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Dnyaneshvari adhyay - 12
by ज्ञानेश्वरमहाराज
[Oct 31, 2007] .. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १२ .. || ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय बारावा | भक्तियोगः | जय जय वो शुद्धे| उदारे प्रसिद्धे| अनवरत आनंदे| वर्षतिये || १|| विषयव्याळें मिठी| दिधलिया नुठी ताठी| ते तुझिये गुरुकृपादृष्टी| निर्विष होय || २|| तरी कवणातें तापु पोळी| कैसेनि वो शोकु जाळी| जरी प्रसादरसकल्लोळीं| पुरें येसि तूं || ३|| योगसुखाचे सोहळे| सेवकां तुझेनि स्नेहाळे| सोऽहंसिद्धीचे लळे| पाळिसी तूं || ४|| आधारशक्तीचिया अंकीं| वाढविसी कौतुकीं| हृदयाकाशपल्लकीं| परीये देसी निजे || ५|| प्रत्यक्ज्योतीची वोवाळणी| करिसी मनपवनाचीं खेळणीं| आत्मसुखाची बाळलेणीं| लेवविसी || ६|| सतरावियेचें स्तन्य देसी| अनुहताचा हल्लरू गासी| समाधिबोधें निजविसी| बुझाऊनि || ७|| म्हणौनि साधकां तूं माउली| पिके सारस्वत तुझिया पाउलीं| या कारणें मी साउली| न संडीं तुझी || ८|| अहो सद्गुरुचिये कृपादृष्टी| तुझें कारुण्य जयातें अधिष्ठी| तो सकलविद्यांचिये सृष्टीं| धात्रा होय || ९|| म्हणौनि अंबे श्रीमंते| निजजनकल्पलते| आज्ञापीं मातें| ग्रंथनिरूपणीं || १०|| नवरसीं भरवीं सागरु| करवीं उचित रत्नांचे आगरु| भावार्थाचे गिरिवरु| निफजवीं माये || ११|| साहित्यसोनियाचिया खाणी| उघडवीं देशियेचिया क्षोणीं| विवेकवल्लीची लावणी| हों देई सैंघ || १२|| संवादफळनिधानें| प्रमेयाचीं उद्यानें| लावीं म्हणे गहनें| निरंतर || १३|| पाखांडाचे दरकुटे| मोडीं वाग्वाद अव्हांटे| कुतर्कांचीं दुष्टें| सावजें फेडीं || १४|| श्रीकृष्णगुणीं मातें| सर्वत्र करीं वो सरतें| राणिवे बैसवी श्रोते| श्रवणाचिये || १५|| ये मऱ्हाठियेचिया नगरीं| ब्रह्मविद्येचा सुकाळु करीं| घेणें देणें सुखचिवरी| हों देईं या जगा || १६|| तूं आपुलेनि स्नेहपल्लवें| मातें पांघुरविशील सदैवें| तरी आतांचि हें आघवें| निर्मीन माये || १७|| इये विनवणीयेसाठीं| अवलोकिलें गुरु कृपादृष्टी| म्हणे गीतार्थेंसी उठी| न बोलें बहु || १८|| तेथ जी जी महाप्रसादु| म्हणौनि साविया जाहला आनन्दु| आतां निरोपीन प्रबंधु| अवधान दीजे || १९|| अर्जुन उवाच | एवं सतत युक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः || १|| तरी सकलवीराधिराजु| जो सोमवंशीं विजयध्वजु| तो बोलता जाहला आत्मजु| पंडुनृपाचा || २०|| कृष्णातें म्हणे अवधारिलें| आपण विश्वरूप मज दाविलें| तें नवल म्हणौनि बिहालें| चित्त माझें || २१|| आणि इये कृष्णमूर्तीची सवे| यालागीं सोय धरिली जीवें| तंव नको म्हणोनि देवें| वारिलें मातें || २२|| तरी व्यक्त आणि अव्यक्त| हें तूंचि एक निभ्रांत| भक्ती पाविजे व्यक्त| अव्यक्त योगें || २३|| या दोनी जी वाटा| तूंतें पावावया वैकुंठा| व्यक्ताव्यक्त दारवंठां| रिगिजे येथ || २४|| पैं जे वानी श्यातुका| तेचि