[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ११ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय अकरावा | विश्वरूपदर्शनयोगः | आतां यावरी एकादशीं| कथा आहे दोहीं रसीं| येथ पार्था विश्वरूपेंसीं| होईल भेटी || १|| जेथ शांताचिया घरा| अद्भुत आला आहे पाहुणेरा| आणि येरांही रसां पांतिकरां| जाहला मानु || २|| अहो वधुवरांचिये मिळणीं| जैशी वराडियां लुगडीं लेणीं| तैसे देशियेच्या सुखासनीं| मिरविले रस || ३|| परी शांताद्भुत बरवे| जे डोळियांच्या अंजुळीं घ्यावें| जैसे हरिहर प्रेमभावें| आले खेंवा || ४|| ना तरी अंवसेच्या दिवशीं| भेटलीं बिंबें दोनी जैशीं| तेवीं एकवळा रसीं| केला एथ || ५|| मीनले गंगेयमुनेचे ओघ| तैसें रसां जाहलें प्रयाग| म्हणौनि सुस्नात होत जग| आघवें एथ || ६|| माजीं गीता सरस्वती गुप्त| आणि दोनी रस ते ओघ मूर्त| यालागीं त्रिवेणी हे उचित| फावली बापा || ७|| एथ श्रवणाचेनि द्वारें| तीर्थीं रिघतां सोपारें| ज्ञानदेवो म्हणे दातारें| माझेनि केलें || ८|| तीरें संस्कृताचीं गहनें| तोडोनि मऱ्हाठियां शब्दसोपानें| रचिली धर्मनिधानें| श्रीनिवृत्तिदेवें || ९|| म्हणौनि भलतेणें एथ सद्भावें नाहावें| प्रयागमाधव विश्वरूप पहावें| येतुलेनि संसारासि द्यावें| तिळोदक || १०|| हें असो ऐसें सावयव| एथ सासिन्नले आथी रसभाव| तेथ श्रवणसुखाची राणीव| जोडली जगा || ११|| जेथ शांताद्भुत रोकडे| आणि येरां रसां पडप जोडे| हें अल्पचि परी उघडें| कैवल्य एथ || १२|| तो हा अकरावा अध्यायो| जो देवाचा आपणपें विसंवता ठावो| परी अर्जुन सदैवांचा रावो| जो एथही पातला || १३|| एथ अर्जुनचि काय म्हणों पातला| आजि आवडतयाही सुकाळु जाहला| जे गीतार्थु हा आला| मऱ्हाठिये || १४|| याचिलागीं माझें| विनविलें आइकिजे| तरी अवधान दीजे| सज्जनीं तुम्ही || १५|| तेवींचि तुम्हां संतांचिये सभे| ऐसी सलगी कीर करूं न लभे| परी मानावें जी तुम्ही लोभें| अपत्या मज || १६|| अहो पुंसा आपणचि पढविजे| मग पढे तरी माथा तुकिजे| कां करविलेनि चोजें न रिझे| बाळका माय || १७|| तेवीं मी जें जें बोलें| तें प्रभु तुमचेंचि शिकविलें| म्हणौनि अवधारिजो आपुलें| आपण देवा || १८|| हें सारस्वताचें गोड| तुम्हींचि लाविलें जी झाड| तरी आतां अवधानामृतें वाड| सिंपोनि कीजे || १९|| मग हें रसभाव फुलीं फुलेल| नानार्थ फळभारें फळा येईल| तुमचेनि धर्में होईल| सुरवाडु जगा || २०|| या बोला संत रिझले| म्हणती तोषलों गा भलें केलें| आतां सांगैं जें बोलिलें| अर्जुनें तेथ || २१|| तंव निवृत्तिदास म्हणे| जी कृष्णार्जुनांचें बोलणें| मी प्राकृत काय सांगों जाणें| परी सांगवा तुम्ही || २२|| अहो रानींचिया पालेखाइरा| नेवाणें करविले लंकेश्वरा| एकला अर्जुन परी अक्षौहिणी अकरा| न जिणेचि काई ? || २३|| म्हणौनि समर्थ जें जें करी| तें न हो न ये चराचरीं| तुम्ही संत तयापरी| बोलवा मातें || २४|| आतां बोलिजतसें आइका| हा गीताभाव निका| जो वैकुंठनायका- | मुखौनि निघाला || २५|| बाप बाप ग्रंथ गीता| जो वेदीं प्रतिपाद्य देवता| तो श्रीकृष्ण वक्ता| जिये ग्रंथीं || २६|| तेथिंचे गौरव कैसें वानावें| जें श्रीशंभूचिये मती नागवे| तें आतां नमस्कारिजे जीवेंभावें| हेंचि भलें || २७|| मग आइका तो किरीटी| घालूनि विश्वरूपीं दिठी| पहिली कैसी गोठी| करिता जाहला || २८|| हें सर्वही सर्वेश्वरु| ऐसा प्रतीतिगत जो पतिकरु| तो बाहेरी होआवा गोचरु| लोचनांसी || २९|| हे जिवाआंतुली चाड| परी देवासि सांगतां सांकड| कां जें विश्वरूप गूढ| कैसेनि पुसावें ? || ३०|| म्हणे मागां कवणीं कहीं| जें पढियंतेनें पुसिलें नाहीं| ते सहसा कैसें काई| सांगा म्हणों ? || ३१|| मी जरी सलगीचा चांगु| तरी काय आइसीहूनी अंतरंगु| परी तेही हा प्रसंगु| बिहाली पुसों || ३२|| माझी आवडे तैसी सेवा जाहली| तरी काय होईल गरुडाचिया येतुली ? | परी तोही हें बोली| करीचिना || ३३|| मी काय सनकादिकांहूनि जवळां| परी तयांही नागवेचि हा चाळा| मी आवडेन काय प्रेमळां| गोकुळींचिया ऐसा ? || ३४|| तयांतेंही लेकुरपणें झकविलें| एकाचे गर्भवासही साहिले| परी विश्वरूप हें राहविलें| न दावीच कवणा || ३५|| हा ठायवरी गुज| याचिये अंतरीचें हें निज| केवीं उराउरी मज| पुसों ये पां ? || ३६|| आणि न पुसेंचि जरी म्हणे| तरी विश्वरूप देखिलियाविणें| सुख नोहेचि परी जिणें| तेंही विपायें || ३७|| म्हणौनि आतां पुसों अळुमाळसें| मग करूं देवा आवडे तैसें| येणें प्रवर्तला साध्वसें| पार्थु बोलों || ३८|| परी तेंचि ऐसेनि भावें| जें एका दों उत्तरांसवें| दावी विश्वरूप आघवें| झाडा देउनी || ३९|| अहो वांसरूं देखिलियाचिसाठीं| धेनु खडबडोनि मोहें उठी| मग स्तनामुखाचिये भेटी| काय पान्हा धरे ? || ४०|| पाहा पां तया पांडवाचेनि नांवें| जो कृष्ण रानींही प्रतिपाळूं धावे| तयांतें अर्जुनें जंव पुसावें| तंव साहील काई ? || ४१|| तो सहजेंचि स्नेहाचें अवतरण| आणि येरु स्नेहा घातलें आहे माजवण| ऐसिये मिळवणी वेगळेपण| उरे हेंचि बहु || ४२|| म्हणौनि अर्जुनाचिया बोलासरिसा| देव विश्वरूप होईल आपैसा| तोचि पहिला प्रसंगु ऐसा| ऐकिजे तरी || ४३|| अर्जुन उवाच | मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् | यत्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम || १|| मग पार्थु देवातें म्हणे| जी तुम्ही मजकारणें| वाच्य केलें जें न बोलणें| कृपानिधे || ४४|| जैं महाभूतें ब्रह्मीं आटती| जीव महदादींचे ठाव फिटती| तैं जें देव होऊनि ठाकती| तें विसवणें शेषींचें || ४५|| होतें हृदयाचिये परिवरीं| रोंविलें कृपणाचिये परी| शब्दब्रह्मासही चोरी| जयाची केली || ४६|| तें तुम्हीं आजि आपुलें| मजपुढां हियें फोडिलें| जया अध्यात्मा वोवाळिलें| ऐश्वर्य हरें || ४७|| ते वस्तु मज स्वामी| एकिहेळां दिधली तुम्ही| हें बोलों तरी आम्ही| तुज पावोनि कैंचे || ४८|| परी साचचि महामोहाचिये पुरीं| बुडालेया देखोनि सीसवरी| तुवां आपणपें घालोनि श्रीहरी| मग काढिलें मातें || ४९|| एक तूंवांचूनि कांहीं| विश्वीं दुजियाची भाष नाहीं| कीं आमुचें कर्म पाहीं| जे आम्हीं आथी म्हणों || ५०|| मी जगीं एक अर्जुनु| ऐसा देहीं वाहे अभिमानु| आणि कौरवांतें इयां स्वजनु| आपुलें म्हणें || ५१|| याहीवरी यांतें मी मारीन| म्हणें तेणें पापें कें रिगेन| ऐसें देखत होतों दुःस्वप्न| तों चेवविला प्रभु || ५२|| देवा गंधर्वनगरीची वस्ती| सोडूनि निघालों लक्ष्मीपती| होतों उदकाचिया आर्ती| रोहिणी पीत || ५३|| जी किरडूं तरी कापडाचें| परी लहरी येत होतिया साचें| ऐसें वायां मरतया जीवाचें| श्रेय तुवां घेतलें || ५४|| आपुलें प्रतिबिंब नेणता| सिंह कुहां घालील देखोनि आतां| ऐसा धरिजे तेवीं अनंता| राखिलें मातें || ५५|| एऱ्हवीं माझा तरी येतुलेवरी| एथ निश्चय होता अवधारीं| जें आतांचि सातांही सागरीं| एकत्र मिळिजे || ५६|| हें जगचि आघवें बुडावें| वरी आकाशहि तुटोनि पडावें| परी झुंजणें न घडावें| गोत्रजेशीं मज || ५७|| ऐसिया अहंकाराचिये वाढी| मियां आग्रहजळीं दिधली होती बुडी| चांगचि तूं जवळां एऱ्हवीं काढी| कवणु मातें || ५८|| नाथिलें आपण पां एक मानिलें| आणि नव्हतया नाम गोत्र ठेविलें| थोर पिसें होतें लागलें| परि राखिलें तुम्ही || ५९|| मागां जळत काढिलें जोहरीं| तैं तें देहासीच भय अवधारीं| आतां हे जोहरवाहर दुसरी| चैतन्यासकट || ६०|| दुराग्रह हिरण्याक्षें| माझी बुद्धि वसुंधरा सूदली काखे| मग माहार्णव गवाक्षें| रिघोनि ठेला || ६१|| तेथ तुझेनि गोसावीपणें| एकवेळ बुद्धीचिया ठाया येणें| हें दुसरें वराह होणें| पडिलें तुज || ६२|| ऐसें अपार तुझें केलें| एकी वाचा काय मी बोलें| परी पांचही पालव मोकलिले| मजप्रती || ६३|| तें कांहीं न वचेचि वायां| भलें यश फावलें देवराया| जे साद्यंत माया| निरसिली माझी || ६४|| आजीं आनंदसरोवरींचीं कमळें| तैसे हे तुझे डोळे| आपुलिया प्रसादाचीं राउळें| जयालागीं करिती || ६५|| हां हो तयाही आणि मोहाची भेटी| हे कायसी पाबळी गोठी ? | केउती मृगजळाची वृष्टी| वडवानळेंसीं ? || ६६|| आणि मी तंव दातारा| ये कृपेचिये रिघोनि गाभारां| घेत आहें चारा| ब्रह्मरसाचा || ६७|| तेणें माझा जी मोह जाये| एथ विस्मो कांहीं आहे ? | तरी उद्धरलों कीं तुझे पाये| शिवतले आहाती || ६८|| भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया | त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् || २|| पैं कमलायतडोळसा| सूर्यकोटितेजसा| मियां तुजपासोनि महेशा| परिसिलें आजीं || ६९|| इयें भूतें जयापरी होती| अथवा लया हन जैसेनि जाती| ते मजपुढां प्रकृती| विवंचिली देवें || ७०|| आणि प्रकृती कीर उगाणा दिधला| वरि पुरुषाचाही ठावो दाविला| जयाचा महिमा पांघरोनि जाहला| धडौता वेदु || ७१|| जी शब्दराशी वाढे जिये| कां धर्माऐशिया रत्नांतें विये| ते एथिंचे प्रभेचे पाये| वोळगे म्हणौनि || ७२|| ऐसें अगाध माहात्म्य| जें सकळमार्गैकगम्य| जें स्वात्मानुभवरम्य| तें इयापरी दाविलें || ७३|| जैसा केरु फिटलिया आभाळीं| दिठी रिगे सूर्यमंडळीं| कां हातें सारूनि बाबुळीं| जळ देखिजे || ७४|| नातरी उकलतया सापाचे वेढे| जैसें चंदना खेंव देणें घडे| अथवा विवसी पळे मग चढे| निधान हातां || ७५|| तैसी प्रकृती हे आड होती| ते देवेंचि सारोनि परौती| मग परतत्त्व माझिये मती| शेजार केलें || ७६|| म्हणौनि