[Oct 31, 2007] ||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १३ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय तेरावा | क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः | आत्मरूप गणेशु केलिया स्मरण| सकळ विद्यांचें अधिकरण| तेचि वंदूं श्रीचरण| श्रीगुरूंचे ||१|| जयांचेनि आठवें| शब्दसृष्टि आंगवे| सारस्वत आघवें| जिव्हेसि ये ||२|| वक्तृत्वा गोडपणें| अमृतातें पारुखें म्हणे| रस होती वोळंगणें| अक्षरांसी ||३|| भावाचें अवतरण| अवतरविती खूण| हाता चढे संपूर्ण| तत्त्वभेद ||४|| श्रीगुरूंचे पाय| जैं हृदय गिंवसूनि ठाय| तैं येवढें भाग्य होय| उन्मेखासी ||५|| ते नमस्कारूनि आतां| जो पितामहाचा पिता| लक्ष्मीयेचा भर्ता| ऐसें म्हणे ||६|| श्रीभगवानुवाच | इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते | एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ||१|| तरी पार्था परिसिजे| देह हें क्षेत्र म्हणिजे| जो हें जाणे तो बोलिजे| क्षेत्रज्ञु एथें ||७|| क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत | क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ञानं मतं मम ||२|| तरि क्षेत्रज्ञु जो एथें| तो मीचि जाण निरुतें| जो सर्व क्षेत्रांतें| संगोपोनि असे ||८|| क्षेत्र आणि क्षेत्रज्ञातें| जाणणें जें निरुतें| ज्ञान ऐसें तयातें| मानूं आम्ही ||९|| तत् क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् | स च यो यत्प्रभावश्च तत् समासेन मे श्रुणु ||३|| तरि क्षेत्र येणें नावें| हें शरीर जेणें भावें| म्हणितलें तें आघवें| सांगों अतां ||१०|| हें क्षेत्र का म्हणिजे| कैसें कें उपजे| कवणाकवणीं वाढविजे| विकारीं एथ ||११|| हें औट हात मोटकें| कीं केवढें पां केतुकें| बरड कीं पिके| कोणाचें हें ||१२|| इत्यादि सर्व| जे जे याचे भाव| ते बोलिजती सावेव| अवधान देईं ||१३|| पैं याचि स्थळाकारणें| श्रुति सदा बोबाणे| तर्कु येणेंचि ठिकाणें| तोंडाळु केला ||१४|| चाळिता हेचि बोली| दर्शनें शेवटा आलीं| तेवींचि नाहीं बुझविली| अझुनि द्वंद्वें ||१५|| शास्त्रांचिये सोयरिके| विचळिजे येणेंचि एकें| याचेनि एकवंकें| जगासि वादु ||१६|| तोंडेसीं तोंडा न पडे| बोलेंसीं बोला न घडे| इया युक्ती बडबडे| त्राय जाहली ||१७|| नेणों कोणाचें हें स्थळ| परि कैसें अभिलाषाचें बळ| जेघरोघरीं कपाळ| पिटवीत असे ||१८|| नास्तिका द्यावया तोंड| वेदांचें गाढें बंड| दे देखोनि पाखांड| आनचि वाजे ||१९|| म्हणे तुम्ही निर्मूळ| लटिकें हें वाग्जाळ| ना म्हणसी तरी पोफळ| घातलें आहे ||२०|| पाखांडाचे कडे| नागवीं लुंचिती मुंडे| नियोजिली वितंडें| ताळासि येती ||२१|| म्ऱ्त्युबळाचेनि माजें| हें जाईल वीण काजें| तें देखोनियां व्याजें| निघाले योगी ||२२|| म्ऱ्त्यूनि आधाधिले| तिहीं निरंजन सेविलें| यमदमांचे केले| मेळावे पुरे ||२३|| येणेंचि क्षेत्राभिमानें| राज्य त्यजिलें ईशानें| गुंति जाणोनि स्मशानें| वासु केला ||२४|| ऐसिया पैजा महेशा| पांघुरणें दाही दिशा| लांचकरू म्हणोनि कोळसा| कामु केला ||२५|| पैं सत्यलोकनाथा| वदनें आलीं बळार्था| तरी तो सर्वथा| जाणेचिना ||२६|| ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् | ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ||४|| एक म्हणती हें स्थळ| जीवाचेंचि समूळ| मग प्राण हें कूळ| तयाचें एथ ||२७|| जे प्राणाचे घरीं| अंगें राबती भाऊ चारी| आणि मना ऐसा आवरी| कुळवाडीकरु ||२८|| तयातें इंद्रियबैलांची पेटी| न म्हणे अंवसीं पाहाटीं| विषयक्षेत्रीं आटी| काढी भली ||२९|| मग विधीची वाफ चुकवी| आणि अन्यायाचें बीज वाफवी| कुकर्माचा करवी| राबु जरी ||३०|| तरी तयाचिसारिखें| असंभड पाप पिके| मग जन्मकोटी दुःखें| भोगी जीवु ||३१|| नातरी विधीचिये वाफे| सत्क्रिया बीज आरोपे| तरी जन्मशताचीं मापें| सुखचि मवीजे ||३२|| तंव आणिक म्हणती हें नव्हे| हें जिवाचेंचि न म्हणावें| आमुतें पुसा आघवें| क्षेत्राचें या ||३३|| अहो जीवु एथ उखिता| वस्तीकरु वाटे जातां| आणि प्राणु हा बलौता| म्हणौनि जागे ||३४|| अनादि जे प्रकृती| सांख्य जियेतें गाती| क्षेत्र हे वृत्ती| तियेची जाणा ||३५|| आणि इयेतेंचि आघवा| आथी घरमेळावा| म्हणौनि ते वाहिवा| घरीं वाहे ||३६|| वाह्याचिये रहाटी| जे कां मुद्दल तिघे इये सृष्टीं| ते इयेच्याचि पोटीं| जहाले गुण ||३७|| रजोगुण पेरी| तेतुलें सत्त्व सोंकरी| मग एकलें तम करी| संवगणी ||३८|| रचूनि महत्तत्त्वाचें खळें| मळी एके काळुगेनि पोळें| तेथ अव्यक्ताची मिळे| सांज भली ||३९|| तंव एकीं मतिवंतीं| या बोलाचिया खंतीं| म्हणितलें या ज्ञप्ती| अर्वाचीना ||४०|| हां हो परतत्त्वाआंतु| कें प्रकृतीची मातु| हा क्षेत्र वृत्तांतु| उगेंचि आइका ||४१|| शून्यसेजेशालिये| सुलीनतेचिये तुळिये| निद्रा केली होती बळियें| संकल्पें येणें ||४२|| तो अवसांत चेइला| उद्यमीं सदैव भला| म्हणौनि ठेवा जोडला| इच्छावशें ||४३|| निरालंबींची वाडी| होती त्रिभुवनायेवढी| हे तयाचिये जोडी| रूपा आली ||४४|| मग महाभूतांचें एकवाट| सैरा वेंटाळूनि भाट| भूतग्रामांचे आघाट| चिरिले चारी ||४५|| यावरी आदी| पांचभूतिकांची मांदी| बांधली प्रभेदीं| पंचभूतिकीं ||४६|| कर्माकर्माचे गुंडे| बांध घातले दोहींकडे| नपुंसकें बरडें| रानें केलीं ||४७|| तेथ येरझारेलागीं| जन्ममृत्यूची सुरंगी| सुहाविली निलागी| संकल्पें येणें ||४८|| मग अहंकारासि एकलाधी| करूनि जीवितावधी| वहाविलें बुद्धि| चराचर ||४९|| यापरी निराळीं| वाढे संकल्पाची डाहाळी| म्हणौनि तो मुळीं| प्रपंचा यया ||५०|| यापरी मत्तमुगुतकीं| तेथ पडिघायिलें आणिकीं| म्हणती हां हो विवेकीं| कैसें तुम्ही ||५१|| परतत्त्वाचिया गांवीं| संकल्पसेज देखावी| तरी कां पां न मनावी| प्रकृति तयाची ? ||५२|| परि असो हें नव्हे| तुम्ही या न लगावें| आतांचि हें आघवें| सांगिजैल ||५३|| तरी आकाशीं कवणें| केलीं मेघाचीं भरणें| अंतरिक्ष तारांगणें| धरी कवण ? ||५४|| गगनाचा तडावा| कोणें वेढिला केधवां| पवनु हिंडतु असावा| हें कवणाचें मत ? ||५५|| रोमां कवण पेरी| सिंधू कवण भरी| पर्जन्याचिया करी| धारा कवण ? ||५६|| तैसें क्षेत्र हें स्वभावें| हे वृत्ती