायां| गर्व कां करूं ? || ३२||
अहो गूळासाखरे मालयाचे| हे बांधे तरी एकाचि रसाचे| परि स्वाद गोडियेचे| आनआन जैसे || ३३||
एक जाणोनियां बोलती| एक ठायें ठावो जाणविती| एक जाणों जातां हारपती| जाणते गुणेंशीं || ३४||
हें ऐसें अध्याय गीतेचे| परि अनिर्वाच्यपण नवमाचें| तो अनुवादलों हें तुमचें| सामर्थ्य प्रभू || ३५||
अहो एकाचि शाटी तपिन्नली| एकीं सृष्टीवरी सृष्टी केली| एकीं पाषाणीं वाऊनि उतरलीं| समुद्रीं कटकें || ३६||
एकीं आकाशीं सूर्यातें धरिलें| एकीं चुळींचि सागरातें भरिलें| तैसें मज मुकयाकरवीं बोलविलें| अनिर्वाच्य तुम्हीं || ३७||
 परि हें असो एथ ऐसें| राम रावण झुंजिन्नले कैसे| राम रावण जैसे| मीनले समरीं || ३८||
तैसें नवमीं कृष्णाचें बोलणें| तें नवमीचियाचि ऐसें मी म्हणें| या निवाडा तत्त्वज्ञु जाणें| जया गीतार्थु हातीं || ३९||
एवं नवही अध्याय पहिले| मियां मतीसारिखे वाखाणिले| आतां उत्तरखंड उवाइलें| ग्रंथाचें ऐका || ४०||
जेथ विभूति प्रतिविभूती| प्रस्तुत अर्जुना सांगिजेती| ते विदग्धा रसवृत्ती| म्हणिपैल कथा || ४१||
देशियेचेनि नागरपणें| शांतु शृंगारातें जिणें| तरि ओंविया होती लेणें| साहित्यासि || ४२||
मूळ ग्रंथींचिया संस्कृता| वरि मऱ्हाठी नीट पढतां| अभिप्राय मानलिया उचिता| कवण भूमी हें न चोजवे || ४३||
जैसें अंगाचेनि सुंदरपणें| लेणिया आंगचि होय लेणें| तेथ अळंकारिलें कवण कवणें| हें निर्वचेना || ४४||
तैसी देशी आणि संस्कृत वाणी| एका भावार्थाच्या सुखासनीं| शोभती आयणी| चोखट आइका || ४५||
उठावलिया भावा रूप| करितां रसवृत्तीचें लागे वडप| चातुर्य म्हणे पडप| जोडलें आम्हां || ४६||
तैसें देशियेचें लावण्य| हिरोनि आणिलें तारुण्य| मग रचिलें अगण्य| गीतातत्त्व || ४७||
 जो चराचर परमगुरु| चतुर चित्तचमत्कारु| तो ऐका यादवेश्वरु| बोलता जाहला || ४८||
ज्ञानदेव निवृत्तीचा म्हणे| ऐसें बोलिलें श्रीहरी तेणें| अर्जुना आघवियाची मातु अंतःकरणें| धडौता आहासि || ४९||
 श्रीभगवानुवाच | भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः | यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया || १||
आम्हीं मागील जें निरूपण केलें| तें तुझें अवधानचि पाहिलें| तवं टाचें नव्हें भलें| पुरतें आहे || ५०||
घटीं थोडेसें उदक घालिजे| तेणें न गळे तरी वरिता भरिजे| ऐसा परिसौनि पाहिलासि तवं परिसविजे| ऐसेंचि होतसे || ५१||
 अवचितयावरी सर्वस्व सांडिजे| मग चोख तरी तोचि भांडारी कीजे| तैसा किरीटी तूं आतां माझें| निजधाम कीं || ५२||
 ऐसें अर्जुना येउतें सर्वेश्वरें| पाहोनि बोलिलें अत्यादरें| गिरी देखोनि सुभरें| मेघु जैसा || ५३||
 तैसा कृपाळुवांचा रावो| म्हणे आइकें गा महाबाहो| सांगितलाचि अभिप्रावो| सांगेन पुढती || ५४||
पैं प्रतिवर्षीं क्षेत्र पेरिजे| पिकाची जंव जंव वाढी देखिजे| यालागीं नुबगिजे| वाहो करितां || ५५||