वेगळिये वाला येका| म्हणौनि एकदेशिया व्यापका| सरिसा पाडू || २५|| अमृताचिया सागरीं| जे लाभे सामर्थ्याची थोरी| तेचि दे अमृतलहरी| चुळीं घेतलेया || २६|| हे कीर माझ्या चित्तीं| प्रतीति आथि जी निरुती| परि पुसणें योगपती| तें याचिलागीं || २७|| जें देवा तुम्हीं नावेक| अंगिकारिलें व्यापक| तें साच कीं कवतिक| हें जाणावया || २८|| तरी तुजलागीं कर्म| तूंचि जयांचें परम| भक्तीसी मनोधर्म| विकोनि घातला || २९|| इत्यादि सर्वीं परीं| जे भक्त तूंतें श्रीहरी| बांधोनियां जिव्हारीं| उपासिती || ३०|| आणि जें प्रणवापैलीकडे| वैखरीयेसी जें कानडें| कायिसयाहि सांगडें| नव्हेचि जें वस्तु || ३१|| तें अक्षर जी अव्यक्त| निर्देश देशरहित| सोऽहंभावें उपासित| ज्ञानिये जे || ३२|| तयां आणि जी भक्तां| येरयेरांमाजी अनंता| कवणें योगु तत्त्वतां| जाणितला सांगा || ३३|| इया किरीटीचिया बोला| तो जगद्बंधु संतोषला| म्हणे हो प्रश्नु भला| जाणसी करूं || ३४|| श्री भगवानुवाच | मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते | श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः || २|| तरी अस्तुगिरीचियां उपकंठीं| रिगालिया रविबिंबापाठीं| रश्मी जैसे किरीटी| संचरती || ३५|| कां वर्षाकाळीं सरिता| जैसी चढों लागें पांडुसुता| तैसी नीच नवी भजतां| श्रद्धा दिसे || ३६|| परी ठाकिलियाहि सागरु| जैसा मागीलही यावा अनिवारु| तिये गंगेचिये ऐसा पडिभरु| प्रेमभावा || ३७|| तैसें सर्वेंद्रियांसहित| मजमाजीं सूनि चित्त| जे रात्रिदिवस न म्हणत| उपासिती || ३८|| इयापरी जे भक्त| आपणपें मज देत| तेचि मी योगयुक्त| परम मानीं || ३९|| ये त्वक्षर्मनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते | सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवं || ३|| आणि येर तेही पांडवा| जे आरूढोनि सोऽहंभावा| झोंबती निरवयवा| अक्षरासी || ४०|| मनाची नखी न लगे| जेथ बुद्धीची दृष्टी न रिगे| ते इंद्रियां कीर जोगें| कायि होईल ? || ४१|| परी ध्यानाही कुवाडें| म्हणौनि एके ठायीं न संपडे| व्यक्तीसि माजिवडें| कवणेही नोहे || ४२|| जया सर्वत्र सर्वपणें| सर्वांही काळीं असणें| जें पावूनि चिंतवणें| हिंपुटी जाहलें || ४३|| जें होय ना नोहे| जें नाहीं ना आहे| ऐसें म्हणौनि उपाये| उपजतीचि ना || ४४|| जें चळे ना ढळे| सरे ना मैळे| तें आपुलेनीचि बळें| आंगविलें जिहीं || ४५|| सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः | ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः || ४|| पैं वैराग्यमहापावकें| जाळूनि विषयांचीं कटकें| अधपलीं तवकें| इंद्रियें धरिलीं || ४६|| मग संयमाची धाटी| सूनि मुरडिलीं उफराटीं| इंद्रियें कोंडिलीं कपाटीं| हृदयाचिया || ४७|| अपानींचिया कवाडा| लावोनि आसनमुद्रा सुहाडा| मूळबंधाचा हुडा| पन्नासिला || ४८|| आशेचे लाग तोडिले| अधैर्याचे कडे झाडिले| निद्रेचें शोधिलें| काळवखें || ४९|| वज्राग्नीचिया