कवणाची नव्हे| हें वाहे तया फावे| येरां तुटे ||५७|| तंव आणिकें एकें| क्षोभें म्हणितलें निकें| तरी भोगिजे एकें| काळें केवीं हें ? ||५८|| तरी ययाचा मारु| देखताति अनिवारु| परी स्वमतीं भरु| अभिमानियां ||५९|| हें जाणों मृत्यु रागिटा| सिंहाडयाचा दरकुटा| परी काय वांजटा| पूरिजत असे ? ||६०|| महाकल्पापरौतीं| कव घालूनि अवचितीं| सत्यलोकभद्रजाती| आंगीं वाजे ||६१|| लोकपाळ नित्य नवे| दिग्गजांचे मेळावे| स्वर्गींचिये आडवे| रिगोनि मोडी ||६२|| येर ययाचेनि अंगवातें| जन्ममृत्यूचिये गर्तें| निर्जिवें होऊनि भ्रमतें| जीवमृगें ||६३|| न्याहाळीं पां केव्हडा| पसरलासे चवडा| जो करूनियां माजिवडा| आकारगजु ||६४|| म्हणौनि काळाची सत्ता| हाचि बोलु निरुता| ऐसे वाद पंडुसुता| क्षेत्रालागीं ||६५|| हे बहु उखिविखी| ऋषीं केली नैमिषीं| पुराणें इयेविषीं| मतपत्रिका ||६६|| अनुष्टुभादि छंदें| प्रबंधीं जें विविधें| ते पत्रावलंबन मदें| करिती अझुनी ||६७|| वेदींचें बृहत्सामसूत्र| जें देखणेपणें पवित्र| परी तयाही हें क्षेत्र| नेणवेचि ||६८|| आणीक आणीकींही बहुतीं| महाकवीं हेतुमंतीं| ययालागीं मती| वेंचिलिया ||६९|| परी ऐसें हें एवढें| कीं अमुकेयाचेंचि फुडें| हें कोणाही वरपडें| होयचिना ||७०|| आतां यावरी जैसें| क्षेत्र हें असे| तुज सांगों तैसें| साद्यंतु गा ||७१|| महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च | इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ||५|| इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः | एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ||६|| तरि महाभूतपंचकु| आणि अहंकारु एकु| बुद्धि अव्यक्त दशकु| इंद्रियांचा ||७२|| मन आणीकही एकु| विषयांचा दशकु| सुख दुःख द्वेषु| संघात इच्छा ||७३|| आणि चेतना धृती| एवं क्षेत्रव्यक्ती| सांगितली तुजप्रती| आघवीची ||७४|| आतां महाभूतें कवणें| कवण विषयो कैसीं करणे| हें वेगळालेपणें| एकैक सांगों ||७५|| तरी पृथ्वी आप तेज| वायु व्योम इयें तुज| सांगितलीं बुझ| महाभूतें पांचें ||७६|| आणि जागतिये दशे| स्वप्न लपालें असे| नातरी अंवसे| चंद्र गूढु ||७७|| नाना अप्रौढबाळकीं| तारुण्य राहे थोकीं| कां न फुलतां कळिकीं| आमोदु जैसा ||७८|| किंबहुना काष्ठीं| वन्हि जेवीं किरीटी| तेवीं प्रकृतिचिया पोटीं| गोप्यु जो असे ||७९|| जैसा ज्वरु धातुगतु| अपथ्याचें मिष पहातु| मग जालिया आंतु| बाहेरी व्यापी ||८०|| तैसी पांचांही गांठीं पडे| जैं देहाकारु उघडे| तैं नाचवी चहूंकडे| तो अहंकारु गा ||८१|| नवल अहंकाराची गोठी| विशेषें न लगे अज्ञानापाठीं| सज्ञानाचे झोंबे कंठीं| नाना संकटीं नाचवी ||८२|| आतां बुद्धि जे म्हणिजे| ते ऐशियां चिन्हीं जाणिजे| बोलिलें यदुराजें| तें आइकें सांगों ||८३|| तरी कंदर्पाचेनि बळें| इंद्रियवृत्तीचेनि मेळें| विभांडूनि येती पाळे| विषयांचे ||८४|| तो सुखदुःखांचा नागोवा| जेथ उगाणों लागे जीवा| तेथ दोहींसी बरवा| पाडु जे धरी ||८५|| हें सुख हें दुःख| हें पुण्य हें दोष| कां हें मैळ हें चोख| ऐसें जे निवडी ||८६|| जिथे अधमोत्तम सुझे| जिये सानें थोर बुझे| जिया दिठी पारखिजे| विषो जीवें ||८७|| जे तेजतत्त्वांची आदी| जे सत्त्वगुणाची वृद्धी| जे आत्मया जीवाची संधी| वसवीत असे जे ||८८|| अर्जुना ते गा जाण| बुद्धि तूं संपूर्ण| आतां आइकें वोळखण| अव्यक्ताची ||८९|| पैं सांख्यांचिया सिद्धांतीं| प्रकृती जे महामती| तेचि एथें प्रस्तुतीं| अव्यक्त गा ||९०|| आणि सांख्ययोगमतें| प्रकृती परिसविली तूंतें| ऐसी दोहीं परीं जेथें| विवंचिली ||९१|| तेथ दुजी जे जीवदशा| तिये नांव वीरेशा| येथ अव्यक्त ऐसा| पर्यावो हा ||९२|| तऱ्ही पाहालया रजनी| तारा लोपती गगनीं| कां हारपें अस्तमानीं| भूतक्रिया ||९३|| नातरी देहो गेलिया पाठीं| देहादिक किरीटी| उपाधि लपे पोटीं| कृतकर्माच्या ||९४|| कां बीजमुद्रेआंतु| थोके तरु समस्तु| कां वस्त्रपणे तंतु- | दशे राहे ||९५|| तैसे सांडोनियां स्थूळधर्म| महाभूतें भूतग्राम| लया जाती सूक्ष्म| होऊनि जेथे ||९६|| अर्जुना तया नांवें| अव्यक्त हें जाणावें| आतां आइकें आघवें| इंद्रियभेद ||९७|| तरी श्रवण नयन| त्वचा घ्राण रसन| इयें जाणें ज्ञान- | करणें पांचें ||९८|| इये तत्त्वमेळापंकीं| सुखदुःखांची उखिविखी| बुद्धि करिते मुखीं| पांचें इहीं ||९९|| मग वाचा आणि कर| चरण आणि अधोद्वार| पायु हे प्रकार| पांच आणिक ||१००|| कर्मेंद्रियें म्हणिपती| तीं इयें जाणिजती| आइकें कैवल्यपती| सांगतसे ||१०१|| पैं प्राणाची अंतौरी| क्रियाशक्ति जे शरीरीं| तियेचि रिगिनिगी द्वारीं| पांचे इहीं ||१०२|| एवं दाहाही करणें| सांगितलीं देवो म्हणे| परिस आतां फुडेपणें| मन तें ऐसें ||१०३|| जें इंद्रियां आणि बुद्धि| माझारिलिये संधीं| रजोगुणाच्या खांदीं| तरळत असे ||१०४|| नीळिमा अंबरीं| कां मृगतृष्णालहरी| तैसें वायांचि फरारी| वावो जाहलें ||१०५|| आणि शुक्रशोणिताचा सांधा| मिळतां पांचांचा बांधा| वायुतत्त्व दशधा| एकचि जाहलें ||१०६|| मग तिहीं दाहे भागीं| देहधर्माच्या खैवंगीं| अधिष्ठिलें आंगीं| आपुलाल्या ||१०७|| तेथ चांचल्य निखळ| एकलें ठेलें निढाळ| म्हणौनि रजाचें बळ| धरिलें तेणें ||१०८|| तें बुद्धीसि बाहेरी| अहंकाराच्या उरावरी| ऐसां ठायीं माझारीं| बळियावलें ||१०९|| वायां मन हें नांव| एऱ्हवीं कल्पनाचि सावेव| जयाचेनि संगें जीव- | दशा वस्तु ||११०|| जें प्रवृत्तीसि मूळ| कामा जयाचे बळ| जें अखंड सूये छळ| अहंकारासी ||१११|| जें इच्छेतें वाढवी| आशेतें चढवी| जें पाठी पुरवी| भयासि गा ||११२|| द्वैत जेथें उठी| अविद्या जेणें लाठी| जें इंद्रियांतें लोटी| विषयांमजी ||११३|| संकल्पें सृष्टी घडी| सवेंचि विकल्पूनि मोडी| मनोरथांच्या उतरंडी| उतरी रची ||११४|| जें भुलीचें कुहर| वायुतत्त्वाचें अंतर| बुद्धीचें द्वार| झाकविलें जेणें ||११५|| तें गा किरीटी मन| या बोला नाहीं आन| आतां विषयाभिधान| भेदू आइकें ||११६|| तरी स्पर्शु आणि शब्दु| रूप रसु गंधु| हा विषयो पंचविधु| ज्ञानेंद्रियांचा ||११७|| इहीं पांचैं द्वारीं| ज्ञानासि धांव बाहेरी| जैसा कां हिरवे चारीं| भांबावे पशु ||११८|| मग स्वर वर्ण विसर्गु| अथवा स्वीकार