पुढतपुढती पुटें देतां| जोडे वानियेची अधिकता| म्हणौनि सोनें पंडुसुता| शोधूंचि आवडे || ५६||
तैसें एथ पार्था| तुज आभार नाहीं सर्वथा| आम्ही आपुलियाचि स्वार्था| बोलों पुढती || ५७||
जैसें बाळका लेवविजे लेणें| तया शृंगारा बाळ काइ जाणे ? | परि ते सुखाचे सोहळे भोगणें| माउलिये दिठी || ५८||
 तैसें तुझें हित आघवें| जंव जंव कां तुज फावे| तंव तंव आमुचें सुख दुणावे| ऐसें आहे || ५९||
आतां अर्जुना असो हे विकडी| मज उघड तुझी आवडी| म्हणौनि तृप्तीची सवडी| बोलतां न पडे || ६०||
 आम्हां येतुलियाचि कारणें| तेंचि, तें तुजशीं बोलणें| परि असो हें अंतःकरणें| अवधान देईं || ६१||
तरी ऐकें गा सुवर्म| वाक्य माझें, परम| जें अक्षरें लेऊनी परब्रह्म| तुज खेंवासि आलें || ६२||
परी किरीटी तूं मातें| नेणसी ना निरुतें| तरि तो गा जो मी एथें| तें विश्वचि हें || ६३||
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः | अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः || २||
एथ वेद मुके जाहाले| मन पवन पांगुळले| रातीविण मावळले| रविशशी जेथ || ६४||
अगा उदरींचा गर्भु जैसा| न देखें आपुलिये मातेची वयसा| मी आघवेया देवां तैसा| नेणवे कांहीं || ६५||
आणि जळचरां उदधीचें मान| मशका नोलांडवेचि गगन| तेवीं महर्षींचें ज्ञान| न देखेचि मातें || ६६||
 मी कवण पां केतुला| कवणाचा कैं जाहला| या निरुती करितां बोला| कल्प गेले || ६७||
कां जे महर्षीं आणि या देवां| येरां भूतजातां सर्वां| मी आदि म्हणौनि पांडवा| अवघड जाणतां || ६८||
 उतरलें उदक पर्वत वळघे| जरी झाड वाढत मुळीं लागे| तरी मियां जालेनि जगें| जाणिजे मातें || ६९||
 कां गाभेवनें वटु गिंवसवे| जरी तरंगीं सागरू सांठवे| कां परमाणूमाजीं सामावे| भूगोलु हा || ७०||
तरी मियां जालिया जीवां| महर्षीं अथवा देवां| मातें जाणावया होआवा| अवकाशु गा || ७१||
ऐसाही जरी विपायें| सांडूनि पुढीले पाये| सर्वेंद्रियांसि होये| पाठिमोरा जो || ७२||
प्रवर्तलाही वेगीं बहुडे| देह सांडूनि मागलीकडे| महाभूतांचिया चढे| माथयावरी || ७३||
 यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् | असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते || ३||
तेथ राहोनि ठायठिके| स्वप्रकाशें चोखें| अजत्व माझें देखे| आपुलिया डोळां || ७४||
मी आदीसिं परु| सकळलोकमहेश्वरु| ऐसिया मातें जो नरु| यापरी जाणें || ७५||
तो पाषाणांमाजीं परिसु| जैसा रसाआंतु सिद्धरसु| तैसा मनुष्याआंतु तो अंशु| माझाचि जाण || ७६||
 तें चालतें ज्ञानाचें बिंब| तयाचे अवयव ते सुखाचे कोंभ| येर माणुसपण तें भांब| लौकिक भागु || ७७||
अगा अवचिता कापुरा- | माजीं सांपडला हिरा| वरी पडिलिया नीरा| न निगे केवीं || ७८||