ज्वाळीं| करूनि सप्तधातूंची होळी| व्याधींच्या सिसाळीं| पूजिलीं यंत्रें || ५०|| मग कुंडलिनियेचा टेंभा| आधारीं केला उभा| तया चोजवलें प्रभा| निमथावरी || ५१|| नवद्वारांचिया चौचकीं| बाणूनि संयतीची आडवंकी| उघडिली खिडकी| ककारांतींची || ५२|| प्राणशक्तिचामुंडे| प्रहारूनि संकल्पमेंढे| मनोमहिषाचेनि मुंडें| दिधलीं बळी || ५३|| चंद्रसूर्यां बुझावणी| करूनि अनुहताची सुडावणी| सतरावियेचें पाणी| जिंतिलें वेगीं || ५४|| मग मध्यमा मध्य विवरें| तेणें कोरिवें दादरें| ठाकिलें चवरें| ब्रह्मरंध्र || ५५|| वरी मकारांत सोपान| ते सांडोनिया गहन| काखे सूनियां गगन| भरले ब्रह्मीं || ५६|| ऐसे जे समबुद्धी| गिळावया सोऽहंसिद्धी| आंगविताती निरवधी| योगदुर्गें || ५७|| आपुलिया साटोवाटी| शून्य घेती उठाउठीं| तेही मातेंचि किरीटी| पावती गा || ५८|| वांचूनि योगचेनि बळें| अधिक कांहीं मिळे| ऐसें नाहीं आगळें| कष्टचि तया || ५९|| क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् | अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते || ५|| जिहीं सकळ भूतांचिया हितीं| निरालंबीं अव्यक्तीं| पसरलिया आसक्ती| भक्तीवीण || ६०|| तयां महेन्द्रादि पदें| करिताति वाटवधें| आणि ऋद्धिसिद्धींचीं द्वंद्वें| पाडोनि ठाती || ६१|| कामक्रोधांचे विलग| उठावती अनेग| आणि शून्येंसीं आंग| झुंजवावें कीं || ६२|| ताहानें ताहानचि पियावी| भुकेलिया भूकचि खावी| अहोरात्र वावीं| मवावा वारा || ६३|| उनी दिहाचें पहुडणें| निरोधाचें वेल्हावणें| झाडासि साजणें| चाळावें गा || ६४|| शीत वेढावें| उष्ण पांघुरावें| वृष्टीचिया असावें| घरांआंतु || ६५|| किंबहुना पांडवा| हा अग्निप्रवेशु नीच नवा| भातारेंवीण करावा| तो हा योगु || ६६|| एथ स्वामीचें काज| ना वापिकें व्याज| परी मरणेंसीं झुंज| नीच नवें || ६७|| ऐसें मृत्यूहूनि तीख| कां घोंटे कढत विख| डोंगर गिळितां मुख| न फाटे काई ? || ६८|| म्हणौनि योगाचियां वाटा| जे निगाले गा सुभटा| तयां दुःखाचाचि शेलवांटा| भागा आला || ६९|| पाहें पां लोहाचे चणे| जैं बोचरिया पडती खाणें| तैं पोट भरणें कीं प्राणें| शुद्धी म्हणों || ७०|| म्हणौनि समुद्र बाहीं| तरणे आथि केंही| कां गगनामाजीं पाईं| खोलिजतु असें ? || ७१|| वळघलिया रणाची थाटी| आंगीं न लागतां कांठी| सूर्याची पाउटी| कां होय गा || ७२|| यालागीं पांगुळा हेवा| नव्हे वायूसि पांडवा| तेवीं देहवंता जीवां| अव्यक्तीं गति || ७३|| ऐसाही जरी धिंवसा| बांधोनियां आकाशा| झोंबती तरी क्लेशा| पात्र होती || ७४|| म्हणौनि येर ते पार्था| नेणतीचि हे व्यथा| जे कां भक्तिपंथा| वोटंगले || ७५|| ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः | अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते || ६|| कर्मेंद्रियें सुखें| करिती कर्में अशेखें| जियें कां वर्णविशेखें| भागा आलीं || ७६|| विधीतें पाळित| निषेधातें गाळित| मज देऊनि