त्यागु| संक्रमण उत्सर्गु| विण्मूत्राचा ||११९|| हे कर्मेंद्रियांचे पांच| विषय गा साच| जे बांधोनियां माच| क्रिया धांवे ||१२०|| ऐसे हे दाही| विषय गा इये देहीं| आतां इच्छा तेही| सांगिजैल ||१२१|| तरि भूतलें आठवे| कां बोलें कान झांकवे| ऐसियावरि चेतवे| जे गा वृत्ती ||१२२|| इंद्रियाविषयांचिये भेटी- | सरसीच जे गा उठी| कामाची बाहुटी| धरूनियां ||१२३|| जियेचेनि उठिलेपणें| मना सैंघ धावणें| न रिगावें तेथ करणें| तोंडें सुती ||१२४|| जिये वृत्तीचिया आवडी| बुद्धी होय वेडी| विषयां जिया गोडी| ते गा इच्छा ||१२५|| आणी इच्छिलिया सांगडें| इंद्रियां आमिष न जोडे| तेथ जोडे ऐसा जो डावो पडे| तोचि द्वेषु ||१२६|| आतां यावरी सुख| तें एवंविध देख| जेणें एकेंचि अशेख| विसरे जीवु ||१२७|| मना वाचे काये| जें आपुली आण वाये| देहस्मृतीची त्राये| मोडित जें ये ||१२८|| जयाचेनि जालेपणें| पांगुळा होईजे प्राणें| सात्त्विकासी दुणें| वरीही लाभु ||१२९|| कां आघवियाचि इंद्रियवृत्ती| हृदयाचिया एकांतीं| थापटूनि सुषुप्ती| आणी जें गा ||१३०|| किंबहुना सोये| जीव आत्मयाची लाहे| तेथ जें होये| तया नाम सुख ||१३१|| आणि ऐसी हे अवस्था| न जोडतां पार्था| जें जीजे तेंचि सर्वथा| दुःख जाणे ||१३२|| तें मनोरथसंगें नव्हे| एऱ्हवीं सिद्धी गेलेंचि आहे| हे दोनीचि उपाये| सुखदुःखासी ||१३३|| आतां असंगा साक्षिभूता| देहीं चैतन्याची जे सत्ता| तिये नाम पंडुसुता| चेतना येथें ||१३४|| जे नखौनि केशवरी| उभी जागे शरीरीं| जे तिहीं अवस्थांतरी| पालटेना ||१३५|| मनबुद्ध्यादि आघवीं| जियेचेनि टवटवीं| प्रकृतिवनमाधवीं| सदांचि जे ||१३६|| जडाजडीं अंशीं| राहाटे जे सरिसी| ते चेतना गा तुजसी| लटिकें नाहीं ||१३७|| पैं रावो परिवारु नेणे| आज्ञाचि परचक्र जिणे| कां चंद्राचेनि पूर्णपणें| सिंधू भरती ||१३८|| नाना भ्रामकाचें सन्निधान| लोहो करी सचेतन| कां सूर्यसंगु जन| चेष्टवी गा ||१३९|| अगा मुख मेळेंवीण| पिलियाचें पोषण| करी निरीक्षण| कूर्
Heh Heh Heh...Teasing There was a little boy named Johnny who used to hang out at the local corner market. The owner didn't know what Johnny's problem was, but the boys would constantly tease him. They would always comment that he was two bricks shy of a load, or two pickles short of a barrel. To prove it, sometimes they would offer Johnny his choice between a nickel (5 cents) and a dime (10 cents) and John would always take the nickel -- they said, because it was bigger. One day after John grabbed the nickel, the store owner took him aside and said, "Johnny, those boys are making fun of you. They think you don't know the dime is worth more than the nickel. Are you grabbing the nickel because it's bigger, or what?" Slowly, Johnny turned toward the store owner and a big grin appeared on his face and Johnny said, "Well, if I took the dime, they'd stop doing it, and so far I have saved $20!"