तैसा मनुष्यलोकाआंतु| तो जरी जाहला प्राकृतु| तऱ्ही प्रकृतिदोषाची मातु| नेणेंचि कीं || ७९||
तो आपसयेंचि सांडिजे पापीं| जैसा जळत चंदनु सर्पीं| तेवीं मातें जाणें तो संकल्पीं| वर्जूनि घापे || ८०||
तेंचि आमुतें कैसें जाणिजे| ऐसें कल्पी जरी चित्त तुझें| तरी मी ऐसा हें माझें| भाव ऐकें || ८१||
जे वेगळालिया भूतीं| सारिखे होऊनि प्रकृती| विखुरले आहेती त्रिजगतीं| आघविये || ८२||
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः | सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च || ४||
अहिंसा समता तुइष्टास्तपो दानं यशोऽयशः | भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः || ५||
तेथ प्रथम जाण बुद्धी| मग ज्ञान जें निरवधी| असंमोह सहनसिद्धी| क्षमा सत्य || ८३||
मग शम दम दोन्ही| सुखदुःख वर्ते जें जनीं| अर्जुना भावाभाव मानीं| भावाचिमाजीं || ८४||
पैं भय आणि निर्भयता| अहिंसा आणि समता| तुइष्टि तप पंडुसुता| दान जें गा || ८५||
अगा यश अपकीर्ती| हे जे भाव सर्वत्र दिसती| ते मजचि पासूनि होती| भूतांचिया ठायीं || ८६||
जैसीं भूतें आहाति सिनानीं| तैसेचि हेही वेगळाले मानीं| एक उपजती माझ्या ज्ञानीं| एक नेणती मातें || ८७||
प्रकाशु आणि कडवसें| हें सूर्याचिस्तव जैसें| प्रकाश उदयीं दिसे| तम अस्तुसीं || ८८||
आणि माझें जाणणें नेणणें| तें तंव भूतांचिया दैवाचें करणें| म्हणौनि भूतीं भावाचें होणें| विषम पडे || ८९||
 यापरी माझिया भावीं| हे जीवसृष्टि आहे आघवी| गुंतली असे जाणावी| पंडुकुमरा || ९०||
आतां इये सृष्टीचे पालक| जयां आधीन वर्तती लोक| ते अकरा भाव आणिक| सांगेन तुज || ९१||
 महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारी मनवस्तथा | मद्भवा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः || ६||
तरी आघवांचि गुणीं वृद्ध| जे महर्षींमाजीं प्रबुद्ध| कश्यपादि प्रसिद्ध| सप्तऋषी || ९२||
आणिकही सांगिजतील| जे कां चौदाआंतुल मुद्दल| स्वायंभू मुख्य वडील| चारी मनु || ९३||
ऐसें हे अकरा| माझ्या मनीं जाहाले धनुर्धरा| सृष्टीचिया व्यापारा- | लागोनियां || ९४||
जैं लोकांची व्यवस्था न पडे| जैं या त्रिभुवनाचे कांहीं न मांडे| तैं महाभूतांचे दळवाडें| अचुंबित असे || ९५||
 तैंचि हे जाहाले| मग इहीं लोक केले| तेथ अध्यक्ष रचूनि ठेविले| इहीं जन || ९६||
म्हणौनि अकराही हे राजा| मग येर जग यांचिया प्रजा| एवं विश्वविस्तारु हा माझा| ऐसेंचि जाण || ९७||
 पाहें पां आरंभीं बीज एकलें| मग तेंचि विरूढलिया बूड जाहालें| बुडीं कोंभ निघाले| खांदियांचे || ९८||
खांदियांपासूनि अनेका| फुटलिया नाना शाखा| शाखांस्तव देखा| पल्लव पानें || ९९||
पल्लवीं फूल फळ| एवं वृक्षत्व जाहालें सकळ| तें निर्धारितां केवळ| बीजचि आघवें || १००||
 तैंसे मी एकचि पहिलें| मग मी तेंचि मनातें व्यालें| तेथ सप्तऋषि जाहाले| आणि चारी मनु || १०१||