जाळित| कर्मफळें || ७७|| ययापरी पाहीं| अर्जुना माझें ठाईं| संन्यासूनि नाहीं| करिती कर्में || ७८|| आणीकही जे जे सर्व| कायिक वाचिक मानसिक भाव| तयां मीवांचूनि धांव| आनौती नाहीं || ७९|| ऐसे जे मत्पर| उपासिती निरंतर| ध्यानमिषें घर| माझें झालें || ८०|| जयांचिये आवडी| केली मजशीं कुळवाडी| भोग मोक्ष बापुडीं| त्यजिलीं कुळें || ८१|| ऐसे अनन्ययोगें| विकले जीवें मनें आंगें| तयांचे कायि एक सांगें| जें सर्व मी करीं || ८२|| तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् | भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् || ७|| किंबहुना धनुर्धरा| जो मातेचिया ये उदरा| तो मातेचा सोयरा| केतुला पां || ८३|| तेवीं मी तयां| जैसे असती तैसियां| कळिकाळ नोकोनियां| घेतला पट्टा || ८४|| एऱ्हवीं तरी माझियां भक्तां| आणि संसाराची चिंता| काय समर्थाची कांता| कोरान्न मागे || ८५|| तैसे ते माझें| कलत्र हें जाणिजे| कायिसेनिही न लजें| तयांचेनि मी || ८६|| जन्ममृत्यूचिया लाटीं| झळंबती इया सृष्टी| तें देखोनियां पोटीं| ऐसें जाहलें || ८७|| भवसिंधूचेनि माजें| कवणासि धाकु नुपजे| तेथ जरी कीं माझे| बिहिती हन || ८८|| म्हणौनि गा पांडवा| मूर्तीचा मेळावा| करूनि त्यांचिया गांवा| धांवतु आलों || ८९|| नामाचिया सहस्रवरी| नावा इया अवधारीं| सजूनियां संसारीं| तारू जाहलों || ९०|| सडे जे देखिले| ते ध्यानकासे लाविले| परीग्रहीं घातले| तरियावरी || ९१|| प्रेमाची पेटी| बांधली एकाचिया पोटीं| मग आणिले तटीं| सायुज्याचिया || ९२|| परी भक्तांचेनि नांवें| चतुष्पदादि आघवे| वैकुंठींचिये राणिवे| योग्य केले || ९३|| म्हणौनि गा भक्तां| नाहीं एकही चिंता| तयांतें समुद्धर्ता| आथि मी सदा || ९४|| आणि जेव्हांचि कां भक्तीं| दीधली आपुली चित्तवृत्ती| तेव्हांचि मज सूति| त्यांचिये नाटीं || ९५|| याकारणें गा भक्तराया| हा मंत्र तुवां धनंजया| शिकिजे जे यया| मार्गा भजिजे || ९६|| मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय | निवसिष्यसि मय्येव अत उर्ध्वं न संशयः || ८|| अगा मानस हें एक| माझ्या स्वरूपीं वृत्तिक| करूनि घालीं निष्टंक| बुद्धि निश्चयेंसीं || ९७|| इयें दोनीं सरिसीं| मजमाजीं प्रेमेसीं| रिगालीं तरी पावसी| मातें तूं गा || ९८|| जे मन बुद्धि इहीं| घर केलें माझ्यां ठायीं| तरी सांगें मग काइ| मी तू ऐसें उरे ? || ९९|| म्हणौनि दीप पालवे| सवेंचि तेज मालवे| कां रविबिंबासवें| प्रकाशु जाय || १००|| उचललेया प्राणासरिसीं| इंद्रियेंही निगती जैसीं| तैसा मनोबुद्धिपाशीं| अहंकारु ये || १०१|| म्हणौनि माझिया स्वरूपीं| मनबुद्धि इयें निक्षेपीं| येतुलेनि सर्वव्यापी| मीचि होसी || १०२|| यया बोला कांहीं| अनारिसें नाहीं| आपली आण पाहीं| वाहतु असें गा || १०३|| अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् | अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनन्जय || ९|| अथवा हें