इयेविषयींचा मज देवा| भरंवसा कीर जाहला जीवा| परी आणीक एक हेवा| उपनला असे || ७७|| तो भिडां जरी म्हणों राहों| तरी आना कवणा पुसों जावों| काय तुजवांचोनि ठावो| जाणत आहों आम्ही ? || ७८|| जळचरु जळाचा आभारु धरी| बाळक स्तनपानीं उपरोधु करी| तरी तया जिणया श्रीहरी| आन उपायो असे ? || ७९|| म्हणौनि भीड सांकडी न धरवे| जीवा आवडे तेंही तुजपुढां बोलावें| तंव राहें म्हणितलें देवें| चाड सांगैं || ८०|| एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर | द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम || ३|| मग बोलिला तो किरीटी| म्हणे तुम्हीं केली जे गोठी| तिया प्रतीतीची दिठी| निवाली माझी || ८१|| आतां जयाचेनि संकल्पें| हे लोकपरंपरा होय हारपे| जया ठायातें आपणपें| मी ऐसें म्हणसी || ८२|| तें मुद्दल रूप तुझें| जेथूनि इयें द्विभुजें हन चतुर्भुजें| सुरकार्याचेनि व्याजें| घेवों घेवों येसी || ८३|| पैं जळशयनाचिया अवगणिया| कां मत्स्य कूर्म इया मिरवणिया| खेळु सरलिया तूं गुणिया| सांठविसी जेथ || ८४|| उपनिषदें जें गाती| योगिये हृदयीं रिगोनि पाहाती| जयातें सनकादिक आहाती| पोटाळुनियां || ८५|| ऐसें अगाध जें तुझें| विश्वरूप कानीं ऐकिजे| तें देखावया चित्त माझें| उतावीळ देवा || ८६|| देवें फेडूनियां सांकड| लोभें पुसिली जरी चाड| तरी हेंचि एकीं वाड| आर्तीं जी मज || ८७|| तुझें विश्वरूपपण आघवें| माझिये दिठीसि गोचर होआवें| ऐसी थोर आस जीवें| बांधोनि आहें || ८८|| मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो | योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम् || ४|| परी आणीक एक एथ शारङ्गी| तुज विश्वरूपातें देखावयालागीं| पैं योग्यता माझिया आंगीं| असे कीं नाहीं || ८९|| हें आपलें आपण मी नेणें| तें कां नेणसी जरी देव म्हणे| तरी सरोगु काय जाणे| निदान रोगाचें ? || ९०|| आणि जी आर्तीचेनि पडिभरें| आर्तु आपुली ठाकी पैं विसरे| जैसा तान्हेला म्हणे न पुरे| समुद्र मज || ९१|| ऐशा सचाडपणाचिये भुली| न सांभाळवे समस्या आपुली| यालागीं योग्यता जेवीं माउली| बालकाची जाणे || ९२|| तयापरी श्रीजनार्दना| विचारिजो माझी संभावना| मग विश्वरूपदर्शना| उपक्रम कीजे || ९३|| तरी ऐसी ते कृपा करा| एऱ्हवीं नव्हे हें म्हणा अवधारा| वायां पंचमालापें बधिरा| सुख केउतें देणें ? || ९४|| एऱ्हवीं येकले बापियाचे तृषे| मेघ जगापुरतें काय न वर्षे ? | परी जहालीही वृष्टि उपखे| जऱ्ही खडकीं होय || ९५|| चकोरा चंद्रामृत फावलें| येरा आण वाहूनि काय वारिलें ? | परी डोळ्यांवीण पाहलें| वायां जाय || ९६|| म्हणौनि विश्वरूप तूं सहसा| दाविसी कीर हा भरवंसा| कां जे कडाडां आणि गहिंसा- | माजी नीत्य नवा तूं कीं || ९७|| तुझें औदार्य जाणों स्वतंत्र| देतां न म्हणसी पात्रापात्र| पैं कैवल्या ऐसें पवित्र| जें वैरियांही दिधलें || ९८|| मोक्षु दुराराध्यु कीर होय| परी तोही आराधी तुझे पाय| म्हणौनि धाडिसी तेथ जाय| पाइकु जैसा || ९९|| तुवां सनकादिकांचेनि मानें| सायुज्यीं सौरसु दिधला पूतने| जे विषाचेनि स्तनपानें| मारूं