 इहीं लोकपाळ केले| लोकपाळीं विविध लोक सृजिले| लोकांपासूनि निपजले| प्रजाजात || १०२||
 ऐसेनि हें विश्व येथें| मीचि विस्तारिलोंसें निरुतें| परी भावाचेनि हातें| माने जया || १०३||
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः | सोऽविकंपेन योगेन युज्यते नात्र संशयः || ७||
 यालागीं सुभद्रापती| हे भाव इया माझिया विभूती| आणि यांचिया व्याप्ती| व्यापिलें जग || १०४||
 म्हणौनि गा यापरी| ब्रह्मादिपिपीलिकावरी| मीवांचूनि दुसरी| गोठी नाहीं || १०५||
ऐसें जाणे जो साचें| तया चेइरें जाहालें ज्ञानाचें| म्हणौनि उत्तमाधम भेदाचें| दुःस्वप्न न देखे || १०६||
 मी माझिया विभूती| विभूतीं अधिष्ठिलिया व्यक्ती| हें आघवें योगप्रतीती| एकचि मानी || १०७||
म्हणौनि निःशंकें येणें महायोगें| मज मीनला मनाचेनि आंगें| एथ संशय करणें न लगे| तो त्रिशुद्धी जाहला || १०८||
कां जे ऐसें किरीटी| मातें भजे जो अभेदा दिठी| तयाचिये भजनाचे नाटीं| सूती मज || १०९||
 म्हणौनि अभेदें जो भक्तियोगु| तेथ शंका नाहीं नये खंगु| करितां ठेला तरी चांगु| तें सांगितलें षष्ठीं || ११०||
तोचि अभेदु कैसा| हें जाणावया मानसा| साद जाली तरी परियेसा| बोलिजेल || १११||
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते | इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः || ८||
तरि मीचि एक सर्वां| या जगा जन्म पांडवा| आणि मजचिपासूनि आघवा| निर्वाहो यांचा || ११२||
कल्लोळमाळा अनेगा| जन्म जळींचि पैं गा| आणि तयां जळचि आश्रयो तरंगा| जीवनही जळ || ११३||
 ऐसें आघवाचि ठायीं| तया जळचि जेवीं पाहीं| तैसा मीवांचूनि नाहीं| विश्वीं इये || ११४||
ऐसिया व्यापका मातें| मानूनि जे भजती भलतेथें| परि साचोकारें उदितें| प्रेमभावें || ११५||
देश काळ वर्तमान| आघवें मजसीं करूनि अभिन्न| जैसा वायु होऊन गगन| गगनींचि विचरे || ११६||
ऐसेनि जे निजज्ञानी| खेळत सुखें त्रिभुवनीं| जगद्रूपा मनीं| सांठऊनि मातें || ११७||
जें जें भेटे भूत| तें तें मानिजे भगवंत| हा भक्तियोगु निश्चित| जाण माझा || ११८||
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् | कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || ९||
 चित्तें मीचि जाहाले| मियांचि प्राणें धाले| é

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Heh Heh Heh...
Emma was telling her mummy a story about a witch who arrived at a hotel without her broom because the broom was late.
“Why was the broom late, Emma?” asked her mummy.
“Because it over swept, mummy. And, mummy, do you know what the witch asked for when she went to reception?”
“What did she ask for, Emma?”
“Broom service.”

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