चित्त| मनबुद्धिसहित| माझ्यां हातीं अचुंबित| न शकसी देवों || १०४|| तरी गा ऐसें करीं| यया आठां पाहारांमाझारीं| मोटकें निमिषभरी| देतु जाय || १०५|| मग जें जें कां निमिख| देखेल माझें सुख| तेतुलें अरोचक| विषयीं घेईल || १०६|| जैसा शरत्कालु रिगे| आणि सरिता वोहटूं लागे| तैसें चित्त काढेल वेगें| प्रपंचौनि || १०७|| मग पुनवेहूनि जैसें| शशिबिंब दिसेंदिसें| हारपत अंवसे| नाहींचि होय || १०८|| तैसें भोगाआंतूनि निगतां| चित्त मजमाजीं रिगतां| हळूहळू पंडुसुता| मीचि होईल || १०९|| अगा अभ्यासयोगु म्हणिजे| तो हा एकु जाणिजे| येणें कांहीं न निपजे| ऐसें नाहीं || ११०|| पैं अभ्यासाचेनि बळें| एकां गति अंतराळे| व्याघ्र सर्प प्रांजळे| केले एकीं || १११|| विष कीं आहारीं पडे| समुद्रीं पायवाट जोडे| एकीं वाग्ब्रह्म थोकडें| अभ्यासें केलें || ११२|| म्हणौनि अभ्यासासी कांहीं| सर्वथा दुष्कर नाहीं| यालागी माझ्या ठायीं| अभ्यासें मीळ || ११३|| अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव | मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन सिद्धिमवाप्स्यसि || १०|| कां अभ्यासाही लागीं| कसु नाहीं तुझिया अंगीं| तरी आहासी जया भागीं| तैसाचि आस || ११४|| इंद्रियें न कोंडीं| भोगातें न तोडीं| अभिमानु न संडीं| स्वजातीचा || ११५|| कुळधर्मु चाळीं| विधिनिषेध पाळीं| मग सुखें तुज सरळी| दिधली आहे || ११६|| परी मनें वाचा देहें| जैसा जो व्यापारु होये| तो मी करीतु आहें| ऐसें न म्हणें || ११७|| करणें कां न करणें| हें आघवें तोचि जाणे| विश्व चळतसे जेणें| परमात्मेनि || ११८|| उणयापुरेयाचें कांहीं| उरों नेदी आपुलिया ठायीं| स्वजाती करूनि घेईं| जीवित्व हें || ११९|| माळियें जेउतें नेलें| तेउतें निवांतचि गेलें| तया पाणिया ऐसें केलें| होआवें गा || १२०|| म्हणौनि प्रवृत्ति आणि निवृत्ती| इयें वोझीं नेघे मती| अखंड चित्तवृत्ती| माझ्या ठायीं || १२१|| एऱ्हवीं तरी सुभटा| उजू कां अव्हाटां| रथु काई खटपटा| करितु असे ? || १२२|| आणि जें जें कर्म निपजे| तें थोडें बहु न म्हणिजे| निवांतचि अर्पिजे| माझ्यां ठायीं || १२३|| ऐसिया मद्भावना| तनुत्यागीं अर्जुना| तूं सायुज्य सदना| माझिया येसी || १२४|| अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः | सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान || ११|| ना तरी हेंही तूज| नेदवे कर्म मज| तरी तूं गा बुझ| पंडुकुमरा || १२५|| बुद्धीचिये पाठीं पोटीं| कर्माआदि कां शेवटीं| मातें बांधणें किरीटी| दुवाड जरी || १२६|| तरी हेंही असो| सांडीं माझा अतिसो| परि संयतिसीं वसो| बुद्धि तुझी || १२७|| आणि जेणें जेणें वेळें| घडती कर्में सकळें| तयांचीं तियें फळें| त्यजितु जाय || १२८|| वृक्ष कां वेली| लोटती फळें आलीं| तैसीं सांडीं निपजलीं| कर्में सिद्धें || १२९|| परि मातें मनीं धरावें| कां मजौद
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