आली || १००|| हां गा राजसूय यागाचिया सभासदीं| देखतां त्रिभुवनाची मांदी| कैसा शतधा दुर्वाक्य शब्दीं| निस्तेजिलासी || १०१|| ऐशिया अपराधिया शिशुपाळा| आपणपें ठावो दिधला गोपाळा| आणि उत्तानचरणाचिया बाळा| काय ध्रुवपदीं चाड ? || १०२|| तो वना आला याचिलागीं| जे बैसावें पितयाचिया उत्संगीं| कीं तो चंद्रसूर्यादिकांपरिस जगीं| श्लाघ्यु केला || १०३|| ऐसा वनवासिया सकळां| देतां एकचि तूं धसाळा| पुत्रा आळवितां अजामिळा| आपणपें देसी || १०४|| जेणें उरीं हाणितलासि पांपरा| तयाचा चरणु वाहासी दातारा| अझुनी वैरियांचिया कलेवरा| विसंबसीना || १०५|| ऐसा अपकारियां तुझा उपकारु| तूं अपात्रींही परी उदारु| दान म्हणौनि दारवंठेकरु| जाहलासी बळीचा || १०६|| तूंतें आराधी ना आयकें| होती पुंसा बोलावित कौतुकें| तिये वैकुंठीं तुवां गणिके| सुरवाडु केला || १०७|| ऐसीं पाहूनि वायाणीं मिषें| आपणपें देवों लागसी वानिवसें| तो तूं कां अनारिसें| मजलागीं करिसी || १०८|| हां गा दुभतयाचेनि पवाडें| जे जगाचें फेडी सांकडें| तिये कामधेनूचे पाडे| काय भुकेले ठाती ? || १०९|| म्हणौनि मियां जें विनविलें कांहीं| तें देव न दाखविती हें कीर नाहीं| परी देखावयालागीं देईं| पात्रता मज || ११०|| तुझें विश्वरूप आकळे| ऐसे जरी जाणसी माझे डोळे| तरी आर्तीचे डोहळे| पुरवीं देवा || १११|| ऐसी ठायेंठावो विनंती| जंव करूं सरला सुभद्रापती| तंव तया षड्गुणचक्रवर्ती| साहवेचिना || ११२|| तो कृपापीयूषसजळु| आणि येरु जवळां आला वर्षाकाळु| नाना कृष्ण कोकिळु| अर्जुन वसंतु || ११३|| नातरी चंद्रबिंब वाटोळें| देखोनि क्षीरसागर उचंबळे| तैसा दुणेंही वरी प्रेमबळें| उल्लसितु जाहला || ११४|| मग तिये प्रसन्नतेचेनि आटोपें| गाजोनि म्हणितलें सकृपें| पार्था देख देख अमुपें| स्वरूपें माझीं || ११५|| एक विश्वरूप देखावें| ऐसा मनोरथु केला पांडवें| कीं विश्वरूपमय आघवें| करूनि घातलें || ११६|| बाप उदार देवो अपरिमितु| याचक स्वेच्छा सदोदितु
Heh Heh Heh...Teasing There was a little boy named Johnny who used to hang out at the local corner market. The owner didn't know what Johnny's problem was, but the boys would constantly tease him. They would always comment that he was two bricks shy of a load, or two pickles short of a barrel. To prove it, sometimes they would offer Johnny his choice between a nickel (5 cents) and a dime (10 cents) and John would always take the nickel -- they said, because it was bigger. One day after John grabbed the nickel, the store owner took him aside and said, "Johnny, those boys are making fun of you. They think you don't know the dime is worth more than the nickel. Are you grabbing the nickel because it's bigger, or what?" Slowly, Johnny turned toward the store owner and a big grin appeared on his face and Johnny said, "Well, if I took the dime, they'd stop doing it, and so far